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पुस्तक समीक्षा - कठे जांणा

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विसंगतियों की ओर इंगित करती लघु कथाएं -कठे जांणा डॉ . मधु संधु हिन्दी कथा जगत में कृष्णा अग्निहोत्री का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं। लगभ...

विसंगतियों की ओर इंगित करती लघु कथाएं-कठे जांणा

डॉ. मधु संधु

हिन्दी कथा जगत में कृष्णा अग्निहोत्री का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं। लगभग छह दशकों से उनकी सक्रिय उपस्थिति रही है। देश की सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। दो दर्जन से ज्यादा उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं। कठे जांणा उनका २०१३ में प्रकाशित नवीनतम लघुकथा संकलन है। पुस्तक में ७७ लघुकथाएं हैं। मूल विषय समसामयिक जीवन की विसंगतियां, विघटन और विषमताएं हैं, जिनका विस्तार पारिवारिक, धार्मिक, प्रशासनिक, राजनैतिक गलियारों तक फैला हुआ है।

धार्मिक मूल्यों के अंदर की मूल्यहीनता और अंधविश्वास को डॉ. अग्निहोत्री ने मुख्यतः चित्रित किया है। गणपति बाबा मोरिया में इस देश में कोई भी शिला मंदिर बन सकती है। मुहूर्त में मानव मूल्यों पर अंधविश्वास भारी पड़ रहे हैं। भंडारा में भंडारा धार्मिक आयोजन न रह कर सामाजिक पारिवारिक खान-पान का उत्सव बन गया है। नेता में भंडारों की व्यर्थता का अंकन है, क्योंकि भीख भी व्यवसाय का रूप ले चुकी है भगवान में शिला को हनुमान मान लोग पूजा और फल की कामना करने लगते हैं। मोक्ष में घबराहट और तनाव के कारण बद्रीनाथ में पत्नी की मृत्यु हो जाती है और पति उसे दोहरा भाग्यशाली इसलिए मानते हैं कि उसने तीर्थयात्रा में और वह भी पति के सामने प्राण त्यागे। भजन मंडली में धर्मस्थलों पर झगड़ रही औरतें हैं। आस्था में आस्था का अर्थ मानव मूल्यों की पहचान है मानव के प्रति जड़ता नहीं। जबकि आशीर्वाद में वह कहती हैं कि आशीर्वाद की शक्ति के सामने यमदूत भी असहाय हो जाते हैं। मन्नत में प्रश्न है कि हम भगवान के पास क्यों जाते हैं? भेंट क्यों चढ़ाते हैं ? ताकि हमारी मन्नतें पूरी हो जाएं, जबकि ऐसा कुछ नहीं है। भगवान को चाहे जितनी भी रिश्वत दो, सब काम प्रारब्धानुसार ही होते हैं।

घरेलू नौकरानियों पर भीष्म साहनी की बबली या सिम्मी हर्षिता की धराशायी के विपरीत अग्निहोत्री ने उन द्वारा पीड़ित गृहणियों की व्यथा चित्रित की है। ट्रेनिंग में अपने बच्चों को चोरी में प्रशिक्षित कर रही काम वाली बाई है। बुद्धिमान में घरेलू नौकरों की बहानेबाजियां हैं। वसूली में निरंकुश जमादार हैं। रोटी रोजी में चौंकीदार ही बन रही इमारतों का सामान चोरी कर कबाड़िए को बेच रहे हैं। हकदार में नौकर सिर्फ हकों के प्रति सचेत है, जबकि पिल्ला रूखी सूखी खाकर भी चोर नौकर को पकड़ने की वफादारी निभाता है।

एक मध्यवर्गीय कालोनी उनकी बहुत सी लघुकथाओं को घेर कर खड़ी है। इन लघु कथाओं में दूरगामी प्रभावों वाली जीवन की छोटी -छोटी समस्यायें हैं। पुण्य और दान में पुण्य के नाम पर अंधविश्वासी लोग कुत्ते, गाय, सुअरों को बढ़ावा दे रहे हैं। भले ही कुत्ते उनके अपने बच्चों को ही काट खाएं या सुअर हर ओर गंदगी फैलाएं। इस कालोनी की औरतें व्रत त्यौहार करेंगी, पूजा अर्चना करेंगीं , दान पुण्य करेंगी, पर पूजा के लिए पुष्पगुच्छों की थैलिया इधर उधर से चोरी करके भरेंगी। रोष, टूटती बेंचें, पिच, पार्क में पार्क के सामने वाले घरों की दुर्दशा का अंकन है। पार्क के सामने की जमीन अकसर महंगी बेची जाती है, पर वहां कभी पार्क नहीं बनता। वहां हंगामें होते ह,ैं जन्म दिन या दूसरे फंक्शन मनाए जाते हैं या क्रिकेट के पिच बनते हैं। भारतीयता में प्रांतवाद पहले है, मुहल्लेदारी और भारतीयता बाद में। मौन में कालोनी के लोग अपनी बॉउंडरी इतनी उँची और चौड़ी बनाते हैं कि रोज दुर्घटनाएं होने लगती हैं। समझदारी और सफाई में कालोनी के रख-रखाव की जिम्मेदारी से सब बचना चाहते हैं और सफाई की किसी को चिंता नहीं। यानी कालोनी कल्चर और रहवासियों के असंतोष को बड़े प्रभावात्मक ढंग से वाणी दी गई है। एक ऐसा कल्चर जहां हर सुख या दुख सबका अपना अपना है, वैयक्तिक है।

पारिवारिक स्तर पर वृद्धों का अभिशप्त जीवन, उनकी उपेक्षा पिंडदान और अपने में चित्रित है। मातम में मातम नहीं, मातम की औपचारिकता है। उन्होंने अपनी लंबी कहानी यह क्या जगह है दोस्तों की तर्ज पर कठे जाणां लिखी है। यहां वृद्धावस्था में बहू ने बाल खींच कर घर से निकाल दिया है।

भ्रष्टतंत्र ने मध्यवर्ग का जीना हराम कर रखा है। आसपास फैली अंधेरगर्दी, विद्रूप और विडम्बनाओं को उनहोंने स्वर दिया है। इतना तो चलता है में सब्जीवाला, दूधवाला कम तोलता है, आटो वाला बाकी पैसे नहीं देता, मिठाईवाला छुट्टे नहीं रखता।

मुखोटे में रिश्वत लेकर सीट रिजर्व करने वाला टी.टी. है। प्रसाद में सेल्स टैक्स के छापे मार कर रिश्वत बटोरी जाती है। रिश्वत के कई रंग और ढंग हैं। उनकी होड़ में कलक्टर जितेन चौधरी की मां की मृत्यु हो जाती है और क्योंकि वह कलक्टर है, इसलिए बाहर से खाना नाश्ता लाने वाले लोगों की भीड़ बनी रहती है। इतना खाना आता है कि ज्यादातर फेंकना ही पड़ता है।

अधिकार में वैश्विक स्तर पर अधिकारों की दौड़ है। यहां लोग चांद पर जमीन खरीद रहे हैं।

कामकाजी स्त्री ने घर -परिवार को नई उँचाइयां दी है। भेंट एवं पुष्पांजलि की पुष्पा घर का कायाकल्प कर देती हैं। कूलर, फ्रिज, मिक्सी, बच्चों के साइकिल, पति की स्कूटी ,छोटी-मोटी पार्टियों से जीवन में रंग भरने लगते हैं। पांच का दम की पांच मजदूर स्त्रियां इकट्ठी होकर एक इंजीनियर की तरह सड़क का काम पूरा करती है। लाशें में अग्निहोत्री फेंटेसी के माध्यम से कहती हैं कि कामकाजी स्त्री मर कर भी जुआरी, श्राबी, चोर, लुटेरे पति से भली है। प्रतिबद्धता में अग्निहोत्री का संदेश हे कि नारी अगर नारी के प्रति प्रतिबद्ध हो तभी बात बनती है। उनकी कुलीन की स्त्री दहेज से इन्कार करते हुए विवाह को अस्वीकार करते नारी सशक्तिकरण का परिचय देती है।

यह समय स्त्री के लिए संक्रमणकाल जैसा है। वह पंच-सरपंच बन रही है, घर, परिवार, समाज,देश के विकास में सहयोग दे रही है, लेकिन सब पुरुष एक ही थैले के चट्टे बट्टे हैं। यहां दलित कनक की इसलिए बोली लगाई जाती है कि उसने पंचों को दूधवाली के साथ जबरदस्ती करते देख लिया था। न्याय में सरपंच रामेश्वरी को बलात्कार के बाद इसलिए आत्महत्या करनी पड़ती है, क्योंकि उसने सरपंच से मजदूरों की पूरी मजदूरी देने के लिए कहा था। हिस्सा नही ंतो बस्त्र नहीं में महिला सरपंच को इसलिए निर्वस्त्र किया जाता है कि उसने गांव विकास के लिए मिली राशि से बाहुबलियों को हिस्सा नहीं दिया। ईमानदार स्त्री की गर्वोक्तियां और शोषण दोनों हैं। स्त्री सामन्तवाद की शिकार भी है और घर, परिवार, समाज को नए क्षितिज भी दिखा रही है।

व्यापार में पूरा देश व्यापारी भी है और भिखारी भी। नेता वोट की भीख मांग रहे हैं। अधिकारी रिश्वत की भीख मांग रहे हैं तो अधिकारी भिखारी कर्मचारी भिखारी रख कर भीख का व्यापार कर रहे हैं। भिखारन की भिखारिन पड़ौसिनों से कहीं अधिक संवेदनशील है।

इंसान से पशु कहीं अधिक वफादार हैं। नंदी में जिंदा गाय को दुत्कारा जा रहा है और बेजान पत्थर के नंदी की अर्चना की जा रही है। गौरी और धर्म में कथनी करनी के अंतर को दर्शाया गया है। गौ पूजन पर भाषण तो दिया जा सकता है, पर मर रही गाय को नहीं बचाया या पानी नहीं पिलाया जा सकता।

खामोशी में साम्प्रदायिकता चित्रित है। विश्वसनीयता में राजनेताओं पर व्यंग्य है। दृढ़ निश्चय में देश की गलत नीतियों पर व्यंग्य है। एक ओर भारतीय सेना रोज सीमा पर चीन की घुसपैठ का मुकाबला कर रही है और दूसरी ओर पूरे देश में चीनी वस्तुओं का प्रयोग हो रहा है। रावण में रावण की बजाय जड़ परम्पराओं और बुराई को जलाने का संदेश है। सौ रुपए की रैगिंग में विद्यार्थी जगत का वह वीभत्स चेहरा है, जो जूनियर छात्रों के लिए आत्महत्या का कारण बनता है। रुष्ट में आपरेशन थियेटर में डाक्टरों का वीभत्स चेहरा है। सम्मान और महिला दिवस में अभिनंदन समारोहों का खोखलापन है और आत्मकेंद्रित नेताओं का दोगलापन है। सिद्धांतों पर धूल में कृष्णा अग्निहोत्री ने उपेक्षित पड़ी प्रस्तर मूर्तियों की ओर ध्यान आकर्षित किया हैं। शिवाजी, गांधी जी, अहल्या, छत्रपाल, अम्बेदकर, भगतसिंह, इंदिरा- सब की प्रतिमाएं विसंगत स्थितियों में हैं। नीचे शराबी, जुआरी, चोर, डाकू, लुटेरे बदमाश बैठते हैं। सिरपर पक्षी बीट करते हैं। किसी राजनेता को, सामाजिक कार्यकर्त्ता को इनकी सुध नहीं। भ्रष्ट नेतृत्व ने विरासत को प्रदूषित, विरूपित एवं अपमानित कर दिया है।

गोलियां वैज्ञानिक कहानी की कोटि में आती है। सिद्धांतों पर धूल और लाशें में फैंटेसी है। छोटे कलेवर के बावजूद इन लघु कथाओं की बुनावट सघन है।

पुस्तक : कठे जांणा

लेखिका : कृष्णा अग्निहोत्री

प्रकाशक : नमन नई दिल्ली

समय : २०१३

madhu_sd19@yahoo.co.in

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रचनाकार: पुस्तक समीक्षा - कठे जांणा
पुस्तक समीक्षा - कठे जांणा
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