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विनीता शुक्ला की कहानी - अधूरा वजूद

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अधूरा वजूद अन्विता उदास सी बैठी थी. तानपूरे पर उंगली फिराकर, स्वर साधने की चेष्ठा; व्यर्थ गयी आखिर. मन में तो शलभ के ताने गूँज रहे थे, “मह...

अधूरा वजूद

अन्विता उदास सी बैठी थी. तानपूरे पर उंगली फिराकर, स्वर साधने की चेष्ठा; व्यर्थ गयी आखिर. मन में तो शलभ के ताने गूँज रहे थे, “महिला मंडल के कार्यक्रम में भाग ले लेतीं, तो कोई पहाड़ टूट पड़ता?”

“तो क्या.... भाग न लेने से- टूट पड़ा पहाड़?!” उसने विरोध किया था लेकिन शलभ पर असर नहीं हुआ . बडबडाते हुए बोला, “बस कुँए की मेढक बनी रहो. मिसेज़ डायरेक्टर पूछ रही थीं कि अन्विता आजकल नजर नहीं आती ....बहुत व्यस्त रहती है क्या?” शलभ के शब्दों ने आग में घी का काम किया. वह फट पडी थी, “तुम्हारी मिसेज़ डायरेक्टर ने; क्लब इसलिए बनाया है कि पति के मातहतों और उनकी बीबियों को, अपनी उंगली पर नचा सकें. जिसके पास कोई काम धंधा न हो, वह महिला मंडल में हाजिरी बजाये. मैडम को मक्खन लगाये और उनके हुकुम का गुलाम बने.”

“क्यों हर्ज ही क्या है इसमें?” शलभ जिद्दी बच्चे की तरह अड़ा हुआ था, “मैडम को मक्खन लगाकर ही उनके पति, डायरेक्टर की ‘गुड बुक्स’ में आये हैं ...समझा करो!! ऐसे कटकर रहने से, काम कैसे चलेगा ...”

“देखो शलभ, अयोग्य लोगों को ही चाटुकारिता का सहारा लेना पड़ता है. मैडम हम सबका फायदा उठाना चाहती हैं. उनके पति तुम लोगों के बॉस हैं- इसका मतलब यह नहीं कि उन्होंने हमें खरीद लिया. उनकी समाज सेवा के लिए हम फ्री में चंदा दें.....नाम कमाएँ वो और हम......” पूरी बात सुने बिना ही, शलभ वहाँ से निकल लिया. अन्विता असहज हो उठी; दिल उखड़ सा गया. जीवनसाथी होकर भी शलभ, उसकी भावनाओं को नहीं समझ पाता.

किसी को एहसास तक नहीं कि उसकी भी, मानसिक और बौद्धिक आवश्यकताएं हैं. जीवन में रचनात्मक कार्य, वह भी करना चाहती है. फालतू में समय क्यों गंवाए?! अब शैली को ही देखो, इतनी बड़ी हो गई है; पर अपने कपडे तक नहीं तहाती. बार- बार नयी फरमाइशें, “ममा कल ढेर सा गाजर का हलवा टिफिन में रख देना – मेरी सहेलियों को बहुत पसंद है”

“पर बेटा, उसमें बहुत झंझट है- और फिर आजकल कामवाली भी तो नहीं आ रही.” सुनकर चुप्पी साध ली शैली ने; लेकिन उसका मुंह फूल गया. बाद में, अपने बड़े भाई रोनित से कह रही थी, “ममा को यह कौन सा नया शौक चर्राया है आजकल…. इस उमर में रियाज़ करके फायदा? ये भी कोई हॉबी है- घर में किसी के लिए टाइम ही नहीं!!” रोनित ने परिपक्वता से, उसे समझाने की कोशिश की थी, “देख बहना, हम सभी की कोई न कोई हॉबी है... है कि नहीं? डैडी क्लब में रमी खेलते हैं. तुम मूवी देखना पसंद करती हो और मैं फुटबाल. फिर ममा ही क्यों....”

“डोंट ट्राई टू प्रीच मी रोनी भैया. तुम बड़े सब एक जैसे हो” और वह ठुनकते हुए वहाँ से चली गयी. किशोरावस्था की यह तुनकमिजाजी, अक्सर ही उसके व्यवहार में झलक उठती. उसे यह बात हजम नहीं होती थी कि जो मां कल तक उसके आगे- पीछे घूमती थी, सहसा इतनी उदासीन कैसे हो गयी! रोनित ही है बस पूरे घर में, जो मां के भीतर की उथल- पुथल को महसूस कर सकता है. कहते हैं; बेटे मां के ज्यादा करीब होते हैं जबकि बेटियां पिता की दुलारी होती हैं. इस घर में भी कुछ ऐसा ही था. रोनित शहर से बाहर छात्रावास में रहता है. यदि पूरे समय, घर में ही रहता होता- तो ममा में हो रहे, भावनात्मक बदलाव को अवश्य समझ पाता.

और एक दिन, जब वे लोग नानी के यहाँ गए; रोनित ने मां और नानी की फुसफुसाहट सुनी. नानी कह रही थी, “अनु, तेरी भाभी छुट्टियों में बाहर जाने का प्लान बना रही हैं”

“पर अम्मा, अभी तो तुम्हारी तबीयत भी ठीक नहीं है.....ये लोग बाद में भी तो जा सकते थे.”

“हाँ पर छुट्टियाँ तो हमेशा नहीं होंगी बेटा”

“लेकिन अम्मा......” आगे की बात ममा के गले में ही फंसकर रह गयी थी. रोनी उनकी बेचारगी से पिघल उठा. वे घर आने पर, चुपचाप अपने कमरे में लेट गयीं. अपनी सुबकियों को भी; सबसे छुपा लिया उन्होंने. रोनित सोच में पड़ गया. मां खुलकर नानी से, अपने साथ रहने को नहीं कह सकीं; शायद नानी के प्रति, उनके दामाद की बेरुखी का ख़याल कर. परिवार में वह, सबकी समस्याएं सुनती हैं पर उनकी उलझन की तरफ; किसी का ध्यान तक नहीं जाता. फिर इस समस्या का मूल तो... सुदूर अतीत में था. नानी और दादी की कभी नहीं बनी. इसी से धीरे धीरे, नानी का आना कम हो गया; और पैरों से लाचार होने के बाद तो बिलकुल बंद. दादी की मृत्यु के बाद भी, डैडी ने कभी उन्हें बुलाया नहीं! रोनित ने मन में तय किया कि वह डैडी से इसका जिक्र जरूर करेगा. हॉस्टल जाने से पहले; मां की मानसिक अस्थिरता के लिए, कुछ न कुछ तो करना ही होगा.

वह सोचता रहा कि क्या करे, फिर अचानक रोली बुआ का ख़याल आया. दिल ने कहा, ‘बुआ ही वो इंसान हैं जो इस बारे में मदद कर सकती हैं.’ रोनी ने, झट से उन्हें फोन लगाया. सारी बात सुनकर वे बोलीं, “चिंता मत कर बेटा. आउंगी मैं वहाँ.... तू देखना, कैसे ठीक करती हूँ सब कुछ!” सुनकर तसल्ली मिली थी, रोनित को. हालात सुधरने की आस हुई. बुआ उसके पिता की बड़ी बहन थीं. बरसों पहले कॉलेज में; उन्होंने किसी को गाते सुना. गायिका सुन्दरी और स्वर भी सुन्दर. नाम- अन्विता, अजब सा आकर्षण था उस लड़की में! रोली शर्मा तब वहीँ पर व्याख्याता थीं. छोटे भाई शलभ के लिए, उन्हें जंच गयी वह सुंदरी! इस तरह, जुड़े थे - जिंदगियों के तार.

अचानक रोली दीदी के आने की सूचना; शलभ को चौंका गयी, पर दिल खिल उठा. अरसा हो गया था, उन्हें देखे. अन्विता को भी संतोष हुआ; सोचा- ‘चलो कुछ दिन तो अच्छे गुजरेंगे’ सीले मन पर, ऊब और समरसता की काई जम गयी थी. शायद अब, उन परतों को खुरच सके अन्विता! बुआ को देखकर, बच्चे उछल पड़े. उनके साथ थे, ढेर सारे उपहार- चौकलेट, कपडे और गेम्स! खुशियों का पूरा पुलिंदा ही, बाँध लायीं थी वे!! सबसे ज्यादा तो शैली ही चहक रही थी. गलबहियां डालकर, लिपट गयी उनसे. “मेरी छुटकी तो बडकी लगने लगी है” उछलकूद करती भतीजी को देखते हुए, रोली ने कहा. “पर सयानी नहीं. बचपना जस का तस है” रोनी ने चुटकी ली तो शलभ भी हंस दिया.

डैडी को खुद पर हँसते देख; रूठ गयी शैली और कोपभवन में जा बैठी. शलभ सकपका गया और अन्विता से बोला, “अरे भई, ज़रा हमारी राजकुमारी को मना लाना......” अनु के असमंजस को देख, शलभ उसे क्रोध से घूरने लगा. भाई के मिजाज़ रोली को जरा भी ठीक न लगे. उसको डपटते हुए बोली, “ गुस्सा तुमने दिलाया है और भरपाई करे अनु- यह कहाँ का न्याय है......और मेरे ख्याल से, हम सभी को उसे इग्नोर करना चाहिए. कितना इममैच्योर और इररिस्पोंसिबिल बिहेविअर है लड़की का! उसको इस तरह, सर मत चढाओ.....नहीं तो बाद में पछ्ताना पडेगा” अनु मन ही मन मुस्करा रही थी. वह यही बात कह- कहकर हार गयी, और पतिदेव चिकने घडे बने रहे. ऊंट पहाड़ के नीचे, आ ही गया था आखिर. बड़ी बहन के सामने, उनकी बोलती बंद हो गयी थी!

रोली दी ने शलभ की बेचैनी को अनदेखा करते हुए कहा, “ चलो भई अनु, खाना लगाया जाये; जोरों की भूख लगी है.” शलभ दुविधा में पड़ गया. दीदी के साथ भोजन न करना, बुरा होगा. लेकिन बिटिया के बिना, कौर गले से उतरेगा क्या??! दी उसके असमंजस को भांप गयीं. रोनित से बोलीं, “ जा बेटा; शैली की थाली, वहीँ रख आ. जब मन करेगा ...खा लेगी” फिर छोटे भाई को गंभीरता से देखते हुए बोली, “चल भैया, अब तू भी शुरू कर. खाना हमेशा समय से खाना चाहिए.” शलभ चाहकर भी बोल न सका. चुपचाप रोटी टूंगने लग गया.

इतने में शैली तमतमाते हुए आई और कहने लगी, “ ममा, मेरे रूम से ये थाली हटा लो. मुझे नहीं खाना ये बोरिंग खाना.... वही रोटी सब्जी .......दाल चावल.” अन्विता कुछ कहने वाली ही थी पर उसके पहले रोली बोल पड़ी, “पहली बात बेटा, हम इंडियन फैमिलीज का स्टैण्डर्ड खाना यही होता है; दूसरी और सबसे इम्पोर्टेंट बात – मां से इस तरह बात नहीं करते!” शैली ने चोर निगाहों से डैडी को देखा पर वहाँ से आज उसे कोई शह नहीं मिली. निराशा और अविश्वास से, वह वापस अपने कमरे में चली गयी. भुनभुनाते हुए उसने खाना खत्म किया और तकिये में सर गडाकर लेट गयी.

दूसरे दिन सुबह- सुबह ही, शैली का नाटक शुरू हो गया, “अभी तक बेड- टी नहीं मिली....व्हाट इज दिस?! पढ़ना है मुझे- चाय के बिना आँख नहीं खुल रही.” शलभ ने भी बिटिया के सुर में सुर मिलाया, “ पता नहीं लोग ऐसे लापरवाह कैसे हैं?! बच्ची को स्कूल जाना है- तीन घंटे बाद. कोई तैयारी नहीं! न नाश्ता न टिफिन...न चाय!!” जवाब अनु ने नहीं बल्कि दी ने दिया, “क्यों तेरे हाथ टूट गए हैं? तुझे तो खूब आती है चाय बनानी. बोर्डिंग के दिनों से ही, खाना बनाना भी आता है......फिर अकेले अनु ही क्यों खटे घर में??...कितना बोझ है बेचारी पर काम का!”

शोरगुल सुनकर अन्विता वहाँ आ गयी और झट रसोईं में घुसकर, चाय का पतीला चढा दिया गैस पर. लेकिन दीदी ने उसका हाथ पकडकर उसे वहाँ से बाहर कर दिया, “नहीं अनु आज तू चाय नहीं बनाएगी. आज तो चाय भैया ही बनाएगा.” रोली दी के तेवर देख, शलभ चुपचाप किचेन में घुसकर, डब्बे टटोलने लगा. किसी तरह चीनी और चाय की पत्ती मिल ही गयी उसको. फटाफट चाय बनाई फिर ट्रे में केतली और कप सजाकर ले आया. “गर्मागर्म चाय- शलभ मार्का चाय”- उसने सबको आवाज़ दी.

अन्विता मुस्कुराये बिना रह न सकी. गृहस्थी के शुरूआती सालों में उसका पति, इसी तरह उसका हाथ बंटाता था.....फिर न जाने क्यूं चुकने लगा वह प्रेम. बच्चों के आने के बाद, शलभ पति और पिता की भूमिकाओं में बंट गया था. और धीरे धीरे पति पर पिता हावी होने लगा! “मैडम जी पीकर बताएं- कैसी बनी है चाय?” शलभ निर्निमेष अनु को ही देख रहा था. पति की दृष्टि से वह चौंकी और रोली दी हंस दीं. बोलीं, “अनु चाय एप्रूव कर ही दे. ठीकठाक बनी है!” अन्विता चाय की सिप लेते हुए फिर मुस्करा दी. “चलो अनु ने तो एप्रूव कर दिया है- आज से चाय बनाना तेरा काम है.” शलभ को यह बात कुछ जमी नहीं, फिर भी दी का लिहाज करके वह चुप रहा.

रसोईं में आके दी ने जल्दी जल्दी सब्जी काटी. अनु और रोली ने मिलकर, चुटकियों में काम निपटा लिया. अन्विता फूल सा हल्का महसूस कर रही थी. शलभ ने ऑफिस की राह ली और शैली स्कूल को निकल गयी. बिना किसी तनाव के, दोनों के टिफिन भी पैक हो गए थे. वह अपनी प्यारी ननद रानी और बेटे के साथ, बालकनी में बैठकर धूप का आनंद लेने लगी. चाय का एक और दौर चला. कामवाली आई और बेगार- टालू काम करके चली गयी. उसने जो काम ठीक से नहीं किये, उसे सुधारने में भी अन्विता को काफी समय लग गया. पर कुल मिलाकर दिन अच्छे से गुजर गया.

शाम को शैली और शलभ वापस आये. शैली ने बस्ता जमीन पर पटका और जूते सहित अंदर चली आई. “अरे बेटा जूते तो उतार ले” अन्विता ने दबी आवाज़ में कहा पर शैली ने सुनी अनसुनी कर दी और बाथरूम में घुस गयी. उसके कीचड सने जूतों से जो गंदगी हुई थी, अन्विता शांत भाव से उसे साफ़ करने लगी. इस प्रकरण पर भाई को चुप्पी साधे देख, रोली ने उसे घूरकर देखा. दी की मंशा समझकर, शलभ ने वादा किया कि वह शैली को जरूर समझायेगा. चाय- नाश्ते के साथ भी, दीदी के निर्देश जारी रहे; ये कि -उनके जाने के बाद हर कोई; अनु की घर के कामों में मदद करेगा. शलभ टी. वी. देखते हुए सब्जी काट सकता है और शैली कम से कम अपना सामान सहेज कर रख सकती है.

यह सुनकर, शलभ के भीतर का पुरुष आहत हुआ. न चाहते हुए भी उसके मुंह से निकल गया, “दी इतना बड़ा अफसर घर के काम करते अच्छा लगेगा. अब तो मेरा डबल प्रमोशन हो गया है.”

“तेरा प्रमोशन हो गया है और अनु का डिमोशन! उसकी उम्र भी बढ़ रही है. कामवाली जब देखो नागा करती है और आती भी है तो आधा- अधूरा काम करके जाती है. तू अपनी शानो शौकत में तो इतना पैसा खर्च करता है पर अन्विता के आराम के लिए एक भी नहीं!”

“तो क्या करूं? आप ही बताइए!”

“घर के कामों के लिए डिशवाशर और स्टैंडिंग वाइपर लेकर आ; ताकि अनु की मशक्कत कुछ कम हो.”

“जी दीदी” दी ने उसे लाजवाब कर दिया था.

अगले दिन रोली ने घोषणा की कि वह और अन्विता, रोनित के साथ शॉपिंग जा रहे हैं; लिहाजा टिफिन नहीं बनेगा. शलभ और शैली अपने ऑफिस/स्कूल की कैंटीन में खाना खा लें. अनु खुश थी. कम से कम, एक दिन तो उसे; बोझिल दिनचर्या से मुक्ति मिली. अन्विता के गानों की रिकॉर्डिंग के लिए, रोली कुछ खाली कैसेट खरीदकर लायी. “अनु, यहाँ एक लोकल क्लब ‘हेरिटेज’ में, लोकगायन का प्रोग्राम है- कुछ दिनों के बाद. वहाँ का मैनेजर मुझे जानता है. तेरे गानों को रिकॉर्ड करके उसे दूँगी. फिर गाने की चांस, तुझे मिल सकती है. मिल सकती है क्या- जरूर मिल जायेगी. मुझे भरोसा है तुम पर!!”

दी के साथ, अनु के दिन पंख लगाकर उड़ते जा रहे थे. मन की उत्फुल्लता, चेहरे पर पढ़ी जा सकती थी. शलभ से भी यह परिवर्तन छुपा न रह सका. वह अपनी पत्नी का एक नया रूप देख रहा था, शायद...उसे अच्छा भी लग रहा था! और एक दिन, अन्विता की फोटो अखबार में देखकर वह चौंक उठा. ‘हेरिटेज’ में दी गयी, उसकी लोकगीत की परफॉरमेंस के बारे में, कई बढियां बातें छपीं थीं. यह देखकर, पत्नी पर गर्व होना स्वाभाविक था. साथ ही दिल में कसक भी हुई कि इतने सालों तक उसने, अनु की प्रतिभा की उपेक्षा की. उसे बढ़ावा देना तो दूर- कभी सराहना के दो बोल भी नहीं बोले. हाँ; यदि कभी ऑफिस के मित्रों का, फैमिली गेट- टुगेदर होता तब ही अन्विता को गाने के लिए कहता- वह भी निर्देश के तौर पर.

“शलभ..भैया, जल्दी रेडी हो जाओ, हमें बाहर जाना है” दी की आवाज़ सुनकर वह वर्तमान में लौट आया. “बाहर?” शलभ अचकचाकर बोला. रोली को थोडा आश्चर्य हुआ, “हाँ बाबा, आज तो सेलिब्रेशन का दिन है- भूल गए?”

“सेलिब्रेशन? ......अनु का नाम पेपर में छपा है- इसलिए?!”

“हाँ, वह भी; और सबसे बड़ी बात- आज के दिन ही तुम दोनों की सगाई हुई थी...याद है? पहली बार मिले थे तुम दोनों और मिलते ही, तुरत फुरत बात तय हो गयी थी”

“सॉरी दी! मैं वाकई भूल गया था!! कई सालों से, हम लोग इसे सेलिब्रेट नहीं....”

“सेलिब्रेट नहीं कर रहे हैं इसलिए!” रोली ने वाक्य पूरा किया, “ देखो भैया, जीवन की छोटी- बड़ी सभी खुशियों को सहेजकर रखना पड़ता है: नहीं तो वे, हवा हो जाती हैं कपूर की तरह” शलभ, रोनित, दीदी सब लोग उत्साह से बाहर जाने के लिए तैयार हो गए पर शैली ने ऐन वक़्त पर नखरे दिखाए, “ बड़े लोगों के साथ मैं क्या करूंगी, ऐसा करती हूँ कि अपनी फ्रेंड शीना के साथ मॉल हो आती हूँ. बहुत दिनों से इन्सिस्ट कर रही है वो”

“शैली! ” इस बार रोली बहुत गंभीर हो गयी थी, “तुम्हारी मां ने, तुम बच्चों के लिए; नौकरी के फर्स्ट क्लास ऑफर ठुकरा दिए- ताकि ढंग से तुम्हें पाल पोस सके; अब जब उसकी खुशी में शामिल होने का वक़्त आया ...तुम ना बोल रही हो” शलभ ने पहली बार, बेटी को जलती निगाहों से देखा.

“सॉरी बुआ!!” शैली का चेहरा लाल पड़ गया था. स्थिति की गंभीरता, वह जान गयी तुरंत. कोई अजानी सी पुलक अन्विता को सिहरा गयी. अछोर आसमान के किसी कोने में बदलियां छंटने लगी थीं.

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( रचनाकार का परिचय यहाँ देखें)

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 5
  1. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव3:02 pm

    बहुत सुन्दर हृदयस्पर्शी कहानी है बधाई विनीता जी

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत ही मार्मिक व संवेदना एं जगाने वाली पेशकश.

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत बहुत धन्यवाद रंगराज जी.

    जवाब देंहटाएं
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रचनाकार: विनीता शुक्ला की कहानी - अधूरा वजूद
विनीता शुक्ला की कहानी - अधूरा वजूद
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