प्राची // जून 2017 // कहानी // देवता // अरुण अर्णव खरे

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तो रन सींग आज बहुत प्रसन्न था. उसके बेटे सूरज सींग को बारवीं पास करते ही बड़े साब ने वर्कचार्ज में बाबू बना दिया था. साथ ही यह भरोसा भी दिलाय...

तोरन सींग आज बहुत प्रसन्न था. उसके बेटे सूरज सींग को बारवीं पास करते ही बड़े साब ने वर्कचार्ज में बाबू बना दिया था. साथ ही यह भरोसा भी दिलाया था कि सूरज जैसे ही कंपूटर की परीक्षा पास कर लेगा उसे वह रेगुलर कर देंगे. इस खुशी को सब के साथ बांटने के लिए तोरन साब से तीन दिन की छुट्टी लेकर अपने गांव आया था. तोरन के खानदान में पहली बार कोई सरकारी बाबू बना था. उसके सारे सगे संबंधी या तो खेतिहर मजदूर थे या फिर उसकी तरह साब लोगों के बंगलों पर काम करते थे. उसकी पत्नी पूनिया तो जैसे अपने मोड़े की उपलब्धि पर बौरा गई थी. दिन में कितनी ही बार वह सूरज का माथा चूम चुकी थी. इसी खुशी में उसने बिरादरी वालों को ग्राम देवता के चबूतरे पर पूड़ी-रायता जींमने का न्योता तक दे डाला था.

बड़े साब ने बोला था सूरज को सोमवार को ही ड्यूटी जाइन कराने के लिए...अतएव तोरन सूरज को लेकर इतवार को ही गाँव से वापस आ गया. सूरज की पोस्टिंग साब ने अपने चहेते कार्यपालन यंतरी के दफ्तर में की थी. सूरज के कागज पत्तर पलटते हुए बड़े बाबू बिंदेसरी यादव ने पहले तोरन और फिर सूरज की ओर इतनी पैनी निगाहों से देखा कि दोनों ही सिहर गए. तोरन हाथ जोड़कर लगभग गिड़गिड़ाते स्वर में बोला- ‘‘कोनऊ कमी है का बाबू जी...बचवा है...आप समझा दो पूरी कर लावेगो...मैं तो कछू समझूँ न...दूसरी जमात तक ही पड़ो है हमने-’’

‘‘नहीं नहीं...कोई कमी नहीं है...सब कागज दुरुस्त हैं-’’ बिंदेसरी यादव बोले- ‘‘तुम्हें पता है कि लड़के के कितने नंबर हैं?’’

‘‘नाँय मालूम, मोए इत्तो पता है कि वाय फस्ट कलास आओ है और इंजीनरिंग को इम्तहान भी पास करो है. तबईं बड़े साब ने ईखों बाबू बना दओ-’’ कहते हुए तोरन की आँखें गर्व से दमकने लगीं.

‘‘तुम लड़के का कैरियर बरबाद कर रहे हो तोरन. तुम्हारा लड़का तो हीरा है हीरा... इसे क्यूँ बाबू बना रहे हो तुम बताओ सूरज...कौन सा इंजीनियरिंग का इम्तिहान पास किया है तुमने?’’ बिंदेसरी ने उत्सुक निगाहों से दोनों की ओर बारी-बारी से देखा.

‘‘जी, पी.ई.टी. पास किया है. एस.सी. की मेरिट लिस्ट में 233वां नंबर है. सब कहते हैं कि मनचाही ब्रांच मिल जाएगी, पर बहुत पैसा लगता है पढ़ाई में...बापू खर्च नहीं उठा पाएँगे. बड़े साब ने कहा कि तुम्हें पक्की नौकरी लगा देंगे. बहुत इंजीनियर बेरोजगार घूम रहे हैं.’’ सूरज ने बताया.

‘‘बड़े साब ने ऐसा कहा तुमसे?’’ बिंदेसरी ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘हओ-’’ जवाब तोरन ने दिया- ‘‘हम कहाँ से लाखों लाते फीस देवे खों...वो तो साब बड़े दयालु हैं हम गरीबन पर जो इत्ती किरपा करत हैं.’’

बिंदेसरी बाबू ने सारे कागज व्यवस्थित किए और सूरज को आफिस में ज्वाइन कराने की आवश्यक कार्यवाही पूर्ण की. बिंदेसरी ने एक बार पुनः सूरज को सोचने के लिए कहा था, पर कम पढ़ा-लिखा तोरन तो सूरज के बाबू बन जाने से ही सातवें आसमान पर जा बैठा था. वह तो बड़े साब की किरपा के तले स्वयं को दबा महसूस कर रहा था- उसे समझ में ही नहीं आया था कि बिंदेसरी बाबू बार-बार क्यूं पूछ रहा है. कहीं उसका कोई स्वारथ तो नहीं है?

बिंदेसरी बाबू ने सूरज को ज्वाइन करवा लिया था. तोरन सूरज को वहां छोड़कर चला गया. शाम को जब दोनों मिले तो तोरन के मन में बहुत से सवाल थे. उसे कोई परेशानी तो नहीं हुई. ईई साब से उसकी भेंट हुई कि नहीं- कुछ काम भी सीखा कि नहीं- बिंदेसरी बाबू ने कोई गड़बड़ तो नहीं की- आफिस के बाकी लोग कैसे लगे उसे-

‘‘बापू- बिंदेसरी बाबू जी ने फिर से मुझसे कहा था कि तुम्हारे जब इतने अच्छे नम्बर हैं तो तुम बाबूगिरि करके क्यूं अपना कैरियर खराब कर रहे हो- वह तो बड़े साब को भी इसका दोष दे रहे थे- कि उन्होंने जानबूझ कर मेरा कैरियर खराब किया है- वह कह रहे थे कि मुझे बैंक से लोन भी मिल जाता और कालेज की फीस भी माफ हो जाती-’’ सूरज जो पहले बड़ा खुश नजर आ रहा था, तोरन को कुछ उदास सा लगा.

तोरन को ध्यान आया जब उसने बड़े साब को सूरज के इंजीनरिंग में पास हो जाने की खबर सुनाई थी तो वह बहुत खुश नजर नहीं आए थे और जब उन्होंने सूरज को बाबू बनाने के लिए तोरन से कहा था तो नीला बिटिया भी बड़े साब पर नाराज हुई थी. उसे तो सूरज के बाबू बन जाने की इतनी खुशी थी कि उसे नीला की बात से दुख हुआ था. वह समझ नहीं पाया था कि नीला बिटिया क्यूं बड़े साब पर नाराज हो रही है.

‘‘तुम बिंदेसरी बाबू की बातन खों दिल पे न लो बिटुआ- हो सकत है बड़े साब ने कबहुं ऊंखों फटकारो हो जासे वो उनसे चिढ़त हो- हमने बड़े साब की बरसों सेवा करी तबहुं उन्होंने तुमाओ इतनो ध्यान रखो- हम गरीबन की आज सुनत कौन है- हमाई बिरादरी में आज तक कोनऊ बाबू नई बनो हतो- तुमने तो हमाओ नाम रोशन कर दओ- तुम अब मन लगा के काम करो- साब कछु दिन में तुमाओ परमोसन भी कर देहें-’’ तोरन ने सूरज को समझाते हुए कहा.

दो माह गुजर गए. सूरज ने आफिस का काम कुछ-कुछ सीख लिया था. सब उसके काम और लगन से खुश थे. तोरन और पूनिया की भी सारी बिरादरी में अपने बिटुआ की उपलब्धि के कारण इज्जत बढ़ गई थी. तोरन भी बड़े साब के इस उपकार के बदले दोहरे चाव से उनकी सेवा में लगा रहता था.

बड़े साब के इकलौते बेटे प्रियेश यानि कि चिंकू बाबा का पढ़ने में मन नहीं लगता था. बड़े साब इस कारण परेशान रहते थे. 12वीं में वह एक बार फेल हो चुका था और इसी साल उन्होंने उसका एडमीशन डोनेशन देकर किसी कालेज में कराया था. बिटिया नीला इस बात को लेकर बड़े साब से नाराज रहती थी और कभी-कभी उनसे सूरज का उदाहरण देते हुए उलझ जाती थी. नीला द्वारा सूरज का इस तरह पक्ष लेना तो तोरन को अच्छा लगता था पर बड़े साब से झगड़ा करना उसे नहीं सुहाता था. उसने एक दो बार अकेले में उसे समझाने की कोशिश भी की थी तो बिटिया ने ‘‘काका तुम नहीं समझोगे.’’ कहकर चुप करा दिया था.

तोरन सींग पिछले चौबीस सालों से बोधराम निरंजन के घर पर काम कर रहा था. उस समय से जब निरंजन नया नया सहायक यंत्री के पद पर भरती हुआ था. उसकी पहली पोस्टिंग बुंदेलखंड के इलाके में हुई थी जहाँ छुआ-छूत और ऊँच-नीच का भेद उस समय समाज में कुष्ठरोग सरीखा जमा बैठा था. इस कारण बोध कुमार के घर पर कोई भी कर्मचारी काम करने को तैयार नहीं था. उसके पहले पदस्थ रहे मनोरंजन शुक्ल के घर पर काम करने वाले छुटके रैकवार और हरिलाल साहू ने साफ-साफ मना कर दिया था- ‘‘साब हम घर पर काम नहीं करेंगे. हमारी बिरादरी में बात पता चल गई तो हम समाज से ही बाहर कर दिए जाएँगे. हमारे बाल-बच्चों के विवाह तक नहीं हो पाएँगे. और हमारा हुक्का-पानी, आपस में उठना-बैठना तक हराम हो जाएगा.’’

सुनकर बोधराम सन्न रह गया था. एक झटके में ही उसकी अफसरी धरातल पर आ गई थी. वह दोनों के खिलाफ अनुशासनहीनता का हंटर चलाना चाहता था लेकिन जिले के एक अनुसूचित जाति के बीडीओ के समझाने पर उसने अपना इरादा त्याग दिया था. घर के कामकाज के लिए उसने ननिहाल से दूर के एक रिश्तेदार तोरन को बुला लिया था और उसे घर पर ही सवर्ेंट क्वार्टर में रहने की जगह दे दी थी. तबसे निरंतर तोरन बोधराम के घर पर काम कर रहा था. बोधराम के कई ट्रांसफर हुए. शासन के नए बने प्रमोशन-नियमों के तहत जल्दी-जल्दी उसके तीन प्रमोशन भी हो गए और वह अपने साथ नियुक्त हुए अनेक अफसरों को पीछे छोड़ते हुए चीफ इंजीनियर बन गया. जल्दी-जल्दी बिना बारी के प्रमोशन पा जाने के बाद वह अहंकारी हो गया था और अपने साथी अफसरों तक से बदतमीजी करने लगा था. तोरन बोधराम के इस बदलते व्यवहार का साक्षी था. जिनसे कभी बोधराम सर कह कर बातें करता था. तोरन ने बोधराम को उनसे ही कई बार बुरा सलूक करते देखा था.

चीफ इंजीनियर बनने के बाद अपने पहले दतिया दौरे पर बोधराम ने छुटके और हरिलाल सहित वृंदावन पटेल उपयंत्री को भी निलंबित कर दिया था. वे दोनों वृंदावन की साइट पर ही कार्यरत थे तथा वृंदावन के कहने पर ही अफसरों के घरों में काम करते थे. अपनी पहली पोस्टिंग के समय से ही तीनों

बोधराम के निशाने पर थे. पर दो माह के अंदर ही तीनों की बहाली के आदेश बोधराम को निकालने पड़े थे. कर्मचारी नेता भक्त चरण ने धमकी दी थी यदि चौबीस घंटे के भीतर निलंबन वापिस नहीं लिया गया तो उसके बंगले के बाहर तम्बू लगाकर भूख हड़ताल की जावेगी.

नौवीं में पढ़ने वाली नीला को पिता का पक्षपाती व्यवहार पसंद नहीं आता था. भक्त चरण की धमकी के बाद जब

बोधराम को पीछे हटना पड़ा तो वह बहुत आहत था. नीला तीनों की बहाली से खुश थी. उसने बोधराम को थैंक्स बोला. बेटी के मुंह से ये सुनते ही वह बिफर गया. उसे लगा भक्त चरण के साथ ही उसकी बेटी भी उसकी मजबूरी का मजाक उड़ा रही है. वह बड़ी जोर से नीला पर चिल्लाया. बिचारी रोती हुई अपने कमरे में चली गई.

बोधराम की पत्नी शामली ने उसे शांत करने की कोशिश की. बोधराम को भी लगा कि उसने अकारण ही नीला को इतनी जोर से डांट दिया है. उसने शामली से कहा- ‘‘तुम ही बताओ मैं क्या करूं? नीला हर बात में विरोध करती है. वह तो आरक्षण तक की विरोधी है. यदि यह वैशाखी न होती तो शायद मैं भी इंजीनियर न बन पाता. चिंकू के रंग-ढंग तुम देख ही रही हो. बिना आरक्षण के वह कुछ बन कर दिखा सकता है क्या? आरक्षण के बावजूद भी उसे ढंग की नौकरी मिलेगी मुझे संदेह है.’’

‘‘समय के साथ नीला भी सब समझ जाएगी. इस उमर में बच्चे ऊंच-नीच नहीं समझते. उसे भी क्लास में कौन एस सी का मानता है. उसकी पहचान तो एक बड़े अफसर की बेटी की है. ऊंची जाति के गरीब बच्चों को देखती है तो व्यथित हो जाती है. उसने आप सरीखे गरीबी के दिन ही कहां देखे हैं. आप उससे प्यार से बात किया कीजिये.’’ शामली ने सलीके से अपनी बात बोधराम के सामने रखी.

‘‘तुम ठीक कहती हो शामली!’’ बोधराम ने कहा- ‘‘लेकिन नीला हर बात में हमारा विरोध करती है.’’

‘‘सूरज के प्रति आपके रुख ने उसे आहत किया था. उसे लगने लगा है कि आप स्वार्थी हैं. आप किसी का हित नहीं कर सकते. मुझे भी लगता है कि सूरज के लिए आपने सही निर्णय नहीं लिया था. तोरन समझता है कि सूरज को बाबू बना कर आपने उस पर बहुत बड़ा अहसान किया है. वह तो आपको देवता समझता है.’’ शामली का स्वर बहुत संयत था. वह नीला का पक्ष बोधराम को समझाने का प्रयास कर रही थी. साथ ही उसे यह भी ध्यान रखना पड़ रहा था कि बोधराम उसकी बातों से आहत महसूस न करे.

‘‘शामली तुम भी मुझे गलत समझती हो...पर मैंने जो भी किया अपने बच्चों के भविष्य के लिए किया.’’ बोधराम के स्वर में कातरता थी. ‘‘तुम्हें याद है न, ...दतिया में कोई भी हमारे घर पर काम करने को तैयार नहीं था. मैं तोरन को नहीं लाया होता तो खाना बनाने से लेकर चौका-बर्तन भी तुम्हें ही करना पड़ता. यदि तोरन जैसे लोगों के बच्चे भी अफसर बन जाएंगे तो फिर हमारे चिंकू का क्या होगा. अफसर का बेटा होकर क्या बाबू बनकर धक्के खाने के लिए छोड़ दूं उसे. किसी तरह चिंकू अफसर बन भी गया तो कौन मिलेगा उसके घर पर काम करने के लिए....मैंने सूरज को लेकर जो भी किया बहुत सोच समझ कर किया. वह बाबू बनकर खुश है...और तोरन भी.’’

शामली को कुछ भी नहीं सूझा कि क्या बोले. बाहर उसे कुछ गिरने की आवाज सुनाई दी तो वह बाहर निकली. हवा के झोंके से राधाकृष्ण की मूर्ति गिरकर टूट गई थी. तोरन टुकड़ों को समेटते हुए अपनी झोली में रख रहा था.

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रचनाकार: प्राची // जून 2017 // कहानी // देवता // अरुण अर्णव खरे
प्राची // जून 2017 // कहानी // देवता // अरुण अर्णव खरे
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