दीपक शर्मा ' सार्थक' का व्यंग्य - भलमनसाहत की चाहत

SHARE:

अरे वो भले आदमी हैं.… पडोसी के बारे में ऐसा सुनते ही जी हुड़क के रह गया। ये तो कहो कि डाक्टर ने रक्त परिवहन में ज़्यादा ट्रैफिक को देखते हुए...

image

अरे वो भले आदमी हैं.… पडोसी के बारे में ऐसा सुनते ही जी हुड़क के रह गया। ये तो कहो कि डाक्टर ने रक्त परिवहन में ज़्यादा ट्रैफिक को देखते हुए बाईपास रुट (सर्जरी )बना दिया था, नहीं तो हृदयाघात होना तय था।

उसी दिन से ठान लिया की मैं भी भला आदमी बन कर दिखाऊंगा। उसके लिए सबसे पहले तो मैंने अपने एक तथाकथित भले मित्र के साथ रहना प्रारम्भ किया क्योंकि 'संगत से गुण होत है,संगत से गुण जाए। ' ऐसा मैंने अपने मनपसंद दारू के ठेके के सामने जो गांधी महाविद्यालय है,वहां की दीवार पर लिखा देखा था। शरीर में बह रहे देसी ठर्रे के साथ तैरती हुई यह बात सीधे कलेजे में चिपक गई थी।

मित्र वाकई भला आदमी निकला क्योंकि मैंने देखा कि उसके मोहल्ले के चौरसिया साहब उनकी बीबी पर खुलेआम चारों तरफ से रस की वर्षा कर रहे थे परन्तु मजाल है कि उन्होंने कभी भी इसका विरोध किया हो। मित्र में भलाई कूट -कूट के भरी थी। वे रास्ते चलते भी लोगों का भला करने में विश्वास रखते हैं। फिर एक ऐसी घटना घटी जिससे मुझे भलाई के साइडफेक्ट देखने को मिले। बात कुछ ऐसी थी कि एक बार रास्ते पर मैं उनके साथ जा रहा था। सामने स्कूटी पर एक लड़की आ रही थी ,दिन में भी स्कूटी कि लाइट जलती देख मित्र की भलमनसाहत जाग उठी और वे बार-बार मुट्ठी बंद करके खोलने लगे जो सामान्यतः लाइट जलने का इशारा होता है। पर हाय रे किस्मत वो लड़की उसे कुछ और ही समझ बैठी और स्कूटी से उतर कर अपनी सैंडिल से उनकी धुलाई करने लगी। भलाई को इस तरह बीच सड़क पर पिटते और बेआबरू होते देख कर मैं सहम गया। उनकी ये दशा देख कर मेरा मन करुणा से भर गया। मैंने उनसे कहा भाई ये तो बहुत बुरा हुआ। वे कराहते हुए बोले 'नेकी कर दरिया में डाल।' मैंने कहा फिलहाल नेकी करने वाले को हॉस्पिटल में डालने कि ज़रूरत है।

फिर क्या था मैंने उन्हें रोड से बटोरा पर फिर भी उनकी भलमनसाहत के कुछ अवशेष (खून की छीटें ,दो तीन दांत )वही रह गए। मैंने उनसे कहा -आपको ऐसा नही करना चाहिए था तो वे दर्द में भी अपने २४ दन्ती मुख से बोले (२४ दन्ती इसलिए क्योंकि दो चार दांत वही रह गए थे )-मैंने तो मात्र अपने धर्म का पालन किया है। मन ही मन मैंने सोचा, ऐसा धर्म किस काम का जिससे मासिकधर्म आने लगे।

इस घटना से मैं इतना तो समझ ही गया कि भलाई बलिदान माँगती है। बात अगर 'नेकी कर दरिया में डाल 'तक ही सीमित होती तो मैं अपने भले आदमी बनने वाली शपत पर कायम रहता पर यहाँ तो लोग नेकी करने वाले को ही दरिया में डाल देते हैं। ना जाने कितने देवी देवताओं की पूजा करते हैं फिर उनकी मूर्तियों को बाकायदा गाते बजाते ले जाकर दरिया में डुबो (विसर्जित ) देते हैं। पर्यावरण का भला चाहने वाले कुछ पर्यावरणविद ने काना फूसी करना शुरू कर दिया है कि इस विसर्जन से नदियाँ, तालाब आदि जल के स्रोत प्रदूषित होते जा रहे हैं। वैसे मुझे इन भले लोगों से बड़ी सहानुभूति है क्योंकि ये लोग बिचारे कानाफूसी ही कर सकते हैं। ये जानते हैं कि जो लोग अपना भला करने वाले भगवान तक को डुबो देते हैं वो उनका क्या हाल करेंगे ये जग जाहिर है।

मुझमें सहानुभूति पैदा हो गई इसका मतलब है कि मुझमें भी भलमनसाहत के गुण पैदा हो रहे हैं। संवेदना और सहानुभूति ये दोनो नेकी के दो हथियार हैं, भले आदमी खासकर नेता (धरती पर पाया जाने वाला सबसे भला जीव नेता है ) इन दोनों शब्दों का प्रयोग अधिकाधिक करते हैं। ट्रेन हादसा हो गया , सौ लोग मर गए। फिर नेता जी ने टीवी पर दर्शन देकर कहा की मुझे मरने वाले लोगों के परिवार के साथ बड़ी सहानुभूति है और मैं बहुत सारी थोक के भाव में संवेदना व्यक्त करता हूँ। कभी-कभी ऐसा लगता है कि ये शब्द (संवेदना ,सहानुभूति )दिवालिया हो गए हैं।

भलमनसाहत चुनाव के मौसम में अपने शबाब पर होता   है। ये एक ऐसा मौसम होता है जब देश के सभी नेताओं के शरीर में ईश्वर द्वारा बनाए गए सभी छिद्रों से भलमनसाहत बहने लगती है। ये नेता हमारे पालनहार हैं पर अभी हाल ही में एक बेचारे भले नेता को देश की अदालत ने चारा घोटाले में सजा सुना दी ,बताइये ये कहाँ कि भलमनसाहत है। अगर सबका पालनहार विष्णु दूध के सागर (छीर सागर ) में रहे तो कोई बात नहीं और देश का पालनहार (नेता ) अगर थोड़ा चारा भी खा ले तो इतना हल्ला .......... भलाई का तो ज़माना ही नहीं है। बिचारे भले लोग ज़्यादा कुछ नहीं चाहते हैं.……ज़्यादा के नहीं लालच हमको थोड़े में गुजारा होता है। और ये 'थोड़ा ' है क्या ?

रहीम ने ने इस 'थोड़े ' कि व्याख्या करते हुए कहा है -

रहिमन इतना दी जिए ,जामे कुटुम समाय।

मैं भी भूखा ना रहूँ , साधु ना भूखा जाय

इस दोहे के माध्यम से रहीम कहना चाहते हैं कि हे मनुष्य! रहीम से केवल उतना ही मांगो (हालांकि रहीम खुद फटीचर थे ) जिसमे कुटुंब समा जाएं पर समस्या कि ये साले कुटुंब चाहे जितना ही धन इकट्ठा कर लो …… समाते ही नहीं हैं। दोहे के अगले भाग में स्वयं की भूख तथा साधु की भूख की बात कही गई है। साधु बेचारा धन की भूख ,काम की भूख ,सम्मान की भूख से परेशान है। ऐसी ही भूख के चक्कर में दो चार बाबा जेल की हवा खा रहे हैं। बेचारे …कहीं हवा खाने से पेट भरता है। समाज का पतन होता जा रहा है। भले लोगों का तो जीना ही मुहाल है।

जितने भी भले आदमी या संस्था हैं वे किसी ना किसी कारण से परेशान ही हैं। मीडिया को ही ले लीजिए लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ , भलमनसाहत का प्रतीक पर आज कल इलेक्ट्रानिक मीडिया बीमार चल रही है। असल में ज्यादा टी आर पी और लाभ की भागदौड़ में बेचारी इलेक्ट्रानिक मीडिया का पेट खराब हो गया है उसे बार-बार ब्रेक रूपी दस्त आने लगे हैं। कोई गंभीर चर्चा चल रही है, पाकिस्तान भारतीय सीमा पर फायरिंग कर रहा है सत्ता पार्टी का प्रवक्ता लम्बी-लम्बी लपेट रहा है कि पत्रकार बीच में टोक कर कहता है- जनाब थोड़ा रुक जाइये ब्रेक पर जाना है। एक घंटे में चालीस मिनट तक तो दस्त के मारे ब्रेक में ही निकल जाते हैं। ये इतनी लापरवाह है कि इस बीमारी का इलाज तक नहीं कराते हैं जबकि बार-बार दस्त से बबासीर का खतरा रहता है।

बात भलाई कि चल रही थी और और फिर दस्त से होते हुए बबासीर तक पहुँच गई , भाईसाहब भलमनसाहत चीज ही ऐसी है फिर भी मानवता कि भलाई के खातिर महान लोग ना जाने कितने कष्ट उठाते हैं। बुद्ध सत्य की खोज में ना जाने कहाँ-कहाँ भटके और अंत में एक बरगद के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। इसका मतलब ये नहीं है कि ज्ञान केवल बरगद के नीचे ही मिलेगा,तबीयत से अगर पाखाने में भी बैठ कर सोचे तो वहाँ भी ज्ञान मिल सकता है। ऐसी ही शोध में लगे एक सज्जन ने मुझे बताया की सत्य का स्वरूप कुछ नहीं है ,सत्य तो परिस्थिति के अनुसार बदलता रहता है। महावीर को नंगा देख कर श्रद्धा पैदा होती है जबकि आमिर खान को एक पोस्टर में अधनंगा देख कर नैतिकता का ह्रास नज़र आता है। यही नैतिक व्यक्ति अपनी अम्मा कि उम्र कि औरत को भी निर्वस्त्र देखने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते हैं। शॉपिंग मॉल में अंडरगार्मेंट पहने खड़े स्टैचू को भी ऐसे देखते हैं कि वो नर्जीव स्टैचू भी शर्मा जाये।

ऐसे  भले व्यक्ति बड़े भावुक भी होते हैं बात - बात पर इनकी 'भावना' के साथ छेडख़ानी हो जाती है मैं ऐसे भी भले आदमियों को जनता हूँ जिन्हे अपनी 'भावना ' को छिड़वाने में मज़ा आता है, ऐसे लोग अपनी भवना को सदा निर्वस्त्र ही रखते हैं जिससे कोई भी उसे देख कर मतवाला हो जाए और छेड़ दे। मज़ेदार बात ये भी है कि ऐसे लोगों की 'भावना' भी बेशर्म हो जाती है और उसे खुद को छिड़वाने में मज़ा आने लगता है।

एक सत्य ये भी है कि भलमनसाहत समान रूप से हर व्यक्ति में नहीं पाई जाती है। ख़ासकर पुरानी पीढ़ी के लोग नई पीढ़ी कि तुलना में खुद को ज़्यादा भला समझते हैं। इसी मान्यता को मानने वाले एक बुज़ुर्गवार से मेरी मुलाक़ात हुई। वे बताने लगे कि "हमारी पीढ़ी में लोग ज़्यादा भले थे पर आज कि पीढ़ी में भलमनसाहत कि जगह बेशर्मी ने ले ली है। खुलेआम लड़के लड़कियाँ घूमते हैं , चूमाचाटी करते हैं।

मैंने कहा ' ये तो रोमांस है इसमे क्या बुराई है ?'

वे मेरी ओर देख कर सपाट लहज़े में बोले, 'अगर चूमना चाटना ही रोमांस है तो फिर धरती पर कुत्ते सबसे ज़्यादा रोमांटिक प्राणी होंगे। '

मेरे पास इसका उत्तर नहीं था। उन्होंने आगे कहा ,' रोमांस तो दूर से ही आँखों से आँखों में देखने से पैदा होता है और हमारे पूर्वज तो मात्र आँखों से देख कर ही महिला को गर्भवती कर देते थे, जैसा कि महाभारत में वेदव्यास द्वारा देखने मात्र से दो कुरु रानियाँ गर्भवती हो गई थी। '

वे आगे भावविभोर होकर बोले ,"हमारे ज़माने में 'काम भवना ' को भी बड़े सलीके से व्यक्त किया जाता था जैसे एक पुरानी फ़िल्म में नायिका के मनोभाव को कितनी अच्छी तरह शब्दों में पिरोया गया है -

 

मैं नदिया फिर भी मैं प्यासी

भेद ये गहरा बात ज़रा सी

 

वहीं आज कल कैसे गाने बनते हैं -

 

लैला तेरी लेलेगी तू लिख के लेले

 

कितनी ज़्यादा हवस है इन लाइनों में ,लेखक ने इसमे अनुप्रास अलंकार का तो अच्छा प्रयोग किया है पर ध्यान से इसके बोल को देखें तो इसमे जेंडर दोष साफ नज़र आता है। "

वे ताव खाकर आगे बोले ," नई पीढ़ी के लोग एकदम निकम्मे हैं। हमारी पीढ़ी के लोग तीन काल यानी भूतकाल , वर्त्तमानकाल , और भविष्यकाल में जीते हैं पर नई पीढ़ी के लोग केवल ' भौकाल ' में जीते हैं। "

इस तरह वे बुज़ुर्गवार मुझे भलमनसाहत पर लेक्चर देकर चले गए। इससे मैंने सीखा कि दुनिया में सबसे आसान काम लेक्चर देना है। हाँ अगर भलमनसाहत कि पराकाष्ठा देखनी है तो वो डेली सोप सीरियल कि नायिकाओं में मिल सकती है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से लेकर समकालीन परिस्थितियों में बने सभी सीरियलों के मूल में एक ही सत्य है कि इसमे एक नायिका होती है जिसमे धैर्य राम ज़्यादा, मानवता बुद्ध से भी ज़्यादा , पराक्रम कृष्ण से भी ज़्यादा होता है। वो बड़ी से बड़ी साजिशों का जेम्स बांड कि तरह पर्दाफाश कर देती हैं। ये कलह प्रधान और टेसूदार सीरियल पतियों कि ज़िन्दगी हराम किये हुए हैं क्योंकि घरेलू महिलाएँ इसकी इतनी एडिक्ट हो चुकी हैं कि वे सीरियल के नायिका कि कभी ना ख़त्म होने वाली समस्याओं को अपनी समस्या समझने लगती हैं। बेचारा पति ऑफिस में बॉस कि गालियां सुनकर तथा ट्रैफिक कि मार खाकर घर पहुंचता है तो उसे उस समस्या से उत्पन्न तनाव को झेलना पड़ता है जो कि सीरियल के नायिका कि है तथा उसकी पत्नी से होकर उस तक पहुचती है। एक पौराणिक ग्रन्थ के अनुसार एक बार माता पार्वती ने क्रोध में आकर भगवान शंकर को खा लिया था और 'धूमा देवी' के नाम से जानी गयी। मेरे पास एविडेंस नहीं है पर मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि ज़रूर सीरियल देखते समय माता पार्वती  को भगवान शंकर ने डिस्टर्ब किया होगा जिसका परिणाम ऐसा निकला।

सूचना  - पतियों से अनुरोध है कि वे सीरियल में चल रहे दृश्य के अनुसार अपनी पत्नी के मूड को आँक कर फिर उसी अनुसार ब्यवहार करें। जन हित में जारी।

एक बात और है ,जो भले दिखते हैं वो ज़रूरी नहीं कि भले ही हों। मेरे गाँव में एक कहावत है कि - 

                 लम्बा तिलक मधुरिया वाणी ,दगाबाज़ की यही निशानी।

बँगाल की लेखिका महाश्वेता देवी की लघु कथा  'कुंती ओ निषादी ' के अनुसार लक्छा गृह में दुर्योधन पाण्डवों को जलाकर मारने का प्रयास करता है पर वे सुरंग खोद कर निकल जाते हैं उसी रात आग लगने से पहले झूठा भ्रम पैदा करने के लिए कुंती एक निषादी और उसके पांच पुत्रों को भोजन कराती है तथा मदिरा पिलाके सुला देती है। आग लगने के बाद निषादी और उसके पाँच पुत्रों के जले शव देख कर दुर्योधन उन्हें पाण्डव समझ कर मरा हुआ मान लेता है। इस प्रकार कुंती अपने तथा अपने पुत्रो के प्राण कि रक्षा करती है। इसे पढ़ कर ना जाने क्यों मुझे पंडित मुरारीलाल तिरबेदी के 'निष्काम कर्म योग का विधान' तथा डाक्टर एस के जैन के 'गुप्त रोग से निदान ' एक जैसे ही प्रतीत होने लगे हैं।

भलमनसाहत की खोज में खोज में मैं इतना तो जान ही गया हूँ कि जो जैसा दिखता हो ज़रूरी नहीं कि वैसा ही हो। और फिर एक दिन मार्क्स बाबा ने मुझे दर्शन दिए .... अरे भई वही मार्क्स बाबा साम्यवाद वाले। जिनके आदर्शों पर चलके रूस में एक मरिल्ले से बच्चे का जन्म हुआ जिसे दुनिया साम्यवाद या कम्युनिसम के नाम से जानती है। ये असमानता ख़त्म करने कि बात करता है और इसलिए जो बड़े थे उनकी गर्दनें काट डाली गई ताकि सब बराबर हो जाये।

खैर बात मार्क्स बाबा कि चल रही थी उन्होंने मुझे दर्शन देकर कहा - 'हे मानव तेरी ये गिद्ध जैसी चीकट आँखें लौंडिया ताड़ने के लिए तो ठीक हैं पर संसार के विराट रूप को देखने में असमर्थ हैं। ' फिर जैसे कृष्ण ने अर्जुन को अपना विराट रूप देखने के लिए दिव्य दृष्टि प्रदान कि थी , मार्क्स बाबा ने मुझे 'भौतिक द्वंदवाद ' रुपी नेत्र प्रदान कर दिए। अब मुझे पूरी दुनियाँ बदली -बदली सी लग रही है। हर तरफ अर्थशास्त्र है जिसने अपनी एक काँख में नैतिकता और दूसरी काँख में मर्यादा को दबा रखा है। मैंने भलमनसाहत के स्वरुप को भी देखा।

            ' भलमनसाहत का पौधा स्वार्थ कि ज़मीन पर उगता है। ' हर जगह भलमनसाहत के पौधे उगे हुए हैं। कुछ जगह तो बाकायदा भलाई कि खेती की जा रही है।

 

ये सब देख कर मुझे बड़ा क्रोध आया एक बारगी मन हुआ कि कम्युनिस्टों के झंडे से हसिया लेकर इन पौधों को काट डालूँ। फिर अपने निठल्लेपन के कारण ये विचार त्याग दिया। वो कहावत है ना कि

किस किस को याद कीजिये, किस किस को रोइए

आराम बड़ी चीज है ,  मुँह ढंक के सोइये।

एक अंतिम बात, जब मैंने ये संस्मरण अपने कुछ भले मित्रों को सुनाया तो उन्होंने कहा कि तुम बड़ी वल्गर भाषा में लिखने लगे हो।

दोस्तों मैं उत्तर भारत के जिस गाँव में पैदा हुआ हूँ वहाँ विद्वता का मानदण्ड यही है कि कौन व्यक्ति बिना दोहराये लगातार पाँच मिनट तक गालियाँ दे सकता है। अतः मुझसे इससे ज़्यादा सभ्य होने कि उम्मीद ना रखें।

                                                                                          __  दीपक शर्मा ' सार्थक '

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: दीपक शर्मा ' सार्थक' का व्यंग्य - भलमनसाहत की चाहत
दीपक शर्मा ' सार्थक' का व्यंग्य - भलमनसाहत की चाहत
http://lh5.ggpht.com/-BnHdnjUPdCc/VLkGl88wCBI/AAAAAAAAdAo/S9qhChm-TTg/image_thumb.png?imgmax=800
http://lh5.ggpht.com/-BnHdnjUPdCc/VLkGl88wCBI/AAAAAAAAdAo/S9qhChm-TTg/s72-c/image_thumb.png?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2015/01/blog-post_80.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2015/01/blog-post_80.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content