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मनोज 'आजिज़' की नज्म - कश्मकश

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नज़्म 

कश्मकश 

       -- मनोज 'आजिज़'

बैठा, ख़ास मिजाज़ लिए 

की कुछ ख़ास अहसासों को 

ज़ब्त करूँगा 

किसी नज़्म या ग़ज़ल में 

बैठा,  बैठा ही रह गया 

ज़ेहन में कई ख़यालात 

रस्सा-रस्सी खेलते हुए 

आकर ठहर गए 

हैवानियत और इंसान 

के बीच रिश्ते को सोचकर ।

और इस बात पर भी कि --

चमक में मस्त,खोये लोग 

क्या नज़्म या ग़ज़ल को 

वक़्त दे पाएंगे?

जीने की दौड़ में 

क्या अदब छुट नहीं गया 

काफ़ी पीछे 

पुराना तमाशा जैसा !

बस, कलम और कागज़ भी 

कश्मकश में रहे 

कि शायद 

आज कुछ 

अच्छे ख़याल बांधूं

--

जमशेदपुर झारखण्ड 

09973680146

5 टिप्पणियाँ

  1. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 19/01/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  2. बहुत खूब ... कागज़ कलम की कशमकश ...

    जवाब देंहटाएं

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