रु. 25,000+ के  नाका लघुकथा पुरस्कार हेतु रचनाएँ आमंत्रित.

अधिक जानकारी के लिए यहाँ http://www.rachanakar.org/2018/10/2019.html देखें.

नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

रसनिष्पत्ति सामाजिक के संस्कारों से बंधकर होती है [ विचार, संस्कार और रस-4 ] / रमेशराज

साझा करें:

  एक कवि द्वारा सृजित काव्य जिन परिस्थितियों में एक सामाजिक द्वारा आस्वाद्य होता है, उसके लिए उस सामाजिक का काव्य-सामग्री के प्रति रुचि लेन...

clip_image001

 

एक कवि द्वारा सृजित काव्य जिन परिस्थितियों में एक सामाजिक द्वारा आस्वाद्य होता है, उसके लिए उस सामाजिक का काव्य-सामग्री के प्रति रुचि लेना परामावश्यक है। सामाजिक की रुचि का विषय, किसी काव्य-सामग्री को पढ़कर मात्र रस या आनंद ग्रहण करना ही नहीं होता, वह उस काव्य-सामग्री में वर्णित मूल्यों का विवेचन करने, उसके सामाजिक प्रभाव देखने, उसमें कुछ नया खोजने या पाने की दृष्टि से भी काव्य का अध्ययन करता है। किसी भी काव्य-सामग्री की सार्थकता या निरर्थकता का संबंध आस्वादक या सामाजिक की वैचारिक अवधारणाओं पर निर्भर रहता है और आस्वादक की पूर्व निर्धारित वैचारिक अवधारणाएं उसके मन में विभिन्न प्रकार की रसात्मकता पैदा करती हैं।

[ads-post]

एक सुधी पाठक के मन में उसकी वैचारिक अवधारणाओं के अनुसार किस प्रकार और कैसी रसात्मकबोध की स्थिति बनती है, इसके लिए एक प्रामाणिक सुधी पाठक के रूप में यदि हम आचार्य रामचंद्र शुक्ल की विवेचना करें और उस रस-दशा के निर्माण में उनके संस्कारों अर्थात् जीवन-मूल्यों के योगदान को परखें तो यह तथ्य खुलकर सामने आ जाते हैं कि किसी भी सामाजिक में समस्त प्रकार का भावोद्बोधन विचारों के द्वारा ही संपन्न होता है। आचार्य शुक्ल रामायण के आस्वादनोपरांत भक्तिरस से सिक्त होते हुए कहते हैं-‘‘ आदिकाव्य के भीतर लोकमंगल की शक्ति के उदय का आभास ताड़का और मारीच के दमन के प्रसंग में ही मिल जाता है। पंचवटी में वह शक्ति जोर पकड़ती दिखाई देती है। सीता-हरण होने पर उसमें आत्मगौरव और दाम्पत्य प्रेम की प्रेरणा बीच में प्रकट होकर, उस विराट मंगलोन्मुखी गति में समन्वित हो जाती है।1

आदिकाव्य रामायण के प्रति आचार्य शुक्ल की भक्ति और श्रद्धा से युक्त बनी मनोदशाओं के कारण को यदि हम खोजें तो-

1. आचार्य शुक्ल आदि काव्य के नायक राम को भगवान का वह स्वरूप मानते हैं, जो समय-समय पर अवतार लेकर दुष्टों का विनाश करता है, वे कहते हैं-‘‘यदि राम द्वारा रावण का वध तथा दमन न हो सकता तो भी राम की गतिविधि का पूरा सौंदर्य रहता, पर उनमें भगवान की पूर्ण कला का दर्शन न होता, क्योंकि भगवान की शक्ति अमोघ है।’’

2. आचार्य शुक्ल की लोकमंगल के लिए किए गए सुकार्यों के प्रति यह अवधारणा है कि-‘‘यदि करुणा किसी व्यक्ति की विशेषता पर अवलंबित होगी कि पीडि़त व्यक्ति हमारा कुटुम्बी, मित्र आदि है तो उस करुणा के द्वारा प्रवर्तित उग्र व तीक्ष्ण भावों में उतनी सुंदरता न होगी। पर बीज रूप में अंतस्संज्ञा में स्थित करुणा यदि इस ढब की होगी कि इतने पुरवासी, इतने देशवासी या इतने मनुष्य पीड़ा पा रहे हैं तो उसके द्वारा प्रवर्तित तीक्ष्ण या उग्र भावों का सौंदर्य उत्तरोत्तर अधिक होगा।’’1

मतलब यह है कि आचार्य शुक्ल को सौंदर्य का उत्तरोत्तर अनुभव ऐसे कार्यों से ही प्राप्त हो सकता है, जिनमें नायक किसी व्यक्ति विशेष पर आए संकट के प्रति करुणाद्र न होकर समूचे लोक पर आए संकट के प्रति करुणाद्र होता है और बचाने के प्रयास करता है। इससे सीधा अर्थ यह निकलता है कि आचार्य शुक्ल की वैचारिक अवधारणाओं की तुष्टि करुणा के उदात्त और मानवीय स्वरूप से होती है। चूंकि करुणा का लोकहितकारी रूप उन्हें आदि काव्य रामायण के नायक राम में दिखलाई देता है, अतः स्वाभाविक रूप से राम के प्रति श्रद्धा और भक्ति उनके मन में उद्बुद्ध हो जाती है।

लेकिन टॉलस्टॉय की कृतियों में जब उन्हें इसी प्रकार के लोककल्याणकारी और मानवीय तत्त्वों के दर्शन होते हैं तो उनके मन में संवेदनात्मक रसात्मकबोध का निर्माण नहीं होता, बल्कि उनके मन में प्रतिवेदनात्मक रस की स्थिति इस प्रकार बनती है-

‘‘टॉलस्टॉय के मनुष्य से मनुष्य में भ्रातृ प्रेम संचार को ही एकमात्र काव्य-तत्त्व कहने का बहुत कुछ कारण सांप्रदायिक था... टॉलस्टॉय के अनुयायी प्रयत्न पक्ष को लेते अवश्य हैं पर केवल पीडि़तों की सेवा सुश्रूषा की दौड़-ध्ूप... आततायियों पर प्रभाव डालने के लिए साधुता के लोकोत्तर प्रदर्शन, त्याग, कष्ट, सहिष्णुता इत्यादि में ही उसका सौंदर्य तलाश करते हैं। साधुता की इस मृदुल गति को वे आध्यात्मिक शक्ति कहते हैं। आध्यात्मिक शब्द की मेरी समझ में काव्य या कला के क्षेत्र में कोई जरूरत नहीं है।’’

मनुष्य जाति के संकट और दुख में करुणाद्र होकर उसे बचाने के प्रयत्न पक्ष में उत्तरोत्तर सौंदर्य का विकास महसूस करने वाले आचार्य शुक्ल आखिर टॉलस्टॉय की मनुष्य से मनुष्य के बीच भ्रातृ-प्रेम की प्रक्रिया [ जिसमें त्याग, कष्ट, सहिष्णुता, पीडि़तों की सेवा-सुश्रूषा आदि के रूप में करुणा के बहुआयामी, सौंदर्यातिरेक से पूर्ण दर्शन होते हैं ] को इतना बेमानी, सारहीन, सांप्रदायिक क्यों ठहरा देते हैं? उनके इस प्रतिवेदनात्मक रसात्मकबोध के पीछे ऐसे कौन-से कारण हैं जो टॉलस्टॉय के काव्य में किसी प्रकार का करुणात्मक, रत्यात्मक, हर्षात्मक तत्त्वों के दर्शन नहीं होने देते। उत्तर के लिए हमें शुक्लजी के जीवन-मूल्यों को बारीकी से फिर समझना पड़ेगा।

1. चूंकि आचार्य शुक्ल की सारी-की-सारी वैचारिक अवधारणाएं ईश्वरवादी हैं अर्थात् उनकी रागात्मकता का विषय वह आलौकिक शक्ति है, जो समूचे लोक या मानव जाति की पीड़ाओं, संकटों के प्रति करुणाद्र होकर दुष्टों, अत्याचारियों आदि से रक्षा करता है, अतः शुक्लजी को [ राम को ईश्वरीय अंश या स्वरूप मानने के कारण ] आदि काव्य के नायक राम की समस्त व्यावहारिकता में तो कल्याणकारी, मानवतावादी तत्त्वों के दर्शन हो जाते हैं लेकिन जब यही गुण उन्हें काव्य के स्तर पर लोक के प्राणियों में दृष्टिगोचर होते हैं तो वे [ लौकिक प्राणियों का ईश्वरीय स्वरूप न बन पाने के कारण ] उन गुणों को लोक-कल्याणकारी नहीं मान पाते हैं।

2. चूंकि शुक्लजी अध्यात्म की सारी-की-सारी व्याख्याओं, मान्यताओं, आस्थाओं आदि को ईश्वर और भक्त या आत्म-परमात्मा के मध्य ही लेते हैं, फलतः टॉलस्टॉय के आध्यात्मकवाद को [ जिसमें भ्रातृ-प्रेम का संचार हो ] उनके संस्कार ग्रहण नहीं कर पाते हैं। अतः वे इस भ्रातृ-प्रेम के प्रति प्रतिवेदनात्मक रूप में आक्रोश की अभिव्यक्ति इस प्रकार करते हैं –

‘‘ आध्यात्मिक शब्द की मेरी समझ में काव्य-कला के क्षेत्र में कोई जरूरत नहीं है।’’

ईश्वर-संबंधी सत्ता के लोक-मंगलकारी स्वरूप की स्थापना करने के लिए आचार्य शुक्ल यह कैसी रहस्यमयी बात कह जाते हैं ? जबकि कथित अध्यात्म की स्थापना काव्य या कला के क्षेत्र में ही हुई है। काव्य या कला के क्षेत्र से इतर कहीं भी अध्यात्म जैसे शब्द का कोई अस्तित्व नहीं है।

खैर... हम यहां सिर्फ यह बताना चाहते हैं कि एक सुधी पाठक अपने संस्कारों से बंधकर किस प्रकार संवेदनात्मक या प्रतिवेदनात्मक-रसात्मक अवस्थाएं करता है। यह संस्कारों के रूप में मूल्यबोध का ही परिणाम है कि कृष्ण, राम, लक्ष्मण और ब्राह्मणों के क्रिया-कलापों से रागात्मक संबंध स्थापित करने वाले आचार्य शुक्ल जब-जब यह अनुभव करते हैं कि अमुक काव्य-कृति में उक्त पात्रों के प्रति लेखक ने न्याय बरतते हुए इनके स्वरूप के निखारा है तो वह श्रद्धा-भक्ति से सिक्त हो उठते हैं। लेकिन जब उन्हें यह लगता है कि अमुक काव्य में उक्त पात्रों को गिराने या नीचा दिखाने की कोशिश की गई है तो उन पात्रों एवं लेखक के प्रति उनके रसात्मकबोध की स्थिति एकदम उलट जाती है। जिसका अनुमान उनके वाचिक अनुभावों से इस प्रकार लगाया जा सकता है-

‘‘माइकेल मधुसूदन ने मेघनाद को अपने काव्य का रूप-गुण-संपन्न नायक बनाया, पर लक्ष्मण को वे कुरूप न कर सके। उन्होंने जो उलटफेर किया, वह कला या काव्यानुभूति की किसी भी प्रकार की प्रेरणा नहीं। बल्कि एक पुरानी धारणा को तोड़ने की बहादुरी दिखाने के लिए। इसी प्रकार बंग भाषा के एक दूसरे कवि नवीनचंद्र के अपने ‘कुरुक्षेत्र’ नामक ग्रंथ में कृष्ण का आदर्श ही बदल दिया। उसमें वे ब्राह्मणों के अत्याचार से पीडि़त जनता के लिए उठ खड़े हुए क्षत्रिय महात्मा के रूप में हैं। अपने समय की किसी खास हवा की झोंक में प्राचीन आर्ष काव्यों में पूर्णतया निर्दिष्ट स्वरूप वाले आदर्श पात्रों को एकदम कोई नया, मनमाना रूप देना भारती के पवित्र मंदिर में व्यर्थ की गड़बड़ मचाना है।’’

माइकेल मधुसूदन एवं बंगकवि नवीनचंद के काव्य का आस्वादन आचार्य शुक्ल को मूल्यों, संस्कारों, वैचारिक निर्णयों के अंतर्विरोधों के कारण क्यों प्रतिवेदनात्मक रसात्मक-अवस्था की ओर ले जाता है, जबकि वह यह भी अनुभव करते हैं कि माइकेल मधुसूदन ने लक्ष्मण को कुरुप नहीं किया है। नवीनचंद ने कृष्ण के माध्यम से पीडि़त जनता का उद्धार करवाया है। कारण स्पष्ट है कि वे लक्ष्मण के आगे मेघनाद के चरित्र को रूप-गुण संपन्न देखना ही नहीं चाहते हैं और नवीनचंद्र की कृति के ब्राह्मणों को वे दयालु, श्रद्धालु, लोकमंगलकारी रूप में ही मानते हैं , इसलिए कृष्ण का क्षत्रिय होकर भी महात्मा रूप में अवतरित होना उन्हें गवारा नहीं होता। परिणामतः वे अपनी बौखलाहट का निशाना सारी-की-सारी काव्य-सामग्री को बना डालते हैं।

बहरहाल इस रसात्मक विवेचन से यह निष्कर्ष तो निकल ही आता है कि किसी पाठक, श्रोता या दर्शक में रसनिष्पत्ति उसके संस्कारों से बंधकर होती है। वह जैसा काव्य के प्रति निर्णय लेता हो, उसकी रसात्मक अवस्था उसी के अनुरुप बन जाती है।

सन्दर्भ-

1.काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था, आचार्य शुक्ल, भा.का.सि., पृष्ठ-26

2. भा. का. सि., पृष्ठ-24

---------------------------------------------------------------------

 

clip_image002

+रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001

मो.-9634551630

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर

-----****-----

-----****-----

|नई रचनाएँ_$type=list$au=0$label=1$count=5$page=1$com=0$va=0$rm=1

.... प्रायोजक ....

-----****-----

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधाएँ ~

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---


|आपके लिए कुछ चुनिंदा रचनाएँ_$type=blogging$count=8$src=random$page=1$va=0$au=0

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3843,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,336,ईबुक,192,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2786,कहानी,2116,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,486,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,90,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,329,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,327,बाल कलम,23,बाल दिवस,3,बालकथा,50,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,9,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,17,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,834,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,7,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,315,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1921,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,648,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,688,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,55,साहित्यिक गतिविधियाँ,184,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,68,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: रसनिष्पत्ति सामाजिक के संस्कारों से बंधकर होती है [ विचार, संस्कार और रस-4 ] / रमेशराज
रसनिष्पत्ति सामाजिक के संस्कारों से बंधकर होती है [ विचार, संस्कार और रस-4 ] / रमेशराज
https://lh3.googleusercontent.com/-SCdLJmEAH10/WPnvtf3V5-I/AAAAAAAA4S0/V0Z0s8GeccI/clip_image001_thumb.png?imgmax=800
https://lh3.googleusercontent.com/-SCdLJmEAH10/WPnvtf3V5-I/AAAAAAAA4S0/V0Z0s8GeccI/s72-c/clip_image001_thumb.png?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2017/04/4_21.html
https://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/2017/04/4_21.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय खोजें सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है चरण 1: साझा करें. चरण 2: ताला खोलने के लिए साझा किए लिंक पर क्लिक करें सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ