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सुरेन्द्र कुमार पटेल की लघुकथा - स्वाधीनता

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॰स्वाधीनता॰
 
         स्वाधीनता दिवस के एक दिन पहले ही बता दिया गया था कि सभी बच्चे
साफ-सुथरे गणवेश में स्कूल आएंगे। झण्डा ऊँचा मनाया जाएगा,प्रभात-फेरी
निकाली जाएगी और अंत में बूंदी बांटी जाएगी।


           रतनलाल के दो बेटों में से एक ही स्कूल जाता था। जो स्कूल जाता
,वह भी कभी-कभार ही ।बाकी के दिनों में घर में रहकर अपने छोटे भाई की देखभाल करता


       मगर आज झण्डा ऊँचा है। आज वह अवश्य  स्कूल जाएगा और खाली हाथ
झुलाता जाएगा।दोनों हाथ ऊपर करके कहेगा,'महात्मा गाँधी की जय' 'स्वाधीनता
दिवस अमर रहे'।


         वह भीतर जाकर मां से पूछा-'मां  ,मैं आज स्कूल जाऊं?' मां ने कहा-'हां
,बेटे जाओ।' तभी उसके पिता रतनलाल की नजर  पड़ी। पूछा-' साहबजादे ! कहां
चले?' उसने सहमकर जवाब दिया, 'पापा ,स्कूल!आज झण्डा ऊंचा है!' रतनलाल
तुनककर बोले,'झण्डा ऊंचा होगा जिसका ,उसका।तेरी माई जाएगी मेरे साथ मजूरी
पर। तू घर में रहकर छोटे को संभाल।' मां ने पक्ष लिया। कहा-'जाने दो बेचारे को ।'
इस पर रतनलाल  द्रवित हुए।


बोले-'. . .तो छोटे को भी लेता जाए।'


         बेचारा सात साल का लड़का ,डेढ़ साल के लड़के को कांख में दबाए
प्रभात- फेरी में सब बच्चों के पीछे- पीछे चला जा रहा था। कभी तो उसको
लगता ,वह वहीं से घर लौट जाए पर  ध्यान  आया बूंदी रोज थोड़े ही बांटी
जाती है ।वह बीच-बीच में कांख से उतारकर हाथों को आराम दे लेता। कुछ दूर
पैदल चलाने की कोशिश करता। मगर तब तक वह और बच्चों से काफी पीछे छूट
जाता। फिर से उसे कांख में दबा दौड़ता।सब बच्चे दोनों हाथ ऊपर उठाकर  'अमर
रहे' कहते तो वह भी रुआंसा कहता,'झण्डा ऊंचा-अमर रहे।'
-0-

॰सुरेन्द्र कुमार पटेल
वार्ड क्रमांक-4,ब्योहारी
जिला-शहडोल ,मध्यप्रदेश।
पिन-484774 (भारत)
ईमेल:
surendrasanju.02@gmail.com

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