पुस्तक समीक्षा - पहली बार

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संवेदनाओं की तलाश में आरसी चौहान वैसे आज-कल अपने चहेते कवि, लेखक, मित्रों की पुस्तक समीक्षाएं लिखने का प्रचलन बहुत जोरों पर है। क्या ऐसे मे...

संवेदनाओं की तलाश में

आरसी चौहान

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वैसे आज-कल अपने चहेते कवि, लेखक, मित्रों की पुस्तक समीक्षाएं लिखने का प्रचलन बहुत जोरों पर है। क्या ऐसे में सही मूल्यांकन सम्भव हो पायेगा?राष्ट्रीय अखबार से जुड़े एक वरिष्ठ लेखक से मैंने ”पहली बार“ नामक कविता संग्रह की समीक्षा लिखकर उक्त अखबार में छापने की बात की तो एक टूक जवाब आया। चौहान साहब! समीक्षाएं हम अपने ही लोगों से लिखवाते हैं। दूसरे पर अब विश्वास नहीं रहा, क्योंकि कुछ लोग अपने दोस्त-मित्रों की पुस्तकों की ही समीक्षाएं लिखते हैं। जिससे वह समीक्षा कम, प्रशंसा ज्यादा हो जाती है। जिससे साहित्य में गिरावट आती है। अंशतः उनकी बात कुछ सच हो सकती है, लेकिन विश्वास भी कोई चीज होती है, उक्त महोदय को मानना पड़ेगा।

अस्तु युवा कवि संतोष कुमार चतुर्वेदी की ”पहली बार“ कविता संग्रह पहली बार में ही ध्यानाकर्षित करती है। अपने शिल्प के गठन और पूर्वीपन मिठास से सोंधेपन के कारण। बलिया जैसे पूर्वांचल के उजड्ड इलाके से आये इस कवि ने जिस यथार्थ पीड़ा को झेला है उसे बड़ी सिद्दत से अपनी कविताओं में उकेरा है। युवा होते भारत में बूढ़ों को हाशिये पर रखना विकास के खोखलेपन को तार-तार करता है। इस सग्रंह की पहली ही कविता है ”चित्र में दुःख“ जो एक संवेदनहीन होते समाज में आशा की किरण, संतोष चतुर्वेदी जैसे विरले रचनाकार ही खोज पाते हैं। जहां एक ओर असहाय बूढ़ा आदमी दीन-हीन अवस्था में जीवन गुजर-बसर करने को अभिषप्त है।वहीं दूसरी ओर समाज के तथा कथित बुद्धिजीवी वर्ग बाजार वादी व्यवस्था में उसे निलाम कर पैसे इकटठा करने में लगा है।

” और न जाने कितने संस्करणों में आया वह बूढा़

अपने दुःख व उदासी के साथ बैठा हुआ

अनुवादहीन

बुढ़े में था बिखरा संसार

और संसार में बैठा हुआ बूढ़ा

उदास का उदास“

कुछ ऐसे शब्द जो कविता में बड़े सलिके से आ गये हैं जिससे कविता का स्तर ऊँचा ही उठा है,जैसे-चुक्का-मुक्का। क्या वाकई कवि ने”चित्र में दुःख“ कविता के इस पंक्ति में ”घर-बार छोड़कर वे बन गये बुद्ध“ में बन लिखा है। भोजपुरी में तो ठीक है”बन“ अर्थात जंगल लेकिन हिन्दी में बन का अर्थ बनना है यहां मिसप्रिंट हो सकता है। फिर भी भाव में कोई कमी नहीं आयी है। संतोष कुमार चतुर्वेदी केवल बाजार वादी ताकतों के कारनामों को ही इंगित नहीं करते बल्कि बाजार के भीड़-भाड़ वाले इलाके में दो क्षण प्यार की बात भी कर लेते हैं।कवि को अपने घर परिवार से दूर रहना, पिता का गुजरना, दोस्तों मित्रों का ऋतुओं की तरह बिछुड़ना कवि को अपने रास्ते से डिगा नहीं पाता।

कुल मिलाकर प्रेम की बात में प्रेम टांके की तरह अपनी जमीन से नत्थी करने में सफल होता है। जो एक सुखद अनुभूति कराता है-

”सरसों के फूलों जैसे ताजा प्रेम

और प्रेम की गर्माहट

सर्द हवाओं और पृथ्वी की परिक्रमाओं के साथ

बचाये हुए है दुनियावी बुनियाद

पछुआ की तपिश भी

नहीं खो पायी है

वातावरण की नमी“

”बातें ऐसी जोड़ती हैं“ में कवि की सुक्ष्म दृष्टि की दाद देनी पड़ेगी कि जहां आपाधापी की जिंदगी में एक दूसरे से मिलने की फुर्सत नहीं है। परन्तु मानसिक रूप से एक दूसरे से जुड़े रहना जिसमें अपने पडो़सी के सुख दःुख में शरीक होना भी शामिल है। यह किस समाज की कल्पना है। बहुत बडा़ सवाल दागती दिखती है यह कविता हमारे ज़हन में बंदूक की तरह-

”पडो़सी के दरवाजे पर लगे बल्ब से

रोशन होता है हमारे घर का बाहरी हिस्सा

लाख रोकने के बाद भी

पहुँच ही जाता है हमारे घर

पडो़सी के घर का किस्सा“

समाज में फैले झूठ-फरेब के बीच आषा की नयी धूप लेकर आती है कविता ”सच्चाई“ इसी तरह ”गुजरात2002 की बानगी भी कम धारदार नहीं है

” बडी़ सफाई से खेला जा रहा है नाटक

आयोजक सूत्रधार की भूमिका में

अलाप रहा है प्रसंग

लोग पात्र बनकर घूम रहे हैं खुलेआम

एक दूसरे का खून करते हुए“

प्रेम के बारीक धागों से कवि ने बहुत सतर्क होकर चादर बुनी है। जिसमें कहीं कोई दाग नहीं, कहीं छीर नही,ं कहीं कटा-फटा नही,ं कितनी अव्यवस्थित होते हुए भी व्यवस्थित है पहली बार कविता में-

”ऐसे ही होता है सब

दुनिया में पहली बार

अव्यवस्थित

व्यवस्थित रूप से

अकेला प्रेम

कितना बदल देता है

दुनिया को“

वतर्मान में घट रही घटनाओं पर पैनी नजर रखना। उसे बड़े सलीके से कविता में ढालना। सीधे-साधे शब्दों को हथियार की तरह प्रयोग करना जैसी कला संताष कुमार चतुर्वेदी की कविता ”अपील“ में देखी जा सकती है।

भाषा नदी की धारा सी प्रवाह मान । किसी अनावश्यक शब्दों की घूसपैठ नहीं । ऐसा माना जाता है कि भाषा की सरलता एवं सहजता कविता को कमजोर बनाती है पर यहां तो बिलकुल उल्टा है। आम लोगों की बोली-भाषा के ही शब्दों से लोकतंत्र के सजग प्रहरी माने जाने वाले नेता जी के छल कपट, प्रंपच को बखूबी हमारे सामने बिना लाग लपेट के उठाकर रख दिया है।

अधिकारियों से लेकर चाटुकार तक जनता की सेवा में लगे हैं। कितना बडा़ तमाचा है यह कविता हमारे समाज पर। और हम हैं कि चुप बैठे हैं विरोध का स्वर कहीं सुनाई नहीं देता। ऐसा लगता है कि कुछ चिंतनशील व बुद्धिजीवियों को छोड़कर हर आदमी बहती गंगा में हाथ धोने में लगा हुआ है।

”इस तरह घर परिवार

रिश्तेदार-चाटुकार सहित

नेता जी कर रहें हैं सेवा जनता की

सेवा पर जन्मजात अधिकार

समझते हैं नेता जी।“

संतोष कुमार चतुर्वेदी ही ”छोटी सी जगह“ कविता में बड़ी बात कहने की हिम्मत रखते हैं। यही कविता का क्लाइमेक्स है। जो पाठकों को बार-बार पढ़ने के लिए मजबूर करती है।

”बड़े लोगों के बड़े होने में

कहीं-न-कहीं शामिल है

छोटी सी यह जगह।“

इसी तरह ”रोटी की धरती“कविता भी भाषा, शिल्प व सहजता से अपनी ओर आकर्षित करती है। जहां इसमें पूर्वांचल के बोले जाने वाले दैनिक शब्द-लपसी,चौकी,बेलन हमें बरबस गांव खींच ले जाते हैं वहीं सर्वत्र बढ़ रहे तमाम असंतुलनों की नयी सीख देती है यह कविता। समाज की आँख में धूल झोंककर अपना काठ का उल्लू सीधा करना हर किसी की फितरत बन चुका है। एक ऐसा वर्ग जो अपने जीविकोपार्जन के लिए बड़ी हस्तियों के पीछे अपना जीवन न्यौछावर कर देता है और अंत में मिलता क्या है?

सिर्फ गुमनामी में जीवन जीने को अभिशप्त। ”विज्ञापन की दुनिया में“ बखूबी देखा जा सकता है

”चित्र में दुःख“ हो या ”अभिनय“ जैसी कविताओं में कवि अपनी पीड़ा को अभिव्यक्त करने से रोक नहीं पाता । जहां कवि आडम्बरपूर्ण जीवन जीने वालों के लिए सीख देता है, वहीं विज्ञापन की दुनिया यर्थाथ जीवन से दूर ”सांइनिग इण्डिया“ में जीता है। जबकि उनके रास्ते में न खत्म होने वाली दुःखों की सुरंग है जिसका आदि अन्त दूर तक दिखाई नहीं देता। ”अपनी तकलीफांे को

सीमित रखना है देहरी तक तुम्हें

अपनी भूख-प्यास और समस्याओं को

तुम्हें चुपके से इस तरह पी लेना है

कि कोई आवाज न हो

झुर्रियों और धावों को

छुपा लेना है

पाउडर-क्रीम तले“

मानव के निरंकुश होते व्यवहार ने एक दूसरे को कितना बेगाना बना दिया है। दिल को दहला देने वाली,हमारे सामने ही एक उजाड़ होती सभ्यता का जीवंत उदाहरण है कविता-”बरगद“।बरगद ने क्या- क्या नहीं देखा अपने जीवन में । एक ठेकेदार के हाथों हजारों असहायों का साथी कैसे विदा हुआ,इस पर किसी तरह की प्रतिक्रिया का न होना, अपनी जड़ता को उजागर कर रहा है। ऐसे तमाम सवालों से जूझते कवि को मलाल है कि अपने आस-पास घटित होने वाली घटनाओं पर हम चुप क्यों हैं? क्या यह चुप्पी भविष्य में फटने वाले किसी ज्चालामुखी का पूर्व संकेत तो नहीं

”फिर कई दिनों तक राज रहा कुल्हाड़ियों का

घुमा कई अंगों पर आरा

भीषण चित्कार के साथ बीत गया एक जमाना

यह उस सभ्यता का अवसान था

जिसे कैद नहीं किया किसी फिल्मकार ने

अपने कैमरे में

दर्ज नहीं हुआ कोई भी मुकदमा

इस खूनी वारदात पर

चुप्पी साध ली दुनिया की सारी अदालतों ने“

आज पूरी दुनिया ही एक रंग मंच बनी हुई है। जिसे हम जिस रूप में देखते हैं क्या वह उसी रूप में है? या कुछ और है? बहुत सारे सवालों से जूझती दीख रही है इस सग्रंह की कविता ”परदा“। इस कविता की सबसे बड़ी खूबी यह है कि परदा आगे से कुछ और व पीछे से कुछ और गुल खिलाता है।यानी दोहरा चरित्र।आज समाज में जिस तरह दोहरे चरित्र वालों की संख्या बेतहासा बढ़ रही है एक सभ्य समाज के लिए कड़ी चेतावनी है।

”धुप मे पथरा जाने की परवाह किये बगैर“ कविता पर कुछ लोगों को एतराज हो सकता है। यह कविता नहीं बल्कि अपने पिता को याद करने का एक तरीका है।उस किसी भी व्यक्ति से पूछा जाए जिसके पिता असमय इस दुनिया से चले गये ।और एक असहाय कंधों पर अचानक पूरे घर -परिवार का बोझ आन पडा़ हो। वह बच्चा ,बच्चा नहीं बल्कि पिता की भूमिका में आ जाता है। वह ठीक से खेल-कूद भी नहीं पाता कि उसके सिर पर पूरी जिम्मेवारियों का एक पहाड़ खडा़ हो जाता है-

”पिछले छब्बीस सालों की सुबह शाम

जैस आंगन-ओसारे और घर

उलझे हुए सब एक साथ

आंखों के सामने

छूटी जा रही है

मेरी गाड़ी

आखिरी बार

और आंगन हो गया है

कुकुरलंघित“

संतोष कुमार चतुर्वेदी की बहुत सारी कविताओं से गुजरने के बाद इस संग्रह के लगभग अन्तिम भाग की कविता ”अभिनय“ इस रचनाकार से परिचय कराने का मेरा माध्यम रही है। जब ”इण्डिया टुडे “के साहित्य वार्षिकी 2002 में अभिनय कविता को पढ़ा तो लगा कि इसका रचनाकार पूर्वांचल के ही किसी हिस्से से आता होगा।ऐसा मैंने अनुमान लगाया। फिर यह बात आयी गयी हो गयी ।अपनी बैचेनी को शेयर करने के लिए अपने कई दोस्तों मित्रों को यह कविता पढ़ने को दी । आखिर पांच-छः सालों के अन्दर इस रचनाकार को ढंूढ ही निकाला।और आज बहुत कम प्रचार- प्रसार के बावजूद ”पहली बार“ कविता संग्रह मेरे हाथ लगी। जिसकी अनदेखी हिन्दी साहित्य में बहुत दिनों तक नहीं की जा सकती।संग्रह पढ़ने के बाद लगता है कि कवि की नजर में कोई बच नहीं पाया है। वे मजदूर, किसान, नेता, ठेकेदार, कूड़ा वाला बच्चा, मदारी, नट, चित्रकार, फिल्मकार, कलाकार, कवि, लेखक और विष्व रंगमंच पर आने वाले विभिन्न पात्र । ऐसा लगता है कि शायद ही कोई हो जो कवि के सामने से गुजरा हो और उसकी कविता में ढल न गया हो।परन्तु यहां कवि से थोड़ी सी षिकायत है।कवि ऐसे क्षेत्र से आता है जहां बिरहा जैसी लोकविधा के अवसान पर कहीं कोई जिक्र नहीं है। हां बरगद नामक कविता में जरूर आल्हा, बिरहा, चैती, कजरी, भजन, सोहर का उल्लेख हुआ है ।

विभिन्न मुददों से लड़ता हुआ कवि सत्य की तरह हांफता जरूर है। परन्तु पराजित नहीं होता।यह एक सकारात्मक पक्ष है। परन्तु कवि जिस क्षेत्र से आया है वहां की लोक परम्पराओं, लोक गीतों व बिरहा जैसी विधा से अनभिज्ञता क्यों ? जो आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। खास कर बिरहा, जिस पर कुछ जातियों का ही वर्चस्व रहा है।लेकिन उनका हिन्दी साहित्य से दूर का रिष्ता नहीं हैं। जिससे यह हिन्दी साहित्य के इतिहास में कहीं कोने अंतरे में पड़ कर रह गया है।क्या ऐसा लोक गायकों जो जनमानस की धमनियों में खून की तरह दौड़ रहे हैं। ऐसे लोक गायकों को कवि भूल क्यों गया? पूरी तरह से हम कवि को इनकार तो नहीं कर सकते। इस संग्रह की अनेक कविताओं में कलाकारों के दुःख दर्द को कवि ने बडे़ सिद्दत से उकेरा है।और आगे आने वाली कविताएं भी आश्वस्त करती दिख रही हैं। जो भविष्य में एक सुखद अनुभूति कराएंगी।

इस संग्रह की कोई भी कविता हिन्दी साहित्य के सागर में हलचल मचाने के लिए पर्याप्त हैं।कुछ कविताएं जैसे - ”चित्र में दुःख,“ ”रोटी की धरती“, ”माचिस,“ ”बरगद,“ ”धूप में पथरा जाने की परवाह किये बगैर,“ ”अभिनय,“ ”मा“ं के अलावा संग्रह की सारी कविताएं बार-बार पढ़ने के लिए बेचैन करती हैं।

अंत में हम यही कहेंगे कि इस संग्रह की समस्त कविताएं एक से बढ़कर एक हैं। जो बहुत दिनों तक तरोताजा बनाए रखेंगी। कवर की रूप-सज्जा थोड़ा मन को खिन्न कर देती है। बावजूद बकौल केदारनाथ सिंह-”मुझे विश्वास है,नये मानचित्र के अकांक्षी इस कवि की आवाज दूर तक और देर तक सुनी जाएगी।“

चर्चित पुस्तक-पहलीबार (काव्य संग्रह)

प्रकाशक-भारती ज्ञानपीठ नयी दिल्ली

कवि- संतोष कुमार चतुर्वेदी

संपर्क-

आरसी चौहान (प्रवक्ता-भूगोल)

राजकीय इण्टर कालेज गौमुख टिहरी

गढ़वाल उत्तराखण्ड 249121

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रचनाकार: पुस्तक समीक्षा - पहली बार
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