फहीम अख़्तर की कहानी - देवदासी

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देवदासी फोन की घंटी काफी देर से बज रही थी ।   करम ने जैसे ही ‘हैलो!' कहा समीर चिंघाड़ने लगा। “यार, मैं इतनी देर से फोन किये जा रहा हूँ...

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देवदासी

फोन की घंटी काफी देर से बज रही थी  करम ने जैसे ही ‘हैलो!' कहा समीर चिंघाड़ने लगा। “यार, मैं इतनी देर से फोन किये जा रहा हूँ तुम रहते कहाँ हो मियाँ?” करम ने समीर को धीमे से समझाने की कोशिश की कि मेरी आँख लग गई थी। मगर समीर, उसकी बात सुनने को तैयार नहीं था। समीर ने अपनी कड़क आवाज़ में उसे हुक्‍म सुना दिया कि रविवार की शाम घर आ जाना। मैंने अपने कुछ दोस्‍त घर बुलाये हैं। ठीक 6 बजे पहुँच जाना। करम ने समीर से पार्टी में आने का वादा कर लिया। पार्टी में करम का शामिल होना समीर की ज़िद थी। लेकिन कुछ ही देर बाद पार्टी के दिखावटी माहौल में करम का दम घुटने लगा। और करम ने जल्‍दी से एकांत कोना पकड़ लिया और अपनी तन्‍हाई को शराब में डुबाने की कोशिश में लग गया।

अभी थोड़ा नशा चढ़ा ही था कि एक मासूम मोहनी आवाज़ ने उसे चौंका दिया। सुनिये करम ने मुड़कर देखा तो एक सुंदर, साँचे में ढ़ला रेशमी बदन जो साड़ी की पकड़ से बाहर झाँकता हुआ, हर व्‍यक्‍ति की तव्‍वज़ो (ध्‍यान) का केन्‍द्र बना हुआ था। करम के सामने खड़ा था, तन्‍हाई और नशा दोनों ही एक साथ बिदा हो गये। उसके कानों में वही मासूम आवाज़ टकराई- “आप अकेले हैं?”

उसके मुँह से अचानक निकल गया- “जी नहीं, आप जो मेरे साथ हैं।” शायद उसे करम की हाज़िर जवाबी भा गई। बड़ी अपनाइत से कुछ कहना चाहा- तभी करम ने पहल की- “मुझे करम कहते हैं”। इससे ज़्‍यादा करम को अपने नाम की तफ़्‍सील में जाना अनावश्‍यक (गैरज़रूरी) लगा।

उसने कहा, “और आपका नाम?”

“कामा, वैसे मुझे लोग देवदासी भी कहकर पुकार लिया करते हैं।” कामा और देवदासी का मिलान करम के कानों को ज़रा अजीब सा लगा।

“आइये आइये, यहाँ तशरीफ़ रखिए, आपका ग्‍लास लगभग ख़ाली है।” करम उस समय तक अपनी तन्‍हाई और माहौल की उकताहट से पूरी तरह से मुक्‍त हो चुका था, और बातचीत में बेबाकी सी आ गई थी। “कामा ने मेज़ से बोतल उठाकर करम का ग्‍लास अपने मेहंदी युक्‍त हाथों की एक जुंबिश से पुर कर दिया। “आप बुरा तो नहीं मानेंगे कि मैं,.. और उसने करम की आँखों में देखकर फिर अपना वाक्‍य पूरा करने की ज़रूरत महसूस नहीं की। करम की ख़ामोशी उसके अन्‍दर चीख़ रही थी कि “एक ग्‍लास तो क्‍या, तुम पूरा समुद्र मुझमें भर दो तो भी मेरी जान, मैं बुरा नहीं मानूँगा”- उसका मन भर का सर हिल रहा था, लेकिन उसकी ज़बान जैसे गूंगी हो गई थी। आख़िरकार बेचैनी भरी ख़ामोशी को तोड़ने के लिये कामा ने ही पहल की-

कामा -“लगता है आपको ख़ामोशी ज़्‍यादा पसंद है?” हालांकि उसके होंटों की हरकत करम को उसकी ख़ामोशी से कहीं ज़्‍यादा पसंद थी। करम ने उसके सवाल के जवाब में अपना एक सवाल दाग़ दिया है।

करम - “आप कामा हैं या देवदासी?”

कामा - “कामा? हाँ देवदासी, और अगर सच पूछिये तो मैं एक कहानी हूँ। अगर वास्‍तव में आप इसको जानना चाहते हैं तो आपको मेरे लिये कुछ समय निकालना होगा।” करम ने फौरन कहा, बिल्‍कुल! आप ही समय और जगह तय कर लीजिये, बंदा हाज़िर हो जायेगा।” उसने बात गहराई को समझते हुए स्‍वीकृति का रंग देते हुए अपने घर आने का न्‍यौता दे डाला।

कामा -“मेरे फ्‍लेट पर शायद ठीक रहेगा?” इस तरह कुछ पलों की बेचैन ख़ामोशी ने पहचान का एक रास्‍ता तय कर दिया फिर वह पार्टी के शोर शराबे वाले माहौल में गुम हो गई। करम सिर्फ मुलाक़ात का वादा लिये पार्टी के हंगामे को छोड़कर अपने घर की ओर चल पड़ा मगर उसका दिमाग़ याकि हज़ार अन्‍जान बातें जानने की उलझन में उलझा था। हफ़्‍ते बीत गये परन्‍तु दिल दिमाग़ एक विचित्र प्रकार की बेचैनी की अवस्‍था में डोल रहे थे। आख़िरकार करम ने एक दिन समीर को फोन लगाकर बिना बात को विस्‍तार दिये ‘कामा' का पता और फोन नम्‍बर हासिल कर लिया और फौरन कामा को फ़ोन लगा दिया। वहाँ से आवाज़ आई।

कामा-“हैलो, कामा स्‍पीकिंग, कौन साहब बोल रहे हैं?”

करम - “हाय कामा, मैं करम बोल रहा हूँ पहचाना?'

कामा- “ओह करम! कैसे याद कर लिया?'

करम - “क्‍या करूँ? तुमने खुद को कहानी बनाकर पेश किया और अब मैं कहानी सुनने के शौक से मजबूर हो गया हूँ।”

कामा- “तो कल पधारिये मेरा पता है फ़्‍लैट नं. 9......।”

करम - “हाँ मैं अच्‍छी से जानता हूँ- तो कल मुलाक़ात होगी- बाय।”

करम इस समय काफ़ी नर्वस था उसकी आवाज़ उसकी बेकरारी को ज़ाहिर कर रही थी, बहरहाल वह एक स्‍त्री है और इसी नाते वह उसकी बेचैनी और वासना के इज़हार के तजुर्बे से पूरी तरह से परिचित होगी। इस सोच से उसके दिल को थोड़ी ढ़ाँढ़स बंधी।

करम दूसरे दिन शाम को उसके फ़्‍लेट पर था। बाहर से तो जगह कुछ यूँ ही थी मगर अन्‍दर की शानो शौकत और सजावट ने करम को अचंभे में डाल दिया। कामा की तरफ से पुर तपाक स्‍वागत मिला। करम धीरे-धीरे ग़र्मजोशी और परिचय की तपिश में पिघलने लगा। कामा सोफ़े पर बैठे करम के कानों में अपने होंटों का रस घोल रही थी। वो क्‍या थी? सर से पैर तक एक कहानी थी और करम अपनी प्‍यासी आँखों में कहानी के हर उतार चढ़ाव को बेतहाशा समो रहा था। कामा हर एंगिल से एक ग़ैर मामूली आकर्षक और दुनिया देखी हुई व्‍यक्‍तित्‍व थी। कमरे में रोशनी और हल्‍के अन्‍धेरे का अजीब लेकिन सुन्‍दर मेल था। उसके तन का कुंदन उसकी कमलिबासी में झलक रहा था। ढ़लती शाम का वक़्‍त जैसे थम सा गया हो- बातों का एक सिलसिला था जो शराब नोशी के साथ-साथ बढ़ता चला जा रहा था। फिर भी करम की जिज्ञासा ख़त्‍म होने का नाम नहीं ले रही थी। करम जानना चाहता था कि कामा और देवदासी के मिलाप की हकीक़त का राज़ क्‍या है? बातचीत के मध्‍य उसके मुँह से ये सुनकर करम बिखर सा गया कि- “मैंने भगवान से जन्‍म लिया है इसलिये मेरी काया भगवान वालों के लिये है।” करम ने उलझन भरे लहजे में कहा।

करम - “मैं समझा नहीं, भगवान की बातों से मैं बिल्‍कुल अंजान हूँ।”

उसने करम की सादगी या अज्ञानता पर अजीब ढं़ग से घूर कर देखा- फिर फौरन ही मुस्‍कुराकर आँखें झुका लीं। करम ने उसे यक़ीन दिलाया कि वाकई वो नहीं जानता भगवान वालों से क्‍या मुराद है?

कामा- “मुझे देवदासी इसलिये कहते हैं कि मेरे जन्‍मदाता शिव और कामा थे- मैं देवा की दास हूँ। मेरा धर्म है कि मैं अपनी आत्‍मा और शरीर को लोगों के लिये भेंट करूँ। यही हमारा कर्म है।” एकवचन अब बहुवचन में परिवर्तित हो चुका था उसने एक ही साँस में बिना किसी झिझक और डर के साफतौर पर याद किये हुए सबक की तरह दोहरा दिया। करम की समझ में नहीं आ रहा था कि किस तरह अपनी प्रतिक्रिया दे। कामा द्वारा विस्‍तार पूर्वक दिया गया बयान उसकी अक्‍ल के लिये किसी पहेली से कम नहीं था- उसने हिम्‍मत करके उससे और अधिक जानने की कोशिश की।

करम- “तो क्‍या देवदासी बनकर अपने शरीर को दूसरों में बाँटना, देवा कृपा की भक्‍ति करने के बराबर है?” कामा ने यह सुनकर कड़वी मुस्‍कुराहट से जवाब दिया।

कामा- “हाँ! हमारे यहाँ भोग, भक्‍ति और सेवा का एक ही रूप है।”

करम को यूँ लगा धर्मात्‍माओं, ऋषियों, फ़लसफ़ियों के प्रचार की तमाम नैतिक और धार्मिक मान्‍यतायें अचानक बेइज्‍ज़त होकर गिर गई हों- वो इस विषय पर और कुछ पूछने सुनने से बचना चाहता था। लेकिन कामा में बला की हिम्‍मत और आत्‍मविश्‍वास था और करम उसके सामने एक कमज़ोर गोश्‍त का ढेर था। उसने करम की जिज्ञासा की आग को बुझाने में खुद मदद की और करम का हाथ थामकर सोफ़े पर बिठाया, जैसे किसी गिरते को सहारा देकर कोई ढाँढ़स बँधा दे। करम ने उसकी हस्‍ती श्रद्धा और यक़ीन की पूर्णता पर बहस करना चाही। मगर करम ने उस शाम के ढ़लते साये और नशे की दम तोड़ती फ़िज़ा से बाहर निकलना आतिथ्‍य के उसूलों के खिलाफ़ समझा, परिणाम स्‍वरूप अपने धार्मिक और नैतिक मान्‍यताओं का कम्‍बल लादे उसके फ्‍लेट से बाहर निकल आया। कामा से मुलाक़ात करम के लिये ज़िन्‍दगी का ख़तरनाक तजुर्बा थी।

उस शाम के बाद एक लंबा अरसा गुज़र गया लेकिन करम की सोच लगातार उसके मस्‍तिष्‍क से चिपकी रही। करम दिन भर यूँ तो हमेशा रोज़गार के कामों में लगा रहता परन्‍तु फुर्सत के पलों में कामा का वो कथन उसके दिमागी वजूद पर बुरी तरह से पत्‍थर बरसाता।

इस शाम के बाद के बाद करम के दिमाग़ में बस एक ही बात घूम रही थी कि देवदासी और कामा का रिश्‍ता क्‍या है?

आज करम जैसे ही काम पर से घर लौटा स्‍थानीय अख़बार का एक ढेर सामने जमा था। करम इत्‍मीनान से उन्‍हें पढ़ने में व्‍यस्‍त हो गया। कुछ ही देर में उस की नज़रों से एक इश्‍तिहार गुज़रा जिसे पढ़कर करम सकते में आ गया।

“शरीर और आत्‍मा की राहत, एक भरपूर देवदासी।” मिलने का पता... इश्‍तिहार पढ़कर करम की बेचैनी और बढ़ गई।

आज ऑफिस से घर जाने के बजाय करम सीधे देवदासी के घर की तरफ चल पड़ा- दस्‍तक देकर कुछ देर तक इंतज़ार करने के बाद देवदासी ने दरवाज़ा खोला। करम को देखते ही उसके चेहरे पर आश्‍चर्य के भाव ज़ाहिर हुए। फौरन ही दरवाज़े से हटकर करम को अन्‍दर आने के लिये जगह दे दी। सोफे पर बिठाते हुए उसने कहना शुरू किया-

कामा- “तो आपकी दिमागी उलझन ये है कि आप जानना चाहते हैं कि मैं क्‍यों और कैसे देवदासी परंपरा को अपना कर जी रही हूँ?” उसने करम के सवाल को आज बिना पूछे ही समझ लिया था। करम सोफे पर बैठा उसे सुन रहा था।

कामा- (अपनी बात को आगे बढाते हुए) “तो सुनिये मैं भी एक आम बच्‍ची की तरह जन्‍मी थी। मगर हालात और ग़रीबी ने मुझ देवदासी बना दिया। मेरी माँ का मेरे बचपन में ही स्‍वर्गवास हो चुका था। बहुत दिनों तक पिता ने मेहनत मजदूरी करके घर का ख़र्च चलाया था। पर भाई बहनों का ख़र्च और पिता के खराब स्‍वास्‍थ्‍य ने हमारी गरीबी को और भी संगीन बना दिया। कुछ हद तक पढ़ाई पूरी करने के बाद मुझे लन्‍दन आने का मौका मिला। काम की तलाश में कई दिनों तक भटकना पड़ा। जिसमें हफ़्‍तों गुजर गये और जब मेरे सब्र का पैमाना लबरेज हो गया तो मैंने फैसला कर लिया और अपना वजूद बचाने के लिये मैं देवदासी बन गई। इस तरह....।” तभी डोर बेल बज उठी। उसकी बात बीच ही में रह गई। उसने उठकर दरवाजा खोला सामने कोई ग्राहक खड़ा था वो उसे लेकर दूसरे कमरे में चली गई। करम बेबसी से देखता रहा। और एक हारे और बेबस इन्‍सान की तरह कमरे से फौरन बाहर निकल आया और तेज़ कदमों से लन्‍दन के फुटपाथ पर चलने लगा।

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नाम

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फहीम अख़्तर की कहानी - देवदासी
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