पद्मा मिश्रा की कहानी - मैं डायन हूँ

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मैं डायन हूँ --पद्मा मिश्रा .. आग की लपटें और ऊंची होती जा रही थीं ..रात काभयानक सन्नाटा उसकी चीखों से दहल उठा था ..-''मैं डायन हूँ...

मैं डायन हूँ --पद्मा मिश्रा
.. आग की लपटें और ऊंची होती जा रही थीं ..रात काभयानक सन्नाटा उसकी चीखों से दहल उठा था ..-''मैं डायन हूँ ..आह !...मत छुओ मुझे ..आमि डायन ...माँ गो !..आआआह ..मैं डायन हूँ ''...धू धू कर जलती पर्बत्ति को
बचाने कोई नहीं आया -भीड़ के बीच क्रोध और आवेश की आवाजें तो थीं ..पर उस जलती हुई नारी देह की पीड़ा और चीखों से कोई नहीं विचलित हुआ .पडोसीमूक दर्शक बने तमाशा देख रहे थे ,अचानक 'धडाम'की आवाज आई और बुरी तरह झुलसी पार्बत्ती नीचे गिर गई .कुछ उत्साही नव युवकों ने उसे टेम्पो में डाल अस्पताल पहुँचाया ,....इधर भीड़ के मनोविज्ञान ने क नई करवट लीअपनी पत्नी को बचा रहे उसके पति राधे पर पत्थरों की बौछार शुरू कर दी ..सबके सब जैसे राक्षस हो गए थे ..वह बेचारा युवक खुद को बचाने के लिए कभी इधर भागता तो कभी उधर उसका सिर फट गया और वह लहू लुहान होता रहा था ...किसी ने पुलिस को खबर कर दी थी -पुलिस को देखते ही भीड़ गायब हो गई ,.सिसकता हुआ राधे घायल अवस्था में ही अस्पताल की ओर दौड़ा .....


..बुरी तरह जली पार्बत्ती नहीं बच पाई .राधे की सिसकती चीखें पुरे अस्पताल परिसर में गूंज रही थीं --''परबतिया रे !...अब किसके सहारे जियूँगा मै ...क्योंमुझे अकेला कर गई ?''....उसकी रिश्तेदार महिलाएं विलाप कर उठीं आखिर क्या दोष था पार्बत्ति का ?..क्या वह जननी नहीं बन पाई इसलिए -वह डायन थी ?...वह अपनी अतृप्त ममता पड़ोस के बच्चों पर लुटाती रही--इस लिए डायन थी ?   .....कौन जानता था ? कौन समझ रहा था उसका दर्द -उसकी पीड़ा .....यही पार्बत्ती सबकी खुशियों में शरीक होती ...छठी -बरही में झूम झूम कर सोहर गाती -बजती थिरकती रहती और उसका सौन्दर्य दिप दिपकरता रहता था ,...लेकिन विवाह के दस वर्ष बीत जाने के बाद भी भगवान ने उसकी झोली में कोई सन्तान नहीं डाली थी --इंतजार और कितना ?...उम्मीदों की सांसें भी टूट रही थीं ..ममता की अनबुझी -अतृप्त प्यास ..तरस रही थी किसी के मासूम ..कोमल अहसास को गले लगाने के लिए ---''हे इश्वर !..एक बार मेरी सुन ले ...हे छठी मईया !...एक बार --जोड़ा नारियल चढ़ाउंगी  ''विनती करते करते न जाने कितनी रातें बीतती चली गईं ...दिन पहाड़ से गुजरते ........

एक छोटी सी कंपनी में मजदूरी करते राधे की दिलासा देती -स्नेह भरी उम्मीद भी उसकी आशाओं को साहस नहीं दे पा रही थीं --क्या करती पर्बत्ती ?..कौन सी मन्नत नहीं मांगी ..किसकी देहरी पर जाकर नाक नहीं रगडी -मत्था नहीं टेका ?किस देवता को नहीं पूजा ?...डाक्टर को भी दिखाया --सब तो ठीक ही था ..कमी कहाँ थी ?..एक उम्मीद के सहारे वह जो भी जप तप --पूजा विधान लोग बताते -करती रहती ---जाड़े की ठंडी काली रात में -पीला सिंदूर ..नीबू ..लाल कपड़ा किसी चौक चौराहे पर सात बार परिक्रमा कर रख देती --और उलटे पांवों लौट आती ..'रात के अंधेरों में जाग जाग कर सुबकती -बद्बदाती पार्बत्तीकी फुसफुसाती आवाज लोगों को डायन सिद्ध करने का टोटका प्रतीत होती थी ,
पर इन धार्मिक कृत्यों ने लोगों की भावनाओं को एक नया आधार दे दिया कि --''वह कोई डायन सिद्ध कर रही है ...तंत्र मन्त्र का सहारा ले डायन को वश में करने का जोग कर रही है ...देवी मईया से मनौती मांगती पार्बत्ती -भुइंया लोट करती ..धुल धूसरित ..मन्दिर तक पहुँचती तो लोग डर कर दूर हट जाते --न जाने यह डायन क्या कर बैठे ....

पर पार्बत्ति तो न जाने किस दुनिया में मगन रहती ,--किसी बच्चे की तोतली पुकार उसकी आत्मा की गहराईयों को छू लेती --उसकी बाहें मचल उठतीं उसे कलेजे से लगाने के लिए .वह दौड़ कर जब किसी बच्चे को गोद में उठाती ..तुरंत उसके परिजन उसे छीन लेते --''नहीं ..मत छुओ ..तू डायन है ..खा जाएगी उसे ..''.सुन सुन कर पार्बत्ति हजार मौतें मर जाती ..--''मैं डायन नहीं हूँ ..मैं तो माँ बनना चाहती हूँ ,,मेरी ममता मरी नहीं है '..मैं .और डायन ?.....रोटी बिलखती पार्बत्ति राधे की बाँहों में बेसुध हो जाती पर समाज की न बदलना था न .. बदला ',आखिर उसका दोष क्या था ..जब वह लोगों के तानों का विरोध करती -तब भी लोग यह कहते --''जब वह डायन नहीं है तब चिढती कयों है ..उसे गुस्सा क्यों आता है ? ..और जब अपनी पीड़ा .अपने दर्द भरे आंसुओं को छिपाए चुप रह जाती है तब
लोगों की गंदी सोच को बढ़ावा मिल जाता कि जरुर यह डायन है ..तभी तो चुप है ....बस्ती में घटती हर अनहोनी --हादसों का जिम्मेदार उसे ही मान लिया जाता --जरुर यह उस डायन की ही करतूत है .


उसके घर के सामने छोटे छोटे बच्चे खेलते थे ..कभी गेंद ..कभी चोर पुलिस ..वह बड़े आनंद और मनोयोग से उन्हें देखा कराती थी ..''क्या कभी मेरा बच्चा भी ऐसे ही खेलेगा ?..''सोचते सोचते सपनो में गुम हो जाती-पार्बत्ति देखती कि ---'' उसका बेटा खेलते खेलते गिर पड़ा,.वह तुरंत दौड़ कर उसे दवा लगा रही है उसके आंसू पोंछ गले लगाती ...कभी नये नये कपड़े पहना स्कूल
भेजती पारबत्ती -उसे प्यार से निहारती ..''...अचानक एक गेंद आकर उसके माथे से टकराई और आंगन में चली गई --वह चौंक कर अपने सपनो से बाहर आ गई ..और दौड़ कर गेंद उठा लाई,-सामने एक चार वर्षीय बच्चा खड़ा था ..मासूम ..नन्हा सा ..अपनी काली काली आँखों से पारबत्ती को देखता हुआ बोल -उठा -''अंटी ..बाल दो ना ''... बस पारबत्ती तो निहाल हो उठी ..तुरंत उसे गोद में उठा कर चूमती हुई पागलों की तरह उसे प्यार करने लगी गेंद लौटा कर पूछा --''हलवा खायेगा ?''...बच्चे के 'हाँ' कहते ही तुरंत कटोरी में हलवा लाकर खिला ही रही थी कि माँ ने देख लिया और वहीँ से चिल्लाई --''कुछ अक्ल नहीं है क्या पारबत्ती ?..तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरे बेटे को छूने की ?..छोड़ उसे --डायन कहीं की --मार ही डालेगी ''............

वह बच्चा झट उसकी गोद से उतर कर ताबड़तोड़ दौड़ा और ठोकर खाकर गिर पड़ा -सिर में चोट लगी और खून तेजी से बहने लगा --कमजोरी से वह बेहोश हो गया --चोट की वजह से रात में बुखार आ गया -डाक्टर को भी दिखाना पड़ा ---बस फिर क्या था !..उसके डायन होने उस उस घोषित फैसले को जैसे मंजूरी मिल गई और उसकी माँ ने चीख चीख कर सारी बस्ती को सिर पर उठा लिया ---''मै न कहती थी कि यह डायन है ..इसने जाने क्या खिलाया मेरे बच्चे को --वह बीमार हो गया ..अब पता नहीं क्या होगा ?..यह पापिन है ..कलंकिन है तभी तो कोई बच्चा नहीं हुआ आज तक ...''


चीखने -चिल्लाने की आवाजें सुन कर उस अल्पशिक्षित समाज के बड़े बुजुर्ग और वृद्ध महिलाएं -जो कल तक उससे सहानुभूति रखती थीं --आज खुसुर पुसुर करती उसे शक की नजरों से देख रही थीं --कोस रहे थे ---''यह ठीक ही कहती है ...अभी अभी तो बच्चा अच्छा भला खेल रहा था ..पार्बत्ती का दिया हलवा खाकर ही उसे क्या हो गया की वह बेहोश हो गया ---इसे इंसानों के बीच रहने का हक ही नहीं है ..इसे समाज से निकालो ..मारो ...पूरी भीड़ देखते देखते उसके खिलाफ हो गई थी --''मारो --निकालो की आवाजें तेज होती गईं और उसके घर पर पत्थरों की मार पड़ने लगी ---

पार्बत्ती चुपचाप पलंग पर लेटी रोती रही --किस्से कहे अपनी पीड़ा ,अपना दुःख किस्से बांटे ?,,कैसे समझाए उन्हें --हाँ ,मै डायन हूँ ,ताकि तुम्हारी गंदी सोच का अंत हो सके ,मै डायन हूँ समाज से ,कुविचारों ढोंग को निकाल फेंकने के लिए ..मुझे माँ बनने दो बस्ती का हर बच्चा मुझे प्यारा है ..पर वह हार गई ..हताशा और निराशा ने उसे विक्षिप्त बना दिया - 'अपनी ममता ..अपनी बेबसी ...मन की पीड़ाअपनी ममता का यूँ कुचला जाना वह सहन नहीं कर सकी --उसकी सोच ने नया मोड़ ले लिया --''शायद लोग सच कहते हैं ...मै सचमुच डायन हूँ ...तभी तो मेरी गोद नहीं भरी आज तक ..वह विक्षिप्तों --पागलों की तरह बद्बदाती हुई उठी और केरोसिन का पूरा टिन अपने उपर ऊंडेल --आग लगा ली .....आजमृत्यु की गोद में विश्राम करती पारबत्ती की ममता लहुलुहान हो गई थी --और हवा में उसकी चीखें गूंज रही थी ....''मै डायन हूँ ...हाँ ..मै डायन हूँ ''.............

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आत्मकथ्य ---यह कहानी अविकसित सोच वाले समाज की उस घृणित मानसिकता का वह नंगा सच है -जो हमे हमारा चेहरा दिखाता है ..कि हम कौन सी दुनिया में रह रहे हैं ?--स्त्री की विवशता --जब ममता व् वात्सल्य की तलाश करती ''डायन  ''बता कर प्रताड़ित की जाती है --तो पीढ़ियों तक उनका कलंक नहीं धुलता ...''----पद्मा मिश्रा

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रचनाकार: पद्मा मिश्रा की कहानी - मैं डायन हूँ
पद्मा मिश्रा की कहानी - मैं डायन हूँ
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