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प्राची - जनवरी 2017 : व्यंग्य / नए वर्ष की शुभकामना / डॉ. विकास कुमार

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व्यंग्य नए वर्ष की शुभकामना डॉ . विकास कुमार लेखक परिचय जन्म :- 12 दिसम्बर 1986 शिक्षा :- एम ए, एम फील, नेट, जे आर एफ, एस आर एफ, पी...

व्यंग्य

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नए वर्ष की शुभकामना

डॉ. विकास कुमार

लेखक परिचय

जन्म :- 12 दिसम्बर 1986

शिक्षा :- एम ए, एम फील, नेट, जे आर एफ, एस आर एफ, पी एच डी.

प्रकाशन :- आजकल, समकालीन भारतीय साहित्य, प्राची, संवदिया, ककसाड़, अक्षरपर्व, परिकथा, आश्वस्त, आम-आदमी, दिल्ली प्रेस, पहचान यात्रा, दलित साहित्य, पृथ्वी और पर्यावरण, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण आदि पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ प्रकाशित.

प्रसारण :- आकाशवाणी, हजारीबाग से कहानियां निरंतर प्रसारित.

सम्प्रति :- अतिथि व्याख्याता, स्नातकोत्तर मनोविज्ञान विभाग, विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग, झारखण्ड-825301.

सम्पर्क :- ग्राम- अमगावाँ, डाकघर- शिला, प्रखण्ड- सिमरिया, जिला- चतरा, झारखण्ड-825401

मो.:- 8102596563, 9031194157

 

रात के बारह बजकर एक मिनट! नये साल का पहला पल, पहला घण्टा, पहला दिन, एक जनवरी...और आज भी उसी अंदाज में मोबाइल की घंटियाँ टुनटुनाने लगीं, संदेश पर संदेश आने लगे, एक से एक शुभकामना संदेश, वही पुरानी परम्परा के अनुसार नये अंदाज में. आज के ही दिन की तरह, सिर्फ एक वर्ष पूर्व आया था.

नव वर्ष मंगलमय हो, हैप्पी न्यू ईयर, नया साल मुबारक हो, इस तरह नये साल पर ढेर सारी शुभकामनाएँ. पता नहीं कब तक ऐसे ही झूठे संदेश मिलते रहेंगे. भला कभी नव वर्ष का अंत होगा या नहीं भी. लोग इसी दिन मुझे थोक भाव में शुभकामना देते हैं, मुबारकबाद देते हैं और उनकी शुभकामना और मुबारकबाद लेते-लेते मेरे सभी जेब भर जाते हैं...और मैं फूलकर कुप्पा हो जाता हूँ. इसके बावजूद और भी कहीं जाने-अनजाने से कोई शुभचिन्तक मिल गये तो ओवरलोड के तौर पर और शुभकामना...पर दुर्भाग्य मेरा, इतनी शुभकामना मिलने के बावजूद मेरा नया साल हमेशा की तरह कभी मंगलमय नहीं हो पाया.

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मुझे आज तक यह समझ में नहीं आया कि आखिर लोगों द्वारा थोक के भाव में मिलनेवाली शुभकामना, बधाई, मुबारकबाद आखिर कहाँ गुम हो जाती हैं. जब कभी इनकी जरूरत होती है तो मैं अपनी भरी जेबों में हाथ डालता हूँ, इस आशा के साथ कि शायद कुछ काम आ जाये. पर खाली पाकर मैं छछंद-सा (वंचित होना) हो जाता हूँ...फिर यह सोचने के लिए बाध्य हो जाता हूँ कि आखिर इनका हवा होना ही था तो क्या जरूरत थी ऐसे मुबारकबाद, शुभकामना और बधाई देने की, जो समय पर काम ही न दे...नहीं चाहिए मुझे ऐसे झुठे मुबारकबाद, शुभकामना और बधाई. रखे रहें सभी अपने पास. झूठ-मूठ मुस्कुराकर, अनावश्यक प्यार जताकर, आखिर क्या जरूरत है ऐसे एहसान जताने की.

सच बताऊँ, अब मैं काफी बड़ा हो गया हूँ. इतनी ही उम्र में कितने नये साल आये और पुराने होते चले गये. मगर मजाल है कोई ऐसा साल, जो मेरे लिए मंगलमय रहा हो. दुःख-दर्द, असफलता, दुश्मनी, लड़ाई-झगड़ा के बिना तो कोई साल बीता ही नहीं.

खैर छोड़िये, मैं आपको पिछले ही वर्ष की बात बताता हूँ. यकीन हो जायेगा.

एक जनवरी को किसी ने मेरे मोबाइल पर मैसेज किया था, ‘नया साल आपके लिए सुख, शांति और समृद्धि का साल होगा, इस अवसर पर आपको ढेर सारी शुभकामनायें.’ मैं पढ़कर अति प्रसन्न हुआ, बल्कि प्रफुल्लित होकर नाच उठा और इससे कहीं ज्यादा तेल-मसाला लगाकर प्रत्योत्तर में मैंने उसे भी मैसेज भेज दिया.

पर सच बताऊं, जितना मैं पहले दिन अति प्रसन्न रहा, उतना ही साल भर अति विषाद की स्थितियों से गुजरा. भला मेरे जैसे एक साधारण युवक को कहाँ सुख और कहाँ शांति...और समृद्धि की बात की तो कल्पना करना ही बेकार है. कभी पैसे का प्रलोभन सताता रहा तो कभी पढ़ाई में अच्छा करने का सपना देखता रहा. पढ़ूँ या काम करूँ, इसी अन्तर्द्वन्द्व में फंसकर दोनों ही काम को सही से अंजाम नहीं दे पाया. अपने माँ-बाबूजी व मास्टर साहब की डाँट-फटकार सुनते-सुनते मैं तो थेथर ही हो गया...और इस हालत में समृद्धि की कल्पना भला की भी जा सकती है क्या?

कुछ ही देर बाद अपने चहेते और प्रिय मित्र का फोन आया, ‘नये साल में सफलता आपके कदमों को हमेशा चूमती रहेगी, ऐसी मेरी भगवान से प्रार्थना है.’ मैंने भी सोच लिया कि इस बार एम.ए. की परीक्षा में नंबर वन पर आ ही जाऊँगा. पर पता नहीं ऐसी प्रार्थना उसने मन से की थी या फिर मेरी असफलताओं पर खिल्ली उड़ाने के मकसद से, समझ नहीं पाया था उस वक्त,...और बदले में मैंने भी नये साल पर ढेर सारी शुभकामनाएँ दे डाली थीं.

जहाँ तक सफलता को मेरे कदमों को चूमने की बात है, यह निराधार साबित हुई. वह मेरे कदम को क्या चूमेगी, मेरी ओर आँख उठाकर भी न देखा, और देखा भी तो तरेरती नजरों से. चाहे वह पढ़ाई की बात हो या रोजगार की, हमेशा की तरह फिसड्डी साबित हुई.

एक लड़की जिसने मेरे साथ एम.ए. किया था, उसका भी मैसेज आया, ‘हैप्पी न्यू इयर. यह नया साल तुम्हारे लिए लड़कियों का साल होगा. जहाँ जाओगे, लड़कियाँ तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ेंगी.’ मैं पढ़कर बहुत ही प्रफुल्लित हुआ. युवा मन को विपरीत लिंग की बात थोड़ी अच्छी जरूर लगती है, यह सर्वमान्य सत्य है.

हाँ, यह बात थोड़ी सत्य जरूर साबित हुई. वह भी मेरे इर्द-गिर्द आयी,...मगर अपना मतलब साध कर चली गयी. कुछ को छोड़कर, बल्कि अधिकांशतः मेरे पास जितनी भी लड़कियाँ आयीं, उनसे कुछ लाभ तो नहीं हुआ, बल्कि हानि जमकर हुई. जब तक हमसे मतलब रहा, तब तक थोड़ी नजदीकियाँ बढ़ीं. एम.ए. का क्लास छुटने के बाद मानों सभी बेगाने से हो गये. कम से कम दिन में एकाध बार आने वाले फोन अब सदा के लिए बंद हो गये. वो लुभावने संदेश, जायकेदार संवाद मानों हवा ही हो गये. लड़कियाँ कितनी मतलबी होती हैं, लड़कों का कितना उपयोग करती हैं, इसी वर्ष मैंने जाना.

उसी दिन मेरे एक शुभ-चिंतक, जिन्हें कभी मेरी कहानियाँ काफी पसंद आया करती थीं, का फोन आया, ‘नव वर्ष मंगलमय हो. यह साल आपकी कहानियों का साल होगा. पत्र-पत्रिकाओं में आप छाये रहें, ऐसी मेरी शुभकामना है.’

फिर उनकी झूठी शुभकामनाओं को सुनकर मेरा मन-मयूर नाच उठा था, ‘इस वर्ष तो मैं साहित्य में अच्छा नाम कमा ही लूँगा. हजारीबाग का प्रेमचन्द बन ही जाऊँगा.’

सच बताऊ, उस वर्ष मात्र दो ही कहानियाँ प्रकाशित हुई थीं और एक-दो को छोड़कर किसी ने पढ़ने की भी इच्छा तक न जाहिर की. पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ भेजते-भेजते मेरीे जेब के सारे पैसे खाली होते चले गये थे.

एक शुभ-चिंतक मिले; फिर भी वे कहाँ मानने वाले थे, उन्होंने भी नववर्ष की शुभकामना देते हुए कहा, ‘यह वर्ष आपको पारिवारिक सुख और शांति प्रदान करेगा. यह मेरी शुभकामना है।’ सच तो यह है कि जबसे पैदा हुआ हूँ, कभी पारिवारिक सुख और शांति नसीब ही नहीं हुआ. उनकी शुभकामना से थोड़ी बहुत आशा जगी थी कि शायद यह वर्ष मेरे लिए अच्छा होगा. यह सोचकर मैंने प्रत्योत्तर में उन्हें भी काफी शुभकामना दे डाली.

पर क्या बताऊँ, उस साल तो माँ-बाबूजी, भाई-बहन, चाचा-चाची से हमेशा टनमन होता रहा. बल्कि यह कहने में मुझे जरा भी संकोच नहीं होगा कि पारिवारिक सुख और शांति के बदले दुःख और अशांति ही हाथ आयी.

‘एक दुआ मांगते हैं भगवान से, चाहते हैं आपकी खुशी ईमान से, सभी तमन्नाएँ पूरी हों आपकी और आप मुस्कराते रहें दिलोजान से, हैप्पी न्यू इयर.’ मेरे ही साथ पढ़ने वाली एक लड़की का संदेश मिला मेरे मोबाइल पर, जिसे पढ़कर मैं बाग-बाग हो उठा था. चलो कोई तो मेरे लिए भगवान से इतना माँगता है,...और अबकी बार तो भगवान मेरी सभी आकांक्षा पूरी कर ही देंगे,...और मैं हमेशा हँसता-खेलता रहूँगा.

पर क्या बताऊँ. मेरी सारी तमन्नाएँ, सिमट कर रह गयीं और मुस्कुराना तो दूर, पूरे साल मैं रोता ही रहा.

अब आप ही बताइये, जिसके साथ इतने बुरे अनुभव हों, नये साल की शुभकामनाओं को लेकर, वह भला जल-भुनकर कलाबत्तु नहीं हो जायेगा तो क्या होगा?...आज भी मेरे मोबाइल में हितैषियों के मैसेज आने शुरू हो गये हैं, जैसे मैं उनके मैसेज को पढ़ने के लिए खाली बैठा हूँ और इससे मेरा नया साल अच्छा ही हो जायेगा.

पता नहीं क्यों कुछ लोग तो बारह बजने का इन्तजार करते रहते हैं, फिर धड़ाधड़ मैसेज भेजने में व्यस्त हो जाते हैं. या फिर कॉल करने में जुट जाते हैं. एक तो इससे कुछ होता-जाता नहीं है, खाली पैसे की बरबादी. अपनी नींद तो हराम करते ही हैं, दूसरों को भी चैन से सोने नहीं देते.

इस बार तो पिछले वर्ष से अधिक आकर्षक अंदाज में मैसेज आ रहे हैं, जिसे मैं पढ़-पढ़कर पागलखाना जाने की तैयारी कर रहा हूँ. थोड़ा कुछ आप भी सुन ही लीजिये.

‘नजर मिला के हमसे, नजर न चुरा लेना. दोस्त बनाकर तुम हमें, गँवा न देना. माना कि हम दूर हैं, मगर हमें भुला न देना, हैप्पी न्यू इयर.’ मेरे ही साथ पढ़ने वाली एक लड़की का यह संदेश है. एक तो मैंने कभी उससे नजर नहीं मिलायी और नजर चुराने की बात करती है. साल भर में वह केवल पहली जनवरी को याद करेगी और हमें सारी जिंदगी याद करने की बात करती है. वाह रे स्वार्थी लड़की.

फिर एक लड़का,...नहीं दोस्त का मैसेज है, ‘यादों में आपकी हर बात रहेगी, जिन्दगी आपकी दोस्ती से आबाद रहेगी. चाहे भुला दें जमाने को हम, आपकी प्यार-सी दोस्ती हमेशा याद रहेगी.’...हाँ न! बड़ा आया है सभी यादों को याद रखने वाला. सौ रुपया दिये थे तो याद ही नहीं है. दोस्ती ही हमेशा रखकर क्या करेगा, जब एहसान को याद रखता ही नहीं है.

इससे पहले कि 2016 अस्त हो, 2016 का कैलेंडर नष्ट हो, आप खुशी से मस्त हो, मोबाइल का नेटवर्क व्यस्त हो, दुआ है 2017 आपके लिए जबरदस्त हो.’ एक सज्जन का मैसेज आया है. ‘हर साल कितना मस्त होता है, हम ही जानते हैं. जब पिछला साल जबरदस्त नहीं रहा तो नया साल क्या खाक जबरदस्त होगा. ये सब बकवास के अलावा कुछ नहीं है. पहले तो मैं रिसपांस देता भी था...अब तो रिसपांस भी नहीं देता. कहते हैं न दूध का जला, छाछ को भी फूंक-फूंक कर पीता है. वही पी रहा हूँ, छाछ को, फूंक-फूंक कर, कहीं जल न जाऊँ.

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रचनाकार: प्राची - जनवरी 2017 : व्यंग्य / नए वर्ष की शुभकामना / डॉ. विकास कुमार
प्राची - जनवरी 2017 : व्यंग्य / नए वर्ष की शुभकामना / डॉ. विकास कुमार
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