धर्मेन्द्र निर्मल की कहानी - धोखा

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धोखा चैत का महीना । तेज धूप। दिन किसी छॉव की तलाश में हॉफता फड़फड़ाता इधर उधर भाग -दौड़ - भटक रहा है। घड़ी की सुई दो से तीन को छूने की फिराक...

धोखा

चैत का महीना । तेज धूप। दिन किसी छॉव की तलाश में हॉफता फड़फड़ाता इधर उधर भाग -दौड़ - भटक रहा है। घड़ी की सुई दो से तीन को छूने की फिराक में बच्‍चों की तरह बार -बार उचक रही है। सूरज है कि गुस्‍से से तमतमाया हुआ है। किसी सनकी राजा के सैनिकों की तरह उनसे निकलने वाली उमस पेंड़ की छॉव को भी नहीं छोड़ रही है। मानो उन्‍हें किसी इनामी फरार वारंटी की तलाश हो। दुनिया चाहे इधर की उधर हो जाए मगर आज उसे किसी भी हाल में नहीं छोड़ना है। ऐसे में हर किसी को एक अदद ठण्‍डी छॉव की तलाश होती है। महेश अपने काम झटपट सकेल अपनी बेग में डाल पीठ पर लटकाकर निकल पड़ा।

उफ्फ! इतनी गर्मी उस पर ए बंद फाटक ․․․․․․।

महेश मन ही मन बुदबुदाता अपनी मोटर सायकल घुमाकर रेलवे हवाई पुल के नीचे रोक दी। हवाई पुल के ऊपर से जाना यानि जितनी दूरी रेलवे फाटक तक आने में तय किए उतनी दूरी फिर से तय करना और उतर कर जितनी दूरी उतरने में लगा है उसे फिर तय करना। ऊपर से समय और मुंह चिढ़ाती चिलचिलाती धूप । महेश रूककर फाटक खुलने की प्रतीक्षा करने लगा।

अरे ! हर्षा इधर कहॉ ?

तीन लड़कियों की मित्र मंडली को अपने सामने से गुजरते देख महेश चौंका। एकाएक उसे ख्‍याल आया। अच्‍छा , यही पर तो उनका कालेज है। शायद वे यहॉ से आटो बैठकर घर लौटना चाहती हों। अगर ये तीन नहीं होती तो मैं ही बिठाकर ले जाता। ओफ हो․․ ! ये तीन क्‍यों हैं ? महेश धीरे -धीरे विचारों की नदी में उतरने लगा। हर्षा के साथ एक तो कौसिल हो गई , दूसरी कौन है ? कौसिल तो हर्षा के घर आती जाती रहती है। एक वही बस है हर्षा की सहेलियों में जिसे महेश जानता पहचानता है। कौसिल का पूरा नाम कौसिल्‍या है जिसे उनकी मित्र मण्‍डली में कौसिल पुकारते है। आजकल शार्टकट का फैशन और चलन है। अभी अभी इसके जनमदिन पर भी आई थी और घण्‍टों बतियायी बिताई थी। सुडौल अंगों वाली , गजगामिनी और गजब की नाक नक्‍श वाली सुन्‍दर कौसिल। उस पर कालेज में पढ़ना यानि सोने पे सुहागा। कौसिल ही क्‍यों ? लड़कियॉ सुन्‍दर ही होती है। लड़कियाँ ही तो है जो इस संसार की सुंदरतम चीजों में से एक है। पर ․․․․ऊपर वाला भी कभी कभी गजब करता है। लड़कियॉ वही होती है पर कभी किसी को परी बना देता है और किसी को ․․․․ आदमी का मन शायद वहीं कहीं बुरा हो जाता है। आदमी बुरा नहीं होता मन बुरा होता है।

वे तीनों गन्‍ना रस के ठेले पर जा खड़ी हुई।

अभी तक मुझे नहीं देख पायी है तभी तो ․․․․․․महेश सोचता है। उसने देखा हर्षा अपनी सहेलियों से बात करने में मशगूल है । बात करते करते वह महेश की ओर जरा - सा मुड़कर देखी और फिर से अपने सहेलियों की ओर मुखातिब हो गयी। महेश को लगा कि हर्षा इधर उसे पहचानने के लिए ही मुड़ी थी । हो न हो अपने आप में तसल्‍ली करना चाहती हो कि मैं जो उनका जीजू जैसा लग रहा हूं , जीजू ही हूं। विश्‍वास और अविश्‍वास में किसी एक को चुनना महेश के अपने दिल की बात है और उसने बहुत जल्‍दी अविश्‍वास का दामन थाम लिया। शायद वह जानबूझकर अनजान बन रही है। देखा ! सहेलियों के आगे बात करने में शर्म महसूस हो रही है। जब घर जाता हूं तो जीजू ! जीजू !! कहते नहीं थकती -चिंया की बच्‍ची। महेश अचानक मुसकुराए बिना नहीं रह सका - चिंया। क्‍या नाम है। कौन रखा होगा यार । हर्षा का प्‍यारा और चिढ़ाने वाला नाम है - चिंया। कौन रखा है किसी को नहीं मालूम मगर कारण सबको पता है। चिंये की तरह ही कोमलांगी , वैसा ही सफेद-भूरा बदन , उन्‍हीं की तरह बिलकुल छोटी सी पतली नाक और इन सबसे बड़ी और सार्थक चीज उसकी सुरीली पतली आवाज है जिसने उसे चिंया नाम दिलाने में अपनी अहम भूमिका अदा की है।

महेश को अचानक याद आया - अरे ! मैंने तो अपने चेहरे पर गमछा लपेट रखा है। हो सकता है इसीलिए वह मुझे पहचान न पायी हो। फिर दूसरे ही पल महेश मन ही मन चिढ़ने लगा -नहीं ! चेहरा ढॅका है तो क्‍या हुआ। मेरे कपड़े , मेरी गाड़ी , मेरा चश्‍मा इन सबको मिला कर तो मुझे पहचाना ही जा सकता है । एक चेहरा छोड़ कई निशानियॉ है मेरी। मैं कैसे उनके चेहरे पर भी गमछा होते हुए उसे उसकी सहेलियों सहित पहचान गया। क्‍या वह मेरी गाड़ी नहीं पहचानती। क्‍या उसे मेरी गाड़ी का भी नंबर नहीं पता। हॉ ! हॉ ! ऐसा ही है , वह जानबूझकर अभी बात नहीं करना चाह रही है।

दूसरे ही पल महेश अपने आप को समझाया। गाड़ी का रंग रूप मिलने से चीजें एक और वही नहीं हो जाती । कभी कभी आँखें भी धोखा खा जाती है। हो न हो उसे मेरी गाड़ी का नंबर मालूम ही न हो। अक्‍सर ऐसा होता है कि अपनों को बार बार देखते रहते हुए भी उनकी कई बारीकियॉ ध्‍यान में नहीं रहती। जैसे महेश को ही अभी हर्षा का मोबाइल नंबर याद नहीं है। उसका ही क्‍यों , उसे तो किसी का मोबाइल नंबर याद नहीं है। यहाँ तक कि उनके यहाँ की एक भी गाड़ी का नंबर याद नहीं है महेश को। दिल है धड़कन गायब , भेजा है याददाश्‍त गायब। तकनीक ने मनुष्‍य को कितना लापरवाह , गैरतमंद और पंगु कर दिया है।

हर्षा की बातें उसकी यादें उसके साथ घटी घटनाएं महेश की आँखों व दिलो - दिमाग में चलचित्र की तरह तैरने लगी। महेश मोबाइल पर हर्षा से पूछा- मैडम जी कहाँ हो ?

जीजू ! मैं लक्ष्‍मी मार्केट रोड पर प्रीमियम पाईंट के पास खड़ी हूं।

अरे ! देख भई रोड पर मत खड़ी रहो कोई उठा ले जाएगा तो मुसीबत हो जाएगी - महेश मजाक के मूड में बोला।

नहीं ! नहीं !! आप बेफिकर रहिए । मुझे कोई नहीं उठा सकता- हर्षा ने पूरे मन से हंसते - चहकते हुए जवाब दिया।

महेश पूरी तरह हर्षा के विचार में डूब चूका है। उसे हर्षा के जन्मदिन की याद हो आयी।

मैडम को जनम दिन मुबारक हो।

थैंक्‍यू ! थैंक्‍यू !! हर्षा ने हर्षित मन से जवाब दिया।

अहा! क्‍या बात है, लाल जोड़े में खूब जंच रही हो।

वाह जीजू आप भी न, महान हो - उसे महेश की बातों पर विश्‍वास न हुआ हो या संभवत उस बात को पुख्‍ता करने के लिए वही बात महेश से फिर सुनना चाहती हो - शरमाकर हर्षा हूबहू अपने लाल जोड़े की तरह लाल हो गयी। तन मन में एक गुदगुदी सी दौड़ गयी। महेश का मन हर्षा से बात करने का हो गया। सहसा एक धिक्‍कारता सा भाव उठा और उसका हाथ पकड़कर रोक दिया। नहीं , ऐसे बीच सड़क पर लड़कियों से बात नहीं करनी चाहिए। लोग क्‍या सोंचेंगे। लोगों को तो बस बहाना चाहिए। रोटी को जिधर से तोड़ो उधर ही मुंह बना लेती है वैसे ही लोगों में बातें कभी भी कहीं भी मुंह बना लेती है। तभी उसने अपने आपको तसल्‍ली दी -लेकिन हर्षा ऐसे सोचने वाली लड़कियों में नहीं है। दूसरे ही पल महेश अपने आपको साले की शादी में पाया।

सगे - संबधियों से अटा पड़ा - मण्‍डप । सब अपने आप में मस्‍त। अचानक हर्षा कहीं से आयी और महेश की ओर अपना एक हाथ बढ़ाते हुए बोली - मुझे जरा संभालना तो जीजू।

महेश हर्षा को उसकी सेंडिल पहनते तक थामे रखा।

क्‍या जीजू ! आपने इतना अच्‍छा मौका अपने हाथ से गवाँ दिया - हर्षा ने हॅसते गुदगुदाते हुए चिढ़ाया।

मतलब - महेश ने अपनी नासमझी उड़ेल दी।

मैंने खुद होकर अपना हाथ दिया था और आपने उसे यूं ही जाने दिया।

महेश अपना सा मुंह लिए रह गया। बदन में एक सिहरन सी दौड़ गयी।

महेश हर्षा के विचार में इतने गहरे तक डूबता उतराता रहा कि रेलगाड़ी कब पार हो गई उसे ध्‍यान ही नहीं रहा। रेलवे फाटक के खुलने की पों पीं -पों पीं की आवाज से एकाएक उसका ध्‍यान भंग हुआ। अक्‍सर ऐसा होता है जब तक किसी ख्‍यालों की दुनिया में डूबे रहते है वास्‍तविक दुनिया को पूरी तरह भूल जाते है। सुकून और ठण्‍डक भरी यादों की छॉव से बाहर निकलते ही महेश को गर्मी का एहसास जोरों से होने लगा। हर्षा को उनकी सहेलियों और उनकी यादों सहित वही जस का तस छोड़कर जाने के लिए महेश ने गाड़ी स्‍टार्ट कर दी । चलने से पहले उसने एक नजर गन्‍ना रस के ठेले पर दौड़ाई । उन तीनों ने अपने अपने चेहरे से गमछा हटा लिया है। तीनों चिलचिलाती चहचहाती गरमी में भी चिडि़यों की तरह चहकती - बतियाती गन्‍ना रस पीने में मगन है। सूरज तेजी से जल रहा है। धरती भी जलने लगी है अब। महेश ने एकाएक गाड़ी धीमी कर दी। उसे समझ नहीं आ रहा है कि उसकी आँखें विश्‍वासघात कर रही है या उसका अपना दिल दिमाग उसका साथ देने से इंकार कर रहा है। उसकी पलकें झपकना भूल गयी है। बिलकुल वही कद काठी ,वैसी ही चाल , हूबहू वही चश्‍मे का फ्रेम। बस चेहरा पराया है। महेश को मानों धक्‍का सा लगा। बाप रे ! इतना बड़ा धोखा।

महेश मानो बहती धारा में बहते बहते बच गया। खड़ा होने के लिए थाह पा लिया।

चलो अच्‍छा हुआ जो मैंने धीरज से काम लिया।

धर्मेन्‍द्र निर्मल

ग्राम पोष्‍ट कुरूद

भिलाईनगर 490024

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रचनाकार: धर्मेन्द्र निर्मल की कहानी - धोखा
धर्मेन्द्र निर्मल की कहानी - धोखा
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