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अंकिता आचार्य का आलेख - हिन्दी की बोलियों में आपसी बोधगम्यता

समस्त भारतीय आर्य भाषाओं बंगला, असमी, गुजराती, मराठी, सिन्धी, उड़िया, कश्मीरी, नेपाली आदि के साथ हिन्दी और उसकी सभी बोलियों का मूलस्रोत संस्कृत भाषा है। संस्कृत का विस्तार क्षेत्र अत्याधिक के कारण इसमें विकार या विकास होने लगा तथा शीघ्र ही इसके कम से कम चार प्रमुख भाषिक रूप दिखाई पड़ने लगे। जिन्हें शौरसेनी, मागधी, अर्धमागधी, महाराष्ट्री प्राकृतों के रूप में जाना गया। आगे चलकर इन प्राकृतों का भी विकास हुआ, जिनके आगे अपभ्रंश शब्द जोड़ कर इन्हें शौरसेनी अपभ्रंश, मागधी अपभ्रंश, अर्धमागधी व महाराष्ट्री अपभ्रंश के नाम से अभिन्हित किया गया।

इन्हीं प्रथम तीन अर्थात् शौरसेनी, अर्धमागधी व मागधी अपभ्रंशों से हिन्दी व उसकी बोलियों का विकास हुआ। इनमें शोरसेनी से राजस्थानी हिन्दी की बोलियाँ- खड़ी बोली, हरियाणवी, ब्रज, बुन्देली, कन्नौजी, मागधी से बिहारी हिन्दी अर्थात् भोजपुरी, मगही, मैथिली तथा अर्धमागधी से अवधी, बघेली व छत्तीसगढ़ी बोलियां विकसित हुईं। हिन्दी की इन समस्त बोलियों का व्यवहार क्षेत्र काफी विस्तृत है। यहां तक कि एक-एक बोली का व्यवहार क्षेत्र योरप की कतिपय स्वतंत्र भाषाओं के व्यवहार क्षेत्र से भी बड़ा है। किन्तु हिन्दी की ये बोलियाँ पूर्णतया श्रृंखलाबद्ध हैं इस श्रृंखलाबद्धता का कारण है इनमें पाई जाने वाली आपसी बोधगम्यता।

यह बोधगम्यता क्या है वस्तुतः एक बोली के प्रयोक्ता दूसरी बोली को किस स्तर तक समझ लेते हैं, यही भाषिक बोधगम्यता है। उदाहरण के लिए पूर्वी हिन्दी की बोलियां अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी बोलियों का विकास अर्धमागधी अपभ्रंश से हुआ है। अतः इनकी भाषिक संरचना लगभग समान है। इसके साथ ही इनके प्रयोक्ता सांस्कृतिक, वाणिज्यिक तथा सामाजिक कार्यों (विवाहादि) से आपस में लगातार सम्पर्कित होते रहते हैं। अतः इनमें आपसी बोध गम्यता की मात्रा अधिक होगी। वास्तव में किसी भाषा या बोली के भाषिक तत्व दूसरी बोली या बोलियों के भाषिक तत्वों से जितने अधिक में समानता होगी, उतनी अधिक भाषिक बोधगम्यता होगी।

उदाहरण के लिए हिन्दी की सभी बोलियों में संस्कृत की ऋ ध्वनि के स्थान में रि, ष श के स्थान पर स, श के स्थान पर ख प्रयुक्त होते हैं। सभी बोलियों में संस्कृत के सभी स्वर, व्यन्जन प्रयुक्त होते हैं। रह, ल्ह, न्ह जैसी ध्वनियां लगभग सभी में हैं। पुल्लिंग में , इनी, नी, आनी,इया लगाकर स्त्रीलिंग बनाने की पद्धति सभी बोलियों में है। सम्बन्ध परसर्ग क, के, केर,केरा कर, की, को, कौ, का अद्भुत साम्य है। ब्रजभाषा में हूँ, हौं की जगह बिहारी बोलियों में हम का प्रयोग होता है।

हिन्दी की सभी बोलियों की कहावतें, मुहावरे, लोकगीतों में बहुत समानता है। संज्ञा शब्दों में करना जोड़कर जैसे विश्वास करना, विचार करना आदि का प्रयोग सभी बोलियों में है। अजायब घर, पावरोटी, डाकघर, कूड़ा कर्कट आदि सामासिक संरचना भी सभी बोलियों में है। हिन्दी की सभी बोलियों में तुर्की, अरबी, पुर्तगाली, अंग्रेजी, गुजराती, मराठी, तमिल, तेलुगु के शब्द मिलते हैं। हा तथा वा प्रत्यय बिहारी में ही नहीं अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी में भी प्रयुक्त होते हैं। जैसे- बैलवा, रजिस्टरवा, मरकहा, कटहा आदि प्रचलित है। मोर, हमर, तोर, इहां, उहां, जहां, जेकर, केकर, अइसन, वइसन, जइसन, तइसन आदि का प्रयोग छत्तीसगढ़ी व पूर्वी हिन्दी में समान रूप में मिलते हैं।

नदी, नालों, पहाड़ों जंगलों के होने तथा आवागमन के संसाधनों व शिक्षा की कमी के कारण इन बोलियों में कतिपय अतिरिक्त व स्थानीय स्तर में भाषिक रूप विकसित हो गए, जिससे इन्हें अलग बोलियों के रूप में पहचान मिली। किन्तु आज सांस्कृतिक, रजनैतिक, शैक्षिक, औद्योगिक, तकनीकी, आवागमन, संचार श्रव्य व दृष्य जगत में हुई क्रांति ने इन सभी बोलियों के प्रयोक्ताओं को और भी करीब ला दिया है, जिससे हिन्दी की इन बोलियों के मध्य आपसी बोधगम्यता तो बढ़ गयी है। यहां तक कि हिन्दी देश एवं देश के बाहर भी अपना स्थान बनाने में सक्षम हो गई है।

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