रचनाकार में खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

प्राची - फरवरी 2017 / कहानी / कलह / ललन तिवारी

SHARE:

कहानी कलह ललन तिवारी परिचय जन्म : 1 जुलाई, 1954 को बिहार प्रांत के रोहतास जिलान्तर्गत सदोखर गांव में. 1972 से बोकारो इस्पात संय...

कहानी

कलह

ललन तिवारी

clip_image002

परिचय

जन्म : 1 जुलाई, 1954 को बिहार प्रांत के रोहतास जिलान्तर्गत सदोखर गांव में. 1972 से बोकारो इस्पात संयंत्र में कार्यरत. 2014 में सेवानिवृत्त.

प्रकाशन : तीन कहानी संग्रह, पांच कविता संग्रह, तीन नाटक प्रकाशित. दो नाटक और दो कहानी संग्रह प्रकाश्य.

अन्य : हंस, वर्तमान साहित्य, कथाक्रम, अक्षर पर्व, आजकल, नया पथ, परिकथा, उद्भावना, कतार, विपक्ष, उत्तरा, साहित्य अमृत, संवेद वाराणसी, पल प्रतिपल, विपाशा, निशांत, आदि पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.

पता : विमर्श,6 , बी-ब्लॉक, ए-बी रोड, रामनगर कॉलोनी, चास, बोकारो-827013 (झारखंड)

मो. 9470972093 ई-मेलः l.tiwari.bokaro@gmail.com

‘‘बचाओ-बचाओ...प्लीज हेल्प मी. दरवाजा खोलो प्लीज...बेबी! साधना! स्वीटी! यह मुझे जान से मार डालेगा...बचाओ-बचाओ.’’

रात के चार बजे एक नारी की आर्त्त-पुकार ने मुझे सोते से जगा दिया.

यह कौन हो सकती है? यह तो पढ़ी-लिखी महिला का आर्त्तकंठ है. वह भी बिल्कुल पास का. मैं यहाँ किसी को जानता नहीं. मैं खुद बेटा-बहू का मेहमान था एक सप्ताह से. इस बिल्डिंग के सारे फ्लैट्स बंगाली-उड़िया, मद्रासी छोकरों से भरे हैं. स्त्री-दर्शन तो किसी-किसी में. बाकी में ताले.

‘‘हेल्प मी....’’ का स्वर अभी भी आ रहा था. दरवाजा पीटा जा रहा था.

[ads-post]

मैं आंदोलित हुआ. दरवाजा खोलकर बाहर आया. पूरा बरामदा लोगों से भरा था. साधना, बेबी, स्वीटी निरपेक्ष भाव से खड़ी दिखीं.

‘‘पकड़ो-पकड़ो भागने नहीं पाए.’’ मैंने ललकारा. मुझे चोरी की शंका हुई. उसके माल-असबाब को चोर उठा ले गये होंगे. चोरी के दौरान महिला की नींद खुली होगी. चोरों से उलझ गयी होगी. उसका पीछा किया होगा. उसे पकड़ने में असमर्थ, मदद के लिए पुकार रही है. मैं ही कौन जवान था जो चोर को पकड़ लेता दौड़कर. वह घटना बिल्डिंग के तीसरे और अंतिम माले की थी. पास पहुँचा तो एक पुरुष को उस महिला से उलझा हुआ पाया.

‘‘पकड़ो-पकड़ो भागने नहीं पाए.’’ पुनः ललकारा. पर, दर्शकों में न कोई हलचल देखी न ही गरमी.

‘‘मैं चोर को पकड़ने के लिए कह रहा हूँ और आपलोग तमाशा देख रहे हैं?’’

किसी में सुगबुगाहट नहीं. खटका हुआ, ‘लगता है यह ‘चोर-छिनार’ की बात नहीं है. मामला कुछ दूसरा है. पुरुष-महिला के बीच हाथापायी के बावजूद वे मूर्तिवत् तमाशा देख रहे हैं.’

‘‘अंकल हेल्प मी, यह मुझे पीट रहा है.’’ महिला ने मुझे उकसाया.

मैं उसका कॉलर पकड़ने ही वाला था कि पुरुष मेरी तरफ पलटा-

‘‘अंकल प्लीज, इस विवाद में मत पड़िए. यह आपस का मामला है।’’

‘‘आपस का...?’’ मैं ठिठक गया, ‘इसीलिए साले पड़ोसी नहीं छुड़ा रहे हैं.’ मैंने मन में कहा.

मैंने दोनों को ध्यान से देखा. दोनों पढ़े-लिखे संभ्रांत. चेहरा-मोहरा सुंदर. गोरा-नाजुक-सौम्य. उम्र पैंतीस-चालीस के आस-पास. पुरुष शर्ट-पैंट, जूते में. महिला स्लीपिंग ड्रेस में. बिना बाँह वाली बंडी. घुटने तक ढीली पैंट. बाल बिखरा-बिखरा. यानी अस्त-व्यस्त चेहरा. किन्तु, दोनों की लड़ाई देख, मन स्थिर नहीं हो पा रहा था, न ही धारणा स्पष्ट.

सबसे पहले मैंने पुरुष को उसकी बाँह पकड़ कर अलग किया.

‘‘आपको जो भी कहना हो महिला की बाँह छोड़कर. इतने लोगों के बीच इनका हाथ पकड़ना शोभा नहीं देती.’’ मैंने उसे झिड़कते हुए कहा. वह मान गया.

दोनों पसीना-पसीना. गले सूख गए थे. मुख आरक्त. महिला बार-बार पुरुष पर पीटने का आरोप लगाती. शरीर पर उभरे नख-चिह्नों को दिखाती. स्त्री-बदन की ताक-झाँक कितना करता सो सरसरी दृष्टि से ही देखा.

‘‘प्लीज अंकल! आप चले जाइए. सी इज माई वाइफ.’’

मुझे गुस्सा आ गया, ‘‘आप पति-पत्नी हैं और सरेआम मारपीट? चलिए घर के अन्दर. आपस का मामला घर में निपटाया जाता है न कि रोड पर?...और, झगड़ने के लिए रात ही मिली थी? वह भी तीन बजे? दिन भर क्या कर रहे थे? सबकी नींद हराम करके रखी है. अपनी उम्र भी देखिए.’’

मैंने दोनों को घर के अन्दर ठेला. वहाँ भी झाँव-झाँव. झगड़ने का सूत्र पकड़ में नहीं आ रहा था. जैसे कोई तबला-झाल बेमेल बज रहा हो अथवा खाली टीन में कंकड़ डाल कर हिलाया जा रहा हो.

‘‘देखिए, आपलोग इस तरह लड़िएगा तो कोई व्यक्ति पास नहीं बैठेगा. झगड़ने के लिए छोड़ देगा. दोनों के हाथ में लाठी-डंडा थमा देगा.’’

दोनों चुप होकर बिल्ली-बिलाव की तरह खूंखार चेहरा बनाए बैठ गए. झगड़े की वज़ह जानने में सबसे बड़ी समस्या भाषा की थी. वे एक ही साथ हिन्दी-मराठी-अँग्रेजी का प्रयोग करते. पल्ले कुछ नहीं पड़ता.

‘‘मैं आप दोनों की बात समझ नहीं पा रहा हूँ, कृपया

धीरे-धीरे बोलें.’’ मैंने निवेदन किया.

‘‘देखिए, देखिए अंकल! इसने सारा सामान फेंक दिया. पंखा तोड़ दिया. परदा फाड़ दिया. पेलमेट गिरा दिया...अन्दर आकर देखिए अंकल.’’

महिला मेरी बाँह पकड़कर दिखाने लगी. वे अन्दर थे. मैं दरवाजे पर खड़ा था. वह महिला मुझे अन्दर खींचने लगी. मुझे झिझक हुई. किसी का नैतिक अधिकार नहीं कि किसी महिला के बेडरूम में जाकर तहकीकात करे. और, वह बार-बार आग्रह...द्रोपदी के आर्त्तनाद सुनकर कृष्ण को द्वारिका से बिना जूते-चप्पल के दौड़कर आना पड़ा था. मैं ड्राइंग रूम में भी नहीं? मेरे वहाँ पहुँचते-पहुँचते पुरुष ने कमाल दिखा दिया था. वह उसे बेड पर पटक कर शेर जैसा सवार हो गया था. और चुपके से महिला का मोबाइल अपनी पैंट की जेब में डाल चुका था. किसी परपुरुष के सामने पति-पत्नी का उस तरह का झगड़ा कभी देखा नहीं था. मुझे पुरुष की बाँह पकड़ कर खींचना पड़ा. तभी महिला पुरुष की चंगुल से मुक्त हो पायी थी.

‘‘प्लीज अंकल, पुलिस को खबर कीजिए. या तो यह मेरी जान ले लेगा अथवा अपनी जान दे देगा. थोड़ी देर पहले यह रेलिंग से लटक रहा था. बाँंह पकड़कर खींच लायी हूँ. कृपया इसको भगाइए यहाँ से.’’ महिला ने कहा.

उस मियाँ-बीवी के झगड़े में साठ बरस का अंकल भला क्या करता? कितना बीच-बचाव? फिर दोनों बेडरूम की ओर भागे. वहाँ भी झब्बा-झुटी. वहाँ से दोनों को खींच कर ड्राइंगरूम में लाया. दोनों को बैठाया. दोनों चुप थे. अभी तरकस खाली नहीं हुआ था. किंतु, वे युवा थे और गुस्से की रौ में बहे जा रहे थे. वे शांत भले थे पर भीतर ज्वालामुखी था जो पत्थर से ढँका था. बीच-बीच में गर्मी का दबाव; ढक्कन उठक-बैठक कर रहा था.

मैंने महिला से ही शुरुआत की कि वह अपना प्रॉब्लम सुनाए. वह कुछ कहती, पुरुष बीच में कूद जाता. उसके वाक्यान्शों को सिर पर उठा लेता. पुरुष कुछ कहता, महिला बीच में. इस तरह बिल्ली-बिलाव का झाँव-झाँव. मुझे बार-बार हस्तक्षेप करना पड़ता. एक तो तीन वर्षीय मेरे पोते ने रात बारह बजे तक जगाए रखा. हर दस मिनट पर ‘गुड-नाइट दादा, गुड नाइट दादा’ कहता रहा. दूसरा कष्ट इन मियाँ-बीवी के कारण जिन्होंने चार बजे से ही जगा कर रखा था. आँखों में नींद की हिलोरों के कारण मन चिड़चिड़ाया हुआ था. ऊपर से इन दोनों का द्वन्द्व जैसे राम की ‘शक्ति पूजा’ का सस्वर पाठ हो रहा था. शब्दों में युद्ध चल रहा था. बाण से बाण, प्रत्यंचा से प्रत्यंचा की टंकार...कान फटे जा रहे थे.

‘‘अंकल, सी इज माई वाइफ.’’ पुरुष ने कहा.

‘‘यानी यू आर हर हसबैंड?’’ मैंने पूछा.

‘‘राइट सर!’’

‘‘यह वाइफ-हसबैंड का झगड़ा शाम तक होता है कि एक नींद सोकर रात के तीन बजे से?’’

‘‘सॉरी अंकल.’’ पुरुष ने क्षमा मांगी.

‘‘सॉरी अंकल कहकर सबकी नींद लौटा देंगे?’’ मैंने सरोश पूछा.

‘‘सॉरी अंकल.’’ पुरुष सटक गया.

मैं महिला की ओर अभिमुख हुआ, ‘‘यह आपके हसबैंड हैं?’’

महिला के कंठ में थूक अंटक गया.

‘‘यह आपके पति हैं?...मींस योर हसबैंड?’’ दूबारा पूछा.

‘‘हाँ अंकल. हम पति-पत्नी ही हैं. वाइफ-हसबैंड.’’

‘‘यह स्वीकार करने में संकोच क्यों हो रहा था?’’

वे पति-पत्नी थे, यह स्वीकारना महिला के मुँह से जरूरी था. वरना कभी भी पलट सकती थी. यानी वह पति-पत्नी का मामला था. उनकी पंचायत हो सकती थी. मैंने जज की तरह अपने को स्थापित किया. उन्हें सामान्य करने के लिए इधर-

उधर की चर्चा में उलझाया.

‘‘पति-पत्नी तो हम भी हैं. दिन में झगड़ते हैं और रात में मुँह फुलाकर सोते हैं. तीन दिन मौन व्रत के बाद राधा का मनौवल. बाँह पकड़ते ही गोद में समा जाती. और, एक आप लोग हैं. दिन में मौन व्रत, रात में महाभारत. युद्ध रात में नहीं, दिन में करने का विधान है...यह काम दिन में ही निपटा लिया कीजिए.’’

‘‘अंकल जी, हमदोनों एक साथ नहीं रहते?’’ महिला ने कहा.

‘‘मतलब?’’

‘‘अलग-अलग रहते हैं. यह तीन-चार महीने पर आता है.’’

‘‘तब तो और प्रेम बढ़ना चाहिए. तीन महीने पर हसबैंड घर आता है तो उसका स्वागत करना चाहिए प्रेम-संभाषण से, न कि...’’

‘‘अंकल, यह रात गुजारने के लिए नहीं...मारपीट करने आता है.’’ महिला बोली.

‘‘ना-ना-ना...यह गलत बात है.’’ मैंने पुरुष से पूछा, ‘‘हाँ जी, आप केवल झगड़ा करने आते हैं?’’

‘‘नहीं अंकल. इसकी गलत हरकतों के कारण ही. मैं कहता हूँ तुम मेरे साथ रहो. यह सुनती ही नहीं. यह स्वतंत्र रहना चाहती है अपने फ्रेंड्स के साथ.’’ पुरुष ने कहा.

पति-पत्नी के बीच फ्रेंड्स यानी ‘वो’. मामला गंभीर. और गुत्थी उलझ गयी. मैं महिला की देह टटोलने लगा. उस महिला को अधेड़ नहीं कहा जा सकता न ही पूर्ण यौवना. देह की चमड़ी सिकुड़ी नहीं थी. बालों में कपास की रेशें नहीं मिलीं. चेहरे का लुक-आऊट दुरुस्त. भौंहें तराशी गयी थीं. उस उम्र में भी टीन-एज का फैशन था. सारे वस्त्र ओछे. खुले गले की कुर्ती (बंडी) बिना बाँह वाली. आधी देह झाँक रही थी. घुटने के नीचे की टाँग झलक रही थी. मैंने पुरुष की ओर देखा, जो उस महिला के पागल होने का संकेत कर रहा था.

‘‘हाँ जी, आप हसबैंड के साथ नहीं रहती?’’ महिला से पूछा.

‘‘नहीं. यह सदैव झगड़ा करता है. घमंडी है.’’

‘‘आप कहाँ रहते हैं जी?’’ पुरुष से पूछा.

‘‘माँ-बाप के पास. यहीं मेरा अपना मकान है.’’

‘‘इसीलिए आरोप लगा रहे हैं कि यह अपने फ्रेंड्स के साथ रहती है?’’

‘‘हाँ.’’

‘‘तो उन्हें आने का मौका तो आप ही देते हैं. एक अकेली औरत को हजार मुसीबतें आती हैं. आप साथ रहते तो आपसे कहती न कि दूसरे पुरुष मित्रों से? अब जो सहयोग करेगा, आएगा ही.’’

‘‘वे गलत इरादे से आते हैं इसके इन्विटेशन पर.’’

‘‘उसका मौका भी आप ही देते हैं. इस युवा महिला की देह में भी खून-पानी है. गरमी और नेचुरल नीड्स हैं...क्या आपको स्त्री की जरूरत नहीं पड़ती?’’

‘‘इसकी कई लेडीज फ्रेंड्स हैं अंकल.’’ महिला ने पलटवार किया. उसे मौका मिला था.

आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया. उनका शब्दशः अर्थ समझ से परे था सिवा भावार्थ के. कुछ देर दोनों को झाँव-झाँव करने दिया. फिर मैं खड़ा हो गया, ‘‘आपलोग लड़िए मुझे जाने दीजिए.’’

महिला ने मेरी बाँह पकड़ ली.

‘‘प्लीज अंकल, थोड़ी देर बैठिए जब तक यह जाता नहीं.’’

मुझे बैठना पड़ा. मैंने पैर से सिर तक पुरुष को देखा. बाल तो काले थे पर सिर आधा गंजा. शरीर में युवा मर्द का कसाव नहीं. देह थुलथुल ऑफिस के बाबू माफिक सुकुमार. आँखों के नीचे झाँई.

‘‘पति-पत्नी के बीच बोलने का मुझे कोई हक नहीं. किन्तु, आरोप बेबुनियाद लगता है.’’

‘‘नहीं अंकल, मैं सच कह रही हूँ.’’

महिला के बाद पुरुष ने भी सच बोलने की दुहाई दी.

‘‘किंतु, मैं सहमत नहीं कि दोनों के अनेक मित्र होंगे. आप गुस्से में हैं. और प्रतिशोध ले रहे हैं. एक दूसरे पर गलत आरोप लगाकर. क्या इस महिला के साथ आपने किसी पुरुष को देखा है?’’

पुरुष के पास कोई जवाब नहीं था.

‘‘और, आपने किसी स्त्री को इस पुरुष के साथ?’’

महिला भी निरुत्तर थी. दोनों बगले झाँकने लगे.

‘‘किसी के चरित्र पर ऊँगली उठाना सहज है, प्रमाणित करना नहीं.’’ पुरुष से बोला, ‘‘मान लें इस महिला के कई पुरुष मित्र हैं तो इसमें आपत्ति क्यों?’’

‘‘यह मेरे खानदान एवं सोसाइटी की प्रतिष्ठा के खिलाफ़ है.’’

‘‘और आपका संबंध अन्य दूसरी महिलाओं से रहे तो?’’ पुरुष खलबला गया.

‘‘स्त्री की इज्जत पुरुषों से बड़ी है.’’ पुरुष ने कहा.

‘‘नहीं, पुरुषों ने अपनी प्रतिष्ठा स्त्रियों से जोड़ी है. वह तभी प्रतिष्ठित रहेगा, जब स्त्रियाँ पतिव्रता हों. इसीलिए उनपर बहुत सारी वर्जनाएँ लाद दी हैं और स्वयं सांड़ की तरह उन्मुक्त.’’

‘‘किन्तु, यह तो राजतंत्र से चला आ रहा है.’’

‘‘राजतंत्र में अनेक पत्नियों को रखने की प्रथा थी, न कि दासियों को पार्टनर बनाने की...अगर आप ऐसा करते हैं तो संभल जाइए...यह प्रजातंत्र है. समान कानून है स्त्री-पुरुष के लिए.’’

मैंने पुरुष को समझाया.

‘‘इसको यहाँ से हटाइए अंकल. प्राण देने-लेने लगेगा. आप नहीं भगा पाते हैं तो मैं पुलिस को बुलाती हूँ.’’ महिला ने कहा. मैंने स्त्री को डांटा जो बंदरी की तरह किटकिटा रही थी.

‘‘बिल्कुल ही पुलिस को फोन कर दीजिए. आप नहीं तो मैं ही कर देता हूँ. पुलिस आएगी, दोनों को थाना ले जाएगी. अलग-अलग सेल में बंद करेगी. बयान लेगी. कपड़ा उतरवाकर जख्मों के निशान देखेगी. अगर यह सब पसंद है तो तुरंत पुलिस को फोन कीजिए.’’ महिला सकपकायी.

‘‘हाँ-हाँ, बुलाओ पुलिस को.’’ पुरुष ने व्यंग्य से कहा.

‘‘यहाँ कोई पुलिस-दारोगा नहीं आएगा. मैं खुद ही जज-दारोगा हूँ. आप अपने झगड़े का अंत स्वयं करें.’’ दोनों निरुत्तर. दोनों के कंठ आहिस्ते-आहिस्ते खुले और झाँव-झाँव में बदल गए.

‘‘आप दोनों की शादी कब हुई थी?’’

‘‘उन्नीस सौ नब्बे (1990) में.’’ पुरुष ने बताया.

‘‘अलग-अलग कब हुए?’’

‘‘दो हजार बारह (2012) में.’’

‘‘यानी तीन साल से?’’

‘‘हाँ.’’

‘‘कोई बाल-बच्चा?’’

‘‘पन्द्रह साल का लड़का है.’’

‘‘कहाँ रहता है?’’

‘‘मेरे साथ.’’ पुरुष ने बताया.

महिला की ओर देखा- ‘‘यानी आपका बेटा भी आपके साथ नहीं रहता?’’

पुरुष उत्साहित हुआ.

‘‘जवाब दो, बेटा साथ क्यों नहीं रहता? पूछिए अंकलजी और पूछिए, बेटा साथ क्यों नहीं रहता?’’

‘‘क्योंकि ये लोग उसे रहने नहीं देते न ही मिलने. मैं चोरी-छुपे स्कूल में ही मिलने जाती हूँ.’’

‘‘आपने तो अपना हक़ खो दिया. कभी बेटे के लिए आपने पंचायत की थी? अपना हक़ मांगा था?’’

महिला चुप. वह आँसू पोंछने लगी.

‘‘कैसी विडंबना है कि माँ अपने बेटे से लुक-छिप कर मिलती है. आपने तो अपना पक्ष स्वयं ही कमजोर कर लिया. बेटा आपका ही है या किसी और का?’’

‘‘वह मेरी अपनी ही औलाद है.’’

‘‘फिर आपके साथ वह क्यों नहीं रहता कि पुत्र भार से भी मुक्त रहना चाहती हैं?’’ मैंने पूछा.

‘‘दादी उसकी आने नहीं देती. उसकी डिक्टेटरशिप चलती है.’’

‘‘तो आप ही चली जाती. वह भी तो आपका ही घर है.’’

‘‘वहाँ बहुत सारी पाबंदियाँ हैं.’’ महिला बोली.

‘‘यानी आपको पाबंदी पसंद नहीं. स्वतंत्र ख्यालातों की हैं ...किन्तु, आपके पिता ने उसी घर में आपकी शादी की होगी. दोनों के बीच सहमति होगी. फिर अचानक...!’’

महिला छटपटाने लगी. मैं पूछता रहा-

‘‘लव-मैरेज हुआ था या अरैंज्ड मैरेज?’’

‘‘दोनों. पहले लव मैरेज, बाद में अरैंज्ड. इसके पिता मेरे मामू भी लगते हैं.’’ पुरुष ने कहा.

‘‘इतना शुद्ध संबंधी, खानदानी परिचय, फिर अविश्वास क्यों? पन्द्रह साल ठीक-ठाक के बाद अचानक...?’’

‘‘इसकी बदचलनी के कारण. मेरे होते हुए भी दूसरे पुरुषों के साथ...’’

‘‘चुप रहिए. पुनः उसी लीक पर आ गए.’’ महिला से पूछा- ‘‘आप कहाँ की हैं?’’

‘‘नासिक की.’’

‘‘दोनों की भेंट कैसे हुई?’’

‘‘भेंट-मुलाकात तो बचपन से थी. पुणे पढ़ने आयी इंजीनियरिंग में तो...’’

‘‘...‘लव’ हो गया. लव हो गया तो शादी भी. यानी चट मंगनी पट ब्याह...तब दोनों में प्रेम था. चरित्रवान थे. सावित्री-सत्यवान थे. बच्चा पैदा किया तब तक सही-सलामत थे. बच्चा तेरह साल का हुआ, तो दोनों में बुरे लक्षण आ गए. संबंधों में दरार पैदा हो गयी. तिरसठ का आंकड़ा छत्तीस में बदल गया और अलग-अलग हो गए...यही न बात है?’’

दोनों ने ‘हाँ अंकल’ कहा और राम की शक्तिपूजा का सस्वर पाठ शुरू कर दिया. मैं सुस्ताने लगा. ‘लगे रहो मुन्ना भाई.’

मैंने महिला को देखा. सुबह की ठंड के कारण ठिठुरी हुई थी. रोंगटे खड़े थे. उसके ओछे ड्रेस में आधा शरीर जो खुला था.

‘‘देखिए, आपको ठंड लग रही है. शॉल तो ओढ़ लें. यह केस इतनी जल्दी सुलझने वाला नहीं. आपदोनों थक भी गए हैं. बैटरी रिचार्ज कर लीजिए.’’ मैंने कहा.

थोड़ी देर चुप्पी. कोई टस से मस नहीं हुआ.

‘‘आपके माता-पिता क्या करते हैं?’’ पुरुष से पूछा.

‘‘दे आर इन गर्वनमेंट जॉब. रिटायर होने में तीन साल बाकी हैं.’’

‘‘फादर पोल्टिशियन हैं.’’ महिला ने जोड़ा.

‘‘किस पार्टी के?’’

‘‘कांग्रेस...’’ महिला ने कहा.

‘‘अर्थात्, भालू के हाथ कुदाल.’’

‘‘ह्वाट?’’ उसे मुहावरा समझ में नहीं आया तो पूछा. मैंने उसे स्पष्ट करना चाहा-

‘‘आपके मम्मी-पापा धनी हैं और पोल्टिशियन भी. वहाँ इनकी जैसी महिला का क्या अस्तित्व होगा? इसलिए यह बगावत पर उतर आयी है. यहाँ सास-बहू का सीरियल काम कर रहा है. और, आपको माता-पिता के साथ रहने की मजबूरी है...आप कितने भाई हैं?’’

‘‘इकलौता हूँ.’’

‘‘इसलिए तो माँ-बाप के पक्ष में हैं. वरना जायदाद से बर्खास्त.’’ मैंने कहा.

पुरुष सकपकाया. महिला प्रसन्न.

‘‘सी इज डेंजरस अंकल.’’ महिला ने सास की आलोचना की.

‘‘सास डेंजरस हो सकती है, हसबैंड तो नहीं. फिर भी इन्हें जलील करती हैं. पकड़ने के लिए पुलिस बुलाती हैं, किन्तु यही आदमी आपके पास सात समन्दर पार कर आधी रात को आता है. कितना प्यार करता है आपको. तनिक इसका भी ख्याल कीजिए.’’ मैंने बताया.

‘‘नो अंकल! प्यार नहीं टॉर्चर करने आता है. इसके दिमाग का स्क्रू ढीला है. माँ जैसा कहती है, वैसा ही करता है.’’

‘‘कमाल की बात है. दोनों एक दूसरे को पागल बताते हैं. मेंटल हॉस्पिटल का सर्टिफिकेट दिखाएँगी तभी मैं मानूँगा कि कौन पागल है...’’

‘तू पागल’, ‘तू पागल’- कहते हुए पति-पत्नी भिड़ गए. महाभारत का दृश्य उपस्थित हो गया.

‘‘शांति-शांति-शांति.’’

‘‘इस तरह लड़ना है तो चाय पीकर लड़ें.’’ महिला से कहा- ‘‘या तो आप चाय बनाकर पिलाएँ अथवा मैं ही अपने घर से बनवा कर लाता हूँ. बिना चाय, झगड़ा सुनने में मजा नहीं आ रहा.’’

औरत टस से मस नहीं हुई. मैं जाने के लिए खड़ा हुआ. महिला बाँह पकड़कर लटक गयी.

‘‘प्लीज अंकल मत जाइए जब तक यह यहाँ है. नहीं तो इसे भी साथ लेते जाइए. यह मुझे डिस्टर्ब करेगा.’’ मुझे बैठना पड़ा.

इस बीच महिला अपना मोबाइल ढूँढ़ने लगी. मोबाइल नहीं मिला तो अपने पति से माँगा. पुरुष ने अनभिज्ञता प्रकट की जबकि मोबाइल उसी के पास था. वह मुझसे रिक्वेस्ट करने लगी कि दिलवा दूँ. पुरुष ने पुनः इंकार किया. उसने तो पत्नी के प्रेमियों का पता लगाने हेतु मोबाइल छीना था. दे कैसे!

महिला परेशान. इस बीच पुरुष ने बैग के साथ तीन-चार बार दरवाजे से बाहर-भीतर किया. मैं तो बुरी तरह फंस गया था. उनके झगड़े से मेरा कोई वास्ता नहीं था सिवा दिमाग चटवाने के.

उजाला होने को आया. मुझे ढूँढ़ती हुई मेरी श्रीमती पास आ गयीं. महिला प्रसन्न हुई कि एक बुजुर्ग महिला उसके पक्ष में आ गयी.

‘‘यह हल्ला क्यों हो रहा है?’’ मेरी श्रीमती ने पूछा.

कलह कथा का संक्षिप्तिकरण, महिला संतुष्ट नहीं हुई. उसने भानुमति का पिटारा खोल दिया. जहाँ भी सांस लेती अथवा गैप मिलता उसका पति घुस जाता. यानी वह कथा कहती तो पति ‘फिल्लर’ का काम करता. एक ही कहानी की रील दो-तीन बार घूम चुकी थी. बीच-बीच में ‘झाँव-झाँव’ नगाड़े की तरह होने लगता.

‘‘देखिए, हमलोग मेहमान हैं. आज न कल चले जाएँगे? इसलिए मिलजुल कर रहिए. पूरी जिंदगी बाकी है. यही हाल रहा तो दोनों कटकर मर जाएँगे. पुत्र भी बर्बाद होगा.’’

मेरी श्रीमती ने समझाया. मेरा बोझ हलका हुआ.

महिला बिफर पड़ी, ‘‘यह संभव नहीं है आंटी. मैं इसके साथ एक दिन भी चैन से नहीं रह पाऊँगी.’’

‘‘यह अपने यारों के साथ रहेगी.’’ पुरुष टुभक पड़ा.

‘‘आपको अकेला रहना पसंद है?’’

‘‘हाँ.’’ महिला ने कहा.

‘‘तो तलाक क्यों नहीं ले लेती?’’

‘‘यह पेपर तैयार करके लाएगा तो मैं साइन कर दूँगी.’’

‘‘और, नहीं लाया तो?’’ महिला मौन. मैं ताड़ गया.

‘‘यानी तलाक लेने की गरज केवल पति को ही है. आपकी नहीं?’’

‘‘नहीं, मेरी भी है.’’

‘‘तो कोर्ट में पेटिशन दीजिए. नोटिस जारी होगा तो खुद दौड़ने लगेगा.’’

‘‘मैं कोर्ट जाऊँगी.’’

‘‘आप कभी नहीं जाएँगी. केवल मुँह से कहती हैं.’’ पुरुष से पूछा, ‘‘आप तलाक लेंगे जी?’’

‘‘नहीं. मेरा कुल-खानदान कलंकित होगा. पिता का पोल्टिकल कैरियर चौपट होगा.’’

‘‘फिर झगड़ते क्यों हैं? बेचारी को वनवास कर दिया. सास-ससुर का बंगला छोड़ कर वन बी.एच.के. में रहने को मजबूर कर दिया.’’ श्रीमती ने पुरुष को झिड़का.

‘‘यह अपनी मर्जी से रहती है आंटी. किसी ने इसे भगाया नहीं. यहाँ दोस्त-यारों से मिलने की सुविधा जो है.’’

फिर उसी पुरानी पीच पर पुरुष दौड़ने लगा. महिला

विरोध करती. यानी झाँव-झाँव.

‘‘शांति-शांति-शांति.’’

‘‘आप न दाएँ चलने देती हैं न बाएँ. बार-बार पति पर मारने का आरोप लगाती हैं. यदि उसको मारना होता तो कब का मार चुका होता. उसके पास धन-बल है. अगर उसे आत्महत्या करनी होती तो कब का छलांग लगा देता. आत्मघाती मना करनेवाले की प्रतीक्षा नहीं करता.’’

मैंने महिला से कहा. पुरुष से पूछ डाला- ‘‘क्यों भाई, आत्महत्या करेंगे? यह पुण्य कार्य है. इसमें आपकी मदद करूँगा. कूद जाइए इस तीन तल्ले बिल्डिंग से.’’

‘‘मुझे कुत्ते ने काटा है कि आत्महत्या करुँ? अगर करना ही होगा तो किसी के चाहने से...?’’

‘‘सुन लिया आपने? आपके पतिदेव कभी आत्महत्या नहीं करेंगे. केवल डराते हैं. आप डरती तो हैं किन्तु मानती नहीं. कुछ सुनती नहीं. कितना प्यार करते हैं आपके पति; यह जानते हुए भी कि आपके अनेक पुरुष मित्र हैं...यह कितना बड़ा साहस है. कितना बड़ा त्याग. आपको पाने के लिए सारे आरोपों को खारिज कर दिया. दुर्गुणों को भुला दिया. और आप हैं कि खिसियानी बिल्ली की तरह...’’ मैंने उस महिला से कहा, और चालू रहा-

‘‘यह आपका पति है. दस बार इस दरवाजे से बाहर गया और अन्दर आया. यह क्यों करता है? आपको ले जाने के लिए. वह यहाँ अकेले में छोड़ना नहीं चाहता. आप उसकी पत्नी थी और आज भी हैं क्योंकि तलाक नहीं हुआ है...और, आप हैं कि उसे दुत्कार रही हैं...क्या यह चाकू लेकर आता है कि लठैत? बेचारा अकेले आता है पीठ पर एक बैग लेकर. उस पर भी फोन करके. वह भी आधी रात के बाद...आने पर आप दरवाजा खोलती हैं कि खिड़की से घुस जाता है?’’

‘‘नहीं, दरवाजा खोलती हूँ.’’

‘‘दरवाजा क्यों खोलती हैं? पुलिस को खबर करती...वह आता है तो आप स्वागत करती हैं...और भी कुछ होता होगा?’’

‘‘नहीं.’’ महिला बोली.

‘‘आप दोनों पति-पत्नी एक हैं. बाहर वालों को बेवकूफ बनाती हैं. सबकी नींद हराम करती हैं.’’

मैं जाने के लिए खड़ा हुआ. महिला मेरी श्रीमती का हाथ पकड़कर लटक गयी कि मैं न जाऊँ.

‘‘तो आप क्या चाहती हैं?’’ बैठते हुए मैंने महिला से पूछा.

‘‘शांति. विदाउट एनी डिस्टर्बेन्स.’’

‘‘यह तो निर्जन वन में, हिमालय या प्रशांत महासागर में ही संभव है. आप वहीं चले जाइए.’’

‘‘नहीं अंकल. मैं यहीं शांति से रहना चाहती हूँ. मुझे किसी की जरूरत नहीं. सास-ससुर, पुत्र, पति किसी की नहीं.’’

‘‘यानी, आजाद परिंदा?’’

‘‘हाँ.’’ महिला बोली.

‘‘फादर-मदर, ब्रदर-सिस्टर और फ्रेन्ड्स से भी दूर?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘यानी ससुराल वाले ही आपके दुश्मन हैं. राइट...तो ससुराल छोड़, कहीं भी जीवन निर्वाह हो सकता है? अगर हो सकता है तो वहीं चले जाइए. क्यों इस फजीहत में...’’ मैंने कहा. महिला चुप.

‘‘माँ-बाप बेटी की शादी कर निश्चिंत होना चाहते हैं न कि उसकी अंतहीन समस्या में शामिल. और, कोई सास-ससुर नहीं चाहेगा कि उसकी बहू-बेटी परिंदे की तरह बेलगाम घूमे. आजादी का मतलब स्वच्छंदता नहीं. बल्कि, सामाजिक मर्यादाओं के अंदर रहना है.’’

‘‘तो जुल्म का विरोध नहीं किया जाय?’’ महिला ने आवेश में कहा.

‘‘विरोध करें किन्तु स्वयं जुल्मी नहीं बनें. नारी-स्वतंत्रता यह नहीं कहती है कि सिर्फ अधिकारों के लिए लड़ें और कर्तव्य भूल जाएँ. परिवार के प्रति आपका कर्तव्य ही कहीं नजर नहीं आ रहा. इसीलिए आपके एकाकी संघर्ष में कहीं दृढ़ता नहीं है. न ही आप प्रेम की परिभाषा समझ रही हैं. बिना समर्पण व प्रेम आप अपनी लड़ाई जीत नहीं सकतीं.’’

जहाँ महिला सकपकायी, पुरुष प्रसन्न नजर आया. दोनों लड़ते-झगड़ते थक चुके थे. शीत युद्ध सम पर आ गया था. सुबह के छह. पुरुष ने अपना बैग उठाया. पीठ पर लटकाया और सीढ़ियाँ उतर गया. इस बार वह वापस नहीं लौटा. महिला ने झाँककर देखा. वह आश्वस्त थी कि वह चला गया था.

‘‘अब आप खुश हैं न?’’

‘‘हाँ, अंकल! रात दो बजे से ही टेंशन में रखा था.’’

‘‘किंतु, मैं नहीं. आपने उसे बैरंग लौटा दिया. उसके तन-मन का स्पर्श नहीं किया. उसे जलील ही किया. आप बिल्कुल व्यावहारिक नहीं हैं. आपके पत्थर दिल में प्रेम-करुणा और क्षमा का भाव नहीं. यू चेंज योरसेल्फ.’’

हम पति-पत्नी अपने घर लौट आए.

आधा घंटा बाद महिला उपस्थित हुई. बेटा-बहू जग गए थे. चाय बन रही थी. महिला सामने की कुर्सी पर बैठ गयी. वह फ्रेश होकर आयी थी. कपड़ा चेंजकर. वही बिना बाँह वाली टी-शर्ट. घुटने तक पैंट. हाई हील की चप्पल. नार्मल मेकअप. दो शूटकेस और हाथ में मोबाइल. वह परेशान थी. मोबाइल में व्यस्त.

‘‘इसी मोबाइल के लिए न शोर मचाया था आपने?’’

‘‘नहीं अंकल! यह दूसरा मोबाइल है. यहाँ दो-तीन मोबाइल रखती हूँ. वह जब भी आता है; पहला हमला मोबाइल पर करता है और मोबाइल छीन ले जाता है.’’ महिला ने लट सुलझाते हुए कहा.

मैंने उस महिला को आपादमस्तक देखा. वह अपने घर में ताला लगाकर आयी थी. किसी गर्लफ्रेंड को बुलाया था, जिसकी प्रतीक्षा थी. वह बार-बार, घड़ी देखती और रेलिंग से नीचे हुलक आती.

‘‘चाय पीजिए.’’ प्याला थमाते हुए बहू ने कहा. उसके केस में बहू-बेटा किसी की रुचि नहीं थी.

‘‘आप घर जाएँगी या मित्र के घर?’’

‘‘पहले मित्र के घर, बाद में माँ के घर नासिक.’’

‘‘और, वे खुश होंगे. तेरा स्वागत करेंगे. दुनिया भर की आजादी दे देंगे. और कहेंगे, जा बेटी जा. आजाद परिंदे की तरह घूमो. घाट-घाट का पानी पिओ और अपने घर-परिवार की उपेक्षा करो.’’

मैंने महिला से कहा. महिला चुप. उसे कोई उत्तर नहीं सूझा.

‘‘जैसे उड़ि जहाज का पंछी, पुनि जहाज पर आवै... आपका केन्द्र व ठिकाना वह ससुराल है. आप भटक गयी हैं. इसके लिए सास को दोषी मानती हैं. कल आप भी तो सास बनेंगी? अगर आपकी बहू स्वच्छंद होकर रहे. घर-परिवार से पंगा ले तो आपको अच्छा लगेगा?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘आपकी सास अपनी परंपरा हो जुड़ी हैं. सब पर लगाम रखना चाहती है कि उच्छृंखल न रहे. सास भी अपनी सास से यही सीखी होंगी और यही आपको सिखाना चाहती हैं जिसे आपको मंजूर नहीं. बगावत कर रही हैं. आज आप स्वस्थ हैं. अपने पैरों पर खड़ी हैं, इसलिए मचल रही हैं. क्रांति कर रही हैं. कल कुछ हो गया तो कौन देखभाल करेगा? तेरे माँ-बाप कल नहीं रहेंगे तो तुझे कौन पूछेगा? क्या तेरा भाई तेरी सेवा करेगा?...नहीं, नहीं करेगा. मैं लिख कर देता हूँ. जब भी सेवा करेगा, तेरा पति. यह पुरुष प्रधान समाज है. अंततः पुरुषों पर ही निर्भर होना पड़ेगा. और, पुरुष सामाजिक नियमों के अधीन ही चलेगा...अपना बुरा-भला सोच कर ही कहीं जाएंगी. जल्दबाजी का काम शैतान का. यही मेरी अंतिम सलाह है.’’

मैंने अपनी आँखें मूँद लीं. वह महिला सोच में पड़ गयी.

मैं मॉर्निंग वाक करके घंटा भर बाद लौटा तो वह महिला जा चुकी थी. उसके घर का ताला खुला हुआ था. मैंने राहत की सांस ली.

‘‘अरे बाप, वह फिर आ गया.’’

बहू ने बरामदे से नीचे हुलक कर देखा. मैंने भी देखा. सड़क पर वह पुरुष नजर आया. इसके पीछे एक उम्रदराज महिला. छह फीट लंबी. रोबदार चेहरा. जिसके पीछे ड्राइवर, गार्ड. शायद उसकी सास थी. जब वह दलबल के साथ ऊपर आयी, इस महिला को माथे पर चुन्नी रखकर उसके पाँव छूते हुए देखा. अब पुनः पंचायत होगी और मैं बुलाया जाऊँगा. इस भय से ‘अनुलोम-विलोम’ करने लगा.

---

COMMENTS

BLOGGER

|नई रचनाएँ_$type=complex$tbg=rainbow$count=6$page=1$va=0$au=0

|कथा-कहानी_$type=complex$tbg=rainbow$au=0$count=6$page=1$src=random-posts$s=200

|हास्य-व्यंग्य_$type=blogging$au=0$count=6$page=1$src=random-posts

|लोककथाएँ_$type=complex$tbg=rainbow$au=0$count=6$page=1$src=random-posts

|लघुकथाएँ_$type=list$au=0$count=5$com=0$page=1$src=random-posts

|काव्य जगत_$type=complex$tbg=rainbow$au=0$count=6$page=1$src=random-posts

|बच्चों के लिए रचनाएँ_$type=complex$tbg=rainbow$au=0$count=6$page=1$src=random-posts

|विविधा_$type=complex$tbg=rainbow$au=0$va=0$count=6$page=1$src=random-posts

 आलेख कविता कहानी व्यंग्य 14 सितम्बर 14 september 15 अगस्त 2 अक्टूबर अक्तूबर अंजनी श्रीवास्तव अंजली काजल अंजली देशपांडे अंबिकादत्त व्यास अखिलेश कुमार भारती अखिलेश सोनी अग्रसेन अजय अरूण अजय वर्मा अजित वडनेरकर अजीत प्रियदर्शी अजीत भारती अनंत वडघणे अनन्त आलोक अनमोल विचार अनामिका अनामी शरण बबल अनिमेष कुमार गुप्ता अनिल कुमार पारा अनिल जनविजय अनुज कुमार आचार्य अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ अनुज खरे अनुपम मिश्र अनूप शुक्ल अपर्णा शर्मा अभिमन्यु अभिषेक ओझा अभिषेक कुमार अम्बर अभिषेक मिश्र अमरपाल सिंह आयुष्कर अमरलाल हिंगोराणी अमित शर्मा अमित शुक्ल अमिय बिन्दु अमृता प्रीतम अरविन्द कुमार खेड़े अरूण देव अरूण माहेश्वरी अर्चना चतुर्वेदी अर्चना वर्मा अर्जुन सिंह नेगी अविनाश त्रिपाठी अशोक गौतम अशोक जैन पोरवाल अशोक शुक्ल अश्विनी कुमार आलोक आई बी अरोड़ा आकांक्षा यादव आचार्य बलवन्त आचार्य शिवपूजन सहाय आजादी आदित्य प्रचंडिया आनंद टहलरामाणी आनन्द किरण आर. के. नारायण आरकॉम आरती आरिफा एविस आलेख आलोक कुमार आलोक कुमार सातपुते आशीष कुमार त्रिवेदी आशीष श्रीवास्तव आशुतोष आशुतोष शुक्ल इंदु संचेतना इन्दिरा वासवाणी इन्द्रमणि उपाध्याय इन्द्रेश कुमार इलाहाबाद ई-बुक ईबुक ईश्वरचन्द्र उपन्यास उपासना उपासना बेहार उमाशंकर सिंह परमार उमेश चन्द्र सिरसवारी उमेशचन्द्र सिरसवारी उषा छाबड़ा उषा रानी ऋतुराज सिंह कौल ऋषभचरण जैन एम. एम. चन्द्रा एस. एम. चन्द्रा कथासरित्सागर कर्ण कला जगत कलावंती सिंह कल्पना कुलश्रेष्ठ कवि कविता कहानी कहानी संग्रह काजल कुमार कान्हा कामिनी कामायनी कार्टून काशीनाथ सिंह किताबी कोना किरन सिंह किशोरी लाल गोस्वामी कुंवर प्रेमिल कुबेर कुमार करन मस्ताना कुसुमलता सिंह कृश्न चन्दर कृष्ण कृष्ण कुमार यादव कृष्ण खटवाणी कृष्ण जन्माष्टमी के. पी. सक्सेना केदारनाथ सिंह कैलाश मंडलोई कैलाश वानखेड़े कैशलेस कैस जौनपुरी क़ैस जौनपुरी कौशल किशोर श्रीवास्तव खिमन मूलाणी गंगा प्रसाद श्रीवास्तव गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर ग़ज़लें गजानंद प्रसाद देवांगन गजेन्द्र नामदेव गणि राजेन्द्र विजय गणेश चतुर्थी गणेश सिंह गांधी जयंती गिरधारी राम गीत गीता दुबे गीता सिंह गुंजन शर्मा गुडविन मसीह गुनो सामताणी गुरदयाल सिंह गोरख प्रभाकर काकडे गोवर्धन यादव गोविन्द वल्लभ पंत गोविन्द सेन चंद्रकला त्रिपाठी चंद्रलेखा चतुष्पदी चन्द्रकिशोर जायसवाल चन्द्रकुमार जैन चाँद पत्रिका चिकित्सा शिविर चुटकुला ज़कीया ज़ुबैरी जगदीप सिंह दाँगी जयचन्द प्रजापति कक्कूजी जयश्री जाजू जयश्री राय जया जादवानी जवाहरलाल कौल जसबीर चावला जावेद अनीस जीवंत प्रसारण जीवनी जीशान हैदर जैदी जुगलबंदी जुनैद अंसारी जैक लंडन ज्ञान चतुर्वेदी ज्योति अग्रवाल टेकचंद ठाकुर प्रसाद सिंह तकनीक तक्षक तनूजा चौधरी तरुण भटनागर तरूण कु सोनी तन्वीर ताराशंकर बंद्योपाध्याय तीर्थ चांदवाणी तुलसीराम तेजेन्द्र शर्मा तेवर तेवरी त्रिलोचन दामोदर दत्त दीक्षित दिनेश बैस दिलबाग सिंह विर्क दिलीप भाटिया दिविक रमेश दीपक आचार्य दुर्गाष्टमी देवी नागरानी देवेन्द्र कुमार मिश्रा देवेन्द्र पाठक महरूम दोहे धर्मेन्द्र निर्मल धर्मेन्द्र राजमंगल नइमत गुलची नजीर नज़ीर अकबराबादी नन्दलाल भारती नरेंद्र शुक्ल नरेन्द्र कुमार आर्य नरेन्द्र कोहली नरेन्‍द्रकुमार मेहता नलिनी मिश्र नवदुर्गा नवरात्रि नागार्जुन नाटक नामवर सिंह निबंध नियम निर्मल गुप्ता नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ नीरज खरे नीलम महेंद्र नीला प्रसाद पंकज प्रखर पंकज मित्र पंकज शुक्ला पंकज सुबीर परसाई परसाईं परिहास पल्लव पल्लवी त्रिवेदी पवन तिवारी पाक कला पाठकीय पालगुम्मि पद्मराजू पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बालगीत बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार श्रीवास्तव मनोज दास ममता सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष सिंह रावण राहुल कुमार राहुल सिंह रिंकी मिश्रा रिचर्ड फाइनमेन रिलायंस इन्फोकाम रीटा शहाणी रेंसमवेयर रेणु कुमारी रेवती रमण शर्मा रोहित रुसिया लक्ष्मी यादव लक्ष्मीकांत मुकुल लक्ष्मीकांत वैष्णव लखमी खिलाणी लघु कथा लघुकथा लतीफ घोंघी ललित ग ललित गर्ग ललित निबंध ललित साहू जख्मी ललिता भाटिया लाल पुष्प लावण्या दीपक शाह लीलाधर मंडलोई लू सुन लूट लोक लोककथा लोकतंत्र का दर्द लोकमित्र लोकेन्द्र सिंह विकास कुमार विजय केसरी विजय शिंदे विज्ञान कथा विद्यानंद कुमार विनय भारत विनीत कुमार विनीता शुक्ला विनोद कुमार दवे विनोद तिवारी विनोद मल्ल विभा खरे विमल चन्द्राकर विमल सिंह विरल पटेल विविध विविधा विवेक प्रियदर्शी विवेक रंजन श्रीवास्तव विवेक सक्सेना विवेकानंद विवेकानन्द विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी विष्णु नागर विष्णु प्रभाकर वीणा भाटिया वीरेन्द्र सरल वेणीशंकर पटेल ब्रज वेलेंटाइन वेलेंटाइन डे वैभव सिंह व्यंग्य व्यंग्य के बहाने व्यंग्य जुगलबंदी व्यथित हृदय शंकर पाटील शगुन अग्रवाल शबनम शर्मा शब्द संधान शम्भूनाथ शरद कोकास शशांक मिश्र भारती शशिकांत सिंह शहीद भगतसिंह शामिख़ फ़राज़ शारदा नरेन्द्र मेहता शालिनी तिवारी शालिनी मुखरैया शिक्षक दिवस शिवकुमार कश्यप शिवप्रसाद कमल शिवरात्रि शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी शीला नरेन्द्र त्रिवेदी शुभम श्री शुभ्रता मिश्रा शेखर मलिक शेषनाथ प्रसाद शैलेन्द्र सरस्वती शैलेश त्रिपाठी शौचालय श्याम गुप्त श्याम सखा श्याम श्याम सुशील श्रीनाथ सिंह श्रीमती तारा सिंह श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंगी श्वेता अरोड़ा संजय दुबे संजय सक्सेना संजीव संजीव ठाकुर संद मदर टेरेसा संदीप तोमर संपादकीय संस्मरण संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018 सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सतीश कुमार त्रिपाठी सपना महेश सपना मांगलिक समीक्षा सरिता पन्थी सविता मिश्रा साइबर अपराध साइबर क्राइम साक्षात्कार सागर यादव जख्मी सार्थक देवांगन सालिम मियाँ साहित्य समाचार साहित्यिक गतिविधियाँ साहित्यिक बगिया सिंहासन बत्तीसी सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध सीताराम गुप्ता सीताराम साहू सीमा असीम सक्सेना सीमा शाहजी सुगन आहूजा सुचिंता कुमारी सुधा गुप्ता अमृता सुधा गोयल नवीन सुधेंदु पटेल सुनीता काम्बोज सुनील जाधव सुभाष चंदर सुभाष चन्द्र कुशवाहा सुभाष नीरव सुभाष लखोटिया सुमन सुमन गौड़ सुरभि बेहेरा सुरेन्द्र चौधरी सुरेन्द्र वर्मा सुरेश चन्द्र सुरेश चन्द्र दास सुविचार सुशांत सुप्रिय सुशील कुमार शर्मा सुशील यादव सुशील शर्मा सुषमा गुप्ता सुषमा श्रीवास्तव सूरज प्रकाश सूर्य बाला सूर्यकांत मिश्रा सूर्यकुमार पांडेय सेल्फी सौमित्र सौरभ मालवीय स्नेहमयी चौधरी स्वच्छ भारत स्वतंत्रता दिवस स्वराज सेनानी हबीब तनवीर हरि भटनागर हरि हिमथाणी हरिकांत जेठवाणी हरिवंश राय बच्चन हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन हरिशंकर परसाई हरीश कुमार हरीश गोयल हरीश नवल हरीश भादानी हरीश सम्यक हरे प्रकाश उपाध्याय हाइकु हाइगा हास-परिहास हास्य हास्य-व्यंग्य हिंदी दिवस विशेष हुस्न तबस्सुम 'निहाँ' biography dohe hindi divas hindi sahitya indian art kavita review satire shatak tevari undefined
नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3793,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,326,ईबुक,182,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2744,कहानी,2069,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,484,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,129,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,87,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,309,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,326,बाल कलम,23,बाल दिवस,3,बालकथा,48,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,8,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,16,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,224,लघुकथा,806,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,306,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,57,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1882,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,637,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,676,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,52,साहित्यिक गतिविधियाँ,181,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,52,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: प्राची - फरवरी 2017 / कहानी / कलह / ललन तिवारी
प्राची - फरवरी 2017 / कहानी / कलह / ललन तिवारी
https://lh3.googleusercontent.com/-wI5TvOLbPCA/WORoPYHkDqI/AAAAAAAA32E/JZ0ea66tPMg/image_thumb%25255B1%25255D.png?imgmax=800
https://lh3.googleusercontent.com/-wI5TvOLbPCA/WORoPYHkDqI/AAAAAAAA32E/JZ0ea66tPMg/s72-c/image_thumb%25255B1%25255D.png?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2017/04/blog-post_56.html
https://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/2017/04/blog-post_56.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय खोजें सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है चरण 1: साझा करें. चरण 2: ताला खोलने के लिए साझा किए लिंक पर क्लिक करें सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ