असगर वजाहत की कहानी - आदमी से आईएफएस हो जाने के बाद श्री त्रि के जीवन की कुछ उल्लेखनीय घटनायें

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आदमी से आईएफएस हो जाने के बाद श्री त्रि के जीवन की कुछ उल्लेखनीय घटनायें (1) जिस साल श्री त्रि, आईएफएस में आये उसी साल कुमारी म भी आईएफ...

आदमी से आईएफएस हो जाने के बाद

श्री त्रि के जीवन की कुछ उल्लेखनीय

घटनायें

(1)

जिस साल श्री त्रि, आईएफएस में आये उसी साल कुमारी म भी आईएफएस में आयी। वे दोनों एक-दूसरे को नहीं जानते थे। उनके दरम्यान सबसे उल्लेखनीय समानता यही थी कि दोनों आईएफएस में थे और सबसे बड़ी असमानता यह थी कि एक मर्द था और दूसरी औरत। इसलिए इन दोनों का विवाह हो गया। एक आध पोस्टिंग तो साथ-साथ मिली लेकिन फिर अलग-अलग पोस्टिंगें मिलती रहीं। रिटायर होने तक यही क्रम चलता रहा। उसके बाद जब उन्हें साथ-साथ रहने का मौका मिला तो उन्होंने बच्चा पैदा किया। बुढ़ापे में बूढ़ी औलाद पैदा हुई। यानी कहुत समझदार। त्रि जब बच्चे के साथ खेलते थे तो बच्चा हंस-हंसकर उनका दिल बढ़ता था।

श्री त्रि और श्रीमती को पूरा विश्वास था कि बच्चा बड़ा होकर आईएफएस में आयेगा और आयी आईएफएस में आयी लड़की से विवाह करके उसी तरह सुखी रहेगा जैसे वे रहे।

(2)

जहां श्री त्रि की नयी पोस्टिंग हुई, वहां एक हरिजन राजदूत था। श्री त्रि पोस्टिंग पर पहुंचते ही हरिजन हो गये। लेकिन राजदूत को विश्वास नहीं हुआ। वह समय-कुसमय कभी शराब के नशे में और कभी पूरे होशो-हवास में श्री त्रि को अपमानित किया करता था। उन्हें उलझन में डालकर मजा लेता था। रोज श्री त्रि से उसके रक्तचाप को खबर लेता था और उसी के अनुसार उन्हें आदेश देता था। एक दिन राजदूत श्री त्रि से कहा कि दिल्ली फोन मिलाकर ज्वाइंट सेक्रेटरी श्री ‘फ’ से फलां-फलां बात पूछो।

श्री त्रि ने कहा,‘‘सर, इस वक्त दिल्ली में रात का दो बज रहा होगा।’’

राजदूत झपटकर बोला, ‘‘मैंने तुमसे यह नहीं पूछा कि इस समय दिल्ली में। क्या बजा होगा।’’

श्री त्रि घबरा गये और बोले, ‘‘मैं तुमसे यह नहीं पूछ रहा हूं। सर इस समय ज्वाइट सेक्रेटरी श्री ‘फ’ सो रहे होंगे।’’

राजदूत ठस्से से बोला, ‘‘मैं तुमसे यह नहीं पूछ रहा हूं कि इस ज्वाइंट सेक्रेटरी श्री ‘फ’ क्या कर रहे होंगे।’’

श्री त्रि अचकचा गए, ‘‘सर ज्वाइंट सेक्रेटरी श्री ‘फ’ को रात में दो बजे उठा दिया गया तो मुझ पर नाराज हो जायेंगे।’’

राजदूत ने आदेश देते हुए कहा,‘‘जाओ फोन करो। क्या तुम जानते हो श्री ‘फ’ को कब्ज रहता है’

‘‘नहीं सर।’’

‘‘कैसे आफीसर हो, यह बात तो मिनिष्ट्री के चपरासी तक जानते हैं। तुम्हें तो यह भी जानना चाहिए कि श्री ‘फ’ को दीगर कौन-कौन सी बीमारियां हैं और कौन-कौन सी दवाएं खाते हैं।’’

‘‘यस सर।’’ श्री त्रि बोले।

‘‘कब्ज होने से पहले श्री ‘फ’ को ‘पाइल्स’ थी। उसके बाद उन्हें ‘एब्सिस’ हुआ था। फिर ‘फेस्टुला’ हो गया था। ‘फेस्टुला’ का आपरेशन कराने के लिए उन्होंने लंदन की पोस्ंिटग ली थी।’’

‘‘यस सर।’’

‘‘क्या यस सर...यस सर किए जा रहे हो...नोट्स क्यों नहीं ले रहे हो।’’

श्री त्रि जल्दी-जल्दी नोट्स लेने लगे।

‘‘लंदन में कामयाब आपरेशन हो जाने के बाद श्री ‘फ’ को कब्ज से छुटकारा नहीं मिला है। मैं सब सोफिया में फर्स्ट सेक्रेटरी था तो एक डेलीगेशन के साथ श्री ‘फ’ वहां आये थे। मैंने उनक ठहरने और मनोरंजन का भरपूर इंतिजाम किया था। लेकिन जाते-जाते उन्होंने राजदूत से मेरी शिकायत कर दी थी और मेरी सी.आर. खराब हो गयी थी। जानते हो उन्होंने शिकायत क्यों की थी’

‘‘यस सर।’’

‘‘तो बताओ न’

‘‘यस सर। श्री त्रि घबरा गये।’’

‘‘शिकायत इसलिए की थी कि उनके कमरे में मैं सत इसबगोल रखवाना भूल गया था।’’

‘‘यस सर।’’

‘‘मुझे मालूम है कि श्री ‘फ’ को अगर रात में जगा दिया जाये तो उन्हें नींद नहीं आती और सुबह कब्ज हो जाता है। ‘मोशन’ नहीं होगा तो उन्हें गुस्सा आ जायेगा गुस्सा आयेगा और कब्ज जो जाता बढ़ेगा। कब्ज बढ़ेगा तो और गुस्सा आयेगा...जाओ श्री ‘फ’ को फाने करो।’’

‘‘यस सर...’’श्री त्रि गिड़गिड़ाये।

‘‘जाओ फोन करो...अगर तुमने फोन न किया तो मुझे कब्ज हो जायेगा...कर दिया तो तुम्हें भी कब्ज हो जायेगा...जाओ फोन करो।’’

(3)

श्री त्रि को जब हरिजन राजदूत ने परेशान करने के हदें खत्म कर दीं तो एक दिन श्री त्रि अपना जनेऊ और कच्छा लेकर राजदूत के पास पहुंच गये।

‘‘ये क्या है त्रि’ राजदूत ने पूछा।

‘‘सर मैं ब्राह्मण नहीं हूं।’’

‘‘तक तुम क्या हो’

‘‘सर पिताजी सपने में आये थे। बोले हम लोग ब्राह्मण कभी नहीं थे...हमारा तो परिवार हरिजन था।’’

‘‘कोई प्रमाण पत्र है तुम्हारे पास’

‘‘सर पिताजी सपने में आये थे।’’

‘‘त्रि अपना जनेऊ और कच्छा उठाओ।’’

‘‘यह जनेऊ और कच्छा तुम्हें सौ-दो सौ साल और पहनना है।’’

(4)

श्री त्रि के कान खराब हो गये। उन्हें कुछ कम सुनाई देने लगा। श्री त्रि के लिए यह कुछ वैसा बुरा न था। घर में पत्नी और आफिस में बॉस की डांट वे जितनी चाहते या जितनी रुचिकर लगती उतनी ही सुनते। कुछ साल बाद उन्होंने योरोप के शहर ‘सर’ में अपनी पोस्टिंग करायी क्योंकि सुना था कि वहां कान का आपरेशन बड़ा अच्छा होता है।

कान का आपरेशन कराने के बाद श्री त्रि को आंखों से कम दिखाई देने लगा। उन्होंने आंखों का भी आपरेशन करा डाला तो दांतों में दर्द रहने लगा। दांत उखड़वा डाले तो उसका असर उनके दिमाग पर पड़ा। दिमाग कमजोर हो गया। यह बात उन्होंने राजदूत को बताई।

राजदूत ने पूरी बात सुनकर कहा, ‘‘तुम्हें यह आपरेशन बहुत पहले कर लेना चाहिए...जितने प्रोमोशन तुम्हें मिले हैं, वे कुछ कम हैं...’’

(5)

श्री त्रि दूतावास के पेशाबखाने से पेशाब करके निकल रहे थे तो उन्होंने देखा कि राजदूत सामने खड़े हैं। राजदूत पेशाब करने जा रहे थे। उन्हें देखकर श्री त्रि सकपका गये।

‘‘क्यों जी तुम भी पेशाब करते हो।’’

‘‘सर सर मेरा ‘रैंक’ बहुत छोटा है सर।’’

‘‘मैं पूछ रहा था तुम भी पेशाब करते हो’ राजदूत ने अकड़ कर पूछा।

‘‘सर, सर आपकी तरह नहीं करता।’’

‘‘क्या मतलब’ राजदूत ने पूछा।

‘‘सर आप पेशाब करते हैं...मैं मूतता हूं सर...जी हां सर मूतता हूं।’’

‘‘ठीक है तो कल से तुम घर ही मूत का आया करोगे और घर ही जाकर मूता करोगे। दूतावास मूतने की जगह नहीं है।’’ राजदूत गुस्से में लौट गये। पेशाब कर लेने के बाद भी त्रि का मूत निकल गया।

(6)

अपने वीजा, अफीसर के कारण एक दिन परेशानी में पड़ गये श्री त्रि।

राजदूत राजपरिवार के व्यक्ति थे, उनकी पत्नी राजकुमारी थीं। श्री त्रि श्री त्रि थे।

राजदूत की पत्नी का एक मुंह लगा माली था। दूतावास में उनका रुतबा राजदूत के बाद नंबर दो था। बीजा अफसर नया-नया आया था। वह माली को माली समझता था। उसने एक दिन पता नहीं माली से क्या कह दिया। माली ने महारानी को जाकर खूब मिर्च-मसाला गया।

राजदूतावास निवास से फोन आया कि श्री त्रि बीजा आफीसर को लेकर तुरंत आ जायें। श्री त्रि ने हनुमान चालीसा पढ़ना शुरू कर दिया।

दुर्भाग्य यह कि नये बीजा आफीसर के बाल कुछ लंबे थे। और श्री त्रि को भी बाल कटाये कुछ महीने हो गये थे क्योंकि योरोप में बाल कटाना वैसे भी अच्छा खासा मंहगा है और जाड़े में पता भी नहीं चलता कि बाल छोटे हैं या बड़े हैं।

बहरहाल महारानी के सामने दोनों पेश हुए। उन्हें देखकर महारानी बोली, ‘‘आप लोग दूतावास में काम करते हैं या हिप्पी हैं।’’

‘‘हिप्पी’ श्री त्रि हकलाये।

‘‘हां हिप्पी...इतने बड़े-बड़े बाल और कौन रखता है...मैं तो तुम लोगों से बात नहीं कर सकती...कल सुबह ठीक नौ बजे...अपने बाल कटवा कर यहां आओ...समझे’

महारानी अंदर चली गयी। श्री त्रि और वीजा अफसर नाई की दुकान चले गये।

(7)

कैसे पत्नी की डांट सहनी पड़ी श्री त्रि को कि वे कुछ न कह सके।

सुबह जल्दी-जल्दी तैयार होकर श्री त्रि घर से निकलने ही वाले थे कि उनकी श्रीमती जी ने कहा, ‘‘सुनो जी तेल खत्म हो गया।’’

श्री त्रि ने कहा, ‘‘ठीक है किसी ड्राइवर के हाथ भिजवा दूंगा।’’

‘‘दोपाहर का खाना नहीं पक पायेगा। जल्दी भिजवाना’’

श्री त्रि दूतावास आ गये। उन्होंने अपने र्क्लक को बुलाया और कहा

‘‘यार शर्मा जरा मार्केट से एक बोतल सन फ्लावर तेल लेकर घर दे आओ।’’

‘‘सर गाड़ी दिलवा दें तो मैं चला जाऊं।’’ शर्मा ने कुटिल मुस्कान के साथ कहा।

श्री त्रि ने एचओसी को फोन किया तो एक चतुर और बददिमाग महिला थी।

‘‘गाड़ी गाड़ी तो गयी हुए एयर पोर्ट...साहब के बेटे को रिसीव करने।’’

‘‘दूसरी गाड़ी मैडम।’’ श्री त्रि गिड़गिड़ाये।

‘‘दूसरी गाड़ी मैडम को लेकर जा रही है। शापिंग कराने।’’

‘‘तीसरी गाड़ी मैडम श्री त्रि रुआंसे हो गये।’’

‘‘तीसरी गाड़ी के ड्राइवर को साहब ने ड्राइ क्लीनर के यहां भेजा है।’’

‘‘चौथी गाड़ी मैडम।’’

‘‘चौथी गाड़ी’

‘‘चौथी गाड़ी तो ‘प्लेग कार’ है...उसका ड्राइवर आप तो जानते ही हैं...मेरे कहने से भी कहीं नहीं जाता...साहब से कहिए।’’

दिन भर श्री त्रि से कोई काम नहीं हुआ। घर से कई फोन आये। हर फोन में डांट-डपट थी। फटकार थी। शाम को चिराग जले तेल लेकर श्री त्रि के घर पहुंचा एक परदेसी।

(8)

श्री त्रि दूतावास के पुस्ताकालय में एक विदेशी महिला का चूम लिया तो क्या हुआ।

विदेशी कन्याओं को देखकर श्री त्रि का सौंन्दर्यबोध इतना उफनने लगा कि वे कविताएं लिखने लगे। कविताएं लिखने का बड़ा खतरनाक प्रभाव उनके व्यक्तित्व पर पड़ा। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण यह है कि एक दिन अकेला पाकर एक विदेशी महिला को उन्होंने दूतावास के पुस्तकालय में चूम लिया। वैसे तो चूमा-चाटी कोई अपराध नहीं है भारतीय दंड विधान में और योरोपीय संस्कृति में भी। पर पता नहीं क्यों विदेशी महिला ने राजदूत से जाकर शिकायत की और कहा कि देखिये श्री त्रि आपकी बराबरी कर रहे हैं।

(9)

राजदूतावास निवास में एक भव्य पार्टी के समापन के बाद राजदूत ने नशे की हालत में श्री त्रि को अपने पास बुलाया। श्री त्रि समझे की पार्टी का हिसाब-किताब करने के लिए बुलाया है। क्योंकि भोज में बुलाने के लिए राजदूत को प्रति अतिथि जो भत्ता मिलता है उसका हिसाब करने की व्याकुलता रहा करती थी राजदूत के मन में। लेकिन सहसा राजदूत ने श्री त्रि से एक दार्शनिक प्रश्न पूछ कर उन्हें हैरान कर दिया।

‘‘सारे जीवन विदेशों में रहने के बाद क्या तुम रिटायरमेंट के बाद इंडिया में रह सकोगे।’’

विदेश सेवा की पहली शर्त यह है कि यदि आपका उच्च अधिकारी कोई सवाल पूछे तो आपको यह पता होना चाहिए कि वह कैसा उत्तर सुनना चाहता है। श्री त्रि को मालूम था कि राजदूत महोदय रिटायर होने वाले हैं और उनका इरादा योरोप के इसी शहर में बसने का है इसी गरज से उन्होंने यहां एक मकान भी खरीद लिया है जिसे वे फर्निश कर रहे हैं, इतनी पृष्ठभूमि जानने के बाद श्री त्रि ने कहा, ‘‘सर बहुत मुश्किल है।’’

‘‘हां, देखो मैं तो इंडिया में रह सकता हूं लेकिन मैडम और बच्चे’

‘‘जी सर...’’

‘‘कल जरा ये ‘चेक’ करना कि ‘रेजीडेंस’ में कौन-कौन से ‘आइटम’ ऐसे हैं जिन्हे डिस्कार्ड किया जा सकता है...‘रूल्स’ तो तुम जानते ही हो...’’

‘‘यस सर।’’

अगले दिन श्री त्रि ने सूची बनाई कि राजदूत निवास में कौन-कौन सी चीजें मतलब कुकिुंग रेंज, वाशिंग मशीन, एयर कंडीशनर वगैरा-वगैरा कबाड़े में फेंक देने लायक हैं। यह सूची इतनी लंबी बन गयी कि उसमें राजदूत को छोड़कर और सब आ गया।

(10)

राजदूत महोदय की यह अंतिम पोस्ंिटग थी वे ‘फ’ शहर में ही बस रहे थे। रिटायर होने से पहले वे शहर को भारतीय सभ्यता और संस्कृति का एक बेमिसाल तोहफा देना चाहते थे। उन्होंने तय किया कि वे शहर में जो पश्चिमी योरोपीय पर्यटकों से भरा रहता है, एक रेस्त्रा खोलेंगे-मतलब संसार का सबसे बड़ा जनतंत्र खोलेगा।

‘रेस्त्रां’ खुल गया। उसका नाम भी ‘भारत’ रखा गया। बस मिल्कियत में नाम दूसरा था। यानि राजदूत के पुत्र उसके मालिक थे।

गड़बड़ यह हुई कि ‘रेस्त्रां’ खुलने के बाद भी भारत से रसोइया नहीं आया। इस कारण राजदूत चिंतित थे। श्री त्रि का काम राजदूत की चिंताओं को अपनी चिंता बना लेना था। उन्होंने राजदूत से कहा, ‘‘सर मैं खानदानी रसोइया हूं।’’

राजदूत ने उन्हें घूर कर देखा क्योंकि इससे पहले वे अपने-आपको अलग-अलग अवसरों पर खानदानी मोची, खानदानी धोबी, खानदानी माली आदि बता चुके थे। पर राजदूत इतिहास में नहीं गये। कूटनीति का काम इतिहास में जाना नहीं है।

अगले दिन दूतावास में खुसुर-पुसुर मच गयी क्योंकि श्री त्रि की सीट खाली थी, पर वे ‘भारत’ के अपने मातहतों को लगातार फोन पर आदेश दे रहे थे। पिसी मिर्च एक किलो...धनिया साबुत...मीटी चटनी चार किला...पापड़ लिज्जत वाले...

कुटिल, चतुर और ईर्ष्यालु एचओसी से यह नही देखा गया। वह तुरंत राजदूत के पास गयी और बोली सर मैं बहुत अच्छे फुलके बेलती हूं...हां सर...सच सर...देख लीजिए सर...

राजदूत की रिसेप्शनिस्ट ‘भारत’ की रेसेप्शनिस्ट हो गयी। गार्ड ‘भारत’के दरवाजे पर खड़ा होने लगा। क्लर्क सब्जियां काटने और गोश्त धोने लगे। बीजा अधिकार बार अटेंडेंट बन गया।

दूतावास में केवल तिरंगा झंडा बचा। तिरंगा झंडा रात के सन्नाटे और अकेले में कभी-कभी गुनगुना लिया करता था जन गण मन अधिनायक जय हे...

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रचनाकार: असगर वजाहत की कहानी - आदमी से आईएफएस हो जाने के बाद श्री त्रि के जीवन की कुछ उल्लेखनीय घटनायें
असगर वजाहत की कहानी - आदमी से आईएफएस हो जाने के बाद श्री त्रि के जीवन की कुछ उल्लेखनीय घटनायें
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