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दीपक आचार्य का आलेख - सुविधाएं सब चाहते हैं फर्ज निभाना कोई नहीं

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सुविधा ऎसा शब्द है जो सभी को तहेदिल से पसन्द है। जो सुविधाओं के हकदार हैं वे भी, और जो सुविधाओं के लिए पात्र नहीं हैं वे भी सुविधाओं के लिए...

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सुविधा ऎसा शब्द है जो सभी को तहेदिल से पसन्द है। जो सुविधाओं के हकदार हैं वे भी, और जो सुविधाओं के लिए पात्र नहीं हैं वे भी सुविधाओं के लिए तरसते रहा करते हैं। सभी तरह के लोग सुविधाभोगी होते जा रहे हैं।

मेहनत की कमाई से कहीं अधिक आनंद अब हमें चतुराई से सब कुछ पा लेने में आता है। परिश्रम की बजाय अब सुविधाओं की तलाश में हम हर तरह के शोर्ट कट तलाशने में लगे हुए हैं।

हम सभी चाहते हैं कि बिना कुछ किए धराए या बहुत कम परिश्रम में सब कुछ सहजता से प्राप्त हो जाए, और वह भी इतना कि हमारी सात पुश्तों को भी कमाने के लिए कुछ न करना पड़े।

पहले जमाने में एक-एक पाई, एक-एक दाना और एक-एक घूंट भी किसी का पा लेना अपने पर ऋण मानते थे और इसलिए बिना मेहनत किये कुछ भी पाने को हराम का मानते थे। यही कारण था कि उस जमाने के लोग इंसान के नाम पर जगत के लिए वरदान थे।

अब तो बिना मेहनत के सब कुछ पा जाने, यहाँ तक कि लूट-खसोट कर भी कुछ प्राप्त हो जाए, तो पीछे नहीं रहने वाले लोगों की भारी भीड़ यहाँ-वहाँ छायी हुई है जिसके जीवन का चरम लक्ष्य यही है कि अपने नाम से सब कुछ हासिल कर जमा किया जाए और दूसरों के मुकाबले अपने आपको वैभवशाली एवं प्रतिष्ठित माना-मनवाया जाए।

चाहे इसके लिए कुछ भी क्याें न करना पड़े। भीख मांगनी पड़े, किसी की गुलामी करनी पड़े या फिर लूट-खसोट और तस्करी को ही क्यों न अपनाना पड़े। हर तरह के बाड़ों में अब पुरुषार्थी लोगों का अकाल पड़ता जा रहा है।

बहुत सारे लोग इस बात को स्वीकारते हैं कि लोग काम नहीं करते। यहां तक कि खुद कामचोर भी जब-तब इसी बात को कहते रहते हैं कि आजकल काम करने वाले नहीं रहे।  हालात ये हो गए हैं कि लोग अपने निर्धारित कर्तव्य कर्मों को हीन एवं उपेक्षित मानकर निजी काम-धंधों और अतिरिक्त ही अतिरिक्त अन्य प्रकार की आय अर्जित करने में फेर में जुटे हुए हैं।

इन लोगों को अपनी ड्यूटी के सिवा कुछ भी करा लो जिसमें कुछ मिलने की आशा पक्की हो, वे सब कुछ कर डालेंगे। आजकल कर्मयोग का कोई सा क्षेत्र हो, बहुत सारे लोग ऎसे जमा हो गए हैं जो अपने कार्यस्थलों और काम-धंधों वाले बाड़ों-गलियारों को धर्मशालाओं की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। 

इन्हें अपने निर्धारित कर्तव्य कर्म करने में मौत आती है लेकिन दुनिया जहान के बारे में घण्टों गप्पे हँकवा लो, खान-पान का आनंद देते रहो, कर्म क्षेत्रीय समय में निजी कामों के लिए समय देते रहो, आलस्य, दरिद्रता और प्रमाद से भरे हुए इन लोगों को कोई काम मत बताओ, तो ये खुश रहेंगे।

जरा सा काम करने का कह दो या अपनी ड्यूटी की याद दिला दो तो बेशर्म होकर श्वानों की तरह भौं-भौं करते हुए जमीन कुरेदने लग जाएंगे। इन्हें मनचाही सुविधाएं देते रहो, मेहमानों की तरह इन पर पैसा लुटाते रहो, इनकी हर हरकत को चुपचाप देखते रहो, तो मुदित भाव से दुम हिलाते हुए रहेंगे, और जरा सा कुछ कर्तव्य का भान करा दो, या किसी गलत हरकत पर टोक दो, फिर देखो, सारे निशाचरों और हिंसक जानवरों की शक्ल ही देख लो इनमें।

हममें से बहुत से लोगों की आदत ही ऎसी बुरी हो गई है हम जहां रहते हैं, जहां काम करते हैं वहां हर प्रकार की जायज-नाजायज सुविधाएँ चाहते हैं, अपने निजी कामों और बेवजह तफरी के लिए समय चाहते हैं, ड्यूटी समय चुराकर दूसरे-तीसरे काम करते हैं और कर्तव्य कर्म में ही मदद करने या कर्तव्य पूरे करने की बात कहने पर ऎसे भड़क जाते हैं जैसे कि इनसे घर का कोई काम ले रहे हों या निजी काम करा रहे हों।

हर क्षेत्र में कर्तव्य कर्मों का ह्रास होता जा रहा है और हम हैं कि भारतमाता को परम वैभव प्रदान करने और भारत को विश्वगुरु बनाने के सपने सजा रहे हैं। इन विषम हालातों में विश्व गुरु नहीं बल्कि गुरुघण्टालों का देश जरूर बन सकता है।

आदमी के पास दुनिया के सारे कामों के लिए फुरसत है, अपने कर्तव्य कर्म के लिए नहीं। जिन लोगों के लिए बंधी-बंधायी राशि हर माह मिल जाने की सुविधा है उन लोगों में बहुत सारे ऎसे देखने को मिल जाएंगे जो पुरुषार्थहीनता को स्वीकार कर चुके हैं और साण्डों की तरह मस्ती मार रहे हैं, औरों को सिंग भी दिखा रहे हैं, नुकीले दाँत और नाखून भी।

बहुत सारे साण्ड धर्म, समाज सेवा और क्षेत्र सेवा के तमाम आयामों के नाम पर धींगामस्ती कर रहे हैं और अपने निर्धारित कर्म की बजाय ऎसे-ऎसे कामों में दिलचस्पी दिखा रहे हैं जो उनके हैं ही नहीं। इसकी दो फीसदी रुचि भी ये अपने स्वकर्म में लगाएं तो दुनिया का भला हो जाए।

हर इंसान की अपनी कोई न कोई ड्यूटी होती है जिसे निभाना उसका अपना व्यक्तिगत फर्ज है। जो ईमानदारी से निभाता है वह आत्म आनंद में मस्त रहता है। उसे हर दिन सोने से पहले इस बात का संतोष रहता है कि उसने जितना जमाने से अर्जित किया है उतना काम पूरी निष्ठा, लगन और ईमानदारी से किया है।

यही कारण है कि फर्ज को मानने वाले अपने पर गर्व करते हैं और जो लोग इसकी अवहेलना करते हैं वे सारे के सारे लोग किसी न किसी मर्ज के शिकार होते हैं। यह मर्ज शारीरिक नहीं तो मानसिक तो होगा ही, यकीन न हो तो दुनिया के सारे हरामखोरों, कामचोरों और निकम्मों को देख लें।

इनके चेहरे पर मुस्कराहट तक कभी नहीं देखी जा सकती। हमेशा इनकी शक्ल पर मुर्दानगी ऎसी छायी रहेगी जैसे कि ये कोई अपराध कारित करने जा रहे हों, किसी की जासूसी का अभियान चला रहे हों अथवा किसी षड़यंत्र का कोई ताना-बाना ही बुन रहे हों।

वे लोग धन्य हैं जो परिश्रमी, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठ होकर स्वकर्म में रमे हुए हैं, जिन्हें न किसी से कोई अपेक्षा है, न किसी से दूराव। श्रमेव जयते।

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

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