रमाशंकर शुक्ल का संस्मरण - मेरे भीतर का जंगल

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संस्मरण मेरे भीतर का जंगल दैनिक जागरण समूह ने मुझे प्रमोट कर कलकत्ता का ब्यूरो चीफ बना दिया। मन में विशिष्टताबोध जागा। मई २००४ का महीना थ...

संस्मरण

मेरे भीतर का जंगल

दैनिक जागरण समूह ने मुझे प्रमोट कर कलकत्ता का ब्यूरो चीफ बना दिया। मन में विशिष्टताबोध जागा। मई २००४ का महीना था। वेतन दोगुना हो गया। सम्पादक का स्तर मिल रहा था तो ख़ुशी क्यों न हो। पत्नी की ख़ुशी का ठिकाना न था। लम्बे समय की रेगिस्तान के बाद जंगल की हरियाली दिखी थी। घर का सामान पैक हो गया। तय किया कि सप्ताह भर बाद आऊंगा फिर सबको ले चलूँगा। तब तक मकान भी मिल जायेगा। सम्पादक आलोक मिश्र, प्रबंधक विमल कुमार दुबे और मै स्टील सिटी से जमशेदपुर से रवाना हुए। गर्मी में भी ठण्ड महसूस हो रही थी। एसी का तापमान ज्यादा था। कलकत्ता में दफ्तर की गाडी स्टेशन पर आ गयी। बाहर क्या है, पता ही न चला। उतरे तो एल्गिन रोड स्थित भव्य मकान। दफ्तर में घुसे तो सब ने बा-अदब सम्मान किया। ५६ हजार महीने का कार्यालय और २५ लोगों का सम्पादकीय स्टाफ। संपादक जी मेरी और देख मुस्कुराये, मानो कह रहे हों कि ले बेटे अब तू मेरे पैरलर हो गया। जम गए तो अगला पड़ाव संपादक का ही होगा। अमर उजाला में संपादक रह चुके हरिवंश तिवारी को यहाँ से जाने की हड़बड़ी थी। आखिर उनका भी तो प्रमोशन हुआ था पटना में समाचार सम्पादक के रूप में।

फुरसत मिली तो धीरे से निकल लिया बाज़ार। एक शो रूम से दो कपडे भी खरीद लिए। फुटपाथों पर ठेले देख तसल्ली हुई कि चलो यहाँ भी लखनऊ जैसी सुविधा। भूख लगने पर आम आदमी भी थोड़े पैसे में पेट भर लेगा। सोच कर ही भूख जाग गयी। ठेले के पास पहुंचा तो नशा किर्र हो गया। हर ठेले पर मछली और चिकन के साथ चावल-पूड़ी। आगे बढ़ा तो मछली मंडी। फिर तो कुछ खाने सवाल ही नहीं। मन का तर्कशास्त्र एकदम अलग। मछली शाकाहारी हो ही नहीं सकती। एक बार शराब तो पी भी लूँगा, काहे की उसमे किसी की हत्या नहीं हो रही। पर अंडा-मांस! ना बाबा ना। जीते जी अपनी ही नजर में मर जाऊँगा। लोग कहे या न कहें, अपनी आत्मा तो कह रही है न! सड़क पर चले जा रहे थे पर आँखों में मरी मछलियाँ और उन पर भिनभिनाती मक्खियाँ रह रह उभर आतीं। महसूस होता जैसे अभी-अभी मछली खा के लौटा होऊ। वे पेट में क्रंदन कर रही हैं और उनकी माएं तड़प रही हैं। मन अशांत हो गया। पान की दुकान से एक पान ले मन बहलाने की कोशिश की पर पान का रंग खून मालूम हुआ। भारी विचलन लिए लौट आया। संपादक जी भोजन के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे, पर मैंने विनम्रता से नकारना चाहा। प्रसून वाजपेयी ने सवाल दागा, भोजन तो किये नहीं हैं आप, फिर क्यों नहीं खायेंगे? अब इसके बाद कुछ कहना नौटंकी होती। सो चुपचाप चल दिया। रास्ते में प्रसून को हिदायत दी, शुद्ध शाकाहारी में चलियेगा। वो बन्दा पूरा घुटा हुआ पत्रकार। बोला, घबराइये नहीं, मैं भी ब्राह्मण हूँ, मेरे घर में लहसुन-प्याज तक नहीं बनता। तसल्ली हुई, कोई तो विश्वास का आदमी मिला। प्रसून हमें एक आलिशान होटल ले गए। सफाई देख तबियत खुश हो गयी। पर यह क्या, यहाँ तो बोतल रखी हैं! संपादक जी से बचते हुए प्रसून के कान में मैंने फुसफुसाया, तब तो यहाँ मांसाहार भी चलता होगा? उन्होंने धीमे से कहा, उसका किचेन अलग है।

बस फिर क्या, जिद पर उतर आया, खाना नहीं खाऊंगा। संपादक जी अब तक समझ चुके थे। खिसिया गए, तू यहाँ भी ......?

अब क्या कहें, भैया मुझसे नहीं चल पायेगा। आखिर जगह और बर्तन तो सब एक ही हैं।

सांझ हुई तो हमें गेस्ट हाउस चलने को कहा गया। इसलिए कि हर जगह और काम देख-भाल लूं। स्थानीय स्टाफ चला गया और परदेशी निकले एक साथ। बस आई और हम सवार हो चल पड़े। रास्ते में जहाँ भी देखो लोहे का साम्राज्य। फुटपाथ पर असंख्य नरमुंड। सब बस चले जा रहे हैं। कहाँ? कौन जाने। बिहारी, बंगाली, उड़िया युपियन। सूखे हुए चेहरे और बुझी हुई आत्माएं। जैसे चल रही हों छायाएं। हर एक किलोमीटर पर गाड़ियाँ एक दूसरे को दरकचती आगे बढ़ने की प्रतियोगिता में लाल बत्ती के आगे बेबस हो एक दूसरे को खूनी निगाह देखती महसूस होतीं। घंटे भर की धमाचौकड़ी के बाद हुगली स्टेशन। अन्दर दौड़ते हुए सब बिलबिलाने लगे। मुख्य द्वार जैसे किसी राक्षस की तरह लोगों को लील रहा हो और कुचल कर थूक दे रहा हो। सुरंग के दोनों और कितने ही लोग बेसुध पड़े-पड़े सो रहे हैं। इसी में किसी को पेशाब लग गयी तो उसके सर के पास लगा मूतने। सोने वाला बेखबर। अचानक हरवंश तिवारी हमारा हाथ पकड़ दौड़ पड़े। क्या हुआ? कुछ नहीं, इधर-उधर ताकते ही रह गए तो ट्रेन छूट जाएगी।

ओह, हम दौड़ते रहे। दौड़ते रहे। स्टेशन में जैसे भूसा भर दिया गया हो। जैसे दुनिया का हर भूखा नंगा यही चला आया हो। ट्रेन आई कि भल्ल से उगल दी हजारों नरमुंड। बाहर रेलमपेल मच गयी। क्या औरत क्या पुरुष, सभी एक दूसरे को रगड़ते हुए ट्रेन दानव के मुंह में समाने के लिए परस्पर धकेल रहे हैं। मेरी सांस अटक गयी। हिम्मत पश्त। सभी साथी अन्दर दाखिल हो चुके थे, पर मैंने तय कर लिया कि इससे नहीं जाऊँगा तो फिर बाहर ही खड़ा रह गया। रात के नौ बज चुके थे। ट्रेन आती और चली जाती, पर सबका मंजर एक।

हम नहीं चढ़ पाए। हरिवंश तिवारी जी संयम टूट गया। भला कितनी देर इंतज़ार करते। इस बार उन्होंने मजबूती से मेरी कलाई पकड़ी और ट्रेन आते ही खींच ले गए। मै अकबका गया। पर एक आपरेटर ने मेरे लिए जगह घेर रखी थी। चलो, थोड़ी मुसीबत तो आसान हुई, लेकिन पूरा शारीर पसीने से लथपथ था। आसपास बैठे पुरुष-महिलाओं की देह से विचित्र गंध नाक में घुसी जा रही थी। पता नहीं क्यों, नाक में मछली की गंध किधर से घुसी जा रही थी। हम भीतर से हिम्मत खोते जा रहे थे। आपरेटर से पूछा, आप लोग रोज ऐसे ही यात्रा करते हो? वह जमशेदपुर से ही आया था, प्रकृति से परिचित था। बोला, भैया आपने यहाँ का प्रभार क्यों स्वीकार लिया?

क्यों?

कहने को वेतन दो-गुना हो गया, पर जानते हैं यहाँ मकान बहुत महंगा है।

तो क्या हुआ, भत्ता भी तो पांच हजार है।

उससे क्या हो जाएगा। यहाँ तो पगड़ी ही ५० हजार देनी पड़ जायेगी। फिर पांच हजार में दरबे जैसा ही मकान मिलेगा। यह जमशेदपुर थोड़े ही है। बड़ी मुश्किल से दो कमरे मिलेंगे। वह भी कम से कम १० किलोमीटर दूर।

हे भगवान यह एक नयी समस्या। दोनों बेटियां अभी छोटी-छोटी। पत्नी कभी महानगर घूमी नहीं हैं। कभी बीमार हुई तो कितनी दूर दौड़ेगी! अखबार की जिंदगी व्यस्तता भरी, कभी कोई दुर्घटना हो गयी तो पहुचने में ही घंटों लग जायेंगे। फिर क्या अब नियति में प्रकृति से दूर ही रहना ही लिखा है क्या! बचपन खांटी जंगली गाँव में गुजरा। मिर्ज़ापुर शहर भी प्रकृति से दूर नहीं। हर ओर जंगल-पहाड़, नदियाँ-झील। पठार-मैदान। क्या नहीं है वहां। शहर से जी ऊबा तो चंद किलोमीटर चल किसी वृक्ष की छाँव और किसी झील के कलरव में विराम कर लो। जमशेदपुर भी कम प्राकृतिक नहीं। वह भी तो प्रकृति की गोंद में बसा प्राकृतिक नगर। मन करे तो सारंडा के जंगल चले जाओ। दलमा पहाड़ पर शिव को प्रणाम कर पहाड़ियों की श्रृंखलाओं को अपलक निहारते हुए विश्व चेतना से साक्षात्कार कर लो। कराईकेला, जराईकेला, नोवामुंडी, किरीबुरू, चक्रधरपुर, घाटशिला, सरायकेला, खरसावा, चाईबासा आदि घूम आओ। हर जगह प्रकृति और पखेरू, सीधे-भोले लोग मिल जायेंगे। पर कलकत्ता! मशीनों का महानगर। हताश-परेशान जिंदगी की परछाइयाँ, कीड़े-मकोड़ों की तरह बिलबिलाती जिंदगी, जहाँ खुद के मनुष्य होने पर भ्रम होने लगे। क्या रोटी इतनी महत्वपूर्ण है कि आत्मा को रुलाते हुए जीना जरूरी हो जाये! आँखों में बचपन से लेकर आज तक के अपने लोग, उनकी प्राकृतिक हंसी, बोली-बानी, सुबह की ताज़ी हवा सी बहती जिंदगानी मचलने लगी।

ट्रेन रफ़्तार भरते हुए दौड़ती और कुछ ही मिनट बाद हांफते हुए रुक जाती। सवारियां लीलती और कुछ उगलकर फिर दौड़ पड़ती। अनजाने चहरे चढ़ जाते और  बेगानी सूरतें उतर जाती। सात स्टेशन बाद आपरेटर बोला, भैया उतरिये। स्टेशन आ गया। एक कस्बानुमा जगह पर ज्यों ही पाँव रखे कि मछली का भस्सा नाक में घुस गया। कही फिर मन का भरम तो नहीं! नहीं, सामने विशाल मछली मंडी। शायद वहां के निवासियों के लिहाज से बनायीं गयी थी। ताकि लोग लौटें तो साग-सब्जी की खरीदारी करते हुए   घर चले जाएँ। हरिवंश जी सबसे आगे तेज डग भरते चल दिए। शेष लोग उनका अनुशरण करते जा रहे थे। खामोश। मछलियाँ कुछ तड़पते हुए तो कुछ कटी मरी हुई। मक्खियाँ भिनभिना रही थीं और उससे ज्यादा लोग भिनभिना रहे थे। न चाहते हुए भी नजरें उस ओर खिंच जाती। कुछ मछलियाँ तो 1२ साल के बच्चों के बराबर जमीन पर बिछी प्लास्टिक पर पड़ी दिखीं। उफ़, हे राम! आदमी और इस मछली के शरीर में क्या फर्क है। क्या मानव मछलियों की तरह बच्चों को भी खा सकता है! करीब आधा किलोमीटर की मछली मंडी मन के भीतर फ़ैल गयी। एक पीसीओ दिखा तो आपरेटर को रोक लिया, रुको, संपादक जी से बात करनी है।

वह मेरी अटैची लिए बाहर खड़ा हो गया। मैंने केबिन में घुस सीधे संपादक जी को फोन लगाया। उधर से हेल्लो की आवाज के साथ ही जुबान लडखडा  गयी, भ ......भैया, म .....मैं रमा।

हा हा बोलो।

भैया, मैं यहाँ काम नहीं करूँगा। हिम्मत के साथ एक ही झटके में कह गया। फिर तो शब्दों ने साथ छोड़ दिया। "एक कही नैननि अनेक कही सैननि रही सही कहि दीनि हिचकीन सो" संपादक जी हतप्रभ थे। दिमाग फिर गया है लड़के का। कितनी  से तो किसी को ऐसा मौका मिलता है।

वे कारण पूछते रहे और मैं चुप  रहा। जवाब कुछ नहीं बस एक ही रट कि हम यहाँ काम नहीं करेंगे। हार कर बोले, ठीक है कल दफ्तर में आओ, फिर बात होगी।

मन में इस उत्तर से तसल्ली न हुई। उधेड़बुन चलती रही, पता नहीं क्या होगा। संपादक जी न माने तो!

केबिन से बहार निकले तो आंसू ठीक से पोंछ लिए। किसी को कानोकान खबर न हुई कि रो कर निकल रहा हूँ।

गेस्ट हाउस क्या था, एक पुराना मकान था। जागरण कर्मी पेइंग गेस्ट के रूप में रह रहे थे। कमरे के अलावा दोनों वक्त का भोजन भी वही मिलता था।

हमने अभी खाना शुरू किया ही था कि एक आपरेटर ने छोटी सी पैक हंडिया खोली। हरवंश जी से पूछा, आप भी लेंगे?

क्या है?

भुजिया।

आलू की?

नहीं। फुसफुसा कर बोला, मछली।

आवाज कानों में घुल गयी। उबकाई सी आने लगी। रोटियां बाहर कुत्ते को डाल आया। मन में बेचैनी बढ़ गयी, हे ईश्वर क्या यहाँ आकर जीवाहारी भी बनना पड़ेगा।पिता द्वारा संस्कार में मिली सात्विकता की थाती लुट जायेगी। जीवन में प्रत्यक्ष हिंसा की प्रकृति भी उगानी पड़ेगी।

मैं अपने में खोया रहा। सोने का बहाना कर चुपचाप पड़ा रहा। आँखों से आंसू चुपचाप निकलते रहे और सुबह के लिए निर्णय दृढ़ होते रहे।

दूसरे दिन गेस्ट हाउस से निकला तो अटैची साथ में थी। हरवंश जी ने पूछा भी तो सिर्फ इतना ही कहा कि जरूरी कागजात हैं। हरवंश जी ज्यादा नहीं सोचना चाहते थे। उनकी ख़ुशी का ठिकाना न था। आज उन्हें पटना चले जाना है। घर के काफी करीब। प्रमोशन के साथ महत्वपूर्ण पद का अवसर मिलना है।

सम्पादक जी आये तो पहले मीटिंग करना चाहे पर मैं हेकड़ी पर उतर आया, पहले भैया मुझसे बात कर लीजिये तब मीटिंग में चलिए। वे मुस्कुरा रहे थे और चुपचाप देखे जा रहे थे। फिर कंधे पर हाथ रख बोले, चलो अच्छा पहले तुम्हीं से बात कर लें।

चीफ की केबिन में हम और वे दो ही लोग थे। वे मुझे चीफ वाली कुर्सी पर बैठाकर बात करना चाह रहे थे। पर यह षड्यंत्र जैसा लगा। उनकी बगल वाली सीट पर बैठ गया। अब उनको कुछ तो अंदाज हो ही गया।

बताओ, काया बात है?

भैया, कलकत्ता हम जैसे जंगली लोगों के लिए पिंजरा है। मेरी आत्मा एक क्षण भी यहाँ शांत नहीं रहेगी। कल से ही घुटन और बेचैनी महसूस कर रहा हूँ।

क्यों?

मुझे यहाँ जिंदगी नहीं दिख रही। लोग कीड़े-मकोड़ों की तरह बिलबिला रहे हैं। मैं इतना दुनियादार और कृत्रिम जिंदगी नहीं जी सकता। आप हमें किरीबुरू, नोवामुंडी या सारंडा के जंगलों में भेज दीजिये। वहां पत्रकारिता कर लूँगा। नक्सलियों से डर नहीं लगता, जितनी इस मानवीय दुर्दशा से।

फिलासफी न झारो यार। तुम्हारा नाम प्रधान सम्पादक को भेजा जा चुका है। उन्हें क्या जवाब दूंगा। पूरी यूनिट की नाक कटा रहे हो।

कुछ देर चुप रह प्रतिभा (मेरी पत्नी) को फोन लगा दिए। कुशल मंगल लेकर सीधे शिकायत पर आ गए, समझाइए महाशय को। ये तो बच्चों की तरह रो रहे हैं। प्रतिभा भी समझाना शुरू कर दी। उस समय प्रतिभा मुझे शत्रु सी नजर आई। बात करने की बजाय मैंने फोन काट दिया।

संपादक जी ने मीटिंग कैंसिल कर दी। बस, हरवंश जी से बोले, अभी तीन-चार दिन रुकिए। शुक्ला अभी जा रहे हैं। लौट कर आयेंगे तो जाइएगा।

लौटते समय सम्पादक जी ने मुझसे कोई बात न की। वे एसी में चले गए और मैं साठ रुपये की टिकट लेकर जनरल में।

घर लौटे तो प्रतिभा उदास थी। चेहरे पर  निर्णय का आक्रोश साफ दिख रहा था, पर कलकत्ता के बारे में जब बातें शुरू हुईं तो उन्हें मेरा निर्णय सही लगने लगा।

घर का सामान बंधा ही रह गया। जमशेदपुर यूनिट के लोगों ने तो मेरी प्रकृति के अनुसार निर्णय का समर्थन किया, पर सम्पादक जी घायल सांप हो गए। किसी न किसी बहाने यातना देने से न चूकते। बातचीत तो बंद ही थी। माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड की परीक्षा के लिए भी अवकाश न दे रहे थे। वे मेरे कैरियर के हर अवसर छीन रहे थे और मैं बागी बन उन्हें अंगूठा दिखाता रहता। अखबार की नौकरी से इस कदर मोहभंग हो चूका था कि मिर्ज़ापुर लौट आने को बार-बार बेचैन हो उठता। पर किस बिरते पर लौटता। बच्चों की परवरिश कौन करता। लेकिन शायद ऊपर वाले ने हमारी सुन ली। २२ सितम्बर को आयोग का रिजल्ट आ गया। अब पत्रकार से शिक्षक हो गया। जीने भर के लिए एक सुरक्षित आसरा क्या मिला, खजाना मिल गया। उस दिन सबसे खुश मैं था और सबसे दुखी सम्पादक जी थे। हाँ रांची के सम्पादक संत शरण भैया ने जरूर बधाई दी थी और चुटकी भी ली, रमा शंकर तुम मुझे प्राइमरी में ही मास्टर बनवा दो यार, मैं ये संपादक की नौकरी छोड़ दूंगा। बुढ़ौती में कुछ तो अपनी जिन्दगी जीने को मिल जाएगी।

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डा0 रमाशंकर शुक्ल

पत्रकारिता, साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में एक परिचित नाम।

चार मई 1971 को मीरजापुर जनपद (उत्तर प्रदेश) के एक समीपस्थ गांव रायपुर पोख्ता में एक सामान्य परिवार में जन्म।

समसामयिक विषयों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लगातार बेबाक लेखन।

'ईश्वर खतरनाक है' तथा 'एक प्रेत यात्रा' काव्य संग्रह। 'ब्रह्म नासिका' और 'नरक में शंकराचार्य' उपन्यास प्रकाशनाधीन। 'प्रेमचंद के उपन्यासों में संवेदना' और 'रसाल व रत्नाकर की ध्वनिमीय तुलना' समीक्षा पुस्तकें प्रस्तावित।

संप्रति : स्वतंत्र पत्रकारिता, साहित्य लेखन के साथ ही ए0एस0 जुबिली इण्टर कालेज, मीरजापुर में हिन्दी अध्यापक।

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पुलिस अस्पताल के पीछे

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रचनाकार: रमाशंकर शुक्ल का संस्मरण - मेरे भीतर का जंगल
रमाशंकर शुक्ल का संस्मरण - मेरे भीतर का जंगल
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