कहानी - पतंग @ लखनऊ की डोर - हरीश कुमार

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पतंग @ लखनऊ की डोर “पापा ,अब चलो भी |” “चलते है बेटा ,जरा सांस तो लेने दो ,अभी तो आफिस से लौटा हूँ |” “ अच्छा ठीक है , मै बाहर आपकी ...


पतंग @ लखनऊ की डोर
“पापा ,अब चलो भी |”

“चलते है बेटा ,जरा सांस तो लेने दो ,अभी तो आफिस से लौटा हूँ |”

“ अच्छा ठीक है , मै बाहर आपकी वेट कर रहा हूँ ,रोज की तरह आज भी कोई बहाना मत बनाना | सारांश ,हर्षिल और मानव सब पतंग खरीद चुके है ,इस बार उनोहने बरेली वाली काली डोर भी खरीदी है ,पूरी एक हजार मीटर नयी चरखी में भरवा के लाये है चौंक वाली दुकान से | कल वसंत पंचमी है और मै ही मोहल्ले में अकेला रह गया हूँ जिसने अभी तक पतंग और डोर नहीं खरीदी हैं |”
“ यार तुम इतने उतावले मत हो ,मै खुद तुम्हे लखनऊ वाली स्पेशल डोर दिलवा के लाऊंगा ,और तुम कल पतंगबाजी के हीरो बनना |” पापा ने पानी पीकर चीकू को प्यार से कहा |

चीकू लखनऊ की स्पेशल डोर के बारे में सुन कर खूब खुश हुआ | उसने सोचा कि अभी तो पापा चाय पियेंगे ,तब तक मै जरा घर के बाहर खेल रहे हर्षिल को ये बात बताऊँ कि इस बार मानव की हीरो पन्ती तो बेटा खत्म ही समझो |

मै बाहर हर्षिल के साथ खेलता हूँ ,आप जल्दी आ जाना|” ऐसा कह कर वो घर से बाहर चल दिया |

“हर्षिल यहाँ आओ ,तुम्हे एक कमाल की बात बतानी हैं |” चीकू ने देखा कि हर्षिल घर के पास एक खाली प्लाट में सारांश के साथ नई पतंग में कन्ने बाँध रहा था |थोड़ी दूर सामने वाली छत पर मानव अपनी पतंग खूब ऊँचा उड़ा कर ताने खड़ा था |

मानव आठवी क्लास में पढ़ता था और मुहल्ले के सभी बच्चों से बड़ा था |

उसके पिता पुलिस विभाग में थे | जब भी पतंग और डोर लेने अपने पापा के साथ किसी दूकान में जाता तो उसके पिता की पुलिसिया पहचान के चलते हर पतंगवाला सबसे अच्छी डोर और खूब सधी हुई पतंग उसे देता | उसके पास पतंगों की कई किस्मे थी जैसे तौकिया ,तिरंगा ,लट्ठा ,बोतल ,परी ,कलूटा | सब बच्चे उसकी पतंगबाजी के कायल थे | हो भी क्यों न अब जब सबसे अच्छी डोर और पतंग उसके पास थे तो वो खूब पेंच लड़ाता और गाजर मूली की तरह दूसरी पतंगों को काट कर हीरो बनता | आस पास के मोहल्ले और स्कूल में उसकी खूब तारीफ़ होती | इस बात से वो कुछ घमंडी हो गया था और दुसरे बच्चों का अक्सर मजाक बनाने में उसे खूब मजा आता |

“क्या है यार ,यही बता दो आकर ,बड़ी मुश्किल से जरा हवा चली है पतंग उड़ाने के लिए |” हर्षिल ने चीकू को अपने पास आने का इशारा करते हुए कहा |
“इस बार देखना ,कल बसंत पंचमी के दिन एक पतंग नही टिक पायेगा और मेरी स्पेशल डोर साबू के गुस्से की तरह सब को धुल चटा देंगी ,क्योकि जब साबू को गुस्सा आता है तो कही ज्वालामुखी ही फटता है |” आजकल चीकू चाचा चौधरी और राका की सीरिज पढ़ रहा था और उसके दिलो दिमाग पर साबू की बहादुरी छाई हुयी थी |
हर्षिल और चीकू ने चुपचाप मानव को राका नाम से बुलाने का कोड तैयार कर लिया था | आज जब उसके पापा ने लखनऊ की स्पेशल डोर वाली बात बताई तो उसे लगा कि चाचा चौधरी की तरह मानव यानी राका को हराने के लिए उनोहने तरकीब खोज ली है और उसके पापा का दिमाग भी चाचा चौधरी की तरह कम्पुटर से भी तेज चलता है |

“बस बस ज्यादा उछलो मत ,मानव यहाँ किसी की नही चलने देगा ,अभी अभी तीन पतंग उसने काटे है मेरे सामने | बड़ी गजब डोर है उसके पास ,ऐसे काटती है जैसे महाबली शाका की तलवार हो |” हर्षिल ने चीकू को मुंह बनाते हुए कहा|

“ ऐसा कुछ नही है ,उसका आंतक अब खत्म होगा क्योकि मेरे पापा अभी बाजार जाने वाले है जहा मै उनके साथ लखनऊ की स्पेशल डोर खरीदने जा रहा हूँ | पूरी की पूरी रील ,और उसमे सद्दी नहीं होगी की समझे | बरेली डोर से आगे की चीज है यार |”

हर्षिल ये सुनकर थोडा चौंका और उसने अपना पतंग छोडकर पूरी तरह से चीकू की और कंसन्ट्रेट किया |
“ अरे ये लखनऊ वाली डोर के बारे में तो वो बिल्लू वाली कामिक्स में तुमने मुझे पढवाया भी था ,उसमे बिल्लू ने खूब पतंगे काटी थी और पिंकी बहुत खुश हुई थी |” हर्षिल ने थोडा हैरान होते हुए कहा |

“ भैया इसके बारे में तो मैंने लोटपोट में भी पढ़ा है ,घसीटा की पतंग मोटू ने लखनऊ वाई डोर से ही काट दी थी ,बहुत सुपर डुपर डोर होती होगी ये |” सारांश उनमे सबसे छोटा था और मोटू पतलू वाली लोटपोट और चम्पक खूब पढता था | उसने भी अपनी बात पूरे सस्पेंस से कही |
“चीकू बेटे चलना है कि नहीं ,मै बाजार जा रहा हूँ |” चीकू के पापा की आवाज आई | उनोहने घर के बाहे अपनी बाइक स्टार्ट करते हुए कहा |

अच्छा हर्षिल ,सारांश ,अभी एक घंटे बाद मिलते हैं ,फिर कल का प्लान बनायेंगे | सब ने एक दुसरे की तरफ देखकर हाँ में सर हिलाया और चीकू “ आया पापा कह कर अपने घर की तरफ दौड़ पड़ा |

पतंगों के मौसम की वजह से बाजार में पतंगों की दुकान पर खूब भीड़ थी | ऊपर आसमान में भी यहाँ वहां पतंगे उडती कटती ,लहराती ऐसे लग रही थी जैसे किसी ने बहुत से रंग बिरंगे कागज आसमान में टांक दिए हो |
“पापा ,आप जब छोटे थे तो कौन सी डोर ज्यादा चलती थी | आपने ज्यादा पतंगे काटी या कटवाई |” चीकू ने अपने पापा के पीछे बैठे हुए कहा |

“ बेटा चीकू ,मैंने बचपन में खूब पतंगे उड़ाई है , हम सब बच्चे तो बाजार से कच्ची डोर जिसे टॉम लोग सद्दी कहते हो ,खरीद लेते थे | वर्धमान की कच्ची रील पूरी हजार मीटर , और उसे सूतने के लिए सम्मान बाजार से खरीद लेते | सुताई में कांच लगाने के लिए पुराने बल्ब और ट्यूब कूट पीस कर किसी बार्क चुनरी से उसे छान कर कांच का पाउडर बना लेते | फिर खुले मैदान में या दो पदों के बीच उसे सूतते | “पापा ने अपनी बचपन की याद को जैसे ताजा किया | चीकू के लिए ये सब कुछ एक नया अनुभव था |

“ क्या अब भी ऐसे सुताई कर सकते है आप “| चीकू ने जिज्ञासा दिखाई |

“करने को तो कोई बड़ी बात नहीं ,पर अब जब सब कुछ रेडीमेड बाजार में ही मिल रहा है तो कौन इतनी मेहनत करे | मेरा एक दोस्त है जो आज भी खुद डोर तैयार करता है और बाजार में बेचता है ,मै तुम्हे उसी से डोर दिलवा देता हूँ | लखनऊ की डोर का पुराना कारीगर है ,बस अपने घर में ही काम करता है |” पापा ने कहा |

बाइक बाजार पार करते हुए एक गली में पहुंची | गली को पार सिरे पर एक मकान था जिसके सामने एक मैदान में कुछ पेड़ लगे थे | दो आदमी वहां पेड़ों के इर्द गिर्द घूम कर डोर की सुताई कर रहे थे |
“और अब्दुल भाई क्या हाल हैं ?” पापा ने एक आदमी को आवाज देते हुए कहा |
“ जी खुदा का फजल है शर्मा जी ,ले आये साहबजादे को ,इसके लिए मैंने डोर तैयार कर रखी है ,रुकिए लाता हूँ |”

अब्दुल ने हाथ पोछे और एक चरखी पर लिपटी हुई लाल डोर लाकर चीकू के हाथ में दी |
“ लो बीटा ,खूब पतंग काटो ,ऐसी डोर है कि किसी को टिकने नहीं देगी “| अब्दुल ने पान चबाते हुए चीकु को मुस्कुराते हुए कहा |”
“ थैंक यू ,अब्दुल अंकल “| चीकू के हाथ तो जैसे जादू की छड़ी लग गयी थी |

पापा ने अब्दुल को कुछ पैसे दिए और फिर पतंग वाली दूकान से उसे अलग अलग रंगों की पतंगे दिलवाई |
शाम घर रही थी | चीकू अपने घर की छत पर हर्षिल और सारांश के साथ बैठा नयी पतंगों में कन्ने दाल रहा था | इस काम के साथ साथ अगले दिन की योजना भी बन रही थी |

“ देखो जैसा कि प्लान बना है कि हम सब यहाँ मेरी छत पर इकठ्ठे पतंग उडायेगें और हमारा एक ही टार्गेट होगा मानव के साथ पेंच लड़कर उसके ज्यादा से ज्यादा पतंग काटना |” चीकू बोला |

“और एक बात हम आपस में एक दुसरे की पतंग को नहीं काटेंगें और चरखी लपेटने में ,फटे पतंग जोड़ने में एक दुसरे की मदद करेंगें | “ हर्षिल पंचशील के सिद्धांत की तरह रियेक्ट कर रहा था |

“ एक बात मेरी भी सुनो भैया ,जब पतंग हवा में टिका हो ,तो थोड़ी देर मुझे भी उड़ाने देना ,वरना मेरी तो बारी ही नहीं आएंगी |” सबसे छोटा दूसरी कक्षा में पढने वाला सारांश बोला |

“ अरे तुम फिकर मत करो ,वैसे भी कल कोई पतंग यह टिकने वाली तो है ही नही ,ये स्पेशल डोर मैदान साफ़ कर देगी और अपनी पतंग खूब तनेगी ,तुम्हे तो बार बार पतंग उड़ने का मौका मिलेगा छोटे |” चीकू ने सारांश की और देखकर कहा |

“ अच्छा आप लोग ये मुझे छोटे वोटे मत कहा करो ,पापा कहते है कि अब मै छोटा नहीं रहा ,बड़ा हो गया हूँ |” सारांश ने नाराजगी जताते हुए कहा |

“ अच्छा यार ,नहीं कहेंगे ,अब अपने टार्गेट पर कंसन्ट्रेट करो | कल ये भी ध्यान रखना कि जब मानव हमसे पेंच लड़ा रहा हो तो क्या डोर खीचता है या ढील देता है ,फिर हम भी व्ही करेंगे और हमें पता चल जाएगा कि उसकी ढोर ढील देकर काटने वाली है या खींच कर काटती है |और उसके पास कितने पतंग है इसका पता सारांश करेगा क्योकि ये हम सबके घर में आता जाता रहता है |” आज चीकू इन सबका बॉस बना हुआ था और सब उसकी बात मान रहे थे क्योकि उसके पास लाल रंग की स्पेशल लखनऊ वाली डोर थी |

सब अपने प्लान की कामयाबी को लेकर फुल कॉंफिडेंट थे | राका की हार निश्चित थी और साबू जीतने वाला था | सब अगली सुबह के लिए अपने अपने घर लौटे |
अगली सुबह के बीच में आज की रात बड़ी लम्बी थी | चीको ने जाने कौन कौन से प्लान और इमेजेज अपने दिमाग में लगातार देखि सोची | खाना खाते समय उसका ध्यान कही और था इसके लिए वो एक बार मम्मी से पिट भी गया |

“पतंग पतंग पतंग ,दिन भर से इस लड़के के सर पर भूत सवार है | आप जरा इसके मैथ्स के टेस्ट देखिये ,खूब इज्जत बना रहा है हमारी | पिछली पेरेंट्स टीचर मीटिंग में भी इसकी मैथ टीचर सरला मोदी ने भी कहा कि चीकू का दिमाग तो खूब चलता है पर शरारतों में मैथ्स में नहीं |” मम्मी ने पापा से शिकायत करते हुए कहा |

चीकू चाहे पापा का ज्यादा लाडला था पर इस समय उनोहने भी मम्मी के हक़ में आवाज उठाई और कहा ,”चीकू ये बहुत गलत बात है तुम अपनी पढाई पर ध्यान नही दे रहे | मैंने फैसला किया है कि कल के पतंग उत्सव के बाद तुम्हारा खेलना कूदना बंद | अब शाम को मै तुम्हे खुद एक घंटा मैथ पढाया करूंगा |

मम्मी का गुस्सा इस पर थोडा शांत हो गया और पापा ने चीकू को अपने कमरे में खिसक जाने का इशारा किया |
चीकू की आखों में नींद नहीं थी ,उसने चुपके से अपनी कपड़ो की अलमारी से लखनऊ कि स्पेशल लाल डोर निकाली और उसे अपने सिरहाने रख कर देखते हुए कुछ सोचने लगा | आज उसके सभी कामिक्स एक कोने में दुबके पड़े थे और राका की तस्वीर वाला पन्ना एक तरफ लटक रहा था | उसकी आँख कब लगी ,उसे पता न चला |
चीकू स्वपनलोक में था | उसने देखा कि उसकी पतंग खूब ऊची तनी हुई है | आस पास की छतों पर मोटू पतलू ,पिंकू ,बिल्लू ,महाबली शाका ,नागराज ,फौलादी सिंह और चम्पंक से सभी जानवर खड़े है | वे सब चीकू चीकू चिल्ला रहे हैं ,उसकी जय जय कार कर रहे हैं |

उसके इंग्लिश वाले खूबसूरत मैडम ज्योति सिन्हा उसे बड़े प्यार से देख रही हैं | उसके स्कूल के दोस्त खली प्लाट में खड़े उसकी पतंग की तरफ बड़े गौर से देख रहे है | वही दूसरी छत पर मानव के साथ राका और मैथ टीचर सरला मोदी खड़े है और मानव की पीठ थपथपा रहे हैं | चीकू के साथ सारांश और हर्षिल खड़े है | चाचा चौधरी और साबू ने उसके पतंग और चरखी संभाल रखी है | उनका कुत्ता रॉकेट मानव को देखकर खूब भौंक रहा है | इसी बीच मानव और चीकू की पतंगों का पेच लड़ गया है और चीकू ने झटके से मानव का पतंग काट दिया है | चीकू के लिए सब तालियाँ बजा रहे है और मानव अपने कटे हुए पतंग को देखकर उदास हो गया है |

चीकू ने चिल्ला कर कहा ,”काट दिया काट दिया ,आई बो आई बो |”
वो अचानक नींद से जागा ,उसने आँखे खोली तो वहां कोई नहीं था | उसे थोडा अफ़सोस हुआ |
“कितना अच्छा सपना था ,काश सब इस तरह आज मेरी डोर का जलवा देखते |” इसने सोचते हुए घडी की और देखा | आठ बज चुके थे |

ब्रश कर के और बोर्न्वीटा दूध पीकर वो बिना नहाये मुंह हाथ धोकर नौ बजे हर्षिल और सारांश के साथ छत पर था | मानव के कुल पतंग और डोर की जानकारी देते हुए सारांश ने उसे बताया |

भैया उसे पास बरेली डोर की दो चरखी है | एक काली रील वाली और एक ग्रीन रंग की | पतंगे मैंने पूरी तो नहीं गिनी पर कम से कम ट्वेंटी तो रही होंगी |”
“कोई बात नहीं मेरे पास भी ट्वेंटी है और हर्षिल भी दस पतंगें लेकर आया है ,गिनती में तो हम उससे आगे ही हैं |” चीकू ने मुस्कुराते हुए कहा |

मानव अपनी पतंग लेकर छत पर आ चुका था | उसके पापा भी एक तरफ कुर्सी पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे | मानव ने चीकू और उसके दोस्तों को छत से देखा तो इशार कर के पेंच लड़ने को कहा |

हवा अच्छी चल रही थी और चीकू पूरे जोश में था | लाल रंग की स्पेशल डोर से बांधकर उसने सबसे पहले तौकिया पतंग उड़ाया | पतंग कुछ सेकेण्ड में ही हवा में झूमने लगा | मानव के पतंग से पेंच लड़ने से पहले रास्ते में और भी बहुत पतंग आस पास उड़ रहे थे | उधर मानव तो इधर चीकू अपनी अपनी डोर से पतंगों से पेंच लड़ते ,उन्हें काटते किसी बड़े योद्धा की तरह एक दुसरे के नजदीक आ रहे थे |

मानव और चीकू अपनी अपनी परफॉरमेंस से खूब हीरो बन चुके थे | सारांश और हर्षिल को लखनऊ की स्पेशल डोर पर विशवास हो चुका था |
“भाई आज हमें कोई नहीं रोक सकता ,ये मानव का बच्चा भी क्या याद करेगा | अभी तक हमने भी पांच पतंग बड़ी सफाई से काटे है और अपना तौकिया पूरी शान से आगे बढ़ रहा है “| हर्षिल बहुत खुश था |

इस बीच चीकू छत के ऊपर से ही अपने घर के आंगन में चिल्लाया “पापा आइये और देखिये ,मैंने पांच पतंग काट दिए हैं “| वो इस बात को हर तरफ फैला देना चाहता था |
उधर मानव ने जब चीकू की ये परफॉरमेंस देखी तो वो थोडा घबराया | आस पास की छत पर पतंग उड़ने वाले कई बच्चे उसके स्कूल से ही थे | आज मानव के साथ साथ चीकू भी उनका हीरो बन रहा था |

आखिरकार चीकू की पतंग और मानव की पतंग के पेंच लड़े | मानव ने अपनी डोर को खीचने के लिए जैसे ही झटके से हाथ आगे पीछे किये ,उसकी पतंग हवा में ही औंधी हो गयी | उसका पतंग कट चूका था | कही कोई मौका ही नहीं दिया था चीकू की पतंग ने उसे और चीकू की छत पर जश्न के हल्ले हुलारे थे | आई बो की ऊंची आवाजे थी | जोश था ,चीकू ने हर्षिल को पतंग की डोर पकडाई और सारांश को उठा कर नाचने लगा | ये लखनऊ की डोर की बड़ी सफलता थी | आज राका पर साबू भारी था |

पर मानव हार माने वाला नही था | उसने कुछ ही पालो में एक और पतंग उड़ाया और चीकू को पेंच के लिए ललकारा |
चीकू ने भी बिना कोई हिचक दिखाते हुए इस बार हर्षिल को पेंच लड़ने का मौका दे दिया |

देखते ही देखते हर्षिल ने लखनऊ की स्पेशल डोर के साथ मानव की पतंग को नीचे से लपेटने की कोशिश की | फुर्ती से डोर खींची पर ये क्या .......
इस बार जीत मानव की हुई | दोनों टीमे एक एक से बराबर हो चुकी थी | सस्पेंस बरकरार था |

मानव ने भी खूब उछल कूद करते हुए दूर से चीकू की तरफ अपने बाएं हाथ की उँगलियों से VVV वी का निशान बनाते हुए मुंह चिढाया |

“भैया इस बार देखना मानव की पतंग पास भी नही फाटक पायेगी “| कहते हुए हर्षिल ने लाल रंग की डोर वाली लखनवी चरखी को उठाया और आखे बंद करके जाने कौन से मन्त्र पढ़े और फूक मार क्र उसे माथे से लगा लिया |

“अब देखना जय काली कलकत्ते वाली का कमाल ,कल टीवी पर शक्तिमान ने ऐसे ही किल्विष को धूल चटाई थी |”
चीकू थोडा हैरान और उदास था पर उसने इस जादुई शक्ति का मन्त्र देखा और शक्तिमान का नाम सुना तो जैसे उसमे नया उत्साह आ गया |

लठ्ठा पतंग को चूम कर उसने उड़ना शुरू किया और मानव के पतंग तक आगे बढ़ा दिया | पतंग आपस में पेंच के लिए एक दुसरे की तरफ पलटे | हवा तेज थी | मानव और चीकू की डोर आपस में टकराई | इस बार दोनों ने खीचने की बजे डोर ढीली छोड़ी | पर कोई नतीजा न निकला | दोनों धीरे धीरे डोर बढ़ाते रहे | अपनी अपनी छत पर साँसे थामे |

छोटा सारांश मुंह खोले दोनों पतंगों को देख रहा था | मानव की परी और चीकू भाई का लाता पतंग अभी तक मैदान में टिके हुए थे | अचानक मानव ने डोर खीचनी शुरू की पर चीकू डोर छोड़ता रहा | कुछ ही पलो में मानव का पतंग मछली की तरह हवा में लहराने लगा | स्कोर दो एक हो चूका था और चीकू की चाट पर जश्न का शोर मचा था |

मानव का मुंह लटक गया |
चीकू और उसके साथियों ने ऊँगली से वी का निशान बनाते हुए उछल उछल कर मानव की तरफ इशारा किया |

चीकू इस सफलता का सन्देश देने के लिए नीचे मम्मी पापा के पास गया और पकौड़ो से भरी प्लेट लेकर लौटा | मानव भी अपनी छत से नीचे उतर कर शायद ब्रेक के लिए चला गया था |

चीकू की छत पर तीनो बच्चों के पाँव जमीन पर नहीं लग रहे थे | आस पास छत पर खड़े मोनू ,गप्पू और जीतू ने भी थम्स अप का निशान बनाते हुए चीकू को बधाई दी |
थोड़ी देर बाद मुकाबला फिर शुरू हुआ | शाम तक हार जीत जीत हार का सिलसिला चलता रहा | स्कोर बढ़ता घटता रहा | चीकू और मानव की पतंगें किसी महाभारत के युद्ध की तरह शाम तक सुस्पेंस जगती रही |
आखिरकार जब स्कोर बराबरी पर था और माँ ने कई बार सभी बच्चो को कई बार छत से नीचे उतरने के लिए आवाजे दी थी और बच्चे “आते हैं”,”एक सेकेण्ड “ , “ आ गये “ के जुमले सुना सुना कर उन्हें पका चुके थे तो एक दम मानव और चीकू की छत पर मम्मियों की सर्जिकल स्ट्राइक हुई और सब पतंगबाज बच्चे पिटते पिटते नीचे उतरे |

मानव का अंहकार टूट चुका था |
चीकू अपने दोस्तों के बीच हीरो बन चुका था |

सब बच्चे खुश थे ,साबू ,चाचा चौधरी ,शक्तिमान ,महाबली शाका ,पिंकू ,बिल्ली और मोटू पतलू सब मुस्कुरा रहे थे |
कहानी खत्म पैसा हजम |
नाम

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पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: कहानी - पतंग @ लखनऊ की डोर - हरीश कुमार
कहानी - पतंग @ लखनऊ की डोर - हरीश कुमार
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