प्रमोद यादव का व्यंग्य - बरसात में…

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“हमसे मिले तुम सजन...तुमसे मिले हम...बरसात में..” अगर बरसात को लेकर इस तरह की बातें आपके जेहन में उमड़-घुमड़ रहे हैं तो आप बिलकुल ही गलत सोच ...

“हमसे मिले तुम सजन...तुमसे मिले हम...बरसात में..”

अगर बरसात को लेकर इस तरह की बातें आपके जेहन में उमड़-घुमड़ रहे हैं तो आप बिलकुल ही गलत सोच रहें हैं..क्योंकि किसी भी बरसात में सजनी हमसे मिलने कभी नहीं आई..और आती भी तो कैसे ? पुराना ज़माना था...पुराने लोग थे..और तब एक घर में एक ही छाते का युग था... वह भी बिग साईज के बारह काडीवाले ( कड़ीवाले) फैमली-पैक छाते का....एक के नीचे ही पूरा परिवार समां जाता..दूसरे की कोई गुंजाईश ही न थी..बस..एक घर-एक छाता....बड़े ही अमीर किस्म के लोगों के घर ही एक से अधिक छाते हुआ करते...वे होते भी तो मोहल्ले की तरह थे- पचास-साठ.. और कहीं-कहीं सत्तर भी ..तब लेडिज छाते का आविर्भाव नहीं हुआ था..ना ही कम काडी वाले छाते बाजार में उपलब्ध थे..”सबका मालिक एक” की तरह यही एक छाता यत्र-तत्र-सर्वत्र हर घर में उपलब्ध हुआ करता.. लेडिज-जेंट्स सभी बरसात के दिनों बारिश होने पर इसमे घुसे पड़ते..जैसे छाता-छाता न हुआ,गोवर्धन पहाड़ हुआ..

“रेनकोट” का भी शुरूआती दौर था.. वह काफी भारी हुआ करता - वजन में भी और दाम में भी.. तब केवल ऊँचे लोगों की पहुँच की चीज थी रेनकोट..यह सर्वथा एक व्यक्ति के लिए ही हुआ करता.. इसे हट्टे-कट्टे पहलवान जैसे लोग..खलनायक और कानन डायल के शरलक होम्स टाईप के लोग ही ओढ़ा करते..रियल-लाईफ से ज्यादा यह फिल्मों में ज्यादा दिखाई पड़ता..उन दिनों जब भी किसी को यह लबादा ओढ़े देखता, बोझ से हमारा बदन झुकने लगता .. इसकी खासियत ये थी कि इसे पहनने के बाद अच्छा-ख़ासा आदमी भी भयावह दिखने लगता..

हाँ...तो हम बता रहे थे कि ना हमने कभी बरसात में “ डम–डम डिगा-डिगा..मौसम भीगा-भीगा “ गाया.. ना ही राजकपूर–नरगिस की तरह एक छाते के नीचे “ प्यार हुआ इकरार हुआ..” कभी गा सके..सारे मौसम में तो मिलना-जुलना हो जाता पर बरसात में बेचारी ‘वो’ घर में ही धरी की धरी रह जाती.” उस पार साजन..इस पार धारे..”..जैसी हालत में किनारे ही रह जाती..हर बरसात में पिया मिलन की बात सोचती लेकिन उस एक अदद छाते को कभी दादाजी लेकर चलते बनते तो कभी बाबूजी..कभी भैया दुकान लेकर चले जाते तो कभी मम्मी लेकर चली जाती पड़ोस में..उसका नंबर कभी लगता ही न था..और छाते के छलावे में यूं ही बरसात निकल जाती..वो पिया मिलन को तड़प-तड़प कर रह जाती ..हमने कई बार कहा कि अपने बाप से दूसरा छाता खरीदने क्यों नहीं कहती तो अक्सर वो बापू के उदगार यूं बताती- ‘ जब एक ही छाते में सबका काम चल रहा है तो दूसरा खरीदने की फिजूलखर्ची क्यों ? और फिर दो-चार महीने ही तो काटने हैं..’

कहते है- बरसात में.. टप- टप बरसते पानी में पिया मिलन की तड़प कुछ ज्यादा ही जोर मारता है..एक बार ऐसे ही हालात में वो “ आर या पार ” का मूड बना मूसलाधार बारिश में हमसे मिलने अपने बाप-दादा के जमाने की बारह काडीवाले विशालकाय इकलौते छाते को ले बेखौफ निकल पड़ी...मौका भी एकदम माकूल था..ना घर में दादाजी थे ना ही बाबूजी...भैया भी मामा के यहाँ गए थे...मम्मी ‘आलरेडी’ मामा के यहाँ ही थी...छाते की डंडी को मजबूती से थामे हौले-हौले पैर जमा-जमाकर,पानी भरे गड्ढों को पार करते चल रही थी.. कभी जोर से हवा चलती तो घबरा जाती..डर जाती कि कहीं छाता उसे उड़ाकर पिया के घर की जगह बन्दूक वाले प्यारेलाल की नाली में न पटक दे..हमसे मिलने की सुध में बेसुध होकर चल रही थी कि दो फर्लांग बाद ही एकाएक पड़ोस के चंदू काका बिना किसी परमिशन के बलात ही छाते में घुस गए और “ हें..हें..” कर हंसते हुए कहने लगे- “ बिटिया..सीधे ही जा रही हो ना..हमें गुप्ताजी की दुकान तक जाना है..पापड लेने है..”

वो क्या कहती ? चुपचाप चलती रही..छाते की कमान उसने(चंदू काका ने) जबरदस्ती ही छीनकर सम्हाल ली.. अभी एक फर्लांग ही और बढे होंगे कि फिर एक मियां बलात छाते में तेजी से घुसते बोले- “ अरे चंदू मियां..हमें भी साथ ले लो ..हमारे छाते को तुम्हारी मामी लेकर गई है..हमें आटा-चक्की तक छोड़ देना..और हाँ..लौटते में हमें ले लीजियो..” उसने छाते की मालकिन को नोटिस ही नहीं किया..उसे देख बस इतना ही बोले- “ तुम कहाँ जा रही हो बिटिया ? “ बिटिया की इच्छा तो हुई कि कह दे- “ तुम सब कमीनों के साथ जहन्नुम में..” पर चुप रही..सोचती रही कि इस तरह हर एक फर्लांग में अवांछित तत्व आते-जाते रहे तो “पिया मिलन को जाना..” कभी होगा ही नहीं.. उसे पहली बार उपरवाले पर और छाता बनाने वाले पर गुस्सा आया..चलो..उपरवाले ने तो बरसात बनाया.. ठीक ही बनाया..पर जिसने भी छाता बनाया-उसने किंग साईज छाता क्यों बनाया ? दो-चार काडी वाला बना देता तो उसका क्या बिगड़ जाता? लंदू-फंदू-चंदू जैसे लोगों से तो निजात मिलता.. तभी अचानक चंदू काका के तेजी से बाहर सटकते ही उसकी तन्द्रा भंग हुई..गुप्ताजी की दूकान में दौड़कर वे गायब हो गए..बारिश काफी तेज थी..इसके पहले कि वह आगे बढती एक सज्जन और तेजी से छाते में बलात घुस आये..उसे देखते ही वह चौंक गई और बेतहाशा डर भी गई..वो बाबूजी थे..देखते ही बोले- “ अरी बिटिया...तुम ? इतनी बारिश में कहाँ जा रही हो ? “ इसके पहले कि वह कुछ जवाब देती बाबूजी नरमी के साथ बोले- “ चलो..अच्छा हुआ..तुम आ गई..हम तो परेशान थे कि इस मूसलाधार बारिश में घर कैसे जायेंगे ?..चलो चलते हैं..” तब वह बोली- “ बाबूजी..ये मामाजी को सामनेवाले चौक में जाना है “

“ हाँ..ठीक है..चलो..गोवर्धन को छोड़ते हुए चलते हैं..” कहते हुए छाते की कमान उन्होंने सम्हाल ली और बरसाती पानी में वे ‘फचक-फचक’ कर चलने लगे...आखिरकार “लौट के बुद्धू घर को आये “ की तर्ज पर वह विशालकाय छाते के साथ जैसे गई थी,वैसे ही बैरंग और बेरंग हो लौट आई.. पिया मिलन की जो भारी तड़प और रंगीन तबियत लिए चली थी उस पर पानी फिर गया..इस अप्रिय घटना की जानकारी उसने बाद में हमें दी तो हम घंटों हँसते रहे.. इसके बाद भी हर बरसात में वो मिलन की तड़पन लिए कोशिश करती लेकिन हमेशा नाकामयाब रहती..कई बार तो हमने घर का छाता चुरा उसे बतौर गिफ्ट देना चाहा पर वो अक्सर “ ना-ना” करती..कहती- “घरवाले पूछेंगे तो क्या जवाब दूँगी ? इतना बड़ा गिफ्ट भला कोई किसी को देता है ? छाता वो भी पूरे बारह काडी वाला ?”

एक बार हमने शरलक होम्स वाले एक रेनकोट की व्यवस्था कर, पॉलीथीनबैग में पैक कर जबरदस्ती ही उसे थमा दिया और कहा कि इस बार की पहली बरसात में बारिश होने पर इसे पहनकर आना...छाते का नाम भी मत लेना..किसी को पता भी नहीं चलेगा..चुपचाप पहन के निकल आना..उसने भी हिम्मत दिखाई..और वादा किया कि इस बार की बारिश में जरुर मिलेंगे..जब साल की पहली झमाझम बारिश हुई तो उम्मीद जगी..सजनी जरुर रेनकोट पहन आएगी.. दरवाजे पर खड़े हो हम इन्तजार करते रहे....बादल गरजता रहा..बिजली चमकती रही..पानी गिरता रहा..और फिर हौले से जैसे किसी ने ब्रेक मारा हो..बारिश थम गई पर वो नहीं आई..मोबाईल का जमाना होता तो पूछ भी लेता-“ व्हाट इश रांग विथ यू ?” पर वैसा कुछ न था...बरसात बीतने के कई दिनों बाद उसकी एक सहेली के मार्फ़त एक पत्र मिला..जिसमें उसने नहीं मिल सकने का भारी दुःख और खेद जताया था..आगे उसने सविस्तार लिखा था कि पहली बारिश के दिन वह रेनकोट पहन एकदम आने को तैयार ही थी कि अचानक दर्पण के सामने खुद को निहारने का लोभ संवरण नहीं कर पाई ..और दर्पण में खुद को देखते ही डरकर बेहोश हो गई..घंटों बेहोश रही..होश में आई तो बारिश थम चुकी थी..इसलिए नहीं आ सकी..इस बात के लिए उसने कोटि-कोटि माफ़ी मांगी..और हर साल की तरह फिर प्रामिस की कि अगले साल जब रिमझिम के तराने लेकर बरसात आएगी तो निश्चित ही मिलेंगे..और इश्वर ने चाहा तो आगामी बारिश में खूब रपटेगे भी और फिसलेंगे भी..अमिताभ और स्मिता की तरह..

हम मूरख भी हमेशा की तरह अगले साल के लिए मान गए.. और आशान्वित रहे कि कभी न कभी तो बरसात में “एक लड़की भीगी-भागी सी..सोती रातों में जागी सी“ जरुर आएगी.... पर ऐसा कभी न हुआ.. आगामी बरसात के पहले ही एकाएक उसकी शादी हो गई और वो सजनी से “ससुराल गेंदाफूल” हो गई..

एक दिन बरसात में बारिश से बचने बाजार में नाई की दूकान के अहाते में हम खड़े थे कि एक नव-दंपत्ति को एक छाते के नीचे हँसते-इठलाते,कहकहे लगाते नजदीक आते देखा..गौर से देखा तो वो सजनी थी..पतिदेव के साथ बारिश का लुत्फ़ उठा रही थी.. उन्हें देख हम हक्के-बक्के रह गए.. ताउम्र सपने हम देखते रहे और हकीकत की दुनिया में वो उल्लू का पठ्ठा “ प्यार हुआ..इकरार हुआ” जैसे दृश्य को फिनिशिंग टच दे रहा था ..बरसात में इतने भी बुरे दिन होते हैं-पहली बार महसूस किये.. एकाएक ही बदन तपने लगा..पसीना छूटने लगा..

अब तो हर साल हमारे साथ यही होता है..जब भी किसी जवाँ जोड़े को छाते के नीचे देखते हैं ..बरसात में...

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प्रमोद यादव

गया नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़

नाम

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रचनाकार: प्रमोद यादव का व्यंग्य - बरसात में…
प्रमोद यादव का व्यंग्य - बरसात में…
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