प्राइमरी स्कूल ख़ामोश हैं ! - शालिनी तिवारी

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प्राइमरी स्कूल ख़ामोश हैं ! दास्तान: आज भारत के अधिकतर क्षेत्रों में निःस्वार्थ भाव से समाज को प्राथमिक शिक्षा बाँटता हुआ प्राइमरी स्क...

प्राइमरी स्कूल ख़ामोश हैं !


दास्तान:
आज भारत के अधिकतर क्षेत्रों में निःस्वार्थ भाव से समाज को प्राथमिक शिक्षा बाँटता हुआ प्राइमरी स्कूल गाँवों, कस्बों या शहरों के एक कोने में तन्हा दिखाई दे रहा है. कई दशक पुराना प्राइमरी स्कूल गाँव में बसा होने के बावजूद गाँव से ही अलग-थलग पड़कर अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहा है. स्कूल पल हरपल टकटकी लगाए विद्यार्थियों का इंतजार कर रहा है. परन्तु आज के बदलते मंजर ने उसके नेक इरादों पर पानी फेर दिया है. जी हाँ, सचमुच प्राइमरी स्कूल अपनी किस्मत कोसता हुआ बद्हाली की मर्म कहानी सुना रहा है. मगर आज की आपाधापी भरी जिन्दगी में भला किसके पास इतना वक्त है कि वह उसके करीब जाकर उसकी ख़बर ले, ख़ामोशी की वजह पूछे और दशकों पहले दिए हुए अतुलनीय योगदान की सराहना करे, यानी उसके वजूद को याद करे. यह वही प्राइमरी स्कूल है जिसने बीते समय में समाज को वैज्ञानिक, क्रान्तिकारी, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रशासक और राजनीतिज्ञ तक सौपें हैं.

बेहाली का हाल:
बद्हाली का आलम यह है कि आज प्राइमरी स्कूल शिक्षकों की कमी, मिड़ ड़े मील की अव्यवस्था, बच्चों की गिरती संख्या, सरकारी गैर-जमीनी नीतियाँ और खास तौर पर शासन सत्ता एवं समाज के गैर जिम्मेदाराना रवैया की वजह से मायूस हैं. जमीनी हकीकत तो यह है कि प्राइमरी स्कूलों में कहीं बच्चे हैं तो मूलभूत सुविधाएँ नहीं, कहीं सुविधाएँ है तो बच्चे नहीं. जनता की नुमाइंदगी करने सत्ता के गलियारे तक पहुँचें अधिकतर नेता , ऊँचे ओहदेदार अधिकारी एक बार ओहदा हथियानें के बाद पीछे मुड़कर देखते तक भी नही, बस यें सब लोक लुभावनीं नीतियाँ बनाने में मशगूल रहते हैं और इनका इससे दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं रहता कि ये नीतियाँ जमीनी स्तर पर कैसे उतारी जाए कि जरूरतमंद लोगों को लाभ मिले. समय के साथ साथ नीतियाँ बनती हैं, चलती हैं और अन्ततः दफ्तरों की फाइलों में ठीक ठाक ढ़ंग से सुपुर्द भी हो जाती है. चुनाव आने पर सरकार अपनी पीठ थप-थपाकर इनका श्रेय भी लेती है.

सार्थक परिणाम से कोसों दूर नीतियाँ :
विशेष गौरतलब है कि आजादी के दशकों बीत जानें के बाद भी आज शिक्षा और उसकी गुणवत्ता का हाल बेहाल है. संविधान के अनुच्छेद-45 में राज्य नीति निर्देशक तत्वों के अन्तर्गत यह व्यवस्था बनाई गई थी कि संविधान को अंगीकृत करके 10 वर्षों के अन्दर 6-14 वर्ष के सभी बालक/बालिकाओं के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था की जाएगी. किन्तु कई दशक गुजर जाने के बाद भी इस लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सका. सरकार द्वारा प्रारम्भिक शिक्षा को लेकर प्रत्येक पंचवर्षीय में अहम फैसले लिए जाते है. वर्तमान में कक्षा 1 से 8 तक सभी बालक/बालिकाओं के लिए निःशुल्क पाठ्य- पुस्तक , मध्यान्ह पोषाहार और छात्रवृत्ति की अधिकाधिक व्यवस्था है. विद्यालय को लेकर तरह तरह के अन्य मानक भी बनाए गए है. प्राथमिक विद्यालय की स्थापना हेतु तकरीबन 1 किमी तथा उच्च प्राथमिक विद्यालय की स्थापना हेतु 2 किमी की अनुमानित दूरी निर्धारित की गयी है. इतना ही नहीं, सरकार का करोड़ों का बजट प्रतिवर्ष प्राथमिक शिक्षा हेतु व्यय किया जाता है. फिर भी आज ऐसी हालत क्यूँ ..... ??

सोचने वाली बात:
जरा गौर कीजिए, आज से 50 वर्ष पूर्व समाज के अधिकतर लोग इन्हीं प्राइमरी स्कूलों में पढ़ते थे, आगे बढ़ते थे और अलग अलग क्षेत्रों में पहुँचकर परिवार एवं समाज का नाम रोशन करते थे. स्कूल आज भी वही हैं, इनमें पढ़ाने वाले शिक्षकों के चयन का मानक शायद तब से आज कहीं ज्यादा बेहतर है, मूलभूत सुविधाएँ अधिक है, प्राथमिक विद्यालय की सँख्या तब से कई गुना आज ज्यादा है. यहाँ तक कि आज तकरीबन प्रत्येक कस्बों में प्राइमरी स्कूल मिल ही जाएगें. परन्तु अहम सवाल यह है कि इतना सब कुछ होने के बावजूद भी प्राइमरी स्कूलों की हालत दिन प्रतिदिन क्यूँ बिगड़ती जा रही है...?

एक अहम कारण यह भी:
मुख्य बात यह है कि आज के कुछ दशक पहले समाज के अधिकतर लोग इन्हीं प्राइमरी स्कूलों में पढ़ते थे. जहाँ से छात्र अपनी अपनी बुद्धिमत्ता के अनुसार अलग अलग क्षेत्रों में सफल भी होते थे. परन्तु आज समाज का अधिकतर बच्चा प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा ग्रहण कर रहा है , इसके विपरीत कुछ गिने चुने सामाजिक दबे कुचले गरीब लोगों के ही बच्चे आज प्राइमरी स्कूलों में आ रहे हैं. यकीनन हम यह कह सकते हैं कि प्राइमरी स्कूलों के अभिभावकों का अधिकांश तबका गैर-जागरूकता के साथ साथ गरीबी और भुखमरी से जूझ रहा है. यह तो वही बात हो गयी कि किसी को पूर्णतय: मक्खन निकाला हुआ दूध दिया जाए और कहा जाए कि अब तुम इससे मक्खन निकालों. आज के प्राइमरी स्कूलों की हालत यही है. पहले प्राइमरी स्कूलों में शुद्ध दुग्ध रूपी छात्र आते थे, जिनसे घी, मक्खन, दही, मट्ठा ( ड़ाँक्टर, इँजी०, नौकरशाह...) सब बनाए जाते थे और आज पहले से ही दूध से सब कुछ निकालकर प्राइमरी स्कूलों को अशुद्ध दूध दिया जा रहा है और कहा जा रहा है कि अब तुम इससे घी, मक्खन, दही और मट्ठा निकालों. क्या यह जमीनी तौर पर सम्भव है ? शायद कभी नहीं.

सामाजिक लगाम की कमी:
दूसरी अहम बात यह है कि दशकों पहले जब समाज के प्रत्येक तबकों के बच्चे इन्हीं प्राइमरी स्कूलों में पढ़ते थे, तो समाज की लगाम भी इन प्राइमरी स्कूलों पर रहती थी. हर अभिभावक प्राइमरी स्कूलों की शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान रखते था, क्योंकि उनके पास ये स्कूल ही शिक्षा प्राप्ति के मुख्य विकल्प हुआ करते थे. सामाजिक सहभागिता के चलते ही शिक्षक भी अपने अध्यापन कार्य को पूर्ण इमानदारी और निष्ठा पूर्वक करते थे. आज दिशाहीन सत्ता ने शिक्षा का व्यवसायीकरण करके समाज के मध्यम एवं उच्च तबकों के लिए कई प्रकार के विकल्प तैयार कर दिए. रईसों और सुविधा सम्पन्न घरानों के बच्चे बड़ी बड़ी अकादमियों, पब्लिक स्कूलों और प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने लगे. अत्याधुनिकता भरे दौड. भाग वाले दौर में स्वकेन्द्रित समाज आज कस्बों की इन प्राइमरी स्कूलों की तरफ देखता भी नहीं है. खैर किसी से मतलब ही क्या है ? उनका बच्चा तो आलीशान स्कूल में पढ़ ही रहा है. शेष गरीब, अशिक्षित और गैर जागरूक समाज दो वक्त की रोटी में इतना व्यस्त है कि यदि एक दिन भी मजदूरी न करे तो खाए क्या ? लाजमी है कि इस तबके को शिक्षा में कोई खासी रूचि नहीं है. एक बार जैसे तैसे करके बच्चे का दाखिला प्राइमरी स्कूल में करा दिया, सर का भार उतार लिया और यह मान बैठा कि अब तो सरकार कापी-किताब, ड़्रेस, मिड़ ड़े मील और छात्रवृत्ति देगी ही.
परिस्थितियों को देखकर हम यह कह सकते हैं कि आज प्राइमरी स्कूलों से सामाजिक लगाम पूर्णरूपेण हट चुकी है, जिसका नतीजा भी हमारे सामने है. शिक्षक भी भयहीन होकर स्वयं को सरकारी दमाद समझ बैठे हैं. देर से विद्यालय आना , जल्दी जाना और कई बार तो बिना छुट्टी ही विद्यालय से नदारद रहना अपनी दिनचर्या समझ बैठे है. खैर मास्टर साहब ! आप स्वयं विचारिए कि यदि आप दूसरे के बच्चे का भविष्य गर्त में ढ़केलेगें तो आपके बच्चे का भविष्य कितना अच्छा होगा, इसको आप स्वयं सोच सकते हैं ?

जन जन की जिम्मेदारी :
अभी हाल में ही मै व्यक्तिगत रूप से प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश के कई प्राइमरी स्कूलों में गई और वहाँ के शिक्षकों एवं विद्यार्थियों से अपने विचारों का आदान प्रदान की. कुछ शिक्षकों जिनमें ड़ा विष्णु मिश्रा, कैलाश नाथ मौर्य, नागेश पासी, अमित लाल वर्मा समेत अन्य कई शिक्षकों से खास बातचीत भी की, प्राइमरी स्कूलों की बदहाली के सम्बंध में कुछ नए पहलू भी सामने उभरकर आए. जो निम्नवत् हैं-
1- शिक्षा का व्यवसायीकरण होना.
2- समाज का प्राइमरी स्कूलों से अंकुश हटना.
3- वर्तमान में समाज के सिर्फ दबे, कुचले , निम्न वर्ग के बच्चों का प्राइमरी स्कूलों में जाना.
4- प्राइमरी स्कूलों और शिक्षकों पर सत्ता एवं शासन तंत्र का कानूनी लगाम लचीला होना.
5- समाज के अधिकतर लोगों की सोच का स्वकेन्द्रित होना.
6- भ्रष्टाचार के चलते नीतियों का ठीक ढ़ंग से जमीनी स्तर पर संचालन न होना.
7- बदलते आधुनिक जमाने के मुताबिक प्राइमरी स्कूलों और उससे जुड़ी नीतियों में सकारात्मक बदलाव न होना.

आइए बदलाव करें :
अहम बात यह है कि किसी भी चीज की बेहतरीकरण में जन जन की सहभागिता अति आवश्यक है और देश भी आगे तभी बढ़ेगा, जब समाज का अन्तिम जन आगे बढ़ेगा. हम अधिकतर इंसान स्वयं के विषय में दिन रात सोचते रहते हैं, आप ही बताइए की क्या यह सच्ची मानवता है ? आप की थोड़ी सी भागीदारी समाज को एक नई दिशा दे सकती है. बस आवश्यकता सिर्फ शुरूआत करने की है, आप देखेंगे कि स्वयं सेवा का कारवां बढ़ता जाएगा, समाज बदलता जाएगा, देश खुद-बखुद आगे बढ़ता जाएगा. सच मानिए , उस वक्त हमें 'देश बदल रहा है, आगे बढ़ रहा है' जैसे नारों की ढ़िढ़ोरा पीटने की जरूरत ही नही रहेगी. देर मत कीजिए, आप भी अपने कस्बे के प्राइमरी स्कूलों में जाइए, उन पर नज़र रखिए और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने हेतु हर सम्भव प्रयास कीजिए. शायद इससे बड़ी देश सेवा आपके लिए कुछ भी नहीं हो सकती है. सो रहे सरकारी तंत्र और समाजिक नुमाइंदों को जगाइए. सरकार भी गली मुहल्लों में थोक के भाव चल रहे प्राइवेट स्कूलों को तय मानक के मुताबिक न होने पर उनकी मान्यता रद्द करे और उन पर नकेल कसे. कुछ नई पहल ऐसी भी प्रारम्भ करे, जिससे समाज के प्रत्येक तबके के बच्चे प्राइमरी स्कूलों में विद्यार्जन करना ज्यादा पसन्द करें. प्राइमरी स्कूलों को अत्याधुनिक बनाने पर बल दिया जाए, नवोदय और केन्द्रीय विद्यालय जैसे ही कई और विद्यालयों की स्थापना की जाए. प्राइमरी स्कूलों की ही तर्ज पर प्राइमरी अंग्रेजी माध्यम स्कूल भी खोले जाए.

निष्कर्षत: हम कह सकते हैं कि देश की दिशा दशा तय करने वालें इन प्राइमरी स्कूलों के साथ जन जन जुड़कर अन्तिम जन को अग्रसित करने में अपना बहुमूल्य योगदान दें, ताकि राष्ट्र समग्रता की ओर बढ़े और गौरव का परचम लहराए.
नाम

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मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड 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रचनाकार: प्राइमरी स्कूल ख़ामोश हैं ! - शालिनी तिवारी
प्राइमरी स्कूल ख़ामोश हैं ! - शालिनी तिवारी
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