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सौमित्र सक्सेना की कहानी - परिचितों के बीच

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सौमित्र सक्‍सेना परिचितों के बीच   कल्‍ले लोग वाट्‌स अप ब्रदर को वास्‍स्‍ऽऽ अब ब्रो और यू मदरफकर को यों मऽ फक्‌ऽऽ बोलते हैं। वो आधी बात फेफ...

सौमित्र सक्‍सेना

परिचितों के बीच

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कल्‍ले लोग वाट्‌स अप ब्रदर को वास्‍स्‍ऽऽ अब ब्रो और यू मदरफकर को यों मऽ फक्‌ऽऽ बोलते हैं। वो आधी बात फेफड़े में खो देते हैं और बाक़ी की कहानी शरीर हिलाकर पूरी करते हैं। मैं जिन इलाक़ों में भी जाता हूँ उनमें ये ज़रूर मिलते हैं। कभी परेशान हाल दिखते हुए सड़क पर रोक कर सऽ यू गोटाऽ कौएऽ (सर हैव यू गौट अ कौएन) कहकर भीख मांगते हैं कभी अंधेरे में तमंचा दिखाके लूट लेते हैं। मैं रात-बिरात ऐसी जगह फंस चुका हूँ। एक बार एक लंबे-चौड़े कल्‍ले ने बिना कुछ पूछे मुँह पर मुक्‍का दे मारा था। एक दफे एक गुस्‍से में चीखकर दुकान के शीशे पर थूक कर चला गया था। यहाँ बहुत से मक्‍कू भी हैं। इनकी आँखें अजीब सी होती हैं। भवें बालों का स्‍टाइल कलमें और चेहरे पर एक दो जगह विचित्र सा भराव ये बता देता है कि ये मैक्‍सिको के वासी हैं और अमरीका का सारा लेबर सम्‍हालने का भाग्‍य लिखाकर आए हैं वहां से। चिंकी अपने चीनी ब्रो बहुत मतलबी होते हैं। अपने काम से काम। पढ़ने-लिखने आते हैं यहां। नौकरी के लिए इन्‍हें यहां कोई नहीं बुलाता। सिंगल एंट्री वीसा मिलता है। एक बार आ गए तो बरसों बरस वापस नहीं जा पाते। चायनीज़ रेस्‍ट्रां में दोपहर को बफे और रात में अपनी छोटी छोटी आंखों वाली औरतों के साथ पार्क में टहलना। चिंकी लोगों औरत को सब्‍जी वाले स्‍टोर में बच्‍चा गाड़ी के साथ मैं देख लेता हूँ तो पास जाकर देखने लगता हूँ। मुझे वो बच्‍चे देखने लायक लगते हैं। कल्‍ले लोगों के बच्‍चों की तरह नहीं जो शैशव में अपनी उपस्‍थिति से कोई भली तस्‍वीर नहीं खड़ी करते।

मैं पटेल हूँ। गुजराती हूँ। छह साल पहले कनाडा से चोरी छिपे अमरीका में चला आया था। चौंतीस बरस की जि़न्‍दगी जी चुका हूँ। दस-ग्‍यारह साल पहले ब्‍याह हुआ था। बीवी तीन बच्‍चों के साथ अहमदाबाद में रहती है और मेरे महीने दो दो महीने पर भेजे दो सौ चार सौ डालर देखकर खुश रहती है। यहां दक्षिण शिकागो के कल्‍लों वाले एरिया में छह बरस से इस गैस स्‍टेशन पर काम कर रहा हूँ। न वापस जा सकता न किसी को बुला सकता हूँ। बाक़ी सब तो ठीक है पर घर-परिवार से दूर रहना बहुत खलता है।

वैसे भी ये बहुत कठिन जगह है। खाने-पीने को मिल जाता है पर हफ्‍ता भर काम न करो तो सब खत्‍म। उस पर चारों तरफ ये रंग-बिरंगे लोग। सारे वक्‍त मन अपने वालों को तरसता है। बाक़ी सबको झेल लेता हूँ पर कल्‍लों को देख कर मेरे अंदर आग लग जाती है। मैं हमेशा सोचता हूँ कि कितना अच्‍छा होता जो भगवान ने मुझे गोरा बनाया होता। मैं छोटे-छोटे बाल रखता उनमें जैल लगाता। काला टक्‍सीडो पहनता। सफ़ेद कमीज़ चटक लाल टाई फुनगीवाले जूते और डायमंड रिंग के साथ मेरी कसरत की हुई बॉडी कैसी दिखती। फिर एक खुली छत और चमड़े की सीट वाली मर्सीडीज गाड़ी में चमकीला सफ़ेद गाउन पहनी गोरी के साथ शहर में घूमता और भरे बाज़ार सबकी नज़रों के सामने उसे होंठ से होंठ लगाकर चूमता।

कभी-कभी मुझे इस बात पर भी बहुत गुस्‍सा आता है कि भगवान ने सबको गोरा ही क्‍यों नहीं बनाया। सारी दुनिया कितनी सुंदर होती तब। सब्‍जी की दुकान पर काम चलाऊ चित्र वाले चिंकी बच्‍चों की जगह हर जगह गोरी औरतों के साथ सब कोणों से देखने लायक बच्‍चे होते। मुझे छह साल पहले देखे अपने तीनों बच्‍चों के चेहरे याद आते हैं। सबसे बड़ा वाला तो खूब गोरा-चिट्टा था। छोटे वाले का कलर मुझे ध्‍यान नहीं रहा। वो बहुत छोटा था जब मैं बाहर आ गया था। पर बीच वाली लड़की का रंग बहुत ही गिरा हुआ था। उसके पैदा होने पर पत्‍नी ने कहा था कि भगवान इसका ब्‍याह कैसे होगा। उस वक्‍त मेरे मन में आई थी कि उसे पलट के बोल दूं  कौन बहुत गोरी है जो इसकी चिन्‍ता कर रही है। जैसे तेरी हो गयी वैसे इसकी भी हो जायेगी। पर मैंने लौट कर उसे कुछ कहा नहीं। मैं चोट लगने वाली बातें किसी से नहीं कहता। ये सारी बातें मेरे भीतर इकट्ठी होकर बहुत दिन तक बैठी रहती हैं।

कोनी रीड से मेरी मुलाक़ात उसी गैस स्‍टेशन पर हुई थी। वो यहां सफाई करने आती थी। कल्‍लन थी। मोटी तगड़ी। लहीम शहीम। बड़ी-बड़ी आंखें। लाल लिपस्‍टिक पुते होंठ। उसकी भारी छाती पर ध्‍यान आते ही मैं घबरा जाता था। उसके पैरों और जा।धों का अनुमान करते वक्‍त मुझे लगता था कि यदि मेरे जैसा दुबला छोटा आदमी हो तो ये उसे निचोड़कर कुचल के रख दे। वो जीन्‍स और टीशर्ट पहनती थी। सिर पर एक लाल स्‍कार्फ। चमड़े की जरसी और स्‍पोट्‌र्स शूज़। वो एक पुरानी टोयोटा से आती थी। उसकी कमर की बेल्‍ट में एक बड़ा सा वाकी टॉकी खुसा रहता और दर्जनों चाबियों से लदा एक बड़ा सा गुच्‍छा। गाड़ी से उतरते ही वो वाकी टॉकी पर बात करना शुरू कर देती। मुझे समझ में नहीं आता था कि एक जमादारिन को वाकी टॉकी की क्‍या ज़रूरत है। टायलेट बाथरूम साफ करने के लिए उसे किससे घंटे घंटे पर गेमप्‍लान लेना पड़ता है और कहां सूचनाएं दर्ज करानी पड़ती हैं। टायलेट भी ऐसे चिकने साफ कि मेरे जैसे देसी को वहां बैठकर ड्राइंगरूम में होने का गुमान हो जाए। पर वो रोज़ दो बार सारे बाथरूम साफ करती थी। उसके पास एक बड़ी सी ड्रमनुमा बाल्‍टी थी। उस बाल्‍टी के मुंह पर एक गोल रेलिंग बनी हुई थी। उस रेलिंग में बहुत से खांचे थे। उन खांचों में बहुत से क्‍लीनर डिटर्जेन्‍ट स्‍प्रे और फ्रैशनर्स सजे रहते। बाल्‍टी के भीतर बहुत से पेपर टावल्‍स और टायलेट रोलों की गड्डियां भरी रहतीं। मैं कई बार कल्‍पना करता था कि वो अंदर जाकर क्‍या करती होगी। पहले शायद रोल जांचती हो। फिर हाथ सुखाने की मशीन के बने खाने में काग़ज़ की तौलियां भर देती होगी। टायलेट की सीट पर तो सेंसर लगा है। आदमी जैसे ही उठता है पानी अ पने आप चल जाता है। एक दहाड़ की आवाज़ के साथ सारी गंदगी पाताल में गुम। तो उसमें वो अपना कया योगदान देती होगी। मैं फिर सोचने लगता कि अपने यहां की जमादारिनें क्‍या क्‍या साफ नहीं करती हैं। कैसी गंदगी में खड़ी होती हैं। मैं एक पल को भावुक होकर सोचने लगता कि काश हमारे यहां के जमादारों को ऐसे गैजेट्‌स और उपकरण उपलब्‍ध हो जाएं तो भारत का कितना भला होगा!

मेरी बारह घंटे की शिफ्‍ट होती थी। गैस स्‍टेशन काफी बड़ा था। उसमें पैट्रोल पम्‍प के साथ एक छोटा स्‍टोर और एक काफी शॉप भी थी। ये कल्‍लों का इलाक़ा था। यहां बड़े बड़े शरीर वाले कल्‍ले अपने लहजे में मऽफकाऽ करते घूमते रहते थे। रात भर बियर और कंडोम खरीदने वालों की लाइन लगी रहती। जिस दिन रात की शिफ्‍ट होती उस रात एक के बाद एक कंडोम के पाकेट नोंचते नोंचते मैं बेचैन हो उठता था। पहले आया था तो अंग्रेजी भी ठीक से नहीं आती थी। उस पर ये लोग आधा शब्‍द मुंह में ही खा लेते। कोनी की भाषा भी ऐसी ही थी पर कोनी बहुत कम बोलती थी।

एक रोज़ शिकागो में खूब बर्फ़ पड़ी। शहर भर में बर्फ़ के ढेर लग गए। सारा ट्रैफिक अवरुद्ध हो गया। मेरी उस दिन रात की शिफ्‍ट थी। सो मुझे कहीं जाना नहीं था। कोनी को पता नहीं क्‍यों आज देर हो गई थी सो वो अभी रुकी हुई थी। कोनी ने मशीन से दो कप काफी निकाली और शीशे से पोर्क चिप्‍स एक पैकेट उठाकर मेरी तरफ चली आई। मैं इस प्रश्‍न में उलझने वाला था कि ये मेरी तरफ यूं क्‍यों आ रही है? इतने में उसने पोर्क चिप्‍स का खुला हुआ पैकेट मेरे आगे कर दिया। मैंने बिना समझे सोचे उसमें से दो टुकड़े उठाए और मुंह में रख लिए। जैसे वह नमकीन सूअर का टुकड़ा मेरे हलक़ में उतरा, मेरे फेफड़ों से ज़ोर से एक भद्दी दहाड़ निकली और तेज़ धार के साथ उलटी होने लगी। जितनी देर में मैं खुद को सम्‍हालता, उतनी देर में कोनी ने मोर्चा सम्‍भाल लिया था। उसने ज़ोर से मुझे पकड़ लिया और मेरे शरीर को आगे झुकाकर पीठ सहलाने लगी। फिर चटपट अपनी ड्रमनुमा बाल्‍टी ले आई और एक मैकेनिकल पोंछे से गंदगी को फट से सोख लिया। फिर डिस्‍इंफैक्‍टैंट छिड़ककर उसे ऐसा पोंछ दिया कि फर्श का एक एक हिस्‍सा चमकने लगा। मैं अभी सूअर का मांस चखने की ग्‍लानि से उबर ही रहा था कि एक विचित्र अनुभूति हुई। कोनी का स्‍पर्श उतना खराब नहीं था।

कोनी ने मुझसे दक्षिणी लहजे की अंग्रेजी में कहा- ‘यू शुड हैव टोल्‍ड मी दैट यू डोन्‍ट ईट मीट।'

- ‘नो नो आई टेक मीट बट ओनली चिकिन गोट मीट।'

- ‘सो यू डोन्‍ट ईट पोर्क। इज़ दिस इन योर रिलीजन।' (तो तुम सूअर का मांस नहीं खाते हो। क्‍या ऐसा तुम्‍हारे धर्म में है)।

- ‘नो जस्‍ट पोर्क इज डरटी।'

मुझे लगा कि मुझे उसके सामने पोर्क को गंदा नहीं कहना चाहिए था। मैं बात सम्‍हालने के लिए बोला, ‘हेयर पोर्क इज़ नॉट बैड बट इन माई कंट्री द अनीमल लिव्‍स इन डरटी प्‍लेसिस।'

(यहां का सूअर बुरा नहीं है पर मेरे मुल्‍क में ये जानवर गंदी जगहों में पलता है)

- ‘आर यू ओके नाव?'

- ‘येस आइ ऐम फाइन।'

- ‘दिस स्‍नो सक्‍स। माइ कार इज़ नॉट स्‍टार्टिंग अप। आई काल्‍ड द कैब बट डोन्‍ट नो हाव लौंग इट्‌स गौना टेक।' (ये बर्फ़ बहुत खराब है। मेरी कार चालू नहीं हो रही है। मैंने टैक्‍सी बुलाई है पर नहीं जानती वो किना वक्‍त लेगी।)

- ‘यू डिड नॉट काल अनीबडी इन फैमिली।'

- ‘माइ फोक्‍स डोन्‍ट लिव हेयर। आई ऐम सिंगल। हाव अबाउट यू फठेला।' (मेरे घरवाले यहां नहीं रहते। मैं अकेली हूँ। तुम्‍हारा क्‍या है पटेल)।

मैंने उस वक्‍त सोचा नहीं था कि मैं उसे ये जवाब दूंगा। मेरे मुंह से निकला।

- ‘आइ ऐम आलसो सिंगल।'

- ‘हाव ओल्‍ड आर यू।'

- ‘28' - मैंने फिर झूठ बोला।

- ‘आई ऐम 24'।

उसके शरीर से उसकी उम्र का कोई मेल नहीं था। मुझे यकायक एक जवान लड़की से बातचीत में लिप्‍त होने पर भीतरी गुदगुदी हुई।

- ‘आर यू वेरी रिलिजियस। यू हैव सो मेनी पिक्‍चर्स ऑफ योर गॉड इन हेयर।'

मैंने अपने चारों तरफ की तस्‍वीरों पर नज़र डाली और हामी भर दी। मैं क्षण भर में खुद को वेरी रिलीजियस समझने लगा। तभी कैब वाले ने हार्न दिया और कोनी मुझे एक मुस्‍कान देकर बाहर निकल गयी। उसका पोर्क चिप्‍स का पैकेट वहीं छूट गया था। मैंने एक घृणित दृष्‍टि से उसे देखा। फिर मुझे कोनी के हाथ की छाप अपने शरीर पर महसूस हुई। मैंने धीरे से पैके उठाया। मन हुआ इसे कूड़ेदान में फेंक दूं। पर सहसा मेरी दो उंगलियां पैकेट के अंदर सरक गई। एक बहुत छोटा सा टुकड़ा बाहर निकला जिसे मैंने जीभ के नीचे रख लिया। बहुत महीन स्‍वाद मुंह में घुला। एक हल्‍की सी बदबू भरी कडुआहट महसूस हुई पर बाद में वो टुकड़ा आराम से हलक में उतर गया। स्‍वाद उतना बुरा भी नहीं था।

कोनी हर रविवार चर्च जाती थी। मुझे भी एक बार चर्च जाने का अनुभव हुआ था। मेरा एक इसाई दोस्‍त जि़द करके मुझे वहां ले गया था। वो यहां नया था। रास्‍ते नहीं मालूम थे ऊपर से कल्‍लों का एरिया। हम दोनों जब चर्च पहुँचे हैरान रह गए। वहां सब कल्‍ले ही कल्‍ले थे। फादर ब्रदर सब। हम दोनों वहां से ऐसे भागे थे जैसे हमें कोई घेरकर मार देगा। कोनी से उस रोज़ के बाद मेरी अक्‍सर बात होने लगी थी। उसी ने मुझे बताया था कि वो बहुत धार्मिक है। मुझे महसूस होता था कि वो शरीर से कैसी भी दिखे पर शांतिप्रिय है। अब जब वो वाकी टाकी खोसे और चाबियों वाला गुच्‍छा खनका कर गैस स्‍टेशन पर पोंछा लगाती थी तो मेरी देह के ताले लगे दरवाज़े खड़कने लगते। मैंने उसे एक स्‍त्री के रूप में देखना शुरू कर दिया था। एक दिन कोनी मुझे अपने घर ले गई। उसका घर दक्षिण शिकागो के भीतरी इलाके में था। अमरीका के आम घरों की तरह यह भी स्‍काटिश आर्कीटेक्‍चर वाला था। ये इलाका उतना साफ नहीं था जितना शहर का बाक़ी हिस्‍सा है। टिपिकल कल्‍लू एरिया। पास में एक गैस स्‍टेशन था जहां मुझे लंबी सी कतार दिखी। औरतें, आदमी, बच्‍चे सब। साथ में ढेरों पुरानी टोयोटा शेबी इधर-उधर बेतरतीब पार्क्‍ड थीं। कुछ बूढ़े टहल रहे थे। बहुत से भिखारीनुमा आवारा से लड़के आपस में झगड़ रहे थे। वातावरण में मऽ फकाऽऽ मऽ फकाऽऽ गूंज रहा था। शायद गूंज नहीं भी रहा हो पर मुझे गुमान हुआ। मैं न जाने क्‍यों यहां चला आया था। वो मुझे अंदर ले आई। फिर खाने के लिए आलू के चिप्‍स और मेक्‍सिकन टमैटो सॉस ले आई।

- ‘ह्नाट इज़ योर होली बुक'।

- ‘गीता।'

- ‘वी रीड बाइबल। इट ब्रिंग्‍स पीस।'

- ‘गीता आलसो ब्रिंग्‍स पीस।'

- ‘यू नो फठेल गॉड क्रियेटेड आल आफ अस। ही डिजाइंड अस। पीपल हू से दैट वी इवाल्‍व्‍ड फ्रॉम समथिंग आर रोंग। गॉड पुट फॉसिल इन मेनी प्‍लेसिस आनली टू मेक अस वंडर।' (क्‍या तुम जानते हो पटेल कि ईश्‍वर ने हम सबको पैदा किया है। उसने रचा है हमें। जो लोग ये कहते हैं कि हम किसी चीज़ से विकसित हुए हैं वो ग़लत हैं। ईश्‍वर ने बहुत सारी जगहों पर जाकर जीवाश्‍म रखे ताकि हम दिग्‍भ्रमित हो सकें)।

मुझे उसकी पूरी बात नहीं समझ आई। अगर गॉड ने सब जगह जाकर फौसिल रखे तब तो ज़रूर उसने बहुत सारे रंग के फौसिल रखे होंगे। अगर वो सिर्फ़ गोरे लोगों के फौसिल रखता तो कितना अच्‍छा होता। हम सब गोरे होते। फिर कोनी इतनी बदसूरत ना होती।

- ‘आई लाइक रिलीजियस पीपल।'

कोनी थोड़ी देर सोचती रही फिर दोबारा बोली।

- ‘डू यू हैव गर्ल फ्रेंट?

मैं गलता हुआ बोला, ‘नो।'

- ‘आर ये वेरी रिलीजियस।'

मैंने हामी में सिर हिलाया। मुझे कोनी में एक कोमल परछाईं दिखाई पड़ी। मैं आगे बढ़ा और उछलकर कोनी से लिपट गया जैसे बचपन में पेड़ पर चढ़ जाता था कभी। मैंने कसकर उसे जकड़ लिया और उसके होंठों पर अपने होंठ गड़ा दिए।

कोनी ने कोई प्रतिकार नहीं किया। उल्‍टे उसने मुझे और कसकर दबोच लिया। उसकी भारी छाती के भीतर मुझे बेहाशी सी महसूस हुई।

मुझे लगा मर्सिडीज से उतरने वाली गोरी लड़की ओझल हो गयी है। पास में बड़ी सी कोनी खड़ी है। मैं सरे बाज़ार उसके लाल लिपिस्‍टिक पुते होंठ चूम रहा हूँ। एकाएक बड़ा वाला बीच वाली और छोटा काले पे काले होते गए और फिर अदृश्‍य हो गए। पत्‍नी का रंग निरंतर निखरता जा रहा है। एक समय आया जब उसका कलर एकदम श्वेत औरतों की तरह हो गया। वो मुझसे कह रही थी जैसे तेरे जैसे कल्‍ले की शादी हो गयी वैसे मेरे बच्‍चों की भी हो जायेगी․․․।

मैं सबेरे उठा। बगल में कोनी सो रही थी। मैंने धिक्‍कार भरी एक नज़र उस पर मारी। अचानक मेरे मन में एक प्रश्‍न गूंजा। अगर कोनी से मेरी कोई लड़की हुई तो उसकी शादी कैसे होगी। पर एकदम उत्त्‍ार भी खुद ही मिल गया। कोनी की लड़की कोनी के पास रहेगी। उसकी शादी अपने कलर वाले परिचितों के बीच होगी। मैंने अपने कपड़े झाड़े और कोनी को बिना जगाए निश्‍चिंत घर से बाहर निकल आया।

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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,344,बाल कलम,25,बाल दिवस,4,बालकथा,66,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,14,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान 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इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,242,लघुकथा,1245,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,326,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2002,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,706,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,790,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,17,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,80,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,201,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,75,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: सौमित्र सक्सेना की कहानी - परिचितों के बीच
सौमित्र सक्सेना की कहानी - परिचितों के बीच
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