सुशील सिद्धार्थ की कहानी - विदूषक

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कहानी सुशील सिद्धार्थ विदूषक उस कमरे के तापमान पर पंचमहाभूतों का कोई नियंत्रण नहीं था। उसमें बैठे लोगों के अनुकूल रहने में ही उसकी भलाई थी।...

कहानी

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सुशील सिद्धार्थ

विदूषक

उस कमरे के तापमान पर पंचमहाभूतों का कोई नियंत्रण नहीं था। उसमें बैठे लोगों के अनुकूल रहने में ही उसकी भलाई थी। कमरे में आते ही देश और काल का बोध दिवंगत हो जाता था। ऐसी जगह प्रखर बैठा था। थोड़ा संशोधन करें तो वहाँ पन्‍द्रह बीस भद्र, सम्‍भ्रांत, पूँजीपति, नवाचारी बैठे थे जिनके सामने प्रखर बैठा था। सामने के लोग मदिरापान के मध्‍यान्‍तर में थे। चेहरे की त्‍वचा तनी, आँखें चढ़ी, ज़बान विह्‍वल और लगभग स्‍थितप्रज्ञ! प्रखर को आने में थोड़ा विलम्‍ब हो गया था। पता पूछने और बिल्‍डिंग में आने के बाद भी खुद को सँभालने में समय लगा। जब द्वारपाल के साथ प्रखर घुसा तो कुशल की साँस में साँस जैसी कोई चीज़ आई, ‘आओ आओ! हम सब कब से तुम्‍हारा इन्‍तज़ार कर रहे हैं। तुम पर यक़ीन करके हमने आज की शाम किसी और को बुलाया भी नहीं था। शाम बर्बाद हो जाती तो ये बास्‍टर्ड मुझे तबाह कर डालते!' बास्‍टर्ड शब्‍द में इतनी आत्‍मीयता भरी थी कि सबके चेहरे चमक उठे। प्रखर अपने से कई गुना हैसियत की कुर्सी पर नामाकूल की तरह बैठ गया।

बैठ तो गया, मगर अब उसे असली काम शुरू करना था। तैयारी की कमी और माहौल के हौलनाक असर ने प्रखर को उजबक बना दिया था। वह सोच ही रहा था कि कुछ तो शुरू करूँ कि तभी गंजे सिर वाले ने कहा, ‘भाई कुशल ने तुम्‍हारी बड़ी तारीफ़ की है․․․ अब दिखाओ अपना आर्ट।' प्रखर ने घबराकर कुशल की ओर देखा, ‘मगर मुझे तो ऐसा कोई लतीफ़ा याद नहीं, मेरे पास ऐसी दिलचस्‍प बातें नहीं, जिन्‍हें सुनाकर मैं आपका मनोरंजन कर सकूँ। मुझेऐसी कोई कहानी याद नहीं पड़ती जिस पर आपको हँसी आ सके। मैं शायद आज की इस शाम को खराब करने के लिए माफ़ी माँगने की तैयारी कर रहा हूँ।'

कुशल का चेहरा उतरने लगा। एक पतले साहब बोले, ‘अरे परेशान मत हो। तुम कुछ भी सुनाओ, हम उसमें हँसने का सपेस तलाश लेंगे। तुम लोगों को अभी आइडिया ही नहीं है कि हम लोग किन किन बातों पर ठहाके लगाते हैं। हमारे क़हक़हों की हक़ीक़त तुम लोगों को अभी पता कहाँ हैं!' प्रखर का हौसला स्‍थिर होने लगा और कुछ-कुछ आत्‍मविश्‍वास लौटने लगा। उसने विनम्रता से कहा, ‘देखिए, आप लगातार मुझे तुम कहे चले जा रहे हैं। मैं जिस कल्‍चर का हूँ वहाँ आप कहते हैं। लोग लड़ाई करें गालियाँ करें, बलात्‍कार करें, दलाली करें- कहते आप ही हैं। आप लोग आप कहेंगे तो अच्‍छा लगेगा।'

भूरी शर्ट वाला उठा, लड़खड़ाया, फिर फ़र्शी सलाम सा करता बोला, ‘आपकी․․․!' उसने ऐसी ऐसी गालियाँ देनी शुरू की कि प्रखर के काल लाल हो गए। कमरे में मौजूद लोग अब मूड में आ रहे हैं ऐसा उनके लाल हो चुके चेहरे बता रहे थे। भूरी शर्ट वाले ने एक चुनिन्‍दा गाली को स्‍वरबद्ध किया और चुटकियाँ बजाकर डाँडिया से करने लगा�‘आपकी माँ की ․․․।' सारे लोगो को राह दिख गई। वे भी चुटकियाँ बजाकर सामूहिक रूप से डाँडिया करने लगे। जल्‍द ही प्रखर बीच में आ गया। उसको गोल घेरे में लेकर लोग चुटकी बजा रहे थे, गुनगुना रहे थे और खिलखिला रहे थे। कुशल भी उनमें शामिल था। प्रखर कुशल के द्वारा सुझाए गए पार्टटाइम काम में घिर चुका था।

․․․

‘तो यह बात हैं' कुशल ने प्रखर की पूरी बात सुनकर इत्‍मीनान से कहा था। ․․․कुशल ने अपनी रिवाल्‍विंग चेयर को दाहिने पैर के ज़ोर से नचा दिया। गोल-गोल घूमते हुए वह बच्‍चों की तरह रहने लगा, ‘काम काम काम'। लग नहीं नहा था कि कुशल आपने ऑफिस में है। एक विदेशी कम्‍पनी का दिल्‍ली स्‍थित ऑफिस। ‘काम' शब्‍द जैसे एक बिछड़े दोस्‍त की तरह उसे मिल गया था। जिसके हाथ पकड़ कर वह नाच रहा था। प्रखर के भीतर समय घूम कर वहाँ पहुँच गया था जहाँ कक्षा आठ के दो विद्यार्थी स्‍कूल में लगी फिरकनी पर चक्‍कर खाने का मज़ा लूट रहे थे। दोनों बी․ए․ तक साथ पढ़े। कुशल के पिता का ट्रांसफर हो गया। प्रखर लखनऊ विश्‍वविद्यालय से हिन्‍दी साहित्‍य में एम․ए․ करता रह गया। कुशल की याद आती तो कर भी क्‍या सकता था। वो ज़माना मोबाइल क्रांति का नहीं था।

यहाँ वहाँ भटकता प्रखर दिल्‍ली आया। उसे एक प्राइवेट संस्‍था में काम मिल गया था। सैलरी को गरिमापूर्ण बनाने के लिए उसे ‘पैकेज' कहा जाने लगा था। प्रखर और उस जैसे अनगिनत इसी पैकेज में जिन्‍दा थे। कोई सैलरी के बारे में पूछता तो प्रखर अपना सिद्ध वाक्‍य दोहराता, ‘स्‍त्री से उसकी आयु और पुरूष से उसकी आमदनी नहीं पूछी जाती।' विद्यार्थी जीवन में प्रखर अपने चुस्‍त जुमलों के लिए प्रसिद्ध था। लड़कियाँ तारीफ़ करती थीं और लड़के रश्‍क। धीरे-धीरे सारे ‘सुभाषित' किसी ख्‍़ास्‍ताहाल मकान की दीवारों पर ढँगे रंगीन बदरंग चित्रों की तरह झूलते गये। प्रखर जिस संस्‍था में काम करता था, उससे पूरा नहीं पड़ता। ज़ाहिर है तनाव रहता।

तनाव से भरा और गुस्‍से से उबलता प्रखर उस दिन आई․टी․ओ․ पर खड़ा था। एक ब्‍लू लाइन बस से उतरा था और दूसरी पकड़ कर लक्ष्‍मीनगर जाना था। जिस बस से उतरा था उसमें मुर्गों की तरह सवारियाँ भरी थीं। बस से उतरते ही मन किया कि फूट फूट कर रो पड़े। उसके दाहिने घुटने में सूजन थी। जब उसने इसका हवाला देकर छः की जगह सात सवारी एडजस्‍ट करने की बात कही थी तो एक आदमी ने अजीब सा अश्‍लील चेहरा बनाकर कहा था कि बैठना है तो बोल․․․ बहाने क्‍यों बनाता है! यहाँ तो सबका कुछ न कुछ सूजा रहता है, किसी का घुटना․․․ किसी की․․․। प्रखर मारे गुस्‍से के खड़ा ही रहा। इस वक्‍त उसके भीतर हिचकियाँ जारी थीं, यह बात और है कि उसकी आँखें गीली होकर शहर के सौन्‍दर्य को बिगाड़ नहीं रही थीं। ․․․ कि तभी सामने से गुज़रती एक कार रूकी। उसमें से कोई झाँकता लगा। कार का शीशा ऊपर से नीचे लुप्‍त हुआ और किसी ने कहा, ‘अरे प्रखर तू!' प्रखर ने गौर से देखा। यह कुशल था। कुशल का दफ्‍तर पटपड़गंज की तरफ़ था। किसी विदेशी कम्‍पनी ने दिल्‍ली में दलाली के लिए उसे रख छोड़ा था। दफ्‍़तर ज्‍़यादा बड़ा न था, मगर रौब पड़ता था। औपचारिकताएँ खत्‍म होते ही कुशल ने गम्‍भीर होकर कहा, ‘तुझे याद है, नवीं क्‍लास में तूने मुझे एक बार थप्‍पड़ मारा था!' दरवाज़ा बन्‍द था। सहसा प्रखर डर गया, ऐसा तो नहीं कि कुशल उछल कर उसे एक तमाचा रसीद कर दे। ‘तू सीरियस हो गया,' कुशल मुस्‍कुराया। प्रखर को राहत मिली, ‘अबे नहीं साले।' अबे और साले शब्‍द पर्याप्‍त सावधानी और सभ्‍यता से कहे गये थे। दिक्‍कतों ने सावधानी और सभ्‍यता के पाठ पढ़ा दिए थे।

प्रखर ने अपनी रामकहानी मुहतसर में सुनाई तो कुशल ने सिफ़र् इतना कहा, ‘यार, अब सोसाइटी को कुशल की ज़रूरत है, प्रखर की नहीं। ख़ैर बता मै। क्‍या कर सकता हूँ तेरे लिए।' प्रखर कॉफी पीने के बाद आश्‍वस्‍त हो गया था। उसने कहा कि मुझे कुछ पार्टटाइम काम दिला दो। गरीबी की रेखा की तरह एक रेखा भय की भी होती है। मैं आजकल उसी के नीचे रहता हूँ । इतना सुनते ही कुशल ‘काम काम काम' रहता गोल गोल घुमने लगा, कुर्सी पर।

‘मिल गया काम' कहते हुए कुशल ने कुर्सी रोक ली। बोला, ‘प्रखर आगे का आगे सोचेंगे․․․ फिलहाल एक काम फौरन हाथ में है।' प्रखर ने उत्‍सुकता चेहरे पर एकत्र कर ली तो कुशल ने बताया कि उसका बीस पच्‍चीस लोगों का एक ग्रुप है �‘आईडीसी'। मतलब ‘आई डोन्‍ट केयर'। ग्रुप के सदस्‍य अपनी अपनी फील्‍ड में ऊँचे मक़ाम पर हैं। राजनीतिज्ञ, नौकरशाह, बिजनेसमैन वगैरह। हर वीकएन्‍ड पर आईडीसी के सदस्‍य एक ख़ास जगह इकटठा होते हैं। खाते-पीते हैं। मनोरंजन के लिए कभी किसी टैरो कार्ड रीडर, कभी लाफ्‍टर चैलेन्‍ज के प्रतिभागी, कभी किसी कभी किसी को बुला लेते हैं। वेराइटी का ध्‍यान रखा जाता है। हैंडसम अमाउन्‍ट दिया जाता है। एक बार तो गैंग रेप की शिकार दो लड़कियों को बुलाया था। उन्‍होंने खूब डिटेल से अपने अनुभव सुनाए थे। बहुत एन्‍जाय किया था मेम्‍बर्स ने। सब रिलैक्‍स हो गए थे। हमें एक दूसरे के साथ अपने अनुभव शेयर करने चाहिए। यही तो ग्‍लोबलाइजेशन है। तुम्‍हारी कहानी सुनने के बाद ऐसी फील आ रही है कि इसमें एन्‍जाय करने की काफ़ी सम्‍भावना है। तुम्‍हारे दुख इस क़ाबिल हैं कि उन पर ठहाके लगाये जा सकें। सोचो यार, इस नश्‍वर दुनिया में रखा ही क्‍या है। तुम्‍हारी वजह से हमें आनन्‍द मिलेगा। कितनी बड़ी बात है। और तुम्‍हें पार्टटाईम जॉब। यह उससे बड़ी बात है। तुमने खुद को प्रूव कर दिया तो हम तुम्‍हें विदेश भी भेज सकते हैं। आजकल मसखरी में बड़ी सम्‍भावनाएँ है।․․․ यह लो कार्ड इस पते पर टाइम से पहुँच जाना।

․․․

लोग थोड़ा हाँपने लगे तब डाँडिया रूका। सब अपनी जगह बैठ गए। प्रखर भी। कुशल ने इशारा किया। प्रखर ने शुरू किया, ‘आप कहें तो मैं बेतरतीब तरीके से कुछ बातें आपके सामने रखता हूँ। आज कल मुझ पर शब्‍दकोश देखने का ख्‍़ाब्‍त सवार है। अभी से कल्‍चर का मामला उठा तो मैंने एक लेख लिखना चाहा। समलैंगिकता से हटकर शब्‍द तलाश रहा था तो एक मिला� ‘पुंमैथुन'। ‘पुंमैथुन' सुनते ही ठहाके लगने लगे। और तो सुनिए। एक और शब्‍द मिला- ‘भगभोजी' । इसका मतलब होता है कि वह आदमी जो अपनी पत्‍नी, बेटी, बहन या अन्‍य को औरों के सामने पेश कर आजीविका चलाता है।' प्रखर हँसी की उम्‍मीद कर रहा था मगर सब गम्‍भीर थे। एक ने कहा, ‘तुम लोगों की सोच में ही खोट है। तुम सोचते हो कि जो हाई लेबल पर कामयाब हैं वे यही सब करके कामयाब हैं। किसने छापा है यह! बताओ। साले का धन्‍धा बन्‍द करवा दूँगा।' सहसा एक बुजुर्गवार पर प्रखर की निगाह पड़ी। वे मामले को हाथ में लेने के लिए कसमसा रहे थे। बाले, ‘शान्‍त! शान्‍त!! मैंने सर्विस टाइम में कल्‍चर, लैंग्‍वेज, लिटरेचर वगैरह को काफ़ी हैन्‍डल किया है। मैं समझ सकता हूँ। वैसे चिन्‍ता की कोई बात नहीं। इनके सारे शब्‍दकोश हमारे अंडकोश के नीचे ही रहते हैं।' अब वाह वाह की आवाज़ें आने लगीं और हँसी की लहर चल पड़ी। कुशल के इशारे पर प्रखर ने भी जाम उठा लिया था। अब वह भी मुस्‍करा रहा था। बुजुर्ग सज्‍जन को सब अंकल अंकल कह रहे थे। अंकल ने पूछा, लेकिन तुम्‍हें यह सब पढ़ने की तल कैसे पड़ी। प्रखर पर सुरूर का पहला छींटा पड़ चुका था, अपने शुरू की वजह से। वे इतना शुद्ध बोलते थे कि एक बार नक्‍शा नवीस उनके मकान का नक्‍शा बनाकर लाया तो बोले ‘क्‍या इन आकर्षित रेखाओं का अक्षरशः अनुगमन अनिवार्य है! उन्‍होंने ही यह लत डलवाई। मैं उनकी खूब सेवा करता था। उनकी पत्‍नी बहुत सुन्‍दर थीं। मेरे ऊपर कृपालु थीं। मैंने दोनों की खूब सेवा की। ․․․ मगर अफ़सोस। काश मुझे अलादीन का चिराग मिल जाता जिसे रगड़-रगड़ कर मैं सारी इच्‍छाएँ पूरी कर लेता!' अंकल ने अगला जाम उठाया, ग़लत․․․ सरासर ग़लत। चिराग मिला था तुम्‍हें। उसे रगड़ रगड़ कर तुम अपना हर काम करवा सकते थे। विश्‍वविद्याल में नियुक्‍ति पर सकते थे। गुरू की पत्‍नी ही थीं अलादीन का चिराग़। सुना मेरे चिरागदीन!' अंकल ने छतफाड़ ठहाका लगाया, सब लोग ताली पीट-पीट कर मज़ा ले रहे थे। शोर-ओ-गुल के बीच अंकल ने एक के कन्‍धे पर हाथ रखा, बेटा डोन्‍ट माइंड। मैंने तुम्‍हारे बारे में कुछ नहीं कहा। अब लोग सोफों और कुर्सियों पर उछल रहे थे।

सेवक लोग खाने-पीने का सामान चुकने से पहले ही रख जाते थे। कुशल का चेहरा बता रहा था कि उसने प्रखर को यहाँ बुलाकर कोई ग़लती नहीं की। प्रखर गिलासों को देखकर ‘आधा भ्‍रा या आधा खाली' की थ्‍यौरी पर चिन्‍तन कर रहा था। सोच रहा था कि हे चिन्‍तकों यह भी सोचो कि जो आधा भरा है वह है क्‍या! हमारे आधे में संघर्ष ही भरे हैं और खाली में भी यही भरें जाएँगे। प्रखर भीतर यह निःशब्‍द बोल रहा कि प्रकट रूप में चिल्‍ला उठा, ‘अपना-अपना जीवन है सर! आप लोग मौज़ कर रहे हैं, हम लोग हड्डी पर कबड्डी खेल रहे हैं।' मोटी तोंद वाले ने खुश होकर कहा, ‘क्‍या स्‍मार्ट डायलाग है पुत्‍तर।' प्रखर लहरों पर चल रहा था, और ये हड्डियाँ इस मुल्‍क के आम आदमी की हैं। देखिएगा, इनसे एक दिन वज्र बनेगा और दुष्‍टों का संहार होगा।' प्रखर के सामने एक मोटी चेन वाला मोबाइल पर बात करते-करते आ खड़ा हुआ। वह कह रहा था, ‘कुछ देर होल्‍ड करना।' फिर प्रखर से मुखातिब हुआ, ‘जय लटूरी बाबा की! जो बोल रहे थे फिर से कहना तो।' प्रखर को लगा कि उसके जुमले हिट हैं। रूपक इसके दिल को छू गया है। उसने शब्‍दों की नोक पलक सुधार सब दोहरा दिया। रूपक पूरा होते होते मोटी चेन वाले का एक थप्‍पड़ अनुप्रास अलंकार की तरह प्रखर के गाल पर पड़ा। प्रखर धड़ाम से एक ओर गिर गया। चेन वाला अपनी जींस के उभार की ओर संकेत कर दाँत पीस रहा था, ‘असली वज्र है ये, समझे मिस्‍टर आम आदमी।'

अंकल ने किसी तरह प्रखर को उठाया। कुशल प्रखर की पीठ थपथपा रहा था, ‘डोन्‍ट माइन्‍ड, यह सब हमारे खेल का हिस्‍सा है। सुर्खरू होता है इन्‍साँ ठोकरें खाने के बाद।' अंकल ने लोगों की ओर ख्‍़ाास निगाह से देखा। सबने अपनी अपनी जेब से लिफाफे निकाल कर मेज़ पर रख दिए। अंकल और कुशल ने भी। अंकल ने लिफाफे उठाकर एक पैकेट में रखे। प्रखर को देते हुए बोले, ‘ले लो․․․ अरे ले भी लो․․․ अरे आप ले भी लीजिए। तुम तो आर्ट ऑफ लाफिंग के मास्‍टर हो। हम फिर तुम्‍हें बुलाएँगे। आए तो बस से होंगे जाना टैक्‍सी में। वना हमारी इन्‍सल्‍ट होगी। जब मैं कार में चलते हुए आजू बाजू कीड़े-मकोड़ों की तरह बिलबिलाते लोग देखता हूँ तो रोना आ जाता है। मन करता है कीड़ों वाली दवाई स्‍प्रे करता चलूँ और कीड़े-मकोड़े पट पट गिरते रहें।' द्वारपाल ने प्रखर का हाथ पकड़ लिया था। लोग आपस में बातें कर रहे थे। अंकल कुशल से कह रहे थे, ‘यह तो अपनी ही तरह का अनूठा विदूषक निकला। तुम्‍हारे भी परिचय में कैसे कैसे लोग भरे पड़े हैं।' प्रखर चल पड़ा। लोगों के ठहाके उस पर नये पूँजीवाद की तरह बरस रहे थे

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2/8-बी, केशवपुरम, लारेन्‍स रोड,

नई दिल्‍ली�3

मोबाइल ः 09868076182

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रचनाकार: सुशील सिद्धार्थ की कहानी - विदूषक
सुशील सिद्धार्थ की कहानी - विदूषक
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