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राजीव आनंद की कविताएँ

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लब तेरे


तेरे लबों की कसम प्‍यारे है दोनों
तेरे झील सी आंखों से भी न्‍यारे है दोनों
लबों की रंगत के गुलाब हो जैसे
बोल तेरे लबों की झरती पंखुरियां वैसे
उधर लब तेरे खुशी का पैगाम लाए
इधर हयात मेरी गमों को भूल सा जाए
लबों ने तेरे यूं करिश्‍मा दिखाया
एक बेवफा को बदलकर बावफा बनाया
लबों के तेरे जो तलबगार हो गया
उसे हयात में रब से मुलाकात हो गया
खुद को लबे तमन्‍ना में फना कौन करेगा ?
दीवाना हो, सौदाई हो और कौन मरेगा !

मकसद-ए-हयात


भटकता रहा मैं इस हयात में
हर पल एक खुशी की तलाश में
साधक बना विकट कामना थी मेरी
कोई दुखी न रहे अपने हयात में
चुभा कांटा निकाला था बच्‍चे का एक दिन
बेशुमार खुशियां आयी थी अपने हयात में
रोते एक शख्‍स को हंसा दिया था एक दिन
जश्‍न मनाया इतनी खुशियां मिली हयात में
गम खत्‍म बेजारों का गर कर सकूं
जीने का मकसद मिल जाए इस हयात में

राजीव आनंद
प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरगंड़ा
गिरिडीह, झारखंड़ 815301

1 टिप्पणियाँ

  1. पुरुषों की ऐसी कोमलता समाज की आवश्यकता है ..साधुवाद।।अपने स्नेह को सींचते रहिये

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