कहानी // प्रेमांध // अर्जुन प्रसाद

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बात बहुत पुरानी है। देश ब्रिटिशों की अन्‍यायपूर्ण, गुलामीभरी हुकूमत से मुक्‍त हो चुका था। एक गोरा अँग्रेज बोरी बंदर में रेलवे के मैकेनिकल वि...


रोहित वर्मा की कलाकृति

बात बहुत पुरानी है। देश ब्रिटिशों की अन्‍यायपूर्ण, गुलामीभरी हुकूमत से मुक्‍त हो चुका था। एक गोरा अँग्रेज बोरी बंदर में रेलवे के मैकेनिकल विभाग में सेक्‍शन इंजीनियर था। उसका नाम था माइकल जोसेफ। उसकी पत्‍नी क्रिस मेरी भी उसके साथ मुंबई में ही रहती थी। वह बहुत सुंदर और रूपवती थी।

अपने पति जोसेफ की भाँति उसका रंग तो गोरा था ही चेहरा भी एकदम सदाबहार दूधिया रंग का था। इससे उसके मुखड़े पर चार चाँद लगे हुए थे। विदेशी स्‍त्रियों की कद-काठी पुरुषों की तरह गठीली और लंबी-चौड़ी होती ही है क्रिस मेरी का बदन भी गजब का हृष्‍ट-पुष्‍ट था। रेलवे से जुड़े होने के कारण जोसेफ का जीवन बहुत व्‍यस्‍त था।

पुलिस और फौजियों जैसे वह दिन-रात दौरों पर ही रहता था। उसका ज्‍यादातर समय घर से बाहर ही व्‍यतीत होता था। वह कभी कहीं चला जाता तो कभी कहीं। उसे अपनी अर्धांगिनी मेरी का ध्‍यान ही न रहता था। नतीजा यह हुआ कि मेरी धीरे-धीरे उसकी ओर से विमुख होती चली गई। उसने भी उसका ध्‍यान रखना कम कर दिया।

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सेक्‍शन इंजीनियर गैंगमैन या खलासियों को अपनी सुविधा के लिए अपने आवासों पर बँगला चपरासी के रूप में रखने के आदी होते ही हैं उस समय माइकल जोसेफ ने भी एक खलासी को अपने यहाँ रखकर उससे चपरासीगिरी का काम लेता था। उसका नाम था तारकेश लेकिन, लोग प्‍यार से उसे तारा ही कहते थे। वह बहुत ही सजग और चौकस व्‍यक्‍ति था। वह एकदम फुर्त और चुलबुले किस्‍म तो था ही बहुत ही बातूनी भी था।

अँग्रेजी शासनकाल में गैंगमैन और खलासियों की भरती करने के दौरान उनका डॉक्‍टरी परीक्षण कराने का कोई प्रचलन न था। मात्र उनकी सेहत देखकर उन्‍हें काम दे दिया जाता था। ऐसा काम करने वालों को केवल शारीरिक रूप से स्‍वस्‍थ और मजबूत होने की जरूरत थी। उनकी कद-काठी को देखकर ही उन्‍हें रेलवे में नौकरी दे दी जाती थी।

तारा दिन भर तो सेक्‍शन इंजीनियर साहब के घर पर रहकर उसकी पत्‍नी क्रिस मेरी की टहल तो बजाता ही था वह रात को भी वहीं रहता था। उसे घर की चारदीवारी के अंदर ही एक कमरा मिला हुआ था। वहाँ रहकर तारा उनके घर का सारा काम करता था।

वह गोरा-चिट्टा तो था ही वह भलीभाँति तंदुरुस्‍त भी था। उसकी शरीर खूब कसी हुई थी। उसके गोरे मुखडे पर हमेशा हँसी खेलती रहती थी। कहने का अभिप्राय यह कि तारा बचपन से ही बहुत हँसमुख था। उसके चेहरे पर उदासी या मायूसी नाम की कोई चीज न रहती थी।

विदेशियों का जीवन खुली किताब की तरह एकदम खुला होता ही है माइकल और मेरी का जीवन भी बिल्‍कुल स्‍वछंद और खुला था। आलिंगन और प्रेमालाप के काम में विदेशी स्‍त्री-पुरुषों के लिए पर्दा नाम का कोई महत्‍व नहीं होता है।

कोई उन्‍हें रतिक्रीड़ा में विलीन देखकर जलता है तो जलता रहे इससे उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। दिन-रात एक ही जगह पर साथ-साथ रहने से तारा और मेरी में खूब पटने लगी। उनमें घनिष्‍ठता बढ़ने से मित्रता भी हो गई। दोनों को एक-दूसरे की चिंता लगी रहती थी। क्रिस उस पर जान छिड़कने लगी। वह नित आए दिन उससे अठखेलियॉ खेलने लगी। आखिरकार हालत यहाँ तक पहुँच गई कि तारा को क्रिस के शयन कक्ष तक आने-जाने की इजाजत भी मिल गई।

इस प्रकार आपस में नजदीकी बढ़ते-बढ़ते वे एक-दूसरे के काफी करीब आ गए। तारा के मदमस्‍त अंगों को देखकर क्रिस का जी ललचाने लगा। वह दिन-प्रतिदिन उसकी ओर आकृष्‍ट होने लगी। तारा की ओर आकर्षित होते ही क्रिस अपने पति जोसेफ को भूलकर तारा को पाने के लिए बेचैन रहने लगी। वह उसके गठीले बदन से खेलने को सोचने लगी। उसका अंग-प्रत्‍यंग खिल उठा। उसके उर में खुशी की लहर दौड़ गई।

वह उसे हर वक्‍त अपने साथ रखने को उत्‍सुक दिखाई देने लगी। वह उसे कनखियों से देखती। इशारों-इशारों में उसे अपने मन की बात समझाने की कोशिश करती। कुछ दिन बाद ही वह उसके सामने अपनी इच्‍छाओं का इजहार भी करने लगी। उसे नेत्रबाण से घायल करने का यत्‍न करती। ऐसा नहीं था कि तारा उसकी नीयत को समझता न था। वह समझता तो सब कुछ था मगर, उसके जवाब में कोई प्रतिक्रिया जाहिर करने में एकदम असमर्थ था। उसकी अभिलाषा से उसे कुछ भी लेना-देना न था। इसलिए उसकी हर हरकत उसे बहुत बुरी लगती थी। वह उससे चिढ़कर मजाक में टाल देता।

तारा था कि उस पर क्रिस मेरी की किसी बात का असर ही न होता। उसे बस अपने काम से काम था। वह उसकी किसी बात पर लेशमात्र भी ध्‍यान न देता। उसे यह तो पता था कि इंजीनियर साहब का कोई काम समय पर पूरा न हुआ तो इसका मतलब नौकरी से हाथ धोना था परंतु, उसे यह हरगिज न मालूम था कि अगर, मेम साहिबा का कोई काम न होने पर क्‍या होगा? वह जोसेफ के अलावा और किसी से न डरता था।

समय इसी तरह आहिस्‍ता-आहिस्‍ता पंख फैलाकर उड़ता रहा। एक बार जब इंजीनियर महोदय घर से बाहर सरकारी काम से लाइन पर थे तब उनकी जीवनसंगिनी क्रिस मेरी घर पर अकेली ही थी। वह बाथिंग टब में भरे पानी में नहा रही थी। उस समय टब के पानी में उसका बदन शीशे की भाँति चमक रहा था। काम पीड़ा के चलते शीतल जल में तपते गोरे, शरीर की गर्मी ऐसे घुल रही थी मानो उसमें आग लग जाएगी।

यकायक उसने तारा को बड़े प्रेम से आवाज देकर अपने पास बुलाया और कहा तारा! मैं अपनी पीठ पर साबुन नहीं लगा पा रही हूँ। कृपया तुम अपने हाथों से लगा दो न? यह सुनते ही तारा को बड़ा ताज्‍जुब्‍ब हुआ। वह उसे बड़े अचंभे से देखने लगा। वह मन ही मन हँसते हुए सोचने लगा कि कैसी अनाड़ी महिला है। इसे जरा भी शर्म नहीं है। बड़ी बेशर्मी से मुझसे अपनी पीठ पर साबुन मलने को कह रही है। क्‍या कोई औरत ऐसा भी करती है? इसे इतनी भी तहजीब नहीं कि एक पराए व्‍यक्‍ति के सामने यह अपनी दिली ख्‍वाहिश का खुलेआम इजहार हर रही है।

तारा पहले कुछ सोचता रहा और फिर न जाने क्‍या सोचकर गमकता हुआ खुशबूदार विदेशी साबुन लेकर अपने हाथों से क्रिस की रेशम सी मुलायम, गुदगुदी पीठ पर लगाने लगा। अपनी पीठ पर तारा का कोमल हाथ लगेते ही क्रिस के बदन में अजीब सी गुदगुदी होने लगी। उसके पूरे तन में सरसराहट फैल गई। वह एकाएक रोमांचित हो उठी।

क्रिस के मन में बड़ी प्रबल इच्‍छा उत्‍पन्‍न हुई कि बड़ा सुनहरा अवसर है लाओ इसकी लंबी-चौड़ी बाहों में समा जाऊँ। तारा आज मेरी बदन को जितना तोड़-मरोड़ सकता है तोड़ डाले तो बेहतर होगा। वह सोचने लगी तारा मेरे गदराए हुए बदन को नीबू की तरह निचोड़कर रख दे। मेरे टूटते बदन को दर्दमुक्‍त कर दे। इससे मेरी कामेच्‍छा शांत हो जाएगी। मन को शांति मिलने से दिमाग को ठंडक मिलेगी। सारा तनाव खत्‍म हो जाएगा।

वह काम के वशीभूत होकर उसके हाथों को पकड़कर नहाने के टब में खींचने लगी। यह देखकर तारा को बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई। मारे शर्म के वह मुँह पर हाथ कर मुस्‍कराने लगा। वह टब में जाने को हरगिज राजी न था। वह उसके मजबूत पंजे से छूटने की जी तोड़ कोशिश करने लगा। वह खुद को बाहर की ओर खींचने की ताकत लगाते हुए बेजान सा चुपचाप आँखें फाड़-फाड़कर उसे निहारने लगा।

तारा की यह बेअदबी क्रिस को तनिक भी पसंद न आई। वह तनिक देर में बिगड़ खड़ी हुई। मन की मुराद पूरी होती न देख वह तिलमिला उठी। वह क्षण भर में ही एकदम आग बबूला हो उठी। वह नेत्र लाल-पीले करके झुंझलाकर बोली तारा!यह क्‍या बदतमीजी है? जरा मुझे समझने का प्रयास करो। तुम मेरी बात को समझने के बजाय उसे मजाक में टालने की कोशिश क्‍यों कर रहे हो।

वह उसे आँख दिखाती हुई कहने लगी मैं तुम्‍हें अपनी आँखों पर बिठाना चाहती हूँ और तुम हो कि कुछ समझते ही नहीं। लगता है तुम्‍हारी आँखों पर बड़ी चर्बी चढ़ी हुई है। नाहक ही इतनी उधेड़बुन करना ठीक नहीं है। एक हट्टे-कट्ठे तंदुरुस्‍त मर्द होकर भी औरतों की भाँति लजाकर मेरे अरमानों का खून कर रहे हो। तुम्‍हें मेरी इच्‍छाओं की कद्र करनी चाहिए। मैं तुम्‍हारी मेम हूँ तुम मेरे रंग में भंग न डालो तभी अच्‍छा है।

कुछ पल रुककर वह जहर उगलती हुई फिर बोली यदि मैं तनिक नमक-मिर्च लगाकर तुम्‍हारे इंजीनियर साहब का कान भर दूँ तो समझो तुम्‍हारी नौकरी गई। पलक झपकते ही तुम्‍हारी जान आफत में पड़ जाएगी। तुम्‍हें मेरी इच्‍छाओं के विरुद्ध ऐसा नहीं करना चाहिए। क्‍या तुमने अब तक यही सीखा है कि जो स्‍त्री तुम्‍हें अपनी जान से बढ़कर चाहती हो तुम उसकी बेइज्‍जती करते रहो। यह मेरा अपमान है। मैं इसे कदापि सहन नहीं कर सकती। एक बात कान खोलकर सुन लो, नारी सब कुछ बर्दाश्‍त कर सकती है परंतु, अपना अनादर वह कभी भी सहन नहीं कर सकती।

किन्‍तु, तारा उसकी मीठी-मीठी बातों पर कोई गौर न करके उसे हॅसी में टाल दिया। जिस प्रकार कुत्‍ते भौंकते रहते हैं और मस्‍त हाथी अपनी मस्‍ती में चलता जाता है उसी प्रकार तारा पर क्रिस की नाराजगी या प्रसन्‍नता का कोई फर्क न पड़ा। वह मुर्दे की तरह चुप पड़ा रहा। मानो उसके शरीर में पुरुषार्थ नाम की कोई चीज ही न हो। वह उसे देखकर मात्र व्‍यंग्‍यात्‍मक दृष्‍टि से मुस्‍कराता रहा।

तारा की यह धृष्‍टता देखकर क्रिस जलभुन गई। वह अपनी हसरत पूरी करने को बेताब हो उठी। मानो उसके तन-बदन में आग लग गई। वह क्रोधावेश में चिल्‍लाकर बोली तुम्‍हारी ऐसी की तैसी। मैं अब तुम्‍हें चखाऊँगी असली मजा। धीरे-धीरे दिन गुजर गया और सुबह से शाम हो गई। सेक्‍शन इंजीनियर माइकल साहब आफिस से छूटने के बाद अपने घर पहुँचे।

वहाँ जाते ही उन्‍होंने देखा कि उनकी पत्‍नी क्रिस बिलख-बिलखकर रो रही है। उन्‍होंने जब उससे रोने की वजह पूछा तो वह सिसकती हुई कहने लगी आज मेरे साथ कुछ अच्‍छा नहीं हुआ। मेरे अकेलेपन का फायदा उठाकर आपके नौकर तारा ने आज मेरी आबरू लूटने की हरकत की। अगर, मैं जरा सी भी चूक जाती तो वह मेरे साथ न जाने क्‍या करता। वह मुझे कहीं का न छोड़ता। अपनी मनमानी करके ही दम लेता।

यह सुनते ही माइकल साहब का पारा गर्म हो गया। वह गर्म तेल की भाँति उबल पड़े। वह एकदम गुस्‍से में भरकर बोले अच्‍छा! तो उसकी यह मजाल कि मेरी बिल्‍ली मुझे ही म्‍याऊँ करे। वह क्रिस को ढाढ़स बँधाते हुए बोले मेरी! तुम जरा रोना बंद करो। अभी पुलिस बुलाकर मैं उसकी चमड़ी उधड़वा लूँगा। वह कमबख्‍त अब काल कोठरी में जाएगा। उसे छठी का दूध याद दिला दूँगा। हमसे पंगा लेना उसे बहुत महँगा साबित होगा।

तत्‍पश्‍चात वह खरामे-खरामे इलाके के पुलिस थाने में जाकर तारा के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दिए कि मेरे बँगला चपरासी तारा ने मेरी गैर मौजूदगी में मेरी पत्‍नी क्रिस मेरी की इज्‍जत से खिलवाड़ करने की भरपूर कोशिश की। मुकदमा दर्ज होते ही पुलिस उनके घर पहुँची और तारा को पकड़कर थाने ले गई। वहाँ जाने पर भी तारा बगैर किसी दहशत के हँसता रहा।

तब दरोगा हनुमान देवधरे ने जुर्म कुबूल करवाने की गरज से उसे हड़काते हुए कहा बहुत हँसी-ठट्ठा सूझ रहा है। सबेरा होते ही जेल भेज दिए जाओगे तो नानी याद आ जाएगी। आखिर, तुमने क्‍या सोचकर ऐसा करने की जुर्रत की? तारा दूध का धुला हुआ निर्दोष तो था ही वह फिर भी हँसता रहा। यह देख दरोगाजी बड़े आश्‍चर्य में पड़ गए। वह सोचने लगे बड़ा ही ढीठ आदमी है। उसे किसी का कोई भय नहीं। ऐसा प्रतीत होता है कि दाल में कुछ काला है। यह बार-बार इतनी निडरता से हँस क्‍यों रहा है? ऐसा तो नहीं कि रिपोर्ट में कुछ गड़बड़ हो।

देवधरे साहब ने पूछा अबे! एक तो चोरी दूसरे सीनाजोरी? सच-सच बता दे वरना, खाल खिंचवाकर उसमें भूसा भरवा दूँगा। रोने के बजाय हँसता चला जा रहा है।

यह सुनते ही तारा मुस्‍काकर बोला हुजूर! आज मैं सुबह से ही हँस रहा हूँ। दरअसल बात यह है कि मुझ पर जो इल्‍जाम लगाया गया है वह बिल्‍कुल निराधार है। आप मुझे कारागार गृह किसी भी सूरत में नहीं भेज सकते क्‍योंकि मेरे ऊपर लगाए गए सारे आरोप बेबुनियाद और सरासर झूठे हैं। मैं किसी महिला के साथ ऐसी बदतमीजी कदापि नहीं कर सकता। यह पाप और मैं? छिः मुझसे स्‍वप्‍न में भी ऐसा न होगा। वास्‍तव में मैडम साहिबा ने मुझे पहचाना ही नहीं। यदि वह मुझे पहचान लेतीं तो ऐसी नौबत कतई न आती। उन्‍होंने साहब से जो कुछ भी कहा वह हरगिज सच नहीं है। मैं निहायत ही बेकसूर हूँ।

यह सुनना था कि दरोगा देवधरे भड़क उठे। वह बोले पकड़े जाने पर तुम्‍हारी तरह हर अपराधी अपने आप को निरापराध ही बताता है। कोई अपराधी खुद को दोशी कतई नहीं कहता है। वह स्‍वयं को हमेशा साफ-पाक ही बताता है।

तदंतर पुलिस ने क्रिस और तारा को चिकित्‍सकीय परीक्षण के लिए अस्‍पताल भेज दिया। वहाँ सर्वप्रथम तारा की जाँच की गई। उसे देखते ही डॉक्‍टर मदन गोपाल सुर्बे चौंक पड़े। वह इंस्‍पेक्‍टर से बोले-तारा ने कोई जुर्म नहीं किया है। यह एकदम निर्दोश है। यह किसी औरत को घूरकर देखने में सक्षम नहीं है। अंत में क्रिस की डाँक्‍टरी जाँच की गई तो उसका इल्‍जाम सफेद झूठ निकला।

उसके साथ तारा ने ऐसा कुछ भी गलत अभद्र व्‍यवहार न किया था जैसा कि उसने अपने पति जोसेफ को बताया था। यह सुनकर माइकल साहब भौंचक्‍का रह गए। उनका माथा ठनकने लगा। अंततोगत्‍वा तारा ने सबके सामने ही क्रिस के ढोल की सारी पोल खोलकर रख दिया। उसने परत दर परत सारी आपबीती सबको सुनाकर हैरत में डाल दिया। दरोगा सुर्बे के ताज्‍जुब्‍ब का भी कोई ठिकाना न रहा।

वाकई बात यह थी कि तारा जन्‍मजात एक किन्‍नर था। उसके अंदर दैहिक कमी तो थी ही उसमें पुरुषत्‍व और मर्दानगी का भी पूर्णतया अभाव था। उसमें भरपूर नारीत्‍व था। उसका हावभाव सब कुछ नारियों जैसा ही था। वह खुद को एक अबला ही मानता था। प्रकृति का मारा वह बेचारा किसी ललना पर बुरी नजर भी न रखता था।

ऐसे में किसी स्‍त्री की मर्यादा और शील भंग करने का कोई प्रश्‍न ही नहीं उठता था। क्रिस मेरी उसे सचमुच न पहचान सकी थी। वह उसे सदैव एक पुरुष ही समझती रही। वह अनजाने में ही उसे एकतरफा अपना दिल दे बैठी। वह उसकी भूख कतई न मिटा सकता था। वह उसके प्रेम में एकदम अंधी हो चुकी थी।

तारा की आधी-अधूरी जिंदगी के बारे में जब उसे पता चला तो वह बहुत शर्मिंदा हुई। उसे अपनी करनी पर बड़ी लज्‍जा आई। उसके साथ ही माइकल जोसेफ को भी बड़ी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी। अपनी अर्धांगिनी क्रिस के व्‍यवहार पर उनका कलेजा चीर उठा। उसके चलते उनके आदर्शों पर पानी फिर गया। उन्‍हें दर-दर की बदनामी झेलनी पड़ी।

उन्‍हें थाने में सरेआम सिर झुकाना पड़ा। उन्‍होंने तारा से क्षमा याचना की। उसने कहा तारा! मुझे माफ कर दो। मैंने नाहक ही तुम पर शक किया। यह औरत नहीं साक्षात पिसाचिनी है। इसे यार बनाने का बड़ा शौक है। मेरी पीठ पीछे यह रंगरेलियाँ मनाती है यह बात मुझे आज ही मालूम पड़ी है। अब तक मेरे चक्षुओं पर परदा पड़ा हुआ था। आज तुमने मेरी आँखें खोल दी।

परंतु, तारा इतना दुःखी हुआ कि अपना तबादला कराकर अन्‍यत्र चला गया। वह इंजीनियर साहब से बस इतना ही बोला कि जहाँ इंसान को पहचानने वाला ही न हो वहाँ क्‍या रहना? क्रिस सचमुच एक पापिनी औरत है। ऐसी औरतें किसी की नहीं होती हैं।

वह फिर बोला साहब! जो अपने पति की नहीं वह किसी की नहीं। यह अपने पति से प्रेम नहीं करती है। अपने ऐशो आराम के चक्‍कर में यह किसी दिन माइकल साहब के प्राण भी ले सकती है। ऐसी कुल्‍टा से दूर रहना ही श्रेष्‍यकर है।

यह सब सुनकर माइकल को बड़ा गहरा धक्‍का लगा। वह छटपटाकर रह गया। इसके बाद माइकल जोसेफ नौकरी छोड़ने के साथ ही क्रिस को त्‍यागकर गुपचुप तरीके से इंग्‍लैंड वापस चला गया। क्रिस यहीं पर रहकर दर-बदर की ठोकरें खाती फिरती रही।

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राजभाषा सहायक ग्रेड-।

महाप्रबंधक कार्यालय

उत्‍तर मध्‍य रेलवे मुख्‍यालय

इलाहाबाद

नाम

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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड 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पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: कहानी // प्रेमांध // अर्जुन प्रसाद
कहानी // प्रेमांध // अर्जुन प्रसाद
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