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प्राची - फरवरी 2017 / कहानी / खत / डॉ. श्याम सखा ‘श्याम’

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कहानी खत डॉ . श्याम सखा ‘श्याम’ ‘‘स र! आप नाराज हैं, मुझसे नाराज हैं यानि उस स्त्री से जिसने पिछले बीस बरस से आपसे, केवल आपसे, प्रेम ...

कहानी

खत

डॉ. श्याम सखा ‘श्याम’

‘‘सर! आप नाराज हैं, मुझसे नाराज हैं यानि उस स्त्री से जिसने पिछले बीस बरस से आपसे, केवल आपसे, प्रेम किया है क्योंकि बकौल आपके, मुझे तो प्रेम करना, आता ही नहीं था. जी हाँ, आपने ही मुझे, प्रेम करना सिखलाया था. जिस्मानी प्रेम नहीं रूहानी प्रेम. जिस्मानी प्रेम में तो मैं, आपके मुताबिक लाजवाब थी. मुझसे पहले आपको ऐसा जिस्मानी प्रेम, किसी से नहीं मिला था, जो आपको तृप्त कर दे और आप तो पारंगत हैं दोनों तरीके के प्रेम में, चाहे जिस्मानी हो या रूहानी. जी हाँ, रूहानी प्रेम का पहला सबक है, स्वयं से प्रेम, माने अपने जिस्म से, अपनी रूह से प्रेम. जिस्म से प्रेम? अपने से प्रेम? मैं कुछ समझी नहीं सर, मैंने कहा था. बहुत भोली हो, बहुत नासमझ हो, आप बोले. अरे! जब तक अपने जिस्म से प्रेम नहीं करोगी, उसे स्वस्थ व सुंदर कैसे रख पाओगी? फिर आपने मुझे न केवल योगासन सिखाए, बल्कि हर रोज़ मुझे, हिसाब देना पड़ता था, कि मैंने व्यायाम व योगासन किए हैं या नहीं. फिर रूहानी प्रेम आपने कहा था कि सुखी रहना सीखो. जो व्यक्ति स्वयं सुखी नहीं है वह दूसरे को सुख क्या देगा?

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मैंने ऐसी ज्ञान की बातें कब सुनी थीं भला? मैट्रिक पास करके, नर्सिंग का कोर्स. फिर एक-दो जगह छुटपुट नौकरियां. इस बीच, एक सयाने बाप के, पगले बेटे से विवाह. कैसा विवाह, वह सब कुछ तो आप को बतला ही चुकी हूं, फिर सयाने ससुर द्वारा मानसिक व दैहिक शोषण से दुःखी होकर छोड़ आई थी उनको, और आ पहुंची थी आपकी शरण में.

आपने, मुझे एक नई सोच, नई विचारधारा दी. आपने कहा, देखो, तुम्हारी नौकरी और तुम्हारी देह को तो सांसारिक नियम व अपवाद सभी झेलने पड़ सकते हैं, परंतु अपनी रूह को बचाए रखना. इसे कलुषित या परेशान मत होने देना. देह और रूह को अलग करना सीखो. देह को तो सामाजिक नियम निभाने होंगे. उसे तो चाहे-अनचाहे प्रेम का नाटक भी करना होगा. परंतु आत्मा से किसी को प्रेम करना, जताना तो मात्र तुम्हारे अपने वश में है. फिर ससुर आए, हंगामा खड़ा करना चाहते थे. मुझे ले जाना चाहते थे. परंतु आप तो वशीकरण मंत्र जानते हैं ना. आपने तो उस बूढ़े अरने भैंसे को भी सधा लिया. फिर मुझे भी समझा बुझाकर भेज दिया, छुट्टियां देकर उसके साथ, यह सीख देकर कि ‘व्हेन यू आर बींग रेप्ड व्हाई डोन्ट यू एन्ज्वाय इट’ सच कहूं सर, पहली बार बूढ़े का साथ मुझे बुरा नहीं लगा था और बूढ़ा तो क्या कहूं मर मिटा था मुझ पर और आप पर भी, तीन दिन में ही छोड़ गया मुझे आपके पास. फिर तो सिलसिला चल पड़ा था मेरा, छह दिन मैं तन, मन से आपकी, एक दिन तन से बूढ़े की. मुझे उससे अच्छे दिन, जिन्दगी में कभी नहीं मिले, क्योंकि मेरी सोच जो बदल गई थी. मैं जहां, जैसी थी, उसी स्थिति को स्वर्ग मान बैठी थी और आपको क्या कहूं, आपके दोनों हाथों में लड्डू थे. मैं तो आपको पहले ही देवता मानती थी. अब तो मेरे ससुर भी आपकी प्रशंसा करते न अघाते थे. इसी तरह चार साल बीत गए. आपने, अपने रसूख से मुझे सरकारी नौकरी दिलवा दी. मैं आना नहीं चाहती थी, आपको छोड़कर. पर आपकी अक्ल के आगे कहां पार पड़ती? बस मेरी तो मुक्ति हो गई, लेकिन आपका आना मेरे पास क्रमशः कम होने लगा जो मुझे कब रास आता?

तब तक आपने शायद किसी और को, और को क्या कुसुम, लंबी-पतली छरहरी अनछुई कुसुम को शीशे में उतार लिया था. आपके वाग्जाल से निकल पाना भला किसके वश में था? मैं कितनी लड़ी थी, रोई थी, गिड़गिड़ाई थी, पाँव पकड़े थे. पर आप तो आप थे, कहते हैं ज्ञानी तो ज्ञान से, पगलाए हाथी को भी वश में कर लेता है. मैं तो एक अवश बेवकूफ स्त्री थी. क्या खूबसूरत तर्क थे आपके! आपने कहा था ना कि आपने मुझ कुलटा को, जो पति-ससुर तथा विवाह पूर्व के प्रेमी को समपर्ण कर चुकी थी, अपनाया था, तो मैं क्यों इतनी ईष्यालु हूँ? अगर कोई अथाह प्रेम-सागर से एक चुल्लू पी रहा है, तो मैं चुपचाप सुनती समझती रही. फिर मैंने सहन करना सीख लिया था. मैंने तो कुसुम को भी छोटी बहन, सौत पता नहीं क्या-क्या नाम दे डाले थे? पर वह नई बछेरी थी. वह कब मानती किसी और का अधिकार, अपने ज्ञानवान सुदर्शन प्रेमी पर उसने अपने तेवर दिखलाए. आप भी अवश थे, उसके सुतवां जवान जिस्म पर. आपने पहले मेरा अपने पास आना बंद किया, फिर सहज-सहज आपका, मेरे पास आना न के बराबर हो गया, कम तो पहले ही हो गया था. मैं विक्षिप्त सी हो गई थी. आपको अपने हाथ से फिसलते देखकर, कितनी रोई गिड़गिड़ाई थी. आप समझदार थे. आपने एकदम किनारा नहीं किया. आप जानते थे कि ऐसा करना आपके लिए, आपके परिवार के लिए घातक सिद्ध हो सकता है. सो आपने ‘सहज पके सो मीठा होय’ वाला सिद्धांत अपनाया. मुझे अपनी बढ़ती उम्र, बढ़ते पारिवारिक कर्तव्यों की दुहाई दी और आपने ही मुझे इशारा किया, अपने पुराने प्रेमी को फिर अपनाने का. अब तक मैं, आपको कुछ-कुछ समझने लगी थी. आपकी ज्ञान की परत को भेद लिया था मैंने, और उसके नीचे छुपा आपका चेहरा कितना घिनौना लग रहा था. पर मैं उसको देखना नहीं चाहती थी. अपने देवता को कलुषित रूप में कौन देखना चाहेगा? जब आपका परतहीन व्यक्तित्व उजागर होने लगता, मैं भय से अपनी मन की आंखें बंद कर लेती. अब भी आप छठे-छमाहे बाजरे की खिचड़ी खाने आ पहुंचते थे मेरे पास.

फिर आपने पाया, कुसुम कुछ अधिक बोझ बन रही है आप पर. बस एक ही झटके में ऑप्रेशन कर डाला था. आपने उसके पिता को बुला डांटा, कि बड़ी होती लड़की का बाप ऐसे आराम से क्यों बैठा है, आँखें मूँदकर? और कर दिया उसका विवाह. वह भी बहुत दूर. शायद आपको भय लगने लगा था, उससे. मैंने देखा तो था उसे. उन दिनों विवाह से पूर्व लगभग मेरी ही तरह विक्षिप्त हो गई थी. मैं भी गई थी उसके विवाह पर. बिल्कुल उस बकरी सी निरीह भयभीत लग रही थी, जिसे कसाई को सौंपा जा रहा हो. और आप तो घराती-बराती, सब पर हावी थे अपने मोहक हरदिल अजीज व्यक्तित्व को ओढ़े हुए. किसकी मजाल थी आपके कवच को भेद सके?

फिर आपका असली रूप मुझपर उजागर हुआ. आपके मित्र मेजर शुक्ला, जिन्होंने एक नागा लड़की से विवाह किया था. जी वही नन्हीं-मुन्नी, जंगली फूल सी लड़की, जिसकी बातें आपको बहुत भाती थीं, क्योंकि वे बातें अछूती थीं शहरी बनावटी बातों से. बेचारे शुक्ला जी भी तो, इसी सादगी पर लुट मरे थे, जो इस अनपढ़ गँवार लड़की से विवाह रचा बैठे थे, अपनी उतरती जवानी के मोड़ पर. आपके बहुत अच्छे मित्र थे. आपकी नजरें उस अबोध लड़की पर थीं, इसका पता तो मुझे लग गया था. पर मेजर शुक्ला से आप डरते थे. वैसे भी बहुत सोच समझकर चलने में माहिर हैं आप. पर आपके हर अच्छे-बुरे काम में शायद विधाता का अपना प्रयोजन होता है कुछ, मेजर शुक्ला पंजाब के उग्रवादियों के हाथ शहीद हो गए. शुक्ला के घरवालों ने जंगली फूल सी लड़की तो तंग करना शुरू कर दिया. उसे कुछ मालूम तो था नहीं. उसकी पेंशन भी नहीं हो पाई, क्योंकि आर्मी रिकॉर्ड में मेजर शुक्ला अविवाहित थे. पेंशन भी उसके सास-ससुर ने हड़प ली तथा निकाल दिया था जंगली फूल को घर से, बेचारी को दुधमुँहे बच्चे के साथ. आप तो मौके की तलाश में थे. पर आप अपनी शतरंज की बिसात अच्छी तरह बिछाना जानते हैं. आपने पहले उसे एक साड़ी स्टोर पर रखवा दिया था. उसकी सुंदर देहदृष्टि व अनगढ़ सौंदर्य की वजह से, जब वह कोई भी नई साड़ी पहनकर बुत सी खड़ी होती तो चलने वाले रुककर खड़े हो जाते. फिर उसने पहली बार साड़ी पहनना सीखा था. सो उसका लहम-फहम अंदाज भी अलग था. कैसे बिताए होंगे आपने वे दो-तीन महीने उसके इंतजार में. आप तो बच्चे-से व्याकुल हो जाते हैं मनचाहे खिलौने को प्राप्त करने के लिए. पर आपको समझना आसान नहीं सर. कैसे आपने उसके सास-ससुर पर दबाव डाला था उसे वापस घर ले जाने के लिए. वे भी आपके द्वारा दिए गए तर्कों की मार कहाँ तक झेल पाते? ले आए उसे वापिस और कर दिया बंद घर में. फिर तो घर से अपने क्लीनिक लाना कहां मुश्किल था? पर वह इतना नाम कमा चुकी थी साड़ी स्टोर पर कि बहुत दिन नहीं रख पाए उसे आप. आपकी बदनामी जो होने लगी थी. पर आपकी इच्छा तो पूर्ण हो चुकी थी, हालांकि आपका दिल नहीं भरा था. यह मैं जानती हूँ क्योंकि आप भरपेट खाए बिना तृप्त नहीं होते. फिर आपको यह भी गवारा नहीं था कि कोई और ले उड़े आपकी कबूतरी को. सो आप उसे मना-मनू कर नागालैंड छोड़ आए थे, क्योंकि अगर वह यहाँ रहती और कहीं और से गुलछर्रे उड़ाती जो आपने उसे सिखा दिए थे, तो आपको सहन होता?

उन्हीं दिनों मैंने आपसे पूछा था, सर! आपने कितने प्रेम किए हैं? आप चौंके थे, एक बार. फिर दार्शनिक हो उठे थे. बोले- पगली, प्रेम क्या कई होते हैं? प्रेम तो हवा तथा नदी की तरह सतत् प्रक्रिया है, मात्र मूरत बदलती रहती है? प्रेम कभी पिता, कभी माँ, भाई, बहन, प्रेमिका, बेटा, बेटी नाती कैसी-कैसी सूरत बदलता है, प्रेम? प्रेम तो अनवरत बहता रहता है. किनारे पर जो भी खड़ा मिलता है, उसमें से किसी को छूकर, किसी को समेट कर आगे बढ़ जाता है. मैं कैसे समझती इस शास्त्रीय ज्ञान को?

पर मैं भी अब, कुछ समझदार हो गई थी तथा मेरे बच्चों को, जो सही मायने में मेरे ससुर की औलाद थे, जी हाँ, आप चौकस थे इस मामले में भी, बड़े होने लगे थे. उन्हें पिता की कमी खलने लगी थी. सो मैं अपने पागल पति को उठा लाई थी, गाँव से. बेचारा पशु है. निरीह पशु थान से बंधा बैठा रहता है, जुगाली करता सा. पर बच्चों को पिता तो मिल गया है. इस समाज में, नारी को पुरुष का सहारा आवश्यक है, चाहे वह कैसा ही निर्बल पुरुष क्यों न हो?

इस बीच आपने मुझे भुला दिया पूर्णतया. मैंने भी आपको अपने मन से उतार दिया था. ‘‘जा को चाहिए मारना मन से देओ उतार.’’ अब शायद अपनी बढ़ती उम्र की वजह से नए शिकार करने में अवश हो गए हैं आप, तभी तो इस नाचीज का ध्यान आया. आप बार-बार आने लगे तो मुझे भी अपने इस सम्मान का ध्यान आया जो मात्र बच्चों की नजर में बचा हुआ था. सो मैंने इशारे से आपको आगाह किया इस बारे में. फिर तो आप बिफर उठे. अपने सारे अहसान गिना डाले जो आपने मुझपर किए थे, जी हाँ- रूहानी और जिस्मानी प्रेम कैसा होता है, वे पल मेरी स्मृति में रचे बसे हैं. अपने उस एकांत में, जो नौकरी और बच्चों की देखभाल में कभी-कभार ही मिल पाता है, अपने उस एकांत में उन पलों को स्मृति के संदूक से निकालकर कितनी पुलकित हो उठती हूँ आप अंदाजा नहीं लगा सकते. मैं तो इन्हें तारीखवार बतला सकती हूँ, पर क्या करूँ आपने ही सिखाया था कि इस देह को समाज के नियम निभाने होंगे? अतः अब मुझे वे नियम निभाने दें और अब तो आप भी नियम निभाना सीखें.

सर! नाराज होकर उस दिन भी आप गए थे और आज यह खत तो शायद आपको और भी आग बबूला कर देगा. सर, प्रेम तो एक सतत् प्रक्रिया है. आपने ही कहा था कि मात्र मूर्ति बदलती रहती है, कभी पिता-माता, दोस्त, प्रेमिका, संतान. सो आप उन सबसे प्रेम कर चुके हैं. अब आप ही के शब्दों में मैं एक मूढ़ अनगढ़ नारी आपको यह कह रही हूँ कि आप, अब तक मात्र स्वयं से प्रेम करते रहे हैं. अब सबकुछ छोड़कर इस समाज से प्रेम कीजिए. सच मानिए सर आप में, अब भी अनंत ऊर्जा है. उस ऊर्जा का सही प्रयोग कीजिए. इस समाज से प्रेम कीजिए, जिसने आपको इतना सब कुछ दिया है, उसे समर्पित कर दीजिए, शेष जीवन. मैं मानती हूं अनेक लोगों की सहायता की है आपने, गरीब, मरीज, गरीब न पढ़ सकने वाले बच्चे. अनेक बूढ़ों को सहारा दिया हैं आपने, मैं इससे इनकार नहीं करती. मैं यह भी मानती हूँ कि मेरे पास, आज जो भी कुछ सुहानी यादें, नौकरी, यहाँ तक यह थोड़ा सा ज्ञान भी, सब आपका दिया हुआ है. इसी वजह से मैं आपसे प्रार्थना करती हूँ. सर सँभालिए स्वयं को.

सम्पर्कः 703, ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी,

से.-20, पंचकुला- 134120,

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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,224,लघुकथा,806,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,306,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,57,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1882,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,637,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,676,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,52,साहित्यिक गतिविधियाँ,181,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,52,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: प्राची - फरवरी 2017 / कहानी / खत / डॉ. श्याम सखा ‘श्याम’
प्राची - फरवरी 2017 / कहानी / खत / डॉ. श्याम सखा ‘श्याम’
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