हरियाली बचपन / कहानी / राहुल देव

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हरियाली बचपन बचपन की यादें जब-जब याद आतीं हैं बहुत अच्छा लगता है। अजीब सी अनुभूति होती है ! आज जब मैंने उस बचपन को देखा तो सहज ही मुझे स...

हरियाली बचपन

बचपन की यादें जब-जब याद आतीं हैं बहुत अच्छा लगता है। अजीब सी अनुभूति होती है ! आज जब मैंने उस बचपन को देखा तो सहज ही मुझे स्मरण हो आया- हरियाली बचपन ! हारी घास का गट्ठर लादे सुबह-सुबह...बचपन हरियाली, हरियाली और बचपन ! अक्सर ऐसा होता रहता। मैं उस रास्ते से सुबह टहलने या मैदान के बहाने घूमने जाया करता था।

कभी ऐसा न हुआ कि वह मुझे न दिखी हो। उम्र लगभग 14-15 साल, सांवला रंग। घास का गट्ठर लादे पता नहीं क्या सोचती- चली जाती। मेरे भावों का पारावार न था। भारत उदय और हरियाली बचपन- उफ़ ! यह विरोधाभास, शायद बाधक है प्रगति का, अभिशाप है हमारे समाज का।

लगभग 2-3 महीने यही क्रम चलता रहा। अंततः मेरा मन नहीं माना तो पता करने की ठानी। मैंने पूछा तो उसने हलके संकोच से बताया, ‘यहीं पास में रहतीं हूँ। दो बहने और एक छोटा भाई है, वे भी मेरी तरह....| माँ-बाप मजदूरी करते तब जाकर भोजन।’

‘स्कूल !’ मैंने पूछ ही लिया,

यह यक्ष प्रश्न था। वह मौन रही, मानो कहना चाहती हो यह भी कैसा मूर्ख प्रश्न। पेट की आग बनाम शिक्षा ! मैं समझ गया। बहुत कठिन है राह जीवन की। आश्चर्य अभी से सब समझती है। मैं आगे कुछ पूछ न सका। लौट आया बुझे मन से। हरियाली में छिपा बचपन सिसकता है। क्या करे वह, मजबूर है स्वयं से/भाग्य से !

एक दिन मैंने फिर पूछा- ‘पढने की इच्छा नहीं होती ?’

‘होती है तो भी क्या किया जाए, कल्पना में जी लेती हूँ यथार्थ को ढोती हूँ।’

इस बार बड़ी निर्भीकता से जवाब दिया था उसने।

‘हाँ यह भी सही है’, मैं ठंडी सांस लेकर बोला।

हालांकि वह अकेली नहीं थी। कई बच्चे रहते थे वहां पर मगर हमेशा नियत समय पर हरियाली लादे वही दिखती मुझे। निर्लिप्त भाव से उसके वजूद को समेटे हुए सबसे पहले दिखती वह हरीतिमा, वह हरियाली जिसके नीचे उसका सिर दब रहा होता।

मैले-कुचैले कपड़ों में भी उसका लावण्य मेहनत के पसीने की बूंदों से दमक उठता। वह अपनी उम्र के हिसाब से बहुत कठिन श्रम करती थी जबकि मुझे हर मौसम की सुबह ठण्ड भरी लगती थी। यह नित्य की बात होती। मैं विवश था, बढ़ जाता आगे उसके बारे में/ भविष्य के बारे में सोचते हुए।

आगे एक मैदान पड़ता था जहाँ पर इलाके के लड़के दिन भर क्रिकेट खेला करते थे उसके आगे छोटे-छोटे मिट्टी के टीले पड़ते थे। सुबह-सुबह वहीं दिखते मुझे कुछ बच्चे गोलियां, गिल्ली-डंडा खेलते हुए। उनमें से कुछ तो बहुत ही छोटे थे मगर जब उनके मुंह से देसी गालियों की बौछार निकलती तो आश्चर्य होता मुझे। क्या गर्भ में ही सबकुछ सीख गये। चाहे उनका अर्थ भी न जान पाते हों मगर....|

कैसी ऊर्जा ! यह ऊर्जा का अपव्यय ही तो है, अगर यही ऊर्जा कहीं और खर्च हो। इस बात पर मुझे अपने बचपन की एक बात याद आ गयी कि कैसे हम सब बातों-बातों में ही टी-ली-ली-टी-ली-ली कह एक दूसरे को चिढ़ाते थे। पल में आपस में नाराज़ हो जाते और अलग-अलग गुट बना लेते और आपस में गुस्से से कहते- ‘अट्टी-बट्टी सात जलम की कुट्टी !’

दुनियादारी से अनभिज्ञ बचपन की तोतली बातें जब हाथ के अंगूठे को दाढ़ी से छुआकर सभी क्रम से यह कहते जाते। लेकिन कभी भी हम और हमारे दोस्तों के बीच होने वाला आपस का झगड़ा स्थायी न रहा। पल भर में ही सब शांत हो जाते और एक दूसरे के गले लग जाते जैसे कोई बात ही न हुई हो। क्या मज़े के दिन थे ! कोई चिंता नहीं, और आज हमारे बचपन इस स्थिति में- उफ़ ! कैसा परिवर्तन !! यह वातावरण का प्रभाव था। पारिवारिक पृष्ठभूमि व परिस्थितियों का असर। इन्हें अनदेखाकर हम कैसे कल्पना करें एक विकसित राष्ट्र की, सम्पूर्ण शिक्षित समाज की ?

मैं उलटे पाँव लौट पड़ा। सहसा बांसों के झुरमुट के नीचे मैंने उसी लड़की को खड़े देखा। वह कुछ परेशान सी लग रही थी। मैंने उससे पूछा, ‘क्या बात है ?’

‘कुछ नहीं’

‘अरे बताओ तो’

‘वो....वो मारता है, परेशान करता है’

‘अरे कौन?’, मैं झुंझला गया।

वह सहमी थी, बोली- ‘वही जिसके घर के सामने हम रहते हैं।’

मुझे सहानुभूति हो आयी। उसकी तरफ से मैं तिवारी जी के घर पहुंचा जिनके घर के ठीक सामने एक झोपड़ी टाइप मकान में उसका परिवार रहा करता था। तिवारी जी से मेरा हल्का-फुल्का परिचय था सो किसी तरह मामला सुलझाने का प्रयास किया। वैसे कोई ख़ास बात भी नहीं थी। तिवारी जी की पत्नी साहिबा गंदगी से परेशान थीं। वह चिल्लाकर मुझसे कहने लगीं- ‘इनके चक्कर में मेरे बच्चे भी बरबाद हो गये। बड़े म्लेच्छ हैं ! उफ़ ! कहाँ फंस गयी मैं।’ आदि-आदि।

मैंने उनके बजाय तिवारी जी को समझाना ज्यादा उचित समझा।

‘कहाँ आप भी, अरे कोई स्थायी निवास तो बना नहीं रहे। अगर हम भी इनकी तरह लड़ने-झगड़ने लगे तो हममे और इनमें क्या फर्क रहा।' मेरा इतना कहना था कि तिवारी जी मेरे ऊपर ही भड़ास निकालने लगे। मुझे उनसे ऐसी आशा न थी। अपने मन का सारा गुबार मुझ पर निकाल तिवारी जी शांत हो गये। मैं चुपचाप सुनता रहा। चुप रहा, केवल उसकी खातिर। एक असहाय परिवार कि रक्षा में मुझे गुरुता महसूस हो रही थी। जाते-जाते मैंने तिवारी से ठन्डे दिमाग से सोचने के लिये कह दिया था।

इसी तरह एक दिन मैं अपने मित्र डॉ. श्रीवास्तव के क्लिनिक पर बैठा था कि तभी वह आई। वह अपनी गोद में 2-3 साल का एक लड़का लिये हुई थी जो कि शायद उसका छोटा भाई था। उसने बताया कि उसके भाई को बहुत तेज बुखार है। डॉ. साहब बातें छोड़ पहले उसे देखने लगे। बच्चे का शरीर बुखार से तप रहा था डॉक्टर साहब ने अपने पास से कुछ दवाइयां दी तथा कुछ दवाइयां बाहर से लिख दीं। उन्होंने उसे एक इंजेक्शन भी लगाया। बच्चा दर्द से कराह उठा। मैं सहानुभूति और शांत भाव से सब देखता रहा, विचार पुनः उमड़ने-घुमड़ने लगे। डॉ. श्रीवास्तव ने उसे दवाइयों की पर्ची थमायी। वह मेरी तरफ देखने लगी, किसी आशा भरी दृष्टि से। मैं समझ गया, फिर भी औपचारिकतावश पूछा- 'क्या पैसे नहीं हैं ?'

उसने न में सिर हिलाया। मैंने फिर पूछा, 'कुछ खाया है तुमने ?'

उसका सिर फिर हिला। उसके चेहरे पर मुर्दगी छाई थी। मैं हिल गया। डॉ. साहब भी द्रवित हो गये। मैंने सौ का नोट निकाल उसे दे दिया। वह कृतज्ञता भरी कातर दृष्टि से मुझे टुकुर-टुकुर ताकती रही। डॉ. श्रीवास्तव ने भी उससे फीस न ली। उसके चले जाने पर मैंने उन्हें पूरी बात बताई।

इस तरह की अनेकों घटनाएं मेरे साथ अक्सर हुआ करतीं।

यह सब होते हुए जब मैं भविष्य के भारत की कल्पना करता तो सिहर उठता। क्रूर मज़ाक ही तो है यह, एक छलावा नकारात्मक के प्रति सकारात्मक का...दीन-दुनिया से बेखबर मैं कुछ ज्यादा ही सोच डालता। शायद अपनी अंतर्मुखी प्रवृत्ति के कारण ही। फिर मैं इन सब बातों की चर्चा करता भी तो किससे, क्या फायदा मिलता ? कोरी गप्प समझते सब, हँसते मुझ पर और मेरी बातों पर कि बड़ा आया समाजसुधारक बनने। इसके आगे कुछ होता तो भी सोचता। सामाजिक विषमता कि यही कड़ी भारत के विकास और अखंडता के लिये घातक है। यहाँ व्यक्ति अपने सुख को सुख तो समझता है परन्तु दूसरे के दुःख को दुःख नहीं। हम मनुष्यों का दिशाबोध ही गलत है ऐसे जाने कैसे-कैसे विचार मेरे मन-मस्तिष्क को झकझोर रहे थे, जैसे किसी को इनकी परवाह ही नहीं !

एक दिन मैंने उससे पुनः बात की, कोशिश की उसके अंतर्मन में झाँकने की लेकिन आज वह कुछ न बोली। हरियाली के नीचे छिपी दिखी मुझे उसकी मुरझाई काया, कहीं तबियत.....कड़ी मेहनत, कुपोषण....सबकुछ संभव है..या कोई और बात। मैं ठहर गया। कहीं ऐसा न हो कि बचपन हरियाली के नीचे सदा के लिये दब जाए। वह धीरे-धीरे चली गयी। मुझे उस दिन बड़ा कष्ट हुआ। मैंने दृढ़ निश्चय कर लिया कि मुझे कुछ करना है इन सबकी दशा सुधारने के लिये। चाहे जो भी हो जाए, मैं करूंगा प्रयास दूंगा एक नयी दिशा। इनके बचपन में भी बचपन की खुशियाँ होगीं। वास्तविक ख़ुशी, सच्ची ख़ुशी !

इसके बाद कुछ दिनों तक वह मुझे नज़र न आयी। मैं बेचैन हो गया। आखिर क्या हुआ उसे ? पता लगा कि वे लोग मजदूरी करने कहीं बाहर चले गये। मेरी आँखों के सामने उसका वही चित्र आ गया। उसी मेहनती छोटी लड़की का जो चुपचाप अपने काम में मग्न रहती। सोचती कुछ-करती कुछ थमती घास, बढ़ती उम्र। अब वह न जाने कहाँ और कैसी हो। क्या होगा उसका भविष्य ? ईश्वर सब ठीक करे !

आज जब भी उस रास्ते से निकलता हूँ तो सहज ही उसकी याद आ जाती है। मैंने उसका नाम तो आज तक नहीं पूछा मगर.....न जाने कैसा लगाव था यह !

मुझे महसूस होता- असहाय, उत्पीड़ित बचपन में जीना कितना दुष्कर है। निकटता से सब देखा था मैंने। वह अभावों में पली थी। कभी-कभी दिखती मुझे उसकी धुंधली आकृति, धुंधला आभास मानो छिपाए हो अपने आंचल में कोई रहस्य और फिर वह अचानक हरियाली बचपन के साए में कहीं खो जाती। मैं ढूंढता रहता उसको इधर-उधर, निरुद्देश्य सोचता रहता हरियाली बचपन के बारे में। निरंतर ऐसे प्रश्नों की बौछार मेरे मानस अभिमन्यु को प्रताड़ित करती रहती। इतने विशाल महाभारत का अंतिम परिणाम क्या रहा ?

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संक्षिप्त परिचय

राहुल देव

जन्म – 20/03/1988

शिक्षा - एम.ए. (अर्थशास्त्र), बी.एड.

साहित्य अध्ययन, लेखन, भ्रमण में रूचि | एक कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह तथा एक बाल उपन्यास प्रकाशित | पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतरजाल मंचों पर कवितायें/ लेख/ कहानियां/ समीक्षाएं आदि का प्रकाशन | साहित्यिक वार्षिकी ‘संवेदन’ के दो अंकों का संपादन | त्रैमासिक पत्रिका ‘इंदु संचेतना’ का सहसंपादन | ई-पत्रिका ‘स्पर्श’ (samvedan-sparsh.blogspot.in) का संचालन | ‘जलेस’ से जुड़ाव |

सम्प्रति - स्वतंत्र लेखन एवं अध्यापन |

संपर्क सूत्र- 9/48 साहित्य सदन, कोतवाली मार्ग, महमूदाबाद (अवध), सीतापुर, उ.प्र. 261203

मो.– 09454112975

ईमेल- rahuldev.bly@gmail.com

नाम

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नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद 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मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड 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रचनाकार: हरियाली बचपन / कहानी / राहुल देव
हरियाली बचपन / कहानी / राहुल देव
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