प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : धारावाहिक आत्मकथा (चौथी किस्त) अनचाहा सफर / रतन वर्मा

SHARE:

आत्म संदर्भ धारावाहिक आत्मकथा (चौथी किस्त) अनचाहा सफर रतन वर्मा संघर्ष की शुरूआत शु रू में तो जब पता चला कि मेरा वेतन मात्र एक सौ पच्चासी रु...

आत्म संदर्भ

धारावाहिक आत्मकथा (चौथी किस्त)

अनचाहा सफर

रतन वर्मा

संघर्ष की शुरूआत

शुरू में तो जब पता चला कि मेरा वेतन मात्र एक सौ पच्चासी रुपये प्रतिमाह होगा, तब मन थोड़ा खिन्न हुआ था. हालांकि 1972 में एक सौ पच्चासी रुपये प्रतिमाह का वेतन भी कम नहीं होता था. लेकिन कुछ ही दिनों में अपने पद के सारे दांवपेचों से मुझे टैक्स दारोगा ने अवगत करा दिया था. टैक्स दारोगा शहर भर के मकानों के टैक्स निर्धारित किया करते थे. टैक्स निर्धारण के बाद सारे मकान-मालिक टैक्स की राशि पर पुनःविचार के लिए अपील में जाते. वार्ड आयुक्तों का एक पैनल प्रतिदिन उनकी अपील पर विचार कर टैक्स की दर कम कर दिया करते थे. चूंकि मैं असेस्मेंट इंचार्ज था, इसलिए मकान मालिकों को मुझसे होकर गुजरना पड़ता था. किसका कितना टैक्स माफ करना है, इससे संबंधित अनुशंसा मुझे ही करनी होती थी. ऐसे में टैक्स-माफी की जितनी रकम होती थी, उसका दो किश्त मकान-मालिकों को टेबुल के नीचे से मुझे अर्पित करना पड़ता था. उस रकम में आधा हिस्सा टैक्स दारोगा का हुआ करता था.

[ads-post]

मसलन, रोज की चार से पांच सौ की आमदनी मुझे ऊपर से होने लगी थी. फिर तो मैं खुद को रईसों का रईस समझने लग गया था. लफंगे दोस्तों का साथ और पैसों का जोर मुझे बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा था. बावजूद इसके घर में पूरा वेतन तथा ऊपरी आमदनी का भी कुछ हिस्सा देने के बाद मैं कपिल भैया के पास रोजाना थोड़ी-थोड़ी रकम जमा करवाता जाता था.

अभी मुझे नौकरी से लगे महीना भर भी नहीं हुआ था कि मां की तबीयत बिगड़ती गई थी. 1974 के जनवरी माह में चिकित्सक ने मां को पेट का कैंसर होने की घोषणा कर दी थी. यहां मैं बता दूं कि वैसे तो मां अपने सारे बच्चों को प्यार किया करती है, लेकिन चूंकि भाई-बहनों में मैं सबसे छोटा था, इसलिए तीनों की अपेक्षा मैं मां के सबसे करीब था. और मेरे लिए भी मां का स्नेह जिंदगी के सबसे बड़े उपहार की तरह था. उस उम्र में भी मैं मां के साथ ही सोता था और मां मन की सारी बातें, दुःख-दर्द मुझसे बांटा करती थी. ऐसे में जब पता चला कि मां को पेट का कैंसर है, तब मेरी मनःस्थिति क्या हुई होगी, यह मैं ही समझ पा रहा था. रह-रहकर मेरे मन में यही ख्याल आता कि चूंकि मैंने लोगों के दिल दुखाकर गलत ढंग से पैसे कमाने शुरू कर दिये हैं, भगवान ने इसी की सजा मुझे दी है. अंततः फरवरी 1974 में मां का स्वर्गवास हो गया था. मेरी हालत पागलों जैसे हो गयी. शायद उसी पागलपन में मैंने जाकर नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और निश्चय किया कि जीवन में कभी भी गलत पैसा नहीं कमाऊंगा और कोशिश करूंगा कि मुझसे किसी का दिल न दुखे.

रात में मां के बगैर जब मैं सोने जाता, तब मां को याद कर-करके सारी रात रोता रहता. मां की कमी ने एक तरह से बैरागी बनाकर रख दिया था मुझे.

मेरा दरभंगा से पलायन...

कहावत है कि इंसान के मन में चाहे कैसा भी जख्म हो, समय उस जख्म के लिए सबसे बड़ा मरहम सिद्ध होता है. मेरा भी दिन तो दोस्तों के साथ इधर-उधर आवारागर्दी करने में गुजर जाता, पर रात की तन्हाई आंसुओं और अंतस की कचोट को ही साथ लेकर आती. उसी दरम्यान अचानक मंजू से मेरी भेंट हुई. हम धीरे-धीरे करीब आते गये और दस दिसंबर 1974 को बिना घर वालों की मंजूरी लिये या बताये हम दोनों प्रणय-सूत्र में बंध गये.

मंजू मेरे लिए एक ऐसा मजबूत कंधा सिद्ध हुई, जिसपर सिर टिकाये मैं दृढ़तापूर्वक आज तक की यात्रा सहजता से तय करता आ रहा हूं.

शादी के बाद लगा कि अब मुझे किसी रोजगार की तलाश करनी चाहिए. हालांकि भैया की ठेकेदारी ठीक ही चल रही थी, जिसमें हम दोनों का भी जीवन-यापन ढंग से हो ही जाता, लेकिन मुझे लगा कि अब जबकि मैं अकेला नहीं हूं, तो भैया पर बोझ बनना ठीक नहीं. मेरा मन इसी चिंता से ग्रस्त रहने लगा. क्या करूंगा, क्या नहीं, समझ नहीं पा रहा था. इन्हीं सब सोचों, आवारागर्दी, मटरगस्ती करते, देखते ही देखते डेढ़ वर्ष का समय गुजर गया था. हार कर देहरादून में रह रहे अपने एक दूर के रिश्तेदार को मैंने पत्र लिखा, उन्होंने हमें देहरादून आ जाने का आमंत्रण दिया. मेरे उस रिश्तेदार को ‘लाइमस्टोन किंग’ के नाम से जाना जाता था. मसूरी में उनकी कई चूना पत्थर और मार्बल की खदानें थीं. मसूरी में ही ‘किंक्रेग’ स्थित डिग्री कॉलेज के पास भारत लाइम-स्टोन कंपनी नाम से उनका दफ्तर था. मुझे उसी दफ्तर में उन्होंने असिस्टेंट मैनेजर के पद पर नियुक्ति दे दी. रहने के लिए बड़ी मोड़ के पास लाला सुमेर चंद के मकान में किराये का एक कमरा दिलवा दिया. कंपनी का मैनेजर एक सरदार था. इंदरपाल सिंह, जिसे सभी ‘पाली’ कहकर पुकारते थे.

बड़ा ही जिंदादिल युवक था वह. हमेशा शेरो-शायरी और चुटकुले सुनाकर लोगों का मनोरंजन किया करता था, लेकिन मेरी नियुक्ति के बाद दो-तीन महीने ही रह पाया था वह वहां. नौकरी छोड़ते वक्त उसने कहा कि पांच महीनों से उसे वेतन नहीं मिला था.

मैंने पूछा भी था, ‘‘तो क्या, इतने सारे पैसे छोड़कर चले जायेंगे.’’

वह ठहाका लगा उठा था. बोला था, ‘‘अब यह तो आपको यहां रहकर पता चलेगा.’’

उसके आशय को मैं नहीं समझ पाया था. नौकरी मिल जाने के कारण मैं निश्चिंत हो गया था कि अब मेरे छोटे से परिवार की गाड़ी पटरी पर आ गयी है. नारायण सिंह ‘पवार’ और सरदार महेन्द्र सिंह जैसे लोगों से मेरी आत्मीयता बढ़ने लगी थी. दोनों म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन के कर्मचारी थे. दोनों की बारी-बारी से वन-वे ट्रैफिक पर ड्यूटी लगा करती थी. उनका काम अत्यंत ही सीमित था, इसलिए ज्यादातर दोनों मेरे पास ही बैठा करते थे. मैं तुकबंदियां तो किया ही करता था, सो वे दोनों मेरे सुधी-श्रोता बन गये थे.

मेरा मसूरी प्रवास...

एक दिन नारायण सिंह पवार, आकर्षक से एक बीस-इक्कीस वर्षीय युवक के साथ मेरे कार्यालय में आया. पहली ही दृष्टि में वह युवक मुझे किसी दार्शनिक जैसा प्रतीत हुआ. बड़े-बड़े घुंघराले बाल, ललाट पर झूलती चंद लटें, सांवला, पर पानीदार गोल चेहरा, आकर्षक आंखें, मंझोला कद, पैंट-शर्ट और शायद दो स्वेटरों से ढका शरीर, कंधे से लटकता भूदानी झोला, मुंह में पान भरा हुआ...वह मुस्करा तो नहीं रहा था, पर स्वाभाविक तौर पर एक स्मित-सा उसके चेहरे पर चस्पां था.

एक नजर उस युवक पर टिकाने के बाद मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि से नारायण की ओर देखा था.

‘‘इनसे मिलो बिहारी बाबू! सुधीर गैरोला ‘मयकश’. यहीं डिग्री कॉलेज में पढ़ता है. बी.ए. में. नारायण मुझे बिहारी-बाबू संबोधित करता था. मसूरी की तहजीब मैं, चाहे कोई उम्र में छोटा हो या बड़ा, दोस्त हो या अजनबी, सभी एक-दूसरे को ‘तुम’ से ही संबोधित किया करते थे. जब सभी वैसा करते थे, वो मैं भी वैसा ही किया करने लगा था.

सुधीर से वह पहली भेंट, जैसे नियति का ही खेल था, मेरे लिए. पूरे मसूरी में वह एक अच्छे कवि के रूप में जाना जाता था. चूंकि, चंद तुकबंदियों को सुनकर नारायण मुझे भी कवि मानने लगा था, इसलिए सुधीर से मेरा परिचय कवि के रूप में करवाया था उसने.

उस दिन सुधीर का, एक पीरियड के बाद, बाकी के पीरियड्स लीजर थे, इसलिए तब तक वह मेरे पास ही रहा था, जब तक कि मेरी ड्यूटी समाप्त नहीं हो गयी थी. उस बीच हम आपस में काव्य-वाचन का आदान-प्रदान भी करते रहे थे. उस एक दिन में ही हम आपस में कुछ ऐसे घनिष्ठ हो गये थे, जैसे हमारी वर्षों की जान-पहचान हो.

उस दिन ड्यूटी से छूटने के बाद मैं उसे अपने आवास पर भी लेता गया था, जहां उसका परिचय मेरी पत्नी और पुत्र से भी हो गया था. पुत्र का नाम मैंने रितेश रखा था, लेकिन वह मुझे रितु पुकारने लगा था. चाय-वाय पीने के बाद हम माल रोड की ओर निकल गये थे.

वैसे मॉल रोड आना-जाना तो रोज ही लगा रहा करता था मेरा- जरूरत के सारे सामान मॉल रोड के बाजार से ही, तो खरीदा करता था. लेकिन उस आने-जाने में न कोई रोमांच होता, न खुशी, बल्कि एक ऊब जैसा ही महसूस होता. जैसे यंत्रवत जाना, कुछ खरीदारी करना, फिर वापस लौट आना. लेकिन मेरे लिये सुधीर से भेंट, जैसे तपती दोपहर में अचानक ही ठंडी बयार बहने जैसा सिद्ध हुआ था. सुधीर मेरे रोज की दिनचर्या में शामिल हो गया था. कॉलेज से सीधे मेरे कार्यालय में आ जाता, तब तक हमारे पास बना रहता, जब तक मेरी ड्यूटी समाप्त नहीं हो जाती. फिर हम दोनों साथ ही मेरे निवास पर आ जाते, वहां चाय-वाय पीकर मॉल रोड की ओर निकल जाते. धीरे-धीरे मसूरी के लगभग सभी लोग हमारी जोड़ी को पहचानने लग गये थे. इत्तेफाकन यदि किसी परिचित को दोनों में से कोई अकेला मिल जाता, तो अवश्य प्रश्न उछाल देता, ‘आज अकेले? और वह?’

मसूरी में सुधीर एवं वहां के स्थानीय रचनाकारों ने एक संस्था भी रखी थी- ‘अलीक साहित्यिक संस्था.’ उसमें कई रचनाकार जुड़े हुए थे. एकमात्र किशन थापा कथाकार थे और उनकी एक कहानी उन दिनों ‘कादम्बिनी’ में छप चुकी थी. किशन भाई थापा हम सभी के बीच उम्र के लिहाज से बड़े थे, इसलिए हम उन्हें विशेष आदर दिया करते थे. वे नेपाल के मूल निवासी थे.

संस्था की साप्ताहिक गोष्ठियां हुआ करती थीं. अब मुझे भी संस्था का सदस्य बना लिया गया था. जब पहली गोष्ठी में मैंने भाग लिया और विभिन्न कवि मित्रों की कवितायें सुनी, तब खुद को मैं बौना-सा महसूस में लगा था. ऐसा इसलिए, क्योंकि मैंने जितना कुछ भी लिख रखा था, सारी की सारी रचनायें फूहड़ रूमानियत से भरी थीं. जैसे-

मोहब्बत के अजब दस्तूर देखे हैं जमाने में,

कि दिल को तोड़कर वापस यहां लौटाया जाता है,

वफा के गीत क्या गाऊं मेरी आवाज टूटी है,

कि दिल को आज दौलत से यहां तुलवाया जाता है’...

या

टूट गये हैं तार-तार दिल के सितार का,

कलाकार का भाव सिसकती साज बना है,

प्यार का अमृत आज बना हाला का प्याला,

कलम आज पीकर हाला अंगार बनी है.

यह ज्वाला वह नहीं कि जिसमें तुम जल जाओ,

इसमें तो बस मेरी ही काया सुलगेगी.

किया पाप मैंने जो तुझसे प्यार किया है,

इसकी सजा मुझे मिलनी है, मुझे मिलेगी.

तो मेरे पास उक्त प्रकार की कविताओं की ही पूंजी थीं, जबकि वहां के सारे कवि जन-चेतना के कवि थे. ऐसे में जब मेरे कविता-पाठ की बारी आयी, तब मुझे लगा कि मैं मना ही कर दूं. पर तभी डायरी में अंकित एक मात्र ‘पहचान’ शीर्षक कविता का ध्यान आ गया. पूर्व में इस कविता से संबंधित भी एक वाकया है. तब मैं दरभंगे में रहा करता था और कॉलेज का छात्र था. कवितायें भी यदा-कदा लिख ही लिया करता था. उन्हीं दिनों भैया के एक मित्र श्री राम एकबाल सिंह ‘विनीत’ का मेरे घर आगमन हुआ. वे पटना से प्रकाशित होने वाले एक साप्ताहिक पत्र ‘हुंकार’ के संपादक थे. भैया की कवितायें अक्सर उस पत्र में छपा करती थीं. दिनभर तो वे भैया के साथ ही हरे, पर रात में उनके सोने की व्यवस्था मेरे ही कमरे में की गयी. उसी समय उन्होंने मुझसे पूछा, ‘तुम कुछ लिखते हो या नहीं.’ मैंने कहा, ‘कभी-कभी कवितायें लिख लेता हूं.’

उन्होंने मुझे कवितायें दिखलाने को कहा.

सकुचाते हुए मैंने एक कॉपी उन्हें थमा दी, फिर बिना उनसे कुछ कहे मैं कमरे से बाहर निकल गया. उसके बाद तो संकोचवश कमरे में जाने की मेरी हिम्मत ही नहीं हो रही थी, लेकिन कुछ ही देर बाद उनकी पुकार मुझे सुनायी दी. संकोच से दुहरा होते हुए मैं उनके सामने प्रकट हुआ.

मुझपर नजर पड़ने के साथ ही उन्होंने मुझे बैठने को कहा, फिर बोल पड़े, ‘रतन, तुममें एक संपूर्ण कवि का गुण है, लेकिन तुम जो यह सिर्फ रूमानियत और प्यार-मोहब्बत वाली कवितायें लिखते हो, इससे समाज को क्या दे पाओगे. समाज में भूख है, गरीबी है, असमानता है, भ्रष्टाचार है...इन सब पर कवितायें लिखो. तुममें भरपूर क्षमता है...हाँ, तुम्हारी ‘पहचान’ कविता अच्छी लगी, वैसे छंदों की अच्छी जानकारी है तुम्हें, इस लिहाज से सारी कवितायें अच्छी हैं. ‘पहचान’ कविता जन चेतना को उभारने वाली कविता है. तुम इस कविता को किसी कागज पर उतार कर दे दो. ‘हुंकार’ में छापूंगा.’

मेरी कविता छप भी सकती है, सुनकर अंतस आह्लाद से भर उठा. उसी वक्त मैंने कविता उतार कर उन्हें थमा दी, जिसे उन्होंने अपने पोर्टफोलियो बैग में रख लिया. फिर तो उस सारी रात मुझे नींद नहीं आयी थी. जब कभी झपकी भी आती तो ‘हुंकार’ का कोई अनजाना-सा पृष्ठ आंखों के सामने लहरा उठता, जिसपर मोटे-मोटे अक्षरों में मेरी कविता छपी नजर आती. बात में वह कविता छपी भी थी, जिसे मैंने अपने लगभग सारे मित्रों को पूरी हेठी के साथ दिखायी थी.

तो उस डायरी में मेरी पहचान कविता भी उपलब्ध थी. हालांकि वहां के सभी कवियों की कविताओं की तुलना में वह कविता बहुत कमजोर थी. फिर भी उसी कविता को मैंने कुछ ऐसे अंदाज में पढ़ लिया था, जैसे कविता का पाठ न कर रहा होऊं, बल्कि कुछ बकबकाये जा रहा होऊं.

लेकिन सिर्फ उस कविता से बात नहीं बनी थी. सुधीर की जिद पर एक प्रेम कविता भी सुनानी पड़ी थी मुझे, जिस पर वहां के अन्य मित्रों ने वाह-वाह तो किया था, पर उनके दाद में मुझे उपहास ही नजर आया था.

बाद में तो प्रत्येक गोष्ठियों में मैं शिरकत करने लगा था. अनेक सारे आत्मीय मित्र बन गये थे मेरे, जिनमें गजपाल सिंह ‘रौथाण’, अतिउर्रब सिद्दीकी, विजय श्रीवास्तव, विजय रावत, विजय द्विवेदी आदि नाम अबतक मेरे लिये न सिर्फ अविस्मरणीय हैं, बल्कि हम जब भी जबकि तीस वर्षों का लंबा अंतराल गुजर चुका है, आपस में संपर्क में हैं.

क्रमशः.....

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : धारावाहिक आत्मकथा (चौथी किस्त) अनचाहा सफर / रतन वर्मा
प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : धारावाहिक आत्मकथा (चौथी किस्त) अनचाहा सफर / रतन वर्मा
https://lh3.googleusercontent.com/-Ld2x5JERWcc/WSpomc1kRtI/AAAAAAAA4s4/T2CHX3erRx8yN7ni5CvRwFXajOZKl7EQQCHM/image_thumb%255B1%255D?imgmax=800
https://lh3.googleusercontent.com/-Ld2x5JERWcc/WSpomc1kRtI/AAAAAAAA4s4/T2CHX3erRx8yN7ni5CvRwFXajOZKl7EQQCHM/s72-c/image_thumb%255B1%255D?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2017/05/2017_11.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2017/05/2017_11.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content