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प्रभुदयाल श्रीवास्तव के बाल-गीत

 

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अनुशासन तोड़ा मिली सजा


खड़ी परीक्षा सिर पर थी,दिन महज बचे थे चार।
भालू को पढ़ने न देता ,रूम पर्टनर सियार।


नोट्स किया करता भालू, जैसे तैसे तैयार।
फाड़ फूड़कर सियार भाई,कर देते सब बेकार।।


कड़क जेब थी भालू भाई, लाये पेन उधार।
ज्योंहि मौका मिला सियार को ,पेन कर दिया पार।।


कष्ट देखकर‌ भालू का, मित्रों ने किया विचार।
भालू दादा सीधे सादे,सियार बड़ा मक्कार‌।।


सबने डांटा सियार‌ भाई को,मत बन तू होशियार।
अगर नहीं अब भी तू सुधरा ,तुझे पड़ेगी मार।।


जो अनुशासन नहीं पालता,करता गलत व्यवहार।
उसे हटाने प्रिंसपाल को मिला हुआ अधिकार।।


समझाने पर भी न माना, जब वह ढीठ गवाँर।
प्रिंसपाल गजराज भाई ने, उसको किया डिबार।।

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दादी बोली


जितनी ज्यादा बूढ़ी दादी,
दादा उससे ज्यादा।
दादी कहती 'मैं' शहजादी,          
और दादा शह्जादा।
दादी का यह गणित,
नातियों पोतों को न भाता।
बूढ़े लोगों को क्यों माने,
शह‌जादी ,शहजादा।
दादी बोली,अरे बुढ़ापा,
नहीं उमर से आता।
जिनका तन मन निर्मल होता,
वही युवा कहलाता।

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