राजुला शाह की कहानी - जुबेर का नाम जुबेर

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राजुला शाह जुबेर का नाम जुबेर “ अब्‍बा, कोयल․․․ उसके भीतर बैठा बच्‍चा बरसों पहले के शब्‍द बुदबुदा रहा था। अब्‍बा उसके साथ कोयल ढूँढने लग...

राजुला शाह

जुबेर का नाम जुबेर

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अब्‍बा, कोयल․․․ उसके भीतर बैठा बच्‍चा बरसों पहले के शब्‍द बुदबुदा रहा था। अब्‍बा उसके साथ कोयल ढूँढने लगते। दोनों को कोयल कभी नहीं दीखती। वह तभी दिखती, जब वह दिखना चाहती। लेकिन वे हर बार उसे ढूँढते ओर वह हर बार ढूँढने का खेल बन जाता। कोयल बड़ी खिलाड़ी है․․․ अब्‍बा कहते और कोयल की नकल में आवाज निकालने लगते। कोयल खेल में शामिल हो, चिढ़ती जाती और अंततः उसका पंचन विकृत होकर फट जाता। बाप बेटा अपनी सफलता का जयघोष करते भीतर चले जाते। भीतर रसोई की खिड़की से कूदकर भागती बिल्‍ली पर अब्‍बा एक मग पानी डालकर कहते-

-चलो अब इसे निमोनिया तो हो ही जाएगा। बेटा बना फरीद ताली बजा-बजाकर हँसता और रात को नींद में गिरते हुए सोचता बिल्‍ली को निमोनिया हुआ होगा कि नहीं? बंद आँख लेटे बिल्‍ली, उसे भीगी-काँपती दिखती और फरीद रजाई को गले तक खींच लेता। उसकी आँख खुल जाती। खिड़की के बाहर हमेशा की तरह होती हवा, नीम के पीले पत्त्‍ाे झराती।”

तालियों के स्‍वर से चौंककर जुबेर ने अपने आसपास देखा। हॉल खचाखच भरा हुआ था। कथापाठ खत्‍म हो गया था। जुबेर सिगरेट मुँह में दबाए बालकनी का दरवाज़ा खोलने लगा। सिगरेट का धुँआ दरवाज़े के शीशे पर एक पर्त में छा रहा था। उस पार उड़ते पंछियों की छायाएँ उसे चीरती हुई निकल गईं। अभी दिन ढला नहीं था। हालाँकि तालियों के स्‍वर से चौंक जब जुबेर कुर्सी से उठा तो उसे लगा था बाहर रात हो चुकी होगी। लेकिन बाहर अभी भी दिन ही चल रहा था। जुबेर खाली छत पर धूप में चला आया। उसकी छाया चुपचाप आकर उसके पीछे खड़ी हो गई। जुबेर ने एक कश खींचा तो छाया ने भी। जुबेर सामने खड़े नीम में छिपी बैठी कोयल को ढूँढने लगा।

जुबेर का कथा में फरीद हो जाना, जुबेर पहचानता था। कभी-कभी उसका मन होता कि कथा गोष्‍ठी में खड़े होकर बोल दे कि असल में वही कथा का फरीद था, बल्‍कि यह भी कि कहाँ-कहाँ फरीद वह नहींथा, जो उसे होना चाहिए था। कृपया व्‍यर्थ में सभा का समय जाया ना करें- यह काल्‍पनिक स्‍वर उसके उबाल पर तुरंत ठंडे छींटे मार देता।

जुबेर का नाम जुबेर बड़ी खाला का दिया हुआ था। पास दूर के सभी लोग उसे इसी नाम से जानते थे। दरअसल अम्‍मीं खाला को बहुत मानती थीं। तिस पर दिल में एक अदद बिटिया की तमन्‍ना लिए अचानक बेटे के आ जाने पर वह नाम के इस नए संकट के लिए तैयार भी कहाँ थीं? उनके भीतर तो ‘सोफिया-सोफिया' यूँ बज रहा था, जैसे किसी गीत के पहले का कॉर्ड! सो ख़ाला अगर कहतीं तोउसका नाम फरीद भी रखा जा सकता था। बहरहाल ऐसी वैसी, कैसी भी तमाम संभावनाओं के बीच जुबेर का नाम जुबेर था, जो उसे खासा नापसन्‍द था। एक से एक नाम सुनता, उसके दिल में एक हूक सी उठती। कई दफे उसके जी में आया भी कि एफिडेविट देकर नाम बदलवा ले। इस बारे में, उसने ताहेरा से भी मशविरा किया था।

-नाम से क्‍या होता है, भला? ․․․वह सुबह-सुबह खिड़की के पल्‍ले हवा में पसारते हुए बोली थी- जुबेर से रेहान, रशीद या साहिल होकर तुम क्‍या बदल जाओगे? जुबेर को उसकी साफगोई बुरी तो लगी थी पर शायद वह ठीक ही कह रही थी। फिर भी, उसके मन में आया कि उसकी इस तमन्‍ना को भी थोड़ी तवज्‍जो तो दी जानी चाहिए थी। बहरहाल उस दिन के बाद उसने वह बात दोबारा नहीं छेड़ी थी। यह बात और है कि उस दिन के बाद से ताहेरा उसे कभी रेहान, तो कभी रशीद बुलाने लगी थी। जुबेर को अपने लिए यह नाम सुनना भला सा लगता, पर कभी शाम के ढलते उजाले में उसे लगता कहीं ऐसा ते नहीं कि ताहेरा उसका मज़ाक उड़ा रही हो․․․ यह ख्‍़याल जुबेर के बेहद मायूस कर देता। उस रात वह दीवार की ओर मुँह फेरकर सो जाता और जि़द में बिरूखा सा सुबह उसी करवट उठता। पता नहीं ताहेरा उसके इस बिरूझाने को ठीक-ठीक पकड़ पाती या नहीं, लेकिन अगली सुबह, ज्‍यों ही जुबेर ‘बीती ताहिर बिसार' के अपनी सहजता में लौटने की पहल करता, तो वह अपने अनजाने ही जैसे अपनी बारी को नाराजगी ठान लेती। इस बारे में उनकी आपस में कोई बात न होती लेकिन इस अनकहे में खेल के कायदों का लिहाज़ करते हुए दोनों चौबीस घंटे के इस तनी रस्‍सी के नाज में शामिल हो जाते। किसी तमाशबीन को शायद इस खेल के तनाव में ढील पड़ने की दूर-दूर तक कोई संभावना ना दीखती। उन दोनों कोखुद भी अगले उस पल के बारे में पता नहीं होता था कि जिसमें अचानक सब सामान्‍य हो जाने वाला होता था।

कभी-कभी जुबेर इस तनी रस्‍सी पर संभल-संभलकर चलते हुए, बीच में ठिठक जाता। उसे रस्‍सी के आसपस का पूरा संसार जैसे फक्‍क्‌ से दीख जाता और वह अपना संतुलन खोकर ज़मीन पर आ पड़ता। आधी-अधूरी रात का हासिल अगले दिन पर लद जाता। सुबह उसकी नींद खुलती तो उसे लगता जैसे रात भर वह कोई सपना देख रहा था- किसी रेहान, असद किसी रशीद का। वह खुद को आईने में घूर-घूरकर देखता। एक पर एक कई चेहरे गिरकर तस्‍वीर को गड़बड़ा देते। अपना चेहरा खोकर जुबेर आईने से मुँह फरे लेता। आगे पीदे के कई कल और परसों सिमटकर उसके पास आ जाते और वह अपनी चिपचिपी हथेली में पकड़ी किताब मुंडेर पर रख देता।

आखिर कथा लेखक ने उसके चरित्र के साथ यह छेड़छाड़ क्‍यों की थी? वह तो उसका सबसे अजीज दोस्‍त हुआ करताथा। बचपन के तमाम किस्‍से -कहानियाँ, घटनाएं वह इसी जुबेर के साथ तो शेयर करता था। फिर उसके सारे नाते रिश्‍तेवालों में से कौन था जो निज़ामाबाद से उससे मिलने जाना चाहता था? उसकी माँ बेचारी अकेले कहाँ जातीं। मेरे हाथ ही उन्‍होंने जुबेर के लिए मीठे शक्‍करपारों से भरा डालडे का डिब्‍बा भिजवाया था। जुबेर के लिए भी अपने छोटे से कस्‍बे से बाहर इतनी दूर बम्‍बई जाने का वह पहला मौका था। रिज़र्वेशन था नहीं, उसे सारे रास्‍ते टॉयलेट के पास बैठकर जाना पड़ा था। उसके बाद बम्‍बई का वह रिक्‍शेवाला जो उसे गोल-गोल घुमाकर, खूब से पैसे ऐंठकर, उसे ना जाने कहाँ छोड़कर नदारद हो गया था। और फिर वह बिहारी जिसने बिना एक रूपया लिए उसे सही ठिकाने तक पहुँचाया था। खासी दूरी थी वहाँ से और जुबेर को बिठलाने से पहले ही उसे पता था कि उसकी जेब खाली थी, और शायद फटी हुई थी। लेकिन भलेमानस ने उसे कमल के हॉस्‍टल के ठीक सामने छोड़ा था। कमल तब कमरे में नहीं था। वह दो घंटे बाद लौटा था और जुबेर को नीचे बेंच पर बैठा देख अचरज से उसकी आँखें फैल गइ थीं। वह उसके गले लगकर रो पड़ा था- ‘जुबेर, तुमने मुझे बचा लिया, तुम आ गए दोस्‍त!'

पर कहानी में समीर फरीद को स्‍टेशन पर लेने जाता है। और उसको देखते ही कहता है- ‘फरीद अब तुम किस उलहने का पैगाम लेकर आए हो? मुझ पर रहम खाओ और वापस चले जाओ, दोस्‍त।'

‘कस्‍बा' को वह कई दिनों से पढ़ रहा था। इतना लम्‍बा समय उसे आमतौर पर किसी कहानी को पढ़ने मेंनहीं लगता था। जाने क्‍या था कि इसे वह खत्‍म ही नहीं कर पा रहा था। वह हर बार शुरू से शुरू करता और दादर स्‍टेशन पर ट्रेन से उतरकर ठगा सा खड़ा रह जाता। कुछ भी करके उसकी आँखों में यह दृश्‍य बनता नहीं था। वह कमल को स्‍टेशन पर आया नहीं देख पाता था। बस। उसके दृश्‍य में तो वही काना कुली होता था, जो उसे टे्रन से उतरते ही प्‍लेटफार्म पर इंतजार करता मिला था। और कथा से बाहर कमल जुबेर को लेने स्‍टेशन नहीं आया था।

-कम ऑन, जुबेर․․․ तुम इसे पर्सनली ले रहे हो। यह सिर्फ एक कथा है मेरे दोस्‍त, इसमें कुछ भी हो सकता है।

जुबेर ने आँखें बंद कर लीं। कान मेंरेल की सीटी बजने लगी। कथा के दृश्‍य में वह गोमती एक्‍सप्रेस के एस-3 डिब्‍बे से उतरने लगा। समीर सूटकेस उसके हाथ से लेते हुए बोला- फरीद अब तुम किस उलहने का पैगाम लेकर आए हो? मुझ पर रहम करो और वापस चले जाओ, दोस्‍त․․․

जुबेर और आँखें बंद ना रख सका। इस डायलॉग के बाद उसे हर बार कमल की माँ का दिया डालडे का पीला डिब्‍बा दिखाई देने लगता था। जुबेर की समझ में नहीं आता था कि ऐसे किसी दृश्‍य के बाद कथा आगे कैसे बढ़ सकती थी? बहरहाल कथा बदस्‍तूर आगे बढ़ती थी। लेकिन फरीद स्‍टेशन से ही लौट गया या समीर के संग उसके हॉस्‍टल गया, इसमें किसी की दिलचस्‍पी नहीं थी। इसलिए फरीद बना जुबेर अपने अदृश्‍य पीले डालडा के डिब्‍बे के साथ स्‍टेशन पर ही छूट गया था। जबकि पाठक समीर के साथ स्‍टेशन से बाहर निकल, सड़क पर तेज कदमों से चलते हुए हॉस्‍टल की छत पर पहुँच गए थे जहाँ हेमा उसका इंतजार कर रही थी।

जुबेर ने अपने भीतर उबलते गुस्‍से से बेचैन हो, दूसरी सिगरेट जला ली। कमल को क्‍या इसका ख्‍़याल भी था कि, जुबेर किस तरह बम्‍बई पहुँ था। आखिर वह उसे ऐसा एक वाक्‍य बोल भी कैसे सकता था, और क्‍यों? वह भी स्‍टेशन पर ही? कया यह संभव है कि अगर कमल स्‍टेशन पर आया होता तो वह ऐसा ही कोई वाक्‍य बोलता? और फिर अगर वह बोलता तो जुबेर उसके साथ हॉस्‍टल जाता या वहीं से लौट जाता?

- मुझे समझ में नहीं आता जुबेर, जुम खुद को इस कथा से इस कदर क्‍यों जोड़ रहे हो? इट्‌ज़ अ स्‍टोरी माय डियर․․․ इसमें फरीद और समीर है, कमल और जुबेर नहीं।

जुबेर अपने बचपन के दोस्‍त से जवाब में कुछ भी कह नहीं पाया था। एकदन्‍त, दयावन्‍त, चार भुजाधारी माथे सिंदूर सोहे मूषे की सवारी․․․ कमल के घर यह आरती रोज़ गाई जाती थी। जुबेर की आधी जिंदगी कमल के यहाँ बीतने से वह हर दिन इस आरती में शामिल था। पूरा कुलकर्णी परिवार रसोई के उस छोटे से कोने में सिमट हाथ जोड़े आँख बंद किए, ताली बजा-बजाकर गाता। जुबेर सिर्फ ताली बजाता और अलमारी के सामने की ज़रा सी जगह में सिमटे कुलकर्णी परिवार को देखता। अलमारी के एक शेल्‍फ में सफेद (कमल के पिताजी ‘सुफेद' बोलते थे) गणपति रखे होते- सिंहासन पर छत्र तले, हाथ में दो-चार लड्‌डू पकड़े। ऊपर नीचे के शेल्‍फों में स्‍टील के बरतन, दाल, चावल, मसालों के एल्‍यूमिनियम के डिब्‍बे रखे रहते। प्‍लास्‍टिक के डिब्‍बों में से कमल की माँ के बनाए शक्‍करपारे और मोदक झाँकते रहते। आरती के दौरान चुपचाप पड़ी इन चीज़ों को देखने में फरीद को बहुत मज़ा आता था। लेकिन इतने भारी गणेशे इतने छोटे से चूहे पर क्‍यों चलते थे? और उनका एक ही दाँत क्‍यों था? कमल की माँ के पास इन तमाम सवालों के जवाब मौजूद होते थे और उनके मुँह खोलते ही वे सारे जवाब कथाएँ बन जाते थे।

एक रात की बात है, गणेश जी बहुत से मोदक खाकर जा रहे थे। मूषक बेचारा पिचका जा रहा था। इतने में सामने से आते साँप को देखकर बिदका और गणेश जी लुढ़क पड़े। उनका पेट फूट गया। सारे मोदक निकलकर बिखर गए। इस नज़ारे कोदेख अकास के चाँद को हँसी आ गई। विनायक ने आव देखा ना ताव, अपना एक दाँत तोड़कर खिदखिदाते चाँद पर दे मारा। फिर उनकी नज़र पड़ी भीगी बिल्‍ली बने मूषक पर। कमबख्‍़त उनका वाहन होकर साँप से डरता था! उन्‍होंने आव देखा ना ताव, साँप को उठाया और कमरबंद की जगह बाँध लिया। तभी से उनका एक दाँत है, कमर पर साँप बँधा है और चाँद पर दाग․․․ कथाएँ तो सैकड़ों थीं जो उनके बचपन के आसपास बुनी-बिखरी थीं। लेकिन उनमें दोनों का साझा था। जो एक दिन जुबेर खुद कमल के लिए कथा बन जाए, ऐसी जुबेर ने कभी कल्‍पना नहीं की थी। क्‍या लेखक होने का मतलब था कि आप अपनी कथा में कुछ भी कर सकते थे? हुआ को अनहुआ भी?

कल कॉलोनी की पिकनिक में नागचून जाना है, याद है न आपको? ताहेरा उसकी प्‍लेट में शोरबा ढालते हुए पूछती। जुबेर चौंककर उसकी तरफ देखता। अभी तो उसकी बगल में पोखर में बंसी डाले कमल बैठा था, ये सुंदर-सी स्‍त्री कौन है जो उसकी प्‍लेट में शोरबा․․․ ओह ताहेरा․․․ हाँऽऽ कल है ना․․․ ताहेरा? वह सोचने लगा पोखर में मछली पकड़ने वाला कल इतना करीब और नागचून वाला कल इतना दूर क्‍यों लग रहा था? क्‍या वह बूढ़ा हो रहा था? अब्‍बा का भी बड़ी उमर में यही हाल हुआथा कि वे उसकी कल की बताई बात भूल जाते और अपने लड़कपन के किस्‍से यूँ सुनाते जैसे ‘कल ही की बात' हो। जुबेर कितना झल्‍ला जाता था उनकी स्‍मृति के इस बर्ताव पर। कई बार उसे लगता अब्‍बा महज़ उसे खिजाने के लिए ऐसा करते थे। उसे लगा जैसे बरसों बाद अब्‍बा पर का उसका शक आज अभी टूट रहा था।

तो क्‍या वह बूढ़ा हो रहा था? क्‍या ताहेरा बूढ़ी हो रही थी? वह नजर उठाकर अपनी बीवी की ओर देखता। उस चेहरे पर उसे अनेक ऐसी रेखाएँ दिखतीं जो अब से पहले उसकी नज़र में कभी नही आइर्ं होतीं। जुबेर कुर्सी खिसकाकर उठ जाता। उसे आजकल भूख सी लगनी बंद हो गई थी। ‘कस्‍बा' सोते-जागते उसके साथ रहने लगी थी। वह फरीद के ख्‍़यालों में दुबला रहा था। वह ख्‍़याल जैसे उसके पीछे पड़ गया था। कई दफे घर की सीढि़याँ उतरते हुए उसे अपने पीदे एक जोड़ा कदमों की आहट सुनाई देती। वह चेहरा थोड़ा घुमाकर कनखियों से पीछे देखता तो वहाँ कोई भी ना होता। उसकी परछाई भी नहीं। कभी सड़क पर चलते हुए उसे गुमाँ होता कि वह कहानी में चल रहा है। फज़र् करो कि वह फरीद हो तो उसे कैसे चलना चाहिए? अगर जुबेर और फरीद को दो अलग व्‍यक्‍ति मानना है तो उनके बीच के फर्क को तो दर्ज़ करना होगा। क्‍या फरीद उसकी छाया था कि चुपचाप उसके पीछे-पीछे चलता चला आए?

पापा․․․ आवाज़ सोफिया की होती। वह इधर-उधर सर घुमाकर देखता तो उसे वह कहीं दिखाई नहीं देती।

पापा․․․ इधर इधर․․․ पास की झाड़ी से आवाज़ आ रही होती। ऊधमचौकड़ी कनेर की झाड़ी में अपना खेल जमाकर बैठी होती। जुबेर अपने ख्‍़यालों में मुब्‍तिला वहाँ एक पल ठिठक जाता। क्‍या कनेर की झाड़ी में घर-घर खेलते इन बच्‍चों के बारे में जस का तस लिख डालने भर से कहानी बन जाएगी? कहानी के लिए दृश्‍य में क्‍या बदलाव दरकार होंगे? चलते-चलते दृश्‍य में मन्‍नू की दूकान आ जाती। कनेर वाले बच्‍चे वहीं खेलते छूट जाते। उन्‍हें वह किसी कथा सूत्र में पिरो पाए इससे पहले एक नया स्‍वर उसकी तंद्रा तोड़ता।

भाई साहब लीजिए। इस बीच तो आप दिखे ही नहीं। सब खैरियत तो है?

सब ठीक है मन्‍नू। थोड़ा बिज़ी था।

जुबेर मन्‍नू के चूना-कत्‍था लगे हाथों से पनामा का डिब्‍बा लेते हुए मन्‍नू के चेहरे को देखने लगता। मन्‍नू की कहानी बनाने के लिए उसके ‘चरित्र' में क्‍या जोड़ा और घटाया जाना होगा? क्‍या क्‍था में उसके चेहरे पर चेचक के ऐेसे ही दाग होंगे जो मन्‍नू के चेहरे पर हैं? वह क्‍या बात-बात पर ऐसे ही हँस पड़ता होगा जैसे मन्‍नू हँस पड़ता है? उसके पास भी क्‍या दो नीली-खाकी कमीज़ें होंगी जो वह बदल बदलकर पहनता होगा? और फिर कहानी का अंत? कया वह वर्तमान से भविष्‍य में छलाँग लगाते हुए मन्‍नू को एक दिन होटल का मालिक बनते दिखाएगी जो वह होना चाहता है और अभी है नहीं? कथा में क्‍या उसका यह स्‍वप्‍न पूरा होगा? क्‍या ज़रूरी था कि कथा लेखक को यह सब पता हो? या फिर कथा में कुछ नहीं होगा और वह उसे भूतकाल से शुरू कर वर्तमान की इस गुमटी तक लाकर यूँ छोड़ देगा कि-- मन्‍नू अपने होटल का सपना देखते हुए इसी तरह अपना पान पैलेस चलाता रहा। उसे उस दिन का इंतजार था कि जिस दिन वह आँखें खोलेगा तो उसके सामने मैनेजर का काउंटर होगा और उस पर तनकर बैठी सुनहरी चीनी बिल्‍ली का खिलौना हाथ हिला हिलाकर सबको भीतर बुला रहा होगा।

पर यह कथा बुन कौन रहा था? फरीद या जुबेर? इस बीच मन्‍नू दूसरे ग्राहकों में व्‍यस्‍त हो जाता। जुबेर पैसे उसके डिब्‍बे पर रख देता। और खुद कहाँ जाने निकला था यह भूलकर वह घर को लौट पड़ता। वो नागचून कब जाना था․․․ क्‍या कह रही थी ताहेरा?

तुम शायद दुःख है कि उसने तुम्‍हें, मसलन रेहान क्‍यों नहीं बनाया! ताहेरा आईने में उसे देख रही होती। जुबेर किताब से आँख उठाकर उसकी तरफ देखता। उसके मुँह पर मुस्‍कान की एक हल्‍की सी रेखा दीखती। क्‍या सचमुच, वह सोचने लगता, कथा में फरीद का नाम रेहान होने से क्‍या वाकई जुबेर की परेशानी कुछ कम हो जाती? क्‍या रेहान बनकर वह वैसा बन पाता जैसा वह बनना चाहता था? पर वह आखिर कैसा और क्‍या बनना चाहता था? ताहेरा कपड़े बदलकर अब आईने के सामने बैठी चोटी गूँथ रही होती। सोते समय वह रोज दो ढीली चोटियाँ किया करती थी। इतनी सुंदर बीवी कया जुबेर की हो सकती थी? और एक वह था जो अपने नाम बदलने का निर्णय तक नहीं कर पाया था․․․

‘रेहान! पंखा चलाऊँ?' वह ताहेरा का स्‍वर होता। जुबेर दीवार की तरफ मुँह फेरकर लेट जाता। वह फरीद से रेहान में आखिर क्‍या बन जातना चाहता था? पर कमल ने उसे कथा बना देने से पहले उससे पूछा नहीं था। कथा में अगर वह उसके लिए जुबेर से फरीद बन गया था, तो वह अब जीवन में उसके लिए क्‍या था? क्‍या ‘कस्‍बा' लिखने के बाद अब वे उसके मन में दो अलग-अलग व्‍यक्‍ति हो गए होंगे या एक दूसरे में डिज़ॉल्‍व होकर गड्‌ड-मड्‌ड हो चुके होंगे? कौन फरीद? कौन जुबेर?

‘मुझे पहचानते हो कमल?' वह अपने बचपन के दोस्‍त को पोखर किनारे झिंझोड़कर पूछना चाहता। पोखर का पानी सपने में आईना बन जाता और अपने सामने खड़े आदमी की बड़बड़ाहट से झुँझला, मुँह फेरकर दूसरी ओर चला जाता। किसी को अपना आईना नहीं बनाया जा सकता था। फरीद क्‍या जुबेर का आईना हो सकता था, जिसमें वह अपना आनेवाला कल देख पाता? जुबेर की इस कथा से कोई तो उम्‍मीद थी जो पूरी नहीं होती थी। ना जाने कितनी बार वह इस एक कहानी को पढ़ चुका था। हर बार वह वही की वही रही आती थी। एक शब्‍द भी यहाँ से वहाँ नहीं होता था। और इसमें जुबेर के अलावा और किसी को आपत्त्‍ाि नहीं थी। जो भी होना था वह पहले से तय था। चाहे कथा में हो या उससे बाहर, उसमें कोई फेरबदल नहीं हो सकता था। अम्‍मी की लाख तमन्‍नाओं के बावजूद जुबेर सोफिया नहीं बन सकता था। अब्‍बा की साथवाली सरकारी नौकरी अलबत्त्‍ाा उसने जरूर हासिल की थी, और फिर थोड़े समय में अब्‍बा के ओहदे से अँगुल भर ऊँचा ओहदा भी। किन्‍तु उसका शहर अब्‍बा के शहर से बड़ा था, यहाँ लोग चौगुने थे, सो उसका घर अब्‍बा के घर से कुछ छोटा ही ठहरता था। फिर शहर में तरह-तरह का सामान मिलता था, इसलिए उसकी जरूरतें भी अब्‍बा से ज्‍यादा थीं। कुल मिलाकर बदले हुए संदर्भ में जुबेर उतना संतुष्‍ट व्‍यक्‍ति नहीं था, जैसी उसकी अपने बारे में कल्‍पना थी। किंतु यही बात अगर ताहेरा कह देती तो वह झल्‍ला जाता। ना चाहते हुए भी वे बार-बार इस ‘तनी रस्‍सी के नाच' में शामिल हो जाते। और फिर जब उस दृश्‍य मं यकायक वह बिन्‍दु आता कि नट बने जुबेर की साँस टूटती तो उसे एक कौंध में जैसे तमाश्‍बीनों की आँख में अपना प्रतिबिम्‍ब दीख जाता। उस पल उसे अपना आप कुछ कुछ कथा के किसी चरित्र की तरह आँख सामने अलग सा दीखने लगता। अपने से अलग इस ‘दूसरे' पर उसे ऐसी माया होती, जैसी बाजार के चकाचौंध मेले से गुजरते, पिता का हाथ पकड़कर घिसटते एक रूआँसे जिद्‌दी बच्‍चे को देखकर होती थी। अक्‍सर वह बाजार में ऐसे किसी बिरूझे, अनमने बच्‍चे का पिता के हाथ से खिंचते, घिसटते, भीड़ में ओझल होना देखता खड़ा रह जाता। ना जाने उस बच्‍चे को क्‍या चाहिए रहा होगा, वह सोचता। और फिर आने वाले कई दिन यह बिम्‍ब उसके मन में जब तब कौंधता रहता। दफ़तर से लौटते हुए वह बस में अपने आसपास बैठे क्‍लांत, ऊँघते, पसीना-पसीना चेहरों को देखता। सभी के भीतर जैसे वही बिरूझा हुआ बच्‍चा बैठा दीखता। उसे ना जाने किस चीज़ की रट लगी रहती जो उसे मिलती नहीं थी। अगर यह रूसी कहानी होती और उसमें बुद्धू ईवान को बोला जाता जाओ वहाँ ना जाने कहाँ, लाओ उसे ना जाने किसे तो इवान बिना कुछ पूछे उसकी खोज में निकल पड़ता।

एक के बाद एक कई चेहरे उसके मन में डूबने उतराने लगे। कई शहर, कई वक्‍त, कई मौसम, कई दिन-रात आपस में गड्‌ड-मड्‌ड हो गए․․․ उन बूढ़े सरदारजी का क्‍या हुआ होगा, जो अमृतसर में रिक्‍शा चलाते थे, और उस मछुआरिन का, जिसे एक दिन अचानक शहर में आकर चिंदी मज़दूर बन जाना पड़ा था? कया उसके पति ने शराब पीना छोड़कर उसकी मदद करना शुरू किया होगा? उस होटल वाले का क्‍या हुआ होगा, जिसने अपने जन्‍मदिन की रात नशे में धुत्‍त हो, अपनी बीवी को ही गोली मार दी थी? क्‍या उसका होटल अभी चल रहा होगा? वह टैक्‍सीवाला․․․ जो जीवन की उमंग से भरा अपने परिवार को ‘देस' से बम्‍बई ले आने का मंसूबा पाले था, उसका क्‍या हुआ होगा?

कई अधूरी कहानियाँ जुबेर के जे़हन में कुलबुलाने लगीं। अचानक उसे गुमां हुआ कि शायद उसके पास भी बहुत सी कहानियाँ थीं चाहता तो वह भी उन्‍हें लिख सकता था। वह बालकनी की मुंडेर पर सिगरेट बुझाकर पीछे घूमा और दीवार से पीठ टिकाकर खड़ा हो गया। भीतर पार्टी में कमल को घेरे उसके प्रशंसक, पाठक आदि कई लोग अब भी खड़े भी आज शायद एक दोस्‍त की हैसियत से वहाँ नहीं था- वह तो उसके जीवन से निकलकर रेंगता हुआ उसकी कही कथा में चला आया था- एक चरित्र। शायद सारे मेहमानों को भी पता होगा कि वही कथा का फरीद था।

छत पर पसरे अंधेरे का फायदा उठाकर वह सीढि़याँ उतरने लगा। भीतर अब भी बहुत भीड़ थी। किसी को उसके ना होने का पता चलने की आशंका नहीं थी। दोबारा भीतर जाकर जुबेर का पार्ट अदा करने के ख्‍याल से ही उसे उब हो रही थी। वह जानना चाहता था, आखिर किस दिन, किस पल से वह कमल के लिए कहानी बन गया होगा। और उस पल के बाद? फरीद में से जुबेर को घटाया तो बाकी क्‍या? हासिल क्‍या? एक बार जुबेर से फरीद बनकर क्‍या संभव था कि वह कमल के लिए दोबारा जुबेर बन सके?

किसी को भी अपना आईना नहीं बनाया जा सकता जुबेर एक बर फिर आईने और दीवार के बीच करवटें लेने लगा। अम्‍मीं, खाला, भाईजान, मामू, जमीर, अमीना कोई भी तो उसका आईना नहीं बन पाया था। जाने कितनी रातें वह यूँ ही उस संभावित आईने से बेजार हो दीवार की ओर मुँह फेरकर सोया था। पर दीवार का आईना हो जाना उसने कीाी नहीं चाहा। ऐसी कई कई रातें उसने अपनी जि़द की करवट ही सोते गुजार दी थीं। एक वह होता और एक उसे समझा गया होता, जो वह होता नहीं। यह फाँक उसका जीना मुहाल कर देने को काफी होती। वह क्‍या था? और उसे क्‍या समझा जा रहा था? कहीं से कोई जवाब नहीं आता। ऐसे समय हर बार, उसके सबसे करीब अगर कोई रहा, तो यह दीवार ही, जो आज भी मुँह बाए थी। हर बार अगली सुबह तक उसमें एक सुराख हो जाता था।

अभी पौ फटने वाली थी। आँखों ही आँखों में जुबेर और दीवार ने रात की चादर में छेद कर डाला था। ताहेरा अभी सो रही थी। नींद में वह और सोफिया जुड़वाँ बहनें लग रही थी। जुबेर के बिस्‍तर पर सोते दो सजीले फरिश्‍ते-से ये लोग कौन थे?

नारंगी परदों से छनकर आती धूप, हौले से सोफिया को जगाने की कोशिश कर रही थी। रात पानी बरसा था। सड़क पार के जामुन की पत्त्‍ाियाँ धुली हुईथीं। जुबेर उठकर खिड़की के पास चला आया। उसने पर्दा सरकाया तो धूप का गोला बिखरकर कमरे में फैल गया। खिड़की के बाहर से गीली सौंधी मिट्‌टी और धुले चमकते पत्त्‍ाे कह रहे थे- रात बारिश आई थी। और धूप का टुकड़ा लाल फर्श पर नाचते हुए कहा रहा था- नहीं तो!

जुबेर ने सोफिया के कामन में फुसाफुसाकर कहा, -बारिश धूप का सपना थी। सोफिया करवट लेकर ताहेरा की ओर मुड़ गई। अब किसी भी पल वह आँखें खोल देने वाली थी। उठते ही झटपट अपना जादू फैलाकर खेल जमा लेने वाली थीं जुबेर की आरामकुर्सी उसका जादूघर थी। वह उसे जब जो बना दे, वह बन जाती थी। कभी बस, कभी रेल, कभी स्‍कूल, कभी घर। सोफिया जादू जानती थी। कभी थी जाती तो उसे ‘कुर्सी' बनाकर उसमें सो भी जाती थी।

जुबेर आरामकुर्सी की लम्‍बी पीठ से टिककर लेट गया। हवा भीतर उसके बाल फरफराने लगी। बंद आँख जुबेर को लेकर आरामकुर्सी आकाश के फेरे पर निकल पड़ी। हवा उसके चेहरे को ले उड़ चली। जुबेर ने आँखें और कसकर बंद कर लीं। वह खुद ही कमरे में बैठे हुए खुद को आकाश में उड़ते देखने लगा। इस चेहरे को देखकर कौन कह सकता था कि वह दिन भर में ना जाने कितनी दफे साहिल से फरहान से रशीद से फरीद से जुबेर में बनता मिटता रहा था? बंद आँखों के सामने आईना उसका खोया हुआ चेहरा लिए डोलने लगा। हाथों में अपना रोशनी से चुँधियाया चेहरा लिए जुबेर चुपके से खिड़की के रास्‍ते वापस चला आया। कमरा अभी जगा नहीं था। सोफिया नींद में मुस्‍करा रही थी

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जे․ एम․ 10, सहियाद्री परिसर,

निराला नगर, भदभदा रोड, भोपाल - 462 003

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(शब्द संगत / रचना समय से साभार)

(चित्र - सौजन्य : आशीष श्रीवास्तव)

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फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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