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गिरिराज भंडारी की तीन ग़ज़लें

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ग़ज़लें

( 1)

वो असला मौन कोने में पड़ा है।

 

वज़न कंधों में सबके आ पड़ा है ,

कितना बेरहम ,कितना बड़ा है ।

 

कोई भूखा है ठंडी में अकड़ते,

संसद में अभी ताला पड़ा है ।

 

सियासी रोटियां सिकने लगी है ,

तवा भी गर्म और काफ़ी बड़ा है।

 

सशंकित हूँ मै, कुछ उत्तर नहीं है ,

विचारों का अभी अंतर अड़ा है ।

 

कहीं पे गिर न जाए सच हमारा,

वो जिसपे बैठा है, उल्टा घड़ा है ।

 

वो खा पाएंगे,इसमें शक मुझे है,

ये सच तो स्वाद में कड़वा बड़ा है।

 

जिसपे था यकीं ये कारगर है ,

वो असला मौन कोने में पड़ा है।

 

 

(2)

मैं सच कहूँगा

 

आँखे बंद कर के यूँ चादर ना तन लो ,

मैं सच कहूँगा आके सब मेरा बयां लो ।

 

प्रकाश आज भी वही सूरज भी वही है ,

आखें खुली रखने की एक शर्त मन लो ।

 

अकेले किसी के घर नहीं आते हैं,ये दोनों,

दुख लंगड़ा,अंधी ख़ुशी ये बात जान लो।

 

यूँ ही मिले से चीज़ की कीमत नहीं होती,

पाने के लिए भाई जी,कुछ तो थकान लो।

 

भीड़ में तो भीड़ का हिस्सा ही रहोगे ,

ऊँचे में जाके तुम कहीं अपना मचान लो ।

 

बिन मांगे तो खुदा भी कुछ देते नहीं यारों,

तुम भी कहो,गूंगे हो तो मेरी जुबान लो ।

 

( 3 )

हर दिन नया घुमाव है

प्राप्त स्वाद खो चुके ,अप्राप्त से खिंचाव है ,

अपनों से बेरुखी यहाँ ,गैरों का रख रखाव है ।

 

भूलना चाहूं भी तो ,हर घाव है हरा अभी ,

टीसता है हर घड़ी ,बाक़ी अभी रिसाव है ।

 

उथलों में कब रुक है वो, बह के दूर जा चुका,

गहरी ज़मी मिली जहाँ उस जगह जमाव है ।

 

भाषा बड़ी तटस्थ थी, हाव भाव संतुलित ,

आंखे बयान कर गयी,किस तरफ़ झुकाव है ।

 

चंचल बड़ी है ज़िंदगी,तय यहाँ कुछ भी नहीं,

हर दिन है नए रास्ते,हर क्षण नया घुमाव है

--

गिरिराज भंडारी

1A /सड़क 35 /सेक्टर 4

भिलाई ,जिला -दुर्ग (छ.ग.)

ग़ज़लें 8705346705539229426

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