विजय शिंदे का आलेख - अध्यापकों की भूमिका और दायित्व

SHARE:

अध्यापकों की भूमिका और दायित्व डॉ. विजय शिंदे प्रस्तावना – शिक्षा का केंद्रीय घटक विद्यार्थी है और उन्हें सही दिशा निर्देशन करनेव...

अध्यापकों की भूमिका और दायित्व

image

डॉ. विजय शिंदे

प्रस्तावना –

शिक्षा का केंद्रीय घटक विद्यार्थी है और उन्हें सही दिशा निर्देशन करनेवाला प्रमुख घटक अध्यापक है। शिक्षा के कई उद्देश्यों की पूर्ति इनके माध्यम से होती है। इन्हें प्रशिक्षित किया जाता है, उनकी सुविधा-असुविधा देखी जाती है। समाज का उनके प्रति कर्तव्य होता और उनका भी समाज के प्रति उत्तरदायित्व रहता है। अध्यापक अपने दायित्वों का पूरी तरीके से निर्वाह करने की कोशिश भी करते हैं। वह सरकारी सेवक होता है और उसके इस कार्य के लिए वेतन भी दिया भी जाता है। अतः उसकी यह जिम्मेदारी होती है कि कम-से-कम वह जितना वेतन लेता है उसके अनुकूल कार्य करता रहे। दूसरी बात शिक्षा का क्षेत्र व्यवसाय या धंधा नहीं है, तो वह समाज के विकास और सेवा का उपयुक्त क्षेत्र है। अध्यापक का कार्य व्यवसाय नहीं सेवा है। अध्यापक इसे नौकरी समझे बिना सेवा समझ कर निभाए। जब इस कार्य को अध्यापक सेवाभाव से देखते हैं तब उनका दायित्व सफलता की ओर अग्रसर होता है। शिक्षा में अध्यापक ही सामाजिक विकास का सूत्रधार है। समाज की इच्छा, आकांक्षा, आवश्यकता, अपेक्षा और आदर्शों को सफल बनाने का कार्य अध्यापक ही करते हैं लेकिन आज भारतीय शिक्षा में शिक्षकों के हालात बडे खराब है। इसके लिए समाज, सरकार, शिक्षा जगत् और वह खुद भी जिम्मेदार है। शिक्षा व्यवस्था के व्यावसायिक रूप से अध्यापकों का शारीरिक, मानसिक और आर्थिक शोषण हो रहा है, अतः वे अपनी सेवा ठीक ढंग से निभाने में अक्षम रहता है। यह स्थिति भारत देश के भविष्य के लिए अच्छी नहीं और ऐसे ही रहा तो बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ होगा।

भारतीय संस्कृति में गुरु को उच्च स्थान प्राप्त है। उन्हें देवताओं के समकक्ष रखा जाता है। उनकी कृपा और आशीर्वाद के फलस्वरूप सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनैतिक मूल ज्ञान की प्राप्ति होती है। वर्तमान युग में इसके आगे वैज्ञानिक ज्ञान प्राप्ति का माध्यम भी गुरु ही है। लेकिन प्राचीन युग में जो गुरु का स्थान था, वह आज नहीं रहा है। दोस्ती के धरातल पर उतर चुका है, इसे अध्यापक भी जाने और विद्यार्थी तथा समाज भी जाने। कहीं-कहीं गुरु का अवमान भी हो रहा है। गुरु के अवमान तथा उसके स्थान के महत्त्व को कम करने के लिए शिक्षा व्यवस्था, विज्ञान, समाज, सरकार और नई शिक्षा नीतियां जिम्मेदार मानी जा सकती है। अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली पर आधारित हमारी शिक्षा प्रणाली में गुरु तथा अध्यापक का स्थान व्यवसायिकता के कारण महत्त्वहीन बन गया है। समाज में उनका मान-सम्मान और प्रतिष्ठा नष्ट-भ्रष्ट हो रही है। छात्र ओर उसके परिवार के लोग उसे अन्यों की तरह व्यवसायी मात्र समझने लगे हैं। इस प्रकार की परिस्थिति समाज के लिए कतई लाभप्रद नहीं है। शिक्षा में प्रवेश कर चुकी व्यवसायिकता ने अध्यापकों को मृतप्राय बना दिया है। व्यवसायिक दृष्टि रखने वाले अध्यापक भी अपनी जिम्मेदारियां और उत्तरदायित्व से विमुख होते हैं।

अध्यापक भूमिका एवं दायित्व –

शिक्षा के प्रमुख प्रचारक तथा आधार के रूप में अध्यापक को माना जाता है। बच्चों के भविष्य निर्माण और उनके माध्यम से पूरे देश के भविष्य निर्माण के लिए आधार भूमि बनाने का कार्य अध्यापक करते हैं। वे न केवल शिष्य को संस्कारित करते हैं, उसके साथ समाज का भी दिशा निर्देशन करते हैं। कुछ साल पहले तक और प्राचीन काल में राजनीतिक गुत्थियों को सुलझाने में वे समर्थ थे। लेकिन आज यह परंपरा खंडित हो गई है। अध्यापकों के कार्य एवं दायित्व बंधनों के कारण सीमित बन गए हैं। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में अध्यापक का स्थान और दर्जा उतना महत्त्वपूर्ण नहीं रहा जितना होना चाहिए था। व्यवस्थापन ओर पदाधिकारियों के आदेशों का पालन करना उनका धर्म बन गया है। परिवार और वेतन के बीच फंसे अध्यापक मानसिक तौर से विकंलांग होने लगे हैं जिसका सीधा असर बौद्धिक दृष्टि से अपने आपको सक्षम बनाने पर भी पड़ता है और नुकसान उठाना पड़ता है नई पीढी को। समाज में अध्यापकों की उपेक्षा-अवहेलना हो रही है और इसी के प्रतिक्रिया स्वरूप अध्यापक भी उत्तरदायित्वों एवं कार्यों के प्रति उदासीनता दिखने लगे हैं। स्थानीय व्यवस्थापन, राजनीति, धर्म, जाति और गुटबाजी के कारण अध्यापकों को सीमाओं में बांधे रखा है। छुट्टी से लेकर पढाई और नियुक्ति से लेकर निष्कासन तक के सारे अधिकार व्यवस्थापन और व्यवस्थापन के चमचों के हाथों में हैं। किसी भी महत्त्वपूर्ण निर्णय के लिए उन्हें आजादी नहीं दी गई है। उन्हें सिर्फ इतनी आजादी है कि पाठ्यक्रम में जो विषय रखे गए हैं वहीं पढाओ। शिक्षा शास्त्री तथा समाज अध्यापकों के उत्तरदायित्व और कार्यों पर विचार मंथन करता है लेकिन उनके प्रति अपने दायित्वों को जानबूझ कर नजरंदाज करता है। अध्यापकों को उनके हाल पर छोड़ कर और उनका शोषण करते हुए दायित्व की बात करना समाज, व्यवस्थापन, सरकार और शोषणकार्ताओं की बेतुकी नीति का परिचायक है।

अध्यापकों की भूमिका, दायित्व, जिम्मेदारी और कार्य आपस में जुडे फिर भी अलग-अलग सूक्ष्म अस्तित्व बनाएं हैं। अध्यापकों की निश्चित वेतन पर नियुक्ति होती है। जिस कार्य के लिए नियुक्ति की है उसको पूरा करना उनकी जिम्मेदारी होती है। अर्थात् वेतन के अनुरूप कार्य करते हुए वेतन को न्याय देना भी उसकी जिम्मेदारी कही जा सकती है। गुरु तथा अध्यापकों की लंबी परंपरा और इतिहास दायित्वों की बात को स्पष्टता से रेखांकित करता है। अध्यापक के पास जो भी ज्ञान है वह छात्र के साथ समाज के लिए वितरित करना उसका दायित्व बनता है। बच्चों को पढाई के अलावा उसे सामाजिक जीवन से संबंधित ज्ञान की प्राप्ति करवाना तथा समाज में योगदान के लिए समर्थ बनाना अध्यापक का दायित्व है। उसका प्रस्तुत कार्य वेतन से कोई संबंध नहीं रखता है और वह अमूल्यवान भी है। अध्यापकों के वैयक्तिक, सामाजिक, राष्ट्रीय, राजनैतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, नैतिक, व्यावसायिक उत्तरदायित्व भी होते है। पढ़ना उनका कार्य है ही लेकिन बच्चें, युवा पीढी तथा समाज में उपयुक्त चीजों की सहायता से आदर्श एवं संस्कारों की निर्मिति करना भी उसी का काम है। "अध्यापकों का दायित्व कमरे में बैठ कर बच्चों को पढाना नहीं होता है। उसका दायित्व विद्यार्थियों का विकास करते हुए उनके सर्वांगीण व्यक्तित्व का निर्माण करना होता है।"1 कल यहीं परिपूर्णता प्राप्त कर चुके बच्चें और युवक, समाज की आधारभूमि बनते हैं। अपने ज्ञान तथा बुद्धि का समाज और राष्ट्र विकास के लिए प्रयोग करते हैं, जिसमें संपूर्ण मानव जाति का विकास होता है। अध्यापकों के दायित्व विकास के लिए एक विशिष्ट वातावरण की निर्मिति करना जरूरी है। अर्थात् समाज द्वारा उसको विशेष सुविधा उपलब्ध करनी चाहिए। सबसे पहले समाज में अध्यापकों का मान-सम्मान तथा उन्हें प्रतिष्ठित बनाने की आवश्यकता है। कार्यक्षम और कुशल अध्यापकों की नियुक्ति कर उनकी कठिनाइयों को दूर करने और साधन-संपन्न बनाने की जरूरत है। इस प्रकार की स्थिति में अध्यापक की पारिवारिक और आर्थिक उलझने खत्म हो सकती हैं। अध्यापक भी एक मनुष्य है, अतः उसकी भी खामियां रहती हैं, उनको दूर करने के लिए उन्हें संस्कारित किया जाना चाहिए। प्रशिक्षण देकर नैतिक, सामाजिक, व्यवसायिक आदि संस्कारों से उसे कुशल बनाने की आवश्यकता होती है। "समाज में अध्यापक की भूमिका अदा करनी हो तो नियमित रूप से आत्मपरीक्षण करते हुए आशावादी वृत्ति को तरोताजा रखने की आवश्यकता है। संस्था-चालक और अध्यक्ष को भी ध्यान में रखना चाहिए कि यह सामूहिक कार्य है। अतः इस सामूहिक कार्य के लिए उचित परिवेश निर्माण करना और अध्यापकों को सहयोग देना उनका कर्तव्य है।"2 इससे स्पष्ट होता है कि अध्यापक समाज के प्रति और समाज उसके प्रति उत्तरदायी है। "शिक्षा व्यवस्था में सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण घटक ‘शिक्षक’ है। शिक्षा से समाज ने जिन इच्छा, आकांक्षा और उद्देश्यों की पूर्ति की कामना की है वह शिक्षक पर निर्भर रहती है।"3 अतः अध्यापकों की सुविधा-असुविधा को सुलझाकर उसे मनोवैज्ञानिक और आर्थिक सहयोग देना संपूर्ण मानव जाति के हित में होता है।

अध्यापकों के कई कार्य होते हैं। उसकी नियुक्ति जिसके लिए की जाती है और उसको जिस जिम्मेदारी को निभाने के लिए वेतन दिया जाता है उसे सफलता से निभाना उसका कार्य है। वह प्रशासन का अंग बना रहता है, अतः उसके जिम्मे का कार्य संपूर्ण व्यवस्था को सफल बनाता है। "शासन व्यवस्था के दो स्पष्ट रूप होते हैं और होने चाहिए। पहला रूप राष्ट्र की समग्रता की अवधारणा से जुडा होता है तथा दूसरा रूप स्थानीय आकांक्षाओं की पूर्ति एवं विकास से जुडा होता है।"4 अध्यापक का दायित्व निभाने से राष्ट्रीयता को शक्ति मिलेगी और समाज तथा स्थानीय आकांक्षाओं की पूर्ति हो सकेगी। "शिक्षा प्रणाली कोई भी या कैसी भी हो, उसकी प्रभावशीलता और सफलता उस प्रणाली के शिक्षकों के कार्य पर निर्भर है और क्योंकि भावी पीढी को शिक्षित करना समाज की आकांक्षाओं को प्रतिफलित करना है।"5 बढ़ती आबादी से शिक्षकों के कार्यों में वृद्धि हो गई है। युवक और बच्चों की पढाई में निर्मित नई-नई समस्याएं उनकी जिम्मेदारी बढ़ने के संकेत दे रहे हैं। अध्यापकों की उदासीनता और बच्चों की दिशाहीनता दोनों भी दायित्वहीनता दिखा रहे हैं। अतः आवश्यकता इस बात की है कि दोनों भी अपनी जिम्मेदारी को निभाए। अध्यापकों के कार्य में संस्कृति और रुढि-परंपराओं का अध्ययन कर निष्क्रिय परंपराओं का त्याग करना तथा संस्कृति को गतिशील बनाना आदि का समावेश होता है। इसके साथ ही शिक्षा में निर्मित समस्या का अध्ययन करके अनुकूल शैक्षिक वातावरण की निर्मिति करना उनका कार्य है। शैक्षिक साहित्य के आधार पर अद्यतन ज्ञान को विद्यार्थियों के सामने रख कर उनका उचित मूल्यांकन करते हुए सर्वांगीण विकास करने की क्षमता अध्यापक में होनी चाहिए। "शिक्षा कार्य में प्रवीणता व दक्षता प्राप्त करने के लिए नियमों व सिद्धांतों का ज्ञान मात्र पर्याप्त नहीं होता, इसके लिए अध्यापक को बच्चों को व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से पढाने के अवसर प्राप्त होने चाहिए तथा उसे यह कार्य पूर्ण योजना व पूर्ण तैयारी के साथ करना चाहिए। इस प्रकार शिक्षण कार्य को बार-बार करने व उसका अभ्यास करने से ही शिक्षक सफल अध्यापक बन सकता है, अन्यथा नहीं।"6 अर्थात् सफल अध्यापक बनने के लिए उसको प्रशिक्षित बनाने की आवश्यकता है तभी वह अपनी जिम्मेदारियां और कार्यों के प्रति सजग रह सकता है।

उपसंहार –

अध्यापक भी आम आदमी है। अतः सामान्य व्यक्ति की जो विशेषताएं हैं वहीं अध्यापकीय व्यक्तित्व में दिखाई पड़ती है परंतु कुछ ऐसी विशेषताएं है जो उसे सामान्यजन से पृथक करती है। संवेदनशीलता, आत्मीयता, परोपकारी वृत्ति, सहृदयता, ममतामयीता, परदुःखकातरता, मानवतावादी वृत्ति, सीधे-सच्चे, प्रतिष्ठित, सौहार्दता, दया-करुणा, सहानुभूति, संघर्षशीलता, दायित्व के प्रति सजगता, मार्गदर्शकता, प्रवीणता, दक्षता, सक्रियता, मूल्यांकनपरकता, परिवर्तनवादिता, विषय ज्ञान पर असाधारण प्रभुत्व आदि गुण अध्यापकों में होते हैं। इनकी सहायता से वह समाज में मान-सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुका है। समाज भी अध्यापकों के कधों पर बच्चों के भविष्य निर्माण का भार सौंप कर निश्चिंत बनता है लेकिन अध्यापकों के प्रति अपने दायित्वों को भूल जाता है। अध्यापक अर्थाभाव, पारिवारिक उलझने और समाज की उदासीनता के बावजूद भी दायित्व एवं कार्य के प्रति प्रामाणिक रहने का प्रयास करता है। समाज, सरकार और शिक्षा में तालमेल न होने के कारण अध्यापकों के सामाजिक स्थान एवं दर्जे में भारी गिरावट आ गई है। गंदी राजनीति, कुटिलता, ईर्ष्या, द्वेश, मत्सर, स्वार्थ, अन्याय, शोषण, दबाव के कारण एक अध्यापक दूसरे अध्यापक को तथा छात्रों को मारने–मरवाने पर उतारू है।

अर्थ केंद्रित व्यवस्था में मनुष्य सुख सुविधा संपन्न होना चाहता है। अध्यापक अर्थाभाव के कारण पतित मार्गों से नई-नई सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए प्रयासरत है और समाज उनकी असुविधाओं को देख कर भी सुविधा देने में उदासीनता दिखाता है। समाज द्वारा दायित्व का भार सौंपना तथा अध्यापक का इस भार से मुक्ति पाने के लिए वेतन के पीछे भागना संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था में अव्यवस्था पैदा कर रहा है। अर्थात् समाज अध्यापकों के प्रति उदासीन है और अध्यापक सामाजिक जिम्मेदारी को भूल चुका है। इस प्रकार की स्थिति न समाज, न देश, न ही भविष्य के लिए लाभदायी है और न अध्यापकों के लिए।

वर्तमान समाज किसी महाभारत से कम नहीं है। सभी लोग महाभारत के पात्र बन कर अपनी-अपनी भूमिका को सफलता से निभा रहे हैं। शिक्षा में चारों ओर पांड़व, कौरव और द्रोणाचार्य देखे जा सकते हैं। अध्यापक और छात्र के पारस्परिक संबंध जितने अच्छे हैं उतनी गिरावट भी पा चुके हैं। दोनों में आपसी सौहार्दता है पर कहीं-कहीं संघर्ष भी शुरू है। द्रोणाचार्य ने जिस प्रकार एकलव्य को अंगूठा मांग कर विद्याविहीन किया उस प्रकार परीक्षाओं और पर्चों को आधार बना कर कई अध्यापक कच्ची उम्र के प्रतिभावान छात्रों को उखाड़ कर फेंकने के लिए उतारू है। छात्र तो मिट्टी का गोला हैं, उन्हें बनाना और बिगाड़ना अध्यापक और शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर है। अध्यापक जिस प्रकार के आदेश और संस्कार का रोपण करेंगे उसी प्रकार की फसल पाएंगे। कुल-मिलाकर कहा जा सकता है कि अध्यापक और छात्र के संबंधों में मौन संघर्ष की स्थिति पैदा हो रही है, अंतर पड़ रहा है और धीरे-धीरे आत्मीयता भी खत्म हो रही है। जिस प्रकार अध्यापक छात्रप्रिय और छात्र श्रद्धावान होते हैं उसी प्रकार दोनों के संबंधों में पतन तथा अवमान की स्थिति भी निर्माण हुई है।

संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था में राजनीति प्रवेश कर चुकी है। अतः अध्यापक भी उससे प्रभावित हो गए हैं। अध्यापकों की नियुक्ति, वेतन, पदोन्नति, निष्कासन आदि प्रक्रिया में राजनीति अनुचित हस्तक्षेप कर रही है। आदर्श अध्यापकों को डराया-धमकाया और निष्कासित किया जा रहा है। अध्ययन विरोधी और गुंडागर्दी पर उतारू अध्यापकों की नियुक्ति की जा रही है ताकि उनका अपनी पार्टी को लाभ हो। अध्यापकों की भर्ती प्रक्रिया संपूर्णतः राजनेताओं के आदेशों पर हो रही है और प्राथमिक स्कूलों से लेकर वरिष्ठ महाविद्यालय, युनिव्हर्सिटी और कुलगुरुओं तक की नियुक्तियों में पैसों का लेन-देन धड़ल्ले से हो रहा है। शिक्षा में राजनीति का अनुचित प्रवेश हुआ और तब से शिक्षा व्यवस्था पैसे कमाने का धंधा बन चुकी है। वर्तमान में अध्यापक अपने दायित्व से विमुख होकर राजनीति में प्रवेश कर चुके हैं। यह स्थिति संपूर्ण मानव जाति के लिए धोखादायी है। अध्यापक, शिक्षा व्यवस्था और राजनीति के अनुचित व्यवहार से देश का भविष्य - ‘बच्चों’ पर गलत संस्कार हो रहे हैं तथा उनके सामने गलत आदर्श रखे जा रहे हैं।

तथ्य –

1. प्राचीन शिक्षा व्यवस्था में अध्यापक देवता-गुरु-मार्गदर्शक की भूमिका और दायित्व निभा रहे थे परंतु अब इन भावनाओं में गिरावट आ चुकी है। बदलती भूमिका में अध्यापक छात्रों के ‘दोस्त’ बन चुके हैं।

2. बच्चों को पढाई के अलावा उसे सामाजिक जीवन से संबंधित ज्ञान की प्राप्ति करवाना तथा समाज में योगदान देने के लिए समर्थ बनाना अध्यापक का दायित्व है।

3. शिक्षा की बदलती व्यावसायिक नीतियों से अध्यापकों पर अन्याय-अत्याचार हो रहे हैं। शोषण, दबाव, डर आदि बातों का असर उन पर पड़ने लगा है। इन हालातों ने उनकी भूमिका और दायित्वों को प्रभावित किया है।

4. समाज की इच्छा, आकांक्षा, आवश्यकता, अपेक्षा और आदर्श को सफल बनाने का कार्य अध्यापक करते हैं, लेकिन आज भारतीय शिक्षकों के हालात ही सोचनीय है। अतः वह जिम्मेदारियों से पलायन करने लगे हैं। इस स्थिति के लिए समाज, शिक्षा व्यवस्था और वे स्वयं जिम्मेदार है।

5. हमारी संपूर्ण शिक्षा प्रणाली युवकों को आदर्श और संस्कारों की शिक्षा देने में असफल रही है। अध्यापक वेतन के लिए नौकरी करते हैं, प्रशासकीय व्यवस्था सरकारी अनुदान राशि उठा कर मौज मना रही है और युवक उपाधियां पाकर बेकारों की कतार लंबी करने लगे हैं।

संदर्भ संकेत –

1. म. गो. माळी, चंद्रकांत घुमटकर – शिक्षणाचे तत्वज्ञान, पृ. 106

2. चंद्रकुमार डांगे – शिक्षण आणि समाजशास्त्र, पृ. 184

3. ग. वि. अकोलकर – माध्यमिक शिक्षण, पृ. 104

4. विजय अग्रवाल – अपने आस-पास, पृ 20

5. डॉ. ईश्वरदयाल गुप्त – आधुनिक भारतीय शिक्षा समस्या चिंतन, पृ 220

6. बालकृष्ण दिवाण – शिक्षा शास्त्र, पृ. 135

डॉ. विजय शिंदे

देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद.

ब्लॉग - साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: विजय शिंदे का आलेख - अध्यापकों की भूमिका और दायित्व
विजय शिंदे का आलेख - अध्यापकों की भूमिका और दायित्व
http://lh6.ggpht.com/-ny02FA1hemY/UZSopc1gWSI/AAAAAAAAU0k/JZxvD8yVnV4/image%25255B2%25255D.png?imgmax=800
http://lh6.ggpht.com/-ny02FA1hemY/UZSopc1gWSI/AAAAAAAAU0k/JZxvD8yVnV4/s72-c/image%25255B2%25255D.png?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2013/05/blog-post_16.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2013/05/blog-post_16.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content