प्राची - अगस्त 2016 - मर्द अभी जिन्दा है / कहानी / तेजेन्द्र शर्मा

SHARE:

कहानी तेजेन्द्र शर्मा के लेखन पर उपलब्ध पुस्तकें 1. तेजेन्द्र शर्मा- वक्त के आइने में (संपादकः हरि भटनागर), 2. रचना समय- तेजेन्द्र शर्मा ...

image

कहानी

तेजेन्द्र शर्मा के लेखन पर उपलब्ध पुस्तकें

1. तेजेन्द्र शर्मा- वक्त के आइने में (संपादकः हरि भटनागर), 2. रचना समय- तेजेन्द्र शर्मा विशेषांक (संपादकः हरि भटनागर), 3. बातें (तेजेन्द्र शर्मा के साक्षात्कार)- संपादकः मधु अरोड़ा 4. हिन्दी की वैश्विक कहानी (संदर्भ तेजेन्द्र शर्मा का रचना संसार)- संपादकः नीना पाल. 5. कथा त्रिकोण- संपादक श्रीनिवास श्रीकान्त (एस.आर हरनोट, मनीषा कुलश्रेष्ठ एवं तेजेन्द्र शर्मा का लेखन संसार)

कहानी ‘अभिशप्त’ चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के एम.ए. हिन्दी के पाठ्यक्रम में शामिल और कहानी ‘पासपोर्ट का रंग’ गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, नोयडा के एम.ए. हिन्दी के पाठ्यक्रम में शामिल.

दूरदर्शन में निरंतर प्रसारण. अनेकों सम्मानों से सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकार.

नामः तेजेन्द्र शर्मा

जन्मः 21 अक्टूबर, 1952 को पंजाब के शहर जगरांव में

शिक्षाः दिल्ली विश्वविद्यालय से बी.ए. (आनर्स) अंग्रेजी एवं एम.ए. अंग्रेजी, कम्प्यूटर कार्य में डिप्लोमा

संप्रतिः लंदन के ओवरग्राउण्ड रेल्वे में कार्यरत

प्रकाशित कृतियांः

काला सागर (वाणी प्रकाशन-1990) ढिबरी टाईट (वाणी प्रकाशन-1994), देह की कीमत (वाणी प्रकाशन-1999) यह क्या हो गया! (डायमण्ड बुक्स-2003), बेघर आंखें (अरू प्रकाशन-2007), सीधी रेखा की परतें (वाणी प्रकाशन-2009- तेजेन्द्र शर्मा की समग्र कहानियां भाग-1), कब्र का मुनाफा (सामयिक प्रकाशन-2010), दीवार में रास्ता (वाणी प्रकाशन-2012), मेरी प्रिय कथाएं (ज्योतिपर्व-2014), प्रतिनिधि कहानियां (किताबघर-2014) सभी कहानी संग्रह. ये घर तुम्हारा है (मेधा बुक्स-2007 -कविता एवं गजल संग्रह).

1- Black & White – the Biography of a Banker (2007)

2- John Keats & TheTwo Hyperions (1978)

3- Lord Byron & Don Juan (1977)

अन्य लेखनः दूरदर्शन के लिए ‘शांति’ सीरियल का लेखन.

अनूदित कृतियांः Grave Profits(अंग्रेजी-कहानियां), Building Bridges ( Bilingual Poems) ढिबरी टाइट, एवं कल फेर आंवीं नाम से पंजाबी, इँटों का जंगल नाम से उर्दू तथा पासपोर्ट का रंगहरू नाम से नेपाली में भी उनकी अनूदित कहानियों के संग्रह प्रकाशित हुए हैं. तेजेन्द्र शर्मा की कहानियां उड़िया, मराठी, गुजराती, चेक भाषा एवं अंग्रेजी में भी अनूदित हो चुकी हैं.

मर्द अभी जिन्दा है

तेजेन्द्र शर्मा

ल शुक्रवार है...

उसे नींद नहीं आ रही है. बार बार करवटें बदलता है...परेशान है. उसे कल मैटिनी शो में एक फिल्म देखनी है- दबंग-2...उसे एक दुःस्वप्न का सा अहसास हो रहा है. कल के तीन घण्टे बेकार हो जाएंगे...भला ऐसी फिल्मों की समीक्षा करने का औचित्य क्या है?

उसकी छठीं इंद्रिय उसे बता रही है कि यह फिल्म भी सौ करोड़ से अधिक का बिजनेस करने वाली है. पहली दबंग तो सुपर हिट फिल्म थी ही...मुन्नी बदनाम हो गई थी...बाद में अन्य बड़े सितारों की फिल्में उनका इंस्पेक्टर रूप ले कर बनाई गईं और सबकी सब सुपर-हिट हो गईं. भला यह क्यों पीछे रहेगी? उसकी समस्या दूसरी है...उसे यह फिल्म न केवल देखनी है बल्कि उसकी समीक्षा भी करनी है...वह एक राष्ट्रीय समाचार पत्र में फिल्मों की समीक्षा लिखता है.

उसके मित्र हमेशा उससे ईर्ष्या करते हैं. आलोक तो कह भी देता है, ‘गुरू, तुम्हारे मजे हैं. हर फिल्म पहला दिन और पहला शो देखने को मिलता है. हम साले ब्लैक में टिकट लेने के लिए झक मारते फिरते हैं, और तुम हो कि सप्ताह में दो-दो फिल्में देखते हो और उस पर तुर्रा यह कि जब चाहो जिसकी चाहो पैण्ट उतार दो. मियां ऐश है तुम्हारी.’ वह आज तक अपनी बात अपने मित्रों को समझा नहीं पाया. भला मित्रों को यह बात समझ में आती भी तो कैसे कि जब वह फिल्म देखता है तो वह अपना मनोरंजन नहीं कर रहा होता. उसके लिये फिल्म देखना भी एक काम है...जैसे कि रेल का इंजिन चलाना या फिर वकालत करना. जब कोई भी व्यवसाय रोजी रोटी का धन्धा बन जाता है तो उसका आकर्षण समाप्त हो जाता है.

वह चाहता है कि केवल बेहतरीन फिल्में ही देखे. मगर उसके बॉस की सोच एकदम साफ है, ‘ बंधुवर, फिल्म समीक्षक को ना काहू से दोस्ती और ना काहू से बैर वाली नीति अपनानी होती है. उसे पूर्वाग्रहों से बचना होता है. बिना फिल्म देखे आप कैसे तय कर लेंगे कि कौन सी फिल्म अच्छी है और कौन सी बुरी.’

वह अपने बॉस की बात समझता है. मगर वही बॉस जब कहता है, ‘सुनिये मालिक, आज जो फिल्म देखने जा रहे हैं, उसकी हीरोइन मेरी खास दोस्त है. जरा दो लाइनें उसकी भूमिका के बारे में जरूर लिख दीजिएगा.’ वह हैरान भी होता है और परेशान भी.

फिल्मों को लेकर उसकी सोच बहुत साफ है. उसे वे फिल्में अच्छी लगती हैं जिनमें मजबूत कहानी, अच्छी पटकथा और संवाद, बढ़िया अभिनय और संवेदनशील प्रस्तुति हो. उसकी समीक्षा में पहला सवाल यही होता है कि आखिर यह फिल्म बनाई क्यों गई.

उसने अपने एक लेख में अपने पसन्दीदा फिल्मों एवं फिल्मकारों का जिक्र किया था,- ब्लैक एण्ड व्हाइट फिल्मों के राजकपूर, गुरुदत्त, बिमल राय, महबूब खान, बी. आर. चोपड़ा, हृषिकेश मुखर्जी, बासु चटर्जी वगैरह उसके प्रिय फिल्म निर्माता थे.

वैसे उसकी पसन्दीदा फिल्मों में मुगले आजम भी शामिल है. उसे सहज अदाकारी अधिक प्रभावित करती है. अभिनय में नाटकीयता का वह कायल नहीं है. हाल ही में उसने आमिर खान के अभिनय की अपनी समीक्षाओं में बहुत प्रशंसा की है. उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण है फिल्म का उद्देश्य.

उसे न तो मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहरा-नुमा फिल्में पसन्द आती हैं और न ही तथाकथित आर्ट फिल्में. उसका तर्क एक ही होता है कि सिनेमा एक पब्लिक मीडिया है. यदि हम श्रोताओं तक नहीं पहुंच सकते तो हमें पैसे जलाने का कोई हक नहीं. 27 डाउन, उसकी रोटी जैसी फिल्मों की वह जम कर खिंचाई करता. हमेशा से ही उसका प्रिय वाक्य रहा है- राजकपूर जब चाहे सत्यजीत राय जैसी फिल्म बना सकता है...उसमें बूट पालिश और जागते रहो जैसी फिल्में बनाने की कूबत है. मगर सत्यजीत राय तीन जन्म लेकर भी संगम जैसी फिल्म नहीं बना सकता. उसे मुख्यधारा का सिनेमा अच्छा लगता है और वह जमकर उस पर लिखता भी है. किन्तु मुख्यधारा का भी वही सिनेमा उसे भाता है जिसे समझदारी से बनाया गया हो.

उसका चेहरा देख कर पत्नी को भी पता चल गया था कि कल देखी जाने वाली फिल्म राज के मन-मुताबिक नहीं है. आमतौर पर उसकी पीने की आदत से परेशान पत्नी ने स्वयं ही अण्डे उबलने के लिये चढ़ा दिये और सोडे की दो बोतलें फ्रिज में ठण्डी होने के लिये रख दीं. सलाद की प्लेट सजाने लगी है. उसका पति व्हिस्की के अलावा कोई और मादक पेय नहीं लेता. और व्हिस्की भी केवल रायल चैलेंज...बहुत प्यार से बस एक ही वाक्य बोलता है, ‘आरती, गैट मी सम आर.सी.’ और आरती नकली गुस्सा नाक पर बिठा कर आर.सी. का पैग बनाने लगती.

राज का दोस्त रूबीन भी आर.सी. का ही शौकीन है. मजेदार बात यह है कि काम भी वही करता है जो कि राज, मगर दोनों में बहुत अन्तर है. रूबीन एक अंग्रेजी समाचार पत्र के लिए फिल्म समीक्षक है तो राज वही काम हिन्दी में करता है. मगर क्या यह बस थोड़ा सा ही अन्तर है...दरअसल यही तो उनके पूरे व्यक्तित्व, पूरी सोच और सपूर्ण जीवन की परिभाषा थी. रूबीन अपनी पत्नी, और दो बच्चों को अपनी मारुति स्विफ्ट कार में शान से बिठाता था तो राज अपनी पुरानी आल्टो की तरह चिड़चिड़ा सा रहता था.

रूबीन का रुतबा था, शान थी और उसकी लिखी समीक्षाओं की बड़े पैमाने पर चर्चा भी होती. एन.डी.टी.वी., टाइम्स चैनल, ए.बी.एन. सभी फिल्मों पर बातचीत करने के लिये उसे ही आमंत्रित करते. उसमें एक अलग सी अदा भी थी. मगर रूबीन स्वयं राज की फिल्मी जानकारी और समझ का कायल था. दोनों अधिकतर शाम साथ ही बिताते- या तो किसी पार्टी में, वर्ना घर पर इकट्ठे आर.सी. के जाम के साथ. मजेदार बात यह कि बाहर पार्टी में स्कॉच पीने वाले ये फिल्मी पत्रकार एक दूसरे के घर में जमीन पर गद्दे लगा कर बेतकल्लुफी से आर.सी. के साथ न्याय करते.

कई बार रूबीन राज से पंगे भी लेता रहता, ‘यार जो बात साहिर और शकील में है, वह किसी और फिल्मी शायर में नहीं.’

‘देखो रूबीन, फिल्मों में शायरी के लिये कोई स्थान नहीं है. फिल्मों को चाहिये लिरिक्स यानी कि गीत. और शैलेन्द्र से बड़ा गीतकार आज तक न तो कभी हुआ है और न ही होगा.’

‘अरे छोड़ो यार, शैलेन्द्र को सुनकर लगता है कि बस पूरी जिन्दगी एक फलसफा है. शकील में रोमान्स है और साहिर की गहराई का तो मुकाबला ही नहीं है.’

‘अरे शैलेन्द्र जैसा रोमान्टिक तो कोई हो ही नहीं सकता, राजहठ फिल्म का गीत कभी सुना है?’

‘यार देखो अब तुम गाने मत लगना...’ और साथ ही शुरू भी हो गया, ‘एक यूं ही सी नजर दिल को जो छू लेती है, कितने अरमान जगाती है तुम्हें क्या मालूम...’

‘यार रूबीन, इतना बेसुरा मत गाओ कि साहिर की आत्मा ही आत्म-हत्या कर ले. मैं शैलेन्द्र के गीत गाता हूं मगर कम से कम सुर में तो रहता हूं...तुम जब कहते हो कि अरमान जगाती हैं...लगता है कि कह रहे हो कि मां जगाती हैं....’

हंसी उछल कर पूर कमरे को भर देती है. एक मजेदार बात यह है कि राज और रूबीन रोज शराब पीते हैं, मगर दोनों को कभी किसी ने नशे की हालत में नहीं देखा. रूबीन पीने के बाद मजेदार चुटकुले सुनाता है तो राज एकदम चुप हो जाता है. कभी कभी तो जैसे ही दोनों में से एक को कोई नया चुटकुला सुनने को मिलता है तो एक पल की भी प्रतीक्षा नहीं कर पाते. बस जल्दी से दूसरे को फोन करते हैं और जब तक चुटकुला सुना नहीं लेते...चैन की सांस नहीं लेते.

‘राज, राऊडी राठौर पर तुम्हारी समीक्षा की खासी चर्चा हो रही है. भला तुमने फिल्म को निकृष्ट क्यों लिखा?.. ऐसे भला कोई किसी फिल्म को माइनस रेटिंग देता है कभी?’

‘अबे यार यह भी साली कोई फिल्म थी. अब देखो, दबंग जैसी वाहियात फिल्म चल गई तो अजय के अन्दर कीड़ा कुलबुलाया और सिंघम बनवा ली, फिर भला अक्षय क्यों पीछे रह जाता उसने सोचा होगा भाई मैं गंगा में हाथ धोने से क्यों पीछे रह जाऊं. इतना भी कोई नहीं सोचता कि श्रोताओं की बेहूदगी सहने की भी कोई सीमा होगी. उधर वो सिंह इज किंग क्या चल निकली कि अक्षय को लगता है कि वो कैसी भी बेहूदा फिल्म में काम कर ले. फिल्म तो चल ही जाएगी...मैंने तो सुना है कि आमिर खान भी पुलिसवाला बन कर एक फिल्म में आ रहा है...शायद तलाश! अब पता नहीं उसे किस बात की तलाश है...’

‘देखो राज, एक बात याद रखो. फिल्मों को बेकार कहने के बहुत से तरीके होते हैं, जैसे कि साहित्य में. तुम्हें किसी की कहानी की भाषा बहुत साधारण लगी तो यूं भी कह सकते हो कि ‘इन कहानियों की भाषा बहुत साधारण है.’ और यह भी कह सकते हो कि ‘फलां फलां लेखक को अपनी कहानियों के लिये किसी विशेष भाषा की आवश्यकता नहीं पड़ती. साधारण शब्दों से ही अपनी बात पहुंचा देते हैं.’ मेरे भाई, सिनेमा भी तो साहित्य का एक्सटेंशन ही है न.’

‘अपनी अपनी सोच होती है रूबीन. मुझे लगता है कि हमारे प्रोफेशन में साफगोई की बहुत जरूरत है. हमारा काम है जनता को सही दिशा दिखाना. अच्छे और बुरे सिनेमा का अन्तर समझाना.’

‘गुरू, तुम अपने काम को इतना सीरियसली मत लो. मेरे यार...नौकरी है तुम्हारी. फिर तुम्हारा परिवार है, बीवी बच्चे हैं. हर वक्त तनाव में रहोगे तो ब्लड प्रेशर बढ़ा लोगे...अरे जब लोगों को प्रकाश मेहरा और मनमोहन देसाई की फिल्में पसन्द हैं तो तुम क्यों उन्हें सत्यजीत राय या श्याम बेनेगल परोसने के चक्कर में हो.’

‘मैं ऐसा नहीं करता रूबीन. मुझे खुद वो सिनेमा अच्छा नहीं लगता जिसे देखने के बाद किसी पाठ्य पुस्तक को पढ़ कर उसकी व्याख्या करनी पड़े. मुझे भी वही सिनेमा पसन्द है जो कम्यूनिकेट करता हो. मैं आर्ट फार आर्ट्स सेक को नहीं मानता. मगर कुछ तो स्तर होना ही चाहिये ना...!’

कहने को तो राज कह जाता है मगर फिर अभय की तरफ देखता है. अभय भी तो उसी की तरह हिन्दी में फिल्मों की समीक्षा करता है. मगर उसे टीवी चैनल वाले भी बातचीत के लिये बुलाते हैं. बस उसने बेतरतीब से बाल रखे हैं, सफेद दाढ़ी बढ़ा रखी है. एक इंटेलेक्चुअल सा लुक बना रखा है. गैंग्स ऑफ वसेपुर जैसी फिल्म बनाने वालों के साथ मंच साझा कर लेता है और अक्षय कुमार का इंटरव्यू भी उसी आसानी से कर लेता है. फिर उसने देखा है कि अभय किसी की आलोचना नहीं करता...कैसे कर पाता है यह सब. क्या उसके भीतर का सच्चा कलाकार कहीं दम तोड़ चुका है?...कैसे चवन्नी छाप फिल्मों के बारे में भी आसानी से तारीफें लिख देता है. उसकी समीक्षाएं आलोचना नहीं होतीं...केवल सूचनाएं होती हैं.

वैसे राज कभी कभी सोचता है कि क्यों उसका बास उसे कभी किसी बड़े स्टार का इंटरव्यू करने के लिये नहीं कहता. जानना तो चाहता है कि क्यों हर ऐसा कार्य गीता के पल्ले पड़ जाता है. पहले पहले सोचता था कि गीता लड़की है. शायद अखबार की इमेज बनती होगी...मगर पूछने की हिम्मत नहीं कर पाता...वैसे तो कड़वा आदमी बहुत हिम्मती होता है...पंजाबी बन्दा है. शायद सोचता ‘सान्नूं की जी...असी की लैणा है...करण दयो ऐश.’

उसकी दशा भी कभी-कभी ठेठ हिन्दी के साहित्यिक लेखक जैसी हो जाती है. वह चाहता है कि उसे बड़े बड़े स्टार पहचानें मगर इसके लिये कोई मेहनत करने को तैयार नहीं. कुछ दोगला सा भी हो जाता है. मानना नहीं चाहता कि उसे बड़े स्टारों से मिलने की चाह है. उसका पुत्र और पुत्री उससे कह भी चुके हैं कि उन्हें शाहरुख खान से मिलना है. ‘पापा आप भी तो फिल्मों में काम करते हैं. मिलवाइये न कभी...स्टारडस्ट में आपकी फोटो भी छपी थी शाहरुख के साथ. फिर आप मिलवाते क्यों नहीं?’

पत्नी अपने पति की मनोदशा से वाकिफ है. कभी व्यंग्य नहीं करती. बस स्थिति को समझ लेती है. उससे जब कभी कोई पूछता है कि पति क्या करते हैं, तो शालीनता से कह देती है कि पत्रकार हैं.

शुरू शुरू में तो वह भी बहुत उत्साहित हो कर पूछ लेती थी, ‘क्यों जी प्रीमियर देखने के पास हमें नहीं मिल सकते क्या? अभय और उसकी पत्नी तो हर फिल्म का प्रीमियर देखते हैं...फिर आपको पास क्यों नहीं मिलता...’

मगर पति को जैसे जैसे जानती गई, ऐसे प्रश्न पृष्ठभूमि में जाते गये. बैंक में नौकरी करती है पत्नी, बस उसी में खुश है. राज न तो उसके बैंक के बारे में कोई बातचीत करता है और न ही अपने दुःख उससे बांटता है. यह सच है कि एक कुंठा उसके भीतर घर करती जा रही है.

पत्नी ने कई बार सलाह भी दी है कि अपना डिपार्टमेण्ट बदलवा ले. मगर राज का एक ही जवाब होता है...‘हार कर शेर घास नहीं खाने लगता...मैं जानता हूं कि मैं सच्चा हूं...अपना संघर्ष जारी रखूंगा...अगर इस जंगल में अकेला हूं तो भी घबराऊंगा नहीं...

‘मैं जब गांव से इस शहर में आया था तो बस एक सूटकेस था और एक हजार रुपये...आज इस शहर में एक छोटा सा घर अपना है...पत्नी है, पुत्र है, पुत्री है.. कार छोटी ही सही काम तो चला रही है...मुझे क्या फर्क पड़ता है कि अभय और रूबीन किस तरह बड़े फिल्म समीक्षक बने हैं. मैं सच लिखना बन्द नहीं करूंगा. दुनिया को मानना पड़ेगा कि ऐसी घटिया फिल्में घटिया ही कहलाएंगी चाहे दो सौ करोड़ से ऊपर का बिजनेस कर लें. इस हिजड़ों की जमात में एक मर्द अभी बाकी है...मैं डरूंगा नहीं...मुझे नहीं चाहिये बड़े सितारों की पार्टियों का निमन्त्रण पत्र...मैं वही लिखूंगा जो महसूस करता हूं...’

राज ने गहरी सांस ली और गिलास में बची रायल चैलेंज का एक लम्बा सा घूंट भर गिलास खाली कर दिया...

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: प्राची - अगस्त 2016 - मर्द अभी जिन्दा है / कहानी / तेजेन्द्र शर्मा
प्राची - अगस्त 2016 - मर्द अभी जिन्दा है / कहानी / तेजेन्द्र शर्मा
https://lh3.googleusercontent.com/-nsDrwP0p4Ms/V71IoOfc-YI/AAAAAAAAvp8/cfDWRueQXNI/image_thumb%25255B2%25255D.png?imgmax=800
https://lh3.googleusercontent.com/-nsDrwP0p4Ms/V71IoOfc-YI/AAAAAAAAvp8/cfDWRueQXNI/s72-c/image_thumb%25255B2%25255D.png?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2016/08/2016_10.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2016/08/2016_10.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content