370010869858007
नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका संपर्क : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी यहाँ [लिंक] देखें.

****

Loading...

मनोज 'आजिज़' की लघुकथा

(लघुकथा)

जाति 

-------

         -- मनोज 'आजिज़'

स्कूल में जातिगत आरक्षण के तहत छात्रों के लिए मुफ्त किताबें देने की बात कही गई । कई अभिभावक आये, आवेदन दिए और जांचोपरांत सभी को किताबें दी गईं । अमन भी कोशिश करने लगा पर पिता की ड्यूटी और माँ की नासाज़ तबीयत के चलते काम बन नहीं रहा था । खुद कई बार जाकर अपने वर्ग-शिक्षक से कहा पर विशेष आग्रह और ध्यान बटोर नहीं पाया । 

तीन-चार दिन पर अमन की माँ स्कूल गई । शिक्षक से मिली और आवेदन दी । आवेदन देने के साथ ही अमन की माँ कह पड़ी-- मैडम, जाति से ऊँचे हैं तो क्या हुआ, कमाई से तो गरीब ही हैं । तीन साल में अमन को कितना कुछ दे पाये हैं, ये तो आप लोगों से छुपा नहीं है । हम लोगों को जो कहिए, अमन को किताब दिला दीजिए, मैडम । आप जो भी मानिये, हम लोग तो गरीबी को ही अपनी जाति मानते हैं ।

लघुकथा 7980722560534107771

एक टिप्पणी भेजें

  1. लघुकथा अच्छी है पर किसी जाति को आरक्षण इसलिए दिया जाता है क्युकि उस जाति पर कई प्रकार के अत्याचार किये गए .

    उत्तर देंहटाएं
  2. मनोज, आपने एक गंभीर विषय उठाया है और इस लघुकथा के माध्यम से मानवता को विशेष जगह दी है । जाति-धर्म-प्रान्त-भाषा आदि की संकीर्णता मानवतावादी होकर ही ख़त्म होगी । आपको बधाई !

    उत्तर देंहटाएं
  3. मनोज, आपने एक गंभीर विषय उठाया है और इस लघुकथा के माध्यम से मानवता को विशेष जगह दी है । जाति-धर्म-प्रान्त-भाषा आदि की संकीर्णता मानवतावादी होकर ही ख़त्म होगी । आपको बधाई !

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

emo-but-icon

मुख्यपृष्ठ item

रचनाकार में छपें. लाखों पाठकों तक पहुँचें, तुरंत!

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं.

   प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 14,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. किसी भी फ़ॉन्ट में रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com
कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.
उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.

इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.

नाका में प्रकाशनार्थ रचनाएँ भेजने संबंधी अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

आवश्यक सूचना : कृपया ध्यान दें -

कविता / ग़ज़ल स्तम्भ के लिए, कृपया न्यूनतम 10 रचनाएँ एक साथ भेजें, छिट-पुट एकल कविताएँ कृपया न भेजें, बल्कि उन्हें एकत्र कर व संकलित कर भेजें. एकल व छिट-पुट कविताओं को अलग से प्रकाशित किया जाना संभव नहीं हो पाता है. अतः उन्हें समय समय पर संकलित कर प्रकाशित किया जाएगा. आपके सहयोग के लिए धन्यवाद.

*******


कुछ और दिलचस्प रचनाएँ

फ़ेसबुक में पसंद करें

---प्रायोजक---

---***---

ब्लॉग आर्काइव