रचनाकार में खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

कहानी // दुर्भाग्य // अर्जुन प्रसाद

SHARE:

बात कई साल पुरानी है। बैताल गाँव के देवदत्‍त भट्ट बड़े ही परोपकारी, विनम्र और उज्‍ज्‍वल व्‍यक्‍तित्‍व के बहुत धनाढ्‌य पुरुष थे। उनके पास यदि...

केएनएस चौहान की कलाकृति

बात कई साल पुरानी है। बैताल गाँव के देवदत्‍त भट्ट बड़े ही परोपकारी, विनम्र और उज्‍ज्‍वल व्‍यक्‍तित्‍व के बहुत धनाढ्‌य पुरुष थे। उनके पास यदि किसी चीज की कमी थी तो बस यही कि संतान के नाम पर मात्र एक पुत्री कुमुद ही थी। बड़ी होने पर उन्‍होंने उसका विवाह पास के ही एक गाँव में एक अच्‍छे घराने में बालकृष्ण शर्मा के पुत्र उदयराज के साथ कर दिया। उदयराज एक अध्‍यापक थे और पास के ही इंटर कॉलेज में लेक्‍चरार थे। वह एक विद्वान और सुलझे हुए पुरुष थे।

वैसे तो इस जगत में एक जैसे स्‍वभाव वाले पति-पत्‍नी का जोड़ा बहुत कम ही बनता है वरना अक्‍सर यही देखने को मिलता है कि उनमें से एक बहुत ही गर्म मिजाज का होता है तो दूसरा बहुत ही नर्म मिजाज का होता है। यही वजह है कि पति-पत्‍नी में अक्‍सर कहासुनी और नोक-झोंक चलती रहती है। कई घरों में तो महाभारत ही मचा रहता है।

कर्कश स्‍वभाव की महिलाएँ अपने पति को एक पति नहीं बल्‍कि कमाकर लाने वाला घरेलू और पालतू नौकर तक समझती हैं। वे न तो खुद को ही समझ पाती हैं और न अपने पति को ही समझने की कोशिश करती हैं। ऐसी स्‍त्रियों का अज्ञान और गुरुर सातवें आसमान पर होता है। उनके आगे नर्म स्‍वभाव का पति जीते जी मरे के समान रहता है। वह अपना माथा पीट लेता है। जब देखिए तब वह केवल भीगी बिल्‍ली ही बना रहता है।

आपस में तालमेल न होने से पति-पत्‍नी के विचार आपस में सदैव टकराते रहते हैं और उनमें कलह मची रहती है लेकिन उदयराज और कुमुद के साथ ऐसा कुछ भी न था। दोनों का स्‍वभाव और आचार-विचार बिल्‍कुल एक जैसा ही था। दोनों ही उदार, समझदार और मृदुभाशी थे। उदयराज और कुमुद में आपस में बहुत ही प्रगाढ़ प्रेम था। उनके बीच कभी भूल से भी कोई रार-तकरार न होती थी। उनका रहन-सहन और पारस्‍परिक तालमेल देखकर उनके कुछ पड़ोसियों को जलन होने लगती थी।

वहीं कुछ लोग ऐसा भी कहने लगते थे कि अगर पति-पत्‍नी की जोड़ी हो तो ऐसी ही हो वरना अकेले ही जीना ठीक है। यह सच भी है। यदि पत्‍नी मधुर स्‍वभाव की सहनशील और बुद्धिमान हो तो पति के गर्ममिजाज होने पर भी घर में क्लेश नहीं होने पाता है। वह अपने बिगड़ैल पति को तनिक देर में ही समझाबुझाकर शांत कर देती है। वह उसका गुस्‍सा भड़कने से रोक लेती है मगर यदि पत्‍नी वास्‍तव में कुलटा या बुद्धिहीन मिल जाए तो जीवन जीते जी नर्क बनकर रह जाता है।

[ads-post]

उदयराज और कुमुद का विवाह होने के बाद उनके तीन पुत्र हुए। उनका नाम था राजीव, संजीव और चिरंजीव। राजीव सबसे बड़े थे और संजीव मँझले। चिरंजीव सबसे छोटे थे। राजीव और संजीव जब बड़े हो गए तो बाबू उदयराज ने आसपास के गाँवों ही रिश्ता देखकर उनका विवाह कर दिए। राजीव का विवाह मंदाग्‍नि से हुआ तो संजीव का विवाह रागिनी से हुआ। चिंरजीव सबसे छोटे थे इसलिए उनका विवाह होने में अभी समय था।

पति-पत्‍नी के रुप में बाबू उदयराज की जोड़ी एक ओर जहाँ बहुत ही लाजवाब थी वहीं उनके दोनों पुत्रों की बहुएँ एक अलग ही साँचे में ढली और पढ़ी-बढ़ी थीं। कहने का मतलब यह कि मीठे में बिल्‍कुल नमक मिल गया। वे किसी छोटी सी बात पर भी समझौता करने वाली न थीं। घर में अपना-अपना कदम रखते ही उन्‍होंने अपना मालिकाना हक जताना षुरु कर दिया।

आखिर धीरे-धीरे उन्‍होंने अपने-अपने पतियों को भरपूर कब्‍जे में कर लिया। दोनों की दोनों ही दिभर बनठनकर रहतीं और कोई कामकाज न करतीं। यह देखकर बाबू उदयराज पति-पत्‍नी को अपार कष्ट होता। वे उन्‍हें समझानेबुझाने का भरसक प्रयास भी करते मगर वे थीं कि उनके कानों पर जूँ तक भी रेगनें वाला न था। मानों दोनों एकमत फैसला करके आई थीं कि चाहें जो कुछ भी हो परंतु हम नहीं सुधरेंगे। उनके आचार-विचार से उदयराज पति-पत्‍नी दुःखी रहने लगे।

मंदाग्‍नि और रागिनी को ग्रामीण जीवन कतई पसंद न था अतएव उन्‍होंने अपने-अपने पतियों का कान भरना आरंभ कर दिया कि गाँव में क्‍या रखा है। कहीं शहर में चलकर नौकरी की जिए और हम भी वहीं रहेंगे। हमारे बस का घरेलू कामकाज नहीं है। यह सुनकर राजीव और संजीव उनका विरोध न कर सके और समय आने पर किसी न किसी शहर में जाने को हामी भर दिए। उन्‍होंने उनसे कहा कि ननिहाल की जमीन-जायदाद का बँटवारा हो जाने दो इसके बाद हम किसी शहर में ही जाकर रहेंगे। यह सुनकर वे दोनों देवरानी-जेठानी चुप हो गईं और अपना समय काटने लगीं।

इधर बाबू उदयराज के माता-पिता बिल्‍कुल वृ़द्ध और कमजोर थे ही, इसलिए वे कब अपना नेत्र बंद कर लेंगे इसका किसी को कुछ पता न था। मृत्‍यु किसी का इंतजार नहीं करती है। मृत्‍यु ही इस संसार में एक अटल सत्‍य है। उन्‍होंने अपने जीते जी सारा सुख भोग लिया था और कुछ बाकी न रह गया था। उनकी इच्‍छाएँ तृप्‍त हो चुकी थीं।

वे अपने जीवन से पूर्णतया संतुष्ट थे। आखिर जब इस दुनिया से जाने का बुलावा आया तो बुढ़ापे में पति-पत्‍नी ने बारी-बारी इस दुनिया से नजर फेर ली। उदयराज के सिर से माँ-बाप का और कुमुद कें सिर से सासु-ससुर का साया हमेशा के लिए उठ गया। इससे बाबू उदयराज पति-पत्‍नी कुछ गमगीन हो गए। यह सांसारिक रीति है कि जवान हों या वृद्ध, माता-पिता से बिछड़ने पर कष्ट होता ही है।

उधर बाबू देवदत्‍त के पास जमीन-जायदाद के साथ अकूत दौलत तो थी ही लोहे का एक ऐसा कुठला था जो चाँदी के हजारों सिक्‍कों से भरा हुआ था। मगर उसकी उस कुठले की एक बड़ी खासियत भी थी अगर कोई व्‍यक्‍ति उस कुठले से सिक्‍का निकालने के लिए उसमें अपना हाथ डालने की कोशिश करता तो वह यकायक बिल्‍कुल बेजान और अवाक रह जाता। उसका हाथ वहीं का वहीं रुक जाता।

बाद में पति-पत्‍नी के मन में यह धारणा घर कर गई कि इसमें कोई देवी या देवता जरूर है जिसे यह मंजूर नहीं कि इस कुठले से सिक्‍कों को निकालकर उसे किसी नेक काम पर खर्च किया जाए। उन्‍होंने उस धन को दान में देने का मन बना लिया। इंसान का स्‍वभाव होता है कि चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए। बुढ़ापे में धन बहुत प्रिय हो जाता है। अविवेकी और लोभी व्‍यक्‍ति वृद्धावस्‍था में बिल्‍कुल धनलोलुप बनकर रह जाता है। मरते दम तक लोभ उसका पीछा नहीं छोड़ता है। भलीभाँमि यह मालूम होते हुए भी कि एक रुपया भी साथ नहीं जाने वाला है, मनुष्य धन के पीछे पड़ा रहता है।

पति-पत्‍नी देवदत्‍त ने सालों से एकत्र धन को दान में देने का मन तो बनाया लेकिन किसी अपरिचित या अनभिज्ञ आदमी को नहीं। उन्‍होंने किसी संस्‍था या भिक्षुक को दान देने का मन नहीं बनाया बल्‍कि उन्‍होंने अपनी इकलौती पुत्री कुमुद के तीनों बेटों यानी अपने प्रिय नातियों को ही समान रुप से धन दान देने का फैसला किया।

पुरानी कहावत है कि धन धन में होता है और जल जल में। बाबू उदयराज के पास पुश्तैनी जायदाद और जमीन थी ही, उधर उनकी ससुराल उनके सासु-ससुर के पास जो कुछ भी था वह भी उन्‍हीं का होने वाला था। बुढ़ापे में सासु-ससुर के मरने के बाद वहाँ का सब कुछ उन्‍हीं को मिलने वाला था। इसे ही लोग सौभाग्‍य कह देते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि हर किसी को हर किसी का धन नहीं पचता है। किसी दूसरे का धन किसी-किसी आदमी को ही पचता है। दूसरों का धन आसानी से पचाना कोई बच्‍चों का खेल नहीं है। किसी-किसी का दिया हुआ धन उसे बहुत कष्ट पहुँचाता है। वह उसका जीवन एकदम तबाह करके रख देता है।

देवदत्‍त भट्ट जी के पास कोई पुत्र तो था नहीं इसलिए बुढ़ापे में उन्‍होंने अपनी देखभाल करने की गरज से अपनी इकलौती बेटी कुमुद के तीनों पुत्रों राजीव, संजीव और चिरंजीव को अपने पास ही बुलाकर अपना सब कुछ उनके नाम कर दिया। इसके बाद तीनों भाई वहाँ भी बारी-बारी रहने लगे।

कुछ दिन बाद राजीव और संजीव की पत्‍नियों ने जब उन पर फिर से दबाव डालना शुरु कर दिया कि किसी शहर में चलकर रहिए तो दोनों बड़े भाई अपने छोटे भाई चिरंजीव से बोले-भाई! हम दोनों का मन अब गाँव में नहीं लगता है। हमारा मन यहाँ के जीवन से ऊब चुका है। दिन-रात खेतीबाड़ी में हाड़ तोड़ मेहनत करके मरते-खपते रहो और तनिक देर में बाढ़ और अकाल आकर उसे बर्बाद कर देता है। यह सब झेलना हमारे बूते की बात नहीं है। अब हम किसी शहर में जाकर नौकरी करेंगे और तुम यही पर रहकर अपनी खेतीबाड़ी सँभालो। अभी तुम्‍हारी शादी वगैरह भी नहीं हुई है इसलिए तुम्‍हें कहीं आने-जाने की कोई जरूरत नहीं है।

इसके बाद वे दोनों भाई राजीव और संजीव अपनी-अपनी पत्‍नियों को गाँव में छोड़कर रेलगाड़ी का टिकट कटाए और धनबाद चले गए। वे अपनी-अपनी देवियों से यह कह गए कि पहले हमें जाकर अपना पैर जमाने दो, इसके बाद हम तुम्‍हें बुला लेंगे। शहरी जीवन गाँवों के मुकाबले काफी जटिल है। वहाँ सब कुछ अपनी कमाई पर ही निर्भर रहमता है। अगर शहर में नौकरी बढ़िया न मिले तो जीवन गुजारना बड़ा मुश्किल हो जाता है। शहरों में हर सामान पैसा देने पर ही मिलता है। बिना पैसा दिए हवा और पानी भी नहीं मिलता है।

तत्‍पश्चात  राजीव और संजीव धनवाद जाकर कोइलरी में आराम से नौकरी करने लगे। इसे ही कहते हैं घर की मुर्गी साग बराबर। अपने घर की खेतीबाड़ी न करके उन्‍हें कोयला खोदने का काम मन भा गया। अगर वे चाहते तो गाँव में ही रहकर अपनी खेती सँभालते और जमींदार बनकर रहते। यदि सूखा और बाढ़ न सताए तो धरती सच में सोना उगलती है यह बात अभी तक सबको मालूम नहीं है इसलिए हमारे बहुत से युवक गाँव छोड़कर शहर में जाकर बसना ही बेहतर समझने लगे हैं। धनवाद में जाकर नौकरी करने के कुछ दिन बाद ही राजीव और संजीव ने अपनी-अपनी पत्‍नियों तथा बच्‍चों को भी वहीं बुला लिया। कहने का मतलब यह कि वे फिर वहीं के होकर रह गए। उन्‍होंने मुँड़कर गाँव-घर की खबर ही न ली।

इधर छोटे शर्मा चिरंजीव अपने परिश्रम के बल पर दिन दूना तो रात चौगुना अमीर होते चले गए। जवान होने पर एक गाँव में उनका भी विवाह हो गया। उनकी पत्‍नी का नाम संयुक्‍ता था। वह गृहकार्य में दक्ष और सुभाशिणी थी। वह अपनी दोनों बड़ी जेठानियों मंदाग्‍नि और रागिनी से बिल्‍कुल अलग थी। चिंरजीव के पास आते ही उसने पूरे घर को सँभाल लिया और हर काम में अपने पतिदेव का साथ देने लगी। उसका सद्‌व्‍यवहार और विचार देखकर बाबू उदयराज और उनकी पत्‍नी कुमुद को बड़ी प्रसन्‍नता हुई। अपनी दोनों बड़ी पुत्रवधुओं से दुःखी उनका कुछ गम कम हो गया। उन्‍हें बड़ी राहत मिली। उनके दिल को कुछ सुकून मिला।

कई साल के बाद राजीव और संजीव कोइलरी से सेवा निवृत्‍त होने के बाद अपनी-अपनी पत्‍नियों और बच्‍चों के साथ गाँव में वापस आ गए और वहीं रहने लगे। दोनों बड़े भाई राजीव और संजीव तब अपनी बीवी-बच्‍चों के साथ गाँव में वापस लौटे तो अपने छोटे भाई चिरंजीव की तरक्‍की देखकर उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्‍हें कोटि यकीन ही न आ रहा था कि यह वही चिरंजीव है जिसे कई साल पहले हम दोनों छोड़कर धनवाद गए थे।

उन्‍होंने चिरंजीव की पत्‍नी संयुक्‍ता को अभी तक नहीं देखा था क्‍योंकि वे दोनों विवाह में बुलाने पर भी गाँव नहीं आए थे। उन्‍होंने यह कहकर गाँव आने में अपनी असमर्थता व्‍यक्‍त कर दी थी कि क्‍या करें, कैसे आएँ काम से छुट्‌टी नहीं मिल रही है। उन्‍होंने जब संयुक्‍ता को देखा तो वे उसे देखते ही रह गए। वे आपस में एक-दूसरे से कहने लगे-कमाल है हम दोनों सुख-शांति की तलाश में धनवाद चले गए लेकिन चिरंजीव अपनी पत्‍नी के साथ यहीं मजे से जीवन गुजार रहा है। इसे कहीं कोई परेशानी नहीं है। यह तो हम दोनों से कई गुना सुखी है।

कुछ दिन बड़े उधेड़बुन के साथ जैसे-तैसे व्‍यतीत हुआ लेकिन उसके बाद वही होने लगा जैसा बर्बादी वाले अन्‍य घरों में होता है। राजीव और संजीव की पत्‍नियाँ अपने-अपने पतियों का कान फिर भरले लगीं। वे उन पर बँटवारा करने का जोर देने लगीं। वे कहने लगीं- चिरंजीव अपनी पत्‍नी संयुक्‍ता के साथ अकेला ही मौज कर रहा है और हम दर-दर की ठोकरें खाते-फिरते रहे हें। अब हम इसे अकेला मौज नहीं करने देंगे। आखिर इस घर पर हमारा भी कुछ अधिकार है। हम भी इस घर की बहुएँ हैं।

वे उनसे बोलीं-देवर से जमीन-जायदाद में अपना-अपना हिस्‍सा ले लीजिए। तीनों भाइयों कुछ दिन तक खींचतान चलती रही और अंत में खेतीबाड़ी और घरबार की सारी जमीन आपस में बराबर-बराबर बँट गई। आपस में बँटवारा होते ही उनके घर-परिवार पर मानो वज्रपात ही हो गया। देखते ही देखते कुछ ही दिनों में घर की सारी यश मारी गई। आहिस्‍ता-आहिस्‍ता उन्‍हें दरिद्रता ने घेर लिया। गरीब और निर्धन दरिद्र होते-होते वे बिल्‍कुल बार्बादी के कगार पर पहुँच गए। सब कुछ तहस-नहस हो गया। इसे ही कहते हें जहाँ सुमति होती है वहाँ संपत्‍ति भी होती है और जहाँ कुमति होती है वहाँ नाना प्रकार की विपत्‍तियाँ ही होती हैं।

अपने बड़े भाइयों के दुःखों से दुःखी होकर छोटे भाई चिरंजीव ने गाँव के बाहर एक दूसरा मकान बना लिया और फिर वहीं रहने लगे। वहीं उसकी अर्धांगिनी संयुक्‍ता ने एक पुत्र को जन्‍म दिया किन्‍तु अफसोस यह कि लड़के को जन्‍म देने के बाद ही संयुक्‍ता की अचानक मृत्‍यु हो गई। उसने भरी जवानी में ही अपनी आँखें मूँद ली। उसका नौनिहाल अभागा बेटा इस दुनिया में बिना मां के ही रह गया। उसने अभी अपनी मां का दूध भी न छुआ था कि वह दुनिया से चली गई। न जाने किसकी मनहूस नजर लग गई कि वह बेचारी असमय ही मृत्‍यु की गोंद में समा गई।

युवावस्‍था में अपनी नई-नवेली प्राणप्रिया के अकाल वियोग से चिंरजीव को बड़ा दुःख हुआ। वह अंदर से टूटकर बिखर गए। संगति का कुछ न कुछ असर होता ही है इसलिए जब तक वह अपने भाइयों और भौजाइयों से अलग रहे तब तक बहुत सुखी और प्रसन्‍न रह परंतु उनके साथ होते ही उन पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। एक ओर पत्‍नी वियोग तो दूसरी ओर नन्‍हें बच्‍चे को पालना उनके लिए दुष्कर हो गया।

उनकी यह पीड़ा उनके माता-पिता से न देखी गई अतः उनके मासूम दुधमुँहे पुत्र को उन्‍होंने अपने पास रख लिया। इससे चिरंजीव को कुछ राहत मिली। अपने उस पुत्र का नाम उन्‍होंने बड़े ही भारी मन से निर्जीव रखा। बिना मां का निर्जीव अपनी दादी कुमुद के सहारे किसी तरह बच तो गया लेकिन बड़ा होने पर भी वह हीन भावना से मुक्‍त न हुआ। वह दीन-हीन भावना का शिकार होकर रह गया। उसे अपनी मां की याद सताती रही। वह रह-रहकर अपनी जन्‍मदायिनी के लिए तड़प‍ उठता था। वह बारंबार यही सोचता रहता कि काश मेरी भी मां होती तो कैसा होता।

एक तो चिरंजीव और उनके मां-बाप निर्जीव की मां संयुक्‍ता की मौत से दुःखी थे दूसरे निर्जीव की दशा देखकर वे और भी अधिक परेशान रहने लगे। वे उसके लिए एक नई मां की खोजबीन में जुट गए। चिरंजीव इलाके के जानेमाने धनी पुरुष थे ही इसलिए उनकी दूसरी शादी होते देर न लगी। ढूँढ़ते-खोजते उन्‍हें एक घर मिल गया।

इसके बाद चिरंजीव ने निर्मक्‍ता नामक एक तरुणी के साथ अपना दूसरा विवाह कर लिया। उनके पुनर्विवाह के बाद निर्मुक्‍ता और चिरंजीव के जीवन की गाड़ी पटरी पर आराम से चलने लगी। निर्जीव को भी एक मां मिल गई। निर्मुक्‍ता उसे अपने सगे पुत्र के समान ही मानने लगी। यह देखकर सबको बड़ी खुशी हुई। इसके बावजूद उदयराज और कुमुद ने निर्जीव को उसके माता-पिता के सहारे ही छोड़ देना उचित न समझा और उसे पुनः अपने पास रख लिया।

समय गुजरता रहा और निर्जीव पलता-बढ़ता गया। अब वह लगभग 8 साल का हो गया। समयचक्र तीव्रगति से गुजरने लगा। तभी समय ने एक बार फिर ऐसी करवट ली कि चिरंजीव के हरेभरे सुखमय जीवन में अचानक तूफान आ गया। कुछ दिन बाद ही निर्मुक्‍ता गर्भवती हो गई इससे परिवार में खुशियों की बहार सी आ गई उनकी वह प्रसन्‍नता ज्‍यादा दिनों तक कायम न रह सकी। वह बहुत जल्‍दी ही उनसे छिन गई।

समय आने पर निर्मुक्‍ता भी रागिनी की तरह एक पुत्र को जन्‍म देने के साथ ही गंभीर रुप से बीमार पड़ गई। इस प्रकार एक पुत्र को जन्‍म देने के बाद चिरंजीव की दूसरी पत्‍नी भी बीमार पड़ गई। लगातार बीमार रहने से उसकी सेहत दिन-प्रतिदिन बिगड़ती चली गई। अंत में उसने खाट पकड़ ली। आपसपास के सभी वैद्य और हकीम हार गए। वे उसकी बीमारी का इलाज न कर सके।

यथानाम तथा गुण, निर्मुक्‍ता भी एक सामान्‍य स्‍त्री थी। वह कोई देवी न थी। मानवीय दुर्बलताएँ उसके अंदर भी थीं। वह भी लोभ के वषीभूत हो चुकी थी। वह अपने इकलौते मासूम नौनिहाल के लिए छटपटाकर रह गई। उसे ऐसी विचित्र स्‍थिति में देखकर यमदेव भी उससे शर्माने लगे। मौत उसे अपने आगोश में लेने को हरगिज तैयार न थी। बीमार होने पर भी उसके प्राण निकलने को कतई तैयार न थे। हालांकि दर्द और पीड़ा से तड़पती हुई हालत में वह जल्‍दी से जल्‍दी अपनी मौत आने की प्रबल इच्‍छा कर रही थी। तब उसने चिरंजीव के पहले पुत्र निर्जीव को अपने पास बुलवाया और उससे धीरे से बोली- बेटा निर्जीव! आज तुम मुझे यह वचन दो कि मेरे मरने के बाद तुम यहाँ की किसी भी जमीन-जायदाद में अपना हिस्‍सा नहीं माँगोगे।

यह सुनकर बेचारा निर्जीव एकदम ठकुआ गया। उसकी समझ में न आ रहा था कि क्‍या करुँ और क्‍या न करुँ। फिर वह सोचने लगा-लालच भी कैसी बला है कि यह मरते समय भी माया-मोह से मुक्‍त नहीं हो पा रही है। आज यह मुझे कैसे अजीबोगरीब धर्म-संकट में डाल रही है। अगर इस समय इसे यह वचन दे दूँ तो मेरे हक में हरगिज अच्‍छा न होगा और यदि ऐसा वचन नहीं देता हूँ तो लोग ताने मारते रहेंगे। मुझ पर नाहक ही जीवन भर के लिए एक बड़ा कलंक लग जाएगा। निर्जीव एक बार अपने पिता चिरंजीव के चेहरे की ओर देखता तो एक बार अपनी सौतेली मां की ओर।

फिर वह सोचने लगा-इससे मेरा जीना दूभर हो जाएगा। सब लोग यही कहेंगे कि इसने अपनी सौतेली मां को वचन न देकर उसे मार दिया। वह उधेड़बुन में पड़ा ही हुआ था कि तभी कुछ ग्रामीण बोले-अरे भइया निर्जीव! इस वक्‍त ज्‍यादा सोच-विचार मत करो। इसके प्राण अटके हुए हैं। तुम बाद में अपना हिस्‍सा ले लेना लेकिन इस समय इसके सामने हाँ कर दो। यह सुनते ही निर्जीव ने तपाक से कह दिया-ठीक है, ऐसा ही होगा। इतना सुनना था कि निर्मुक्‍ता के प्राण पखेरू उड़ गए। चिरंजीव को एक बार फिर विधुरता का मुँह देखना पड़ा। उन्‍हें पत्‍नीसुख जितना लिखा उतना ही मिला। दो-दो विवाह करके भी वह इस जग में अकेले ही रह गए।

समय का पहिया घूमता रहा और चिरंजीव के दोनों पुत्र बड़े हो गए। उनके जवान हो जाने के बाद रिश्‍तेदारों के दबाव डालने पर चिरंजीव को दानों पुत्रों के बीच जमीन-जायदाद का दो हिस्‍सों में बराबर बँटवारा करना पड़ा। निर्जीव को अपने दादा-दादी बाबू उदयराज और कुमुद की भी आधी जायदाद और खेतीबाड़ी मिल गई मगर उसके दुर्भाग्‍य ने उसे न छोड़ा। वह जानी दुश्मन की भाँति पंजे झाड़कर उसके पीछे पड़ी रही। यद्यपि बँटवारे के कुछ दिन बाद ही एक सुंदरी से उसका विवाह भी हो गया और शादी के बाद उसके दो पुत्र भी हुए परंतु मुफ्‍त में मिले हुए ननिहाल के धन ने मानो उसे तबाह और बर्बाद करने को ठान लिया था।

उसके घर का सारा यश धीरे-धीरे खत्‍म होने लगा। एक दिन तो दुर्भाग्‍य ने उसे इस तरह धर दबोच लिया कि वह छटपटाते ही रह गया लेकिन उसने उसे छोडने का नाम तक न लिया। उस दिन उसके घर में आटा न था। उसकी पत्‍नी मधु ने उससे कई बार कहा-गेहूँ पिसवाकर ले आई वरना आज रोटी न मिलेगी। वह सुनकर टालता रहा और गेहूँ पिसाने चक्‍की पर नहीं गया। वह बस, अभी-अभी करता रहा।

पुरुषों की अपेक्षा महिलाएँ कुछ कम सहनशील होती ही हैं निर्जीव की आनाकानी देखकर मधु के साहस ने जवाब दे दिया और वह एकदम आवेश में आ गई। मन संताप बढ़ते ही उसने आव देखा न ताव और अपने शरीर पर मिट्टी का तेल उड़ेलकर आग लगा ली। उसने अपने आपको आग के हवाले तो झोक दिया मगर अब दो बच्‍चों की देखभाल कौन करेगा यह सोचकर दुःखी हो गई। उसे अपने किए पर पश्चाताप होने लगा।

निंर्जीव ने किसी तरह उसकी आग बुझाई और उसे अस्‍पताल ले गया। वहाँ जाने पर जब इलाके के एस.डी.एम. ने वहाँ जाकर उसका बयान लिया तो उसने निर्जीव को साफ-साफ बचा दिया और बोली कि हुजूर! लापरवाहीवश अकस्‍मात ऐसा हो गया। मेरे जलने में मेरे पति का कोई हाथ नहीं है। यह बिल्‍कुल निर्दोश हैं। निर्जीव अपनी ओर से इस हादसे में तनिक भी दोषी न था इसलिए कुदरत ने उसे बख्श दिया वरना उसे नाहक ही जेल की हवा भी खानी पड़ती। वह बाल-बाल बच गया।

आज उस घर की सभी स्‍त्रियाँ दो वक्‍त की रोटी को तो मोहताज हैं ही वे पहनने के लिए एक वस्‍त्र को भी तरसती रहती हैं। यह सच है कि अपने परिश्रम की कमाई में बरकत होती है। किसी दूसरे का धन मनुष्य को गर्त में भी पहुँचा सकता है। दुर्भाग्‍य के सामने उदयराज के पुत्रों को ननिहाल की दौलत किसी भी तरह रास न आई। वह उनकी तबाही का एक बड़ा कारण बनकर रह गई।

--

अर्जुन प्रसाद

वरिष्‍ठ अनुवादक

उत्‍तर मध्‍य रेलवे परियोजना इकाई

शिवाजी ब्रिज, नई दिल्‍ली-110001

COMMENTS

BLOGGER

विज्ञापन

----
.... विज्ञापन ....

-----****-----

|नई रचनाएँ_$type=complex$count=6$page=1$va=0$au=0

|कथा-कहानी_$type=complex$au=0$count=6$page=1$src=random-posts$s=200

|हास्य-व्यंग्य_$type=blogging$au=0$count=6$page=1$src=random-posts

-- विज्ञापन --

---

|लोककथाएँ_$type=complex$au=0$count=6$page=1$src=random-posts

|लघुकथाएँ_$type=list$au=0$count=5$com=0$page=1$src=random-posts

|काव्य जगत_$type=complex$au=0$count=6$page=1$src=random-posts

-- विज्ञापन --

---

|बच्चों के लिए रचनाएँ_$type=complex$au=0$count=6$page=1$src=random-posts

|विविधा_$type=complex$au=0$va=0$count=6$page=1$src=random-posts

 आलेख कविता कहानी व्यंग्य 14 सितम्बर 14 september 15 अगस्त 2 अक्टूबर अक्तूबर अंजनी श्रीवास्तव अंजली काजल अंजली देशपांडे अंबिकादत्त व्यास अखिलेश कुमार भारती अखिलेश सोनी अग्रसेन अजय अरूण अजय वर्मा अजित वडनेरकर अजीत प्रियदर्शी अजीत भारती अनंत वडघणे अनन्त आलोक अनमोल विचार अनामिका अनामी शरण बबल अनिमेष कुमार गुप्ता अनिल कुमार पारा अनिल जनविजय अनुज कुमार आचार्य अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ अनुज खरे अनुपम मिश्र अनूप शुक्ल अपर्णा शर्मा अभिमन्यु अभिषेक ओझा अभिषेक कुमार अम्बर अभिषेक मिश्र अमरपाल सिंह आयुष्कर अमरलाल हिंगोराणी अमित शर्मा अमित शुक्ल अमिय बिन्दु अमृता प्रीतम अरविन्द कुमार खेड़े अरूण देव अरूण माहेश्वरी अर्चना चतुर्वेदी अर्चना वर्मा अर्जुन सिंह नेगी अविनाश त्रिपाठी अशोक गौतम अशोक जैन पोरवाल अशोक शुक्ल अश्विनी कुमार आलोक आई बी अरोड़ा आकांक्षा यादव आचार्य बलवन्त आचार्य शिवपूजन सहाय आजादी आदित्य प्रचंडिया आनंद टहलरामाणी आनन्द किरण आर. के. नारायण आरकॉम आरती आरिफा एविस आलेख आलोक कुमार आलोक कुमार सातपुते आशीष कुमार त्रिवेदी आशीष श्रीवास्तव आशुतोष आशुतोष शुक्ल इंदु संचेतना इन्दिरा वासवाणी इन्द्रमणि उपाध्याय इन्द्रेश कुमार इलाहाबाद ई-बुक ईबुक ईश्वरचन्द्र उपन्यास उपासना उपासना बेहार उमाशंकर सिंह परमार उमेश चन्द्र सिरसवारी उमेशचन्द्र सिरसवारी उषा छाबड़ा उषा रानी ऋतुराज सिंह कौल ऋषभचरण जैन एम. एम. चन्द्रा एस. एम. चन्द्रा कथासरित्सागर कर्ण कला जगत कलावंती सिंह कल्पना कुलश्रेष्ठ कवि कविता कहानी कहानी संग्रह काजल कुमार कान्हा कामिनी कामायनी कार्टून काशीनाथ सिंह किताबी कोना किरन सिंह किशोरी लाल गोस्वामी कुंवर प्रेमिल कुबेर कुमार करन मस्ताना कुसुमलता सिंह कृश्न चन्दर कृष्ण कृष्ण कुमार यादव कृष्ण खटवाणी कृष्ण जन्माष्टमी के. पी. सक्सेना केदारनाथ सिंह कैलाश मंडलोई कैलाश वानखेड़े कैशलेस कैस जौनपुरी क़ैस जौनपुरी कौशल किशोर श्रीवास्तव खिमन मूलाणी गंगा प्रसाद श्रीवास्तव गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर ग़ज़लें गजानंद प्रसाद देवांगन गजेन्द्र नामदेव गणि राजेन्द्र विजय गणेश चतुर्थी गणेश सिंह गांधी जयंती गिरधारी राम गीत गीता दुबे गीता सिंह गुंजन शर्मा गुडविन मसीह गुनो सामताणी गुरदयाल सिंह गोरख प्रभाकर काकडे गोवर्धन यादव गोविन्द वल्लभ पंत गोविन्द सेन चंद्रकला त्रिपाठी चंद्रलेखा चतुष्पदी चन्द्रकिशोर जायसवाल चन्द्रकुमार जैन चाँद पत्रिका चिकित्सा शिविर चुटकुला ज़कीया ज़ुबैरी जगदीप सिंह दाँगी जयचन्द प्रजापति कक्कूजी जयश्री जाजू जयश्री राय जया जादवानी जवाहरलाल कौल जसबीर चावला जावेद अनीस जीवंत प्रसारण जीवनी जीशान हैदर जैदी जुगलबंदी जुनैद अंसारी जैक लंडन ज्ञान चतुर्वेदी ज्योति अग्रवाल टेकचंद ठाकुर प्रसाद सिंह तकनीक तक्षक तनूजा चौधरी तरुण भटनागर तरूण कु सोनी तन्वीर ताराशंकर बंद्योपाध्याय तीर्थ चांदवाणी तुलसीराम तेजेन्द्र शर्मा तेवर तेवरी त्रिलोचन दामोदर दत्त दीक्षित दिनेश बैस दिलबाग सिंह विर्क दिलीप भाटिया दिविक रमेश दीपक आचार्य दुर्गाष्टमी देवी नागरानी देवेन्द्र कुमार मिश्रा देवेन्द्र पाठक महरूम दोहे धर्मेन्द्र निर्मल धर्मेन्द्र राजमंगल नइमत गुलची नजीर नज़ीर अकबराबादी नन्दलाल भारती नरेंद्र शुक्ल नरेन्द्र कुमार आर्य नरेन्द्र कोहली नरेन्‍द्रकुमार मेहता नलिनी मिश्र नवदुर्गा नवरात्रि नागार्जुन नाटक नामवर सिंह निबंध नियम निर्मल गुप्ता नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ नीरज खरे नीलम महेंद्र नीला प्रसाद पंकज प्रखर पंकज मित्र पंकज शुक्ला पंकज सुबीर परसाई परसाईं परिहास पल्लव पल्लवी त्रिवेदी पवन तिवारी पाक कला पाठकीय पालगुम्मि पद्मराजू पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बालगीत बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार श्रीवास्तव मनोज दास ममता सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष सिंह रावण राहुल कुमार राहुल सिंह रिंकी मिश्रा रिचर्ड फाइनमेन रिलायंस इन्फोकाम रीटा शहाणी रेंसमवेयर रेणु कुमारी रेवती रमण शर्मा रोहित रुसिया लक्ष्मी यादव लक्ष्मीकांत मुकुल लक्ष्मीकांत वैष्णव लखमी खिलाणी लघु कथा लघुकथा लतीफ घोंघी ललित ग ललित गर्ग ललित निबंध ललित साहू जख्मी ललिता भाटिया लाल पुष्प लावण्या दीपक शाह लीलाधर मंडलोई लू सुन लूट लोक लोककथा लोकतंत्र का दर्द लोकमित्र लोकेन्द्र सिंह विकास कुमार विजय केसरी विजय शिंदे विज्ञान कथा विद्यानंद कुमार विनय भारत विनीत कुमार विनीता शुक्ला विनोद कुमार दवे विनोद तिवारी विनोद मल्ल विभा खरे विमल चन्द्राकर विमल सिंह विरल पटेल विविध विविधा विवेक प्रियदर्शी विवेक रंजन श्रीवास्तव विवेक सक्सेना विवेकानंद विवेकानन्द विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी विष्णु नागर विष्णु प्रभाकर वीणा भाटिया वीरेन्द्र सरल वेणीशंकर पटेल ब्रज वेलेंटाइन वेलेंटाइन डे वैभव सिंह व्यंग्य व्यंग्य के बहाने व्यंग्य जुगलबंदी व्यथित हृदय शंकर पाटील शगुन अग्रवाल शबनम शर्मा शब्द संधान शम्भूनाथ शरद कोकास शशांक मिश्र भारती शशिकांत सिंह शहीद भगतसिंह शामिख़ फ़राज़ शारदा नरेन्द्र मेहता शालिनी तिवारी शालिनी मुखरैया शिक्षक दिवस शिवकुमार कश्यप शिवप्रसाद कमल शिवरात्रि शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी शीला नरेन्द्र त्रिवेदी शुभम श्री शुभ्रता मिश्रा शेखर मलिक शेषनाथ प्रसाद शैलेन्द्र सरस्वती शैलेश त्रिपाठी शौचालय श्याम गुप्त श्याम सखा श्याम श्याम सुशील श्रीनाथ सिंह श्रीमती तारा सिंह श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंगी श्वेता अरोड़ा संजय दुबे संजय सक्सेना संजीव संजीव ठाकुर संद मदर टेरेसा संदीप तोमर संपादकीय संस्मरण संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018 सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सतीश कुमार त्रिपाठी सपना महेश सपना मांगलिक समीक्षा सरिता पन्थी सविता मिश्रा साइबर अपराध साइबर क्राइम साक्षात्कार सागर यादव जख्मी सार्थक देवांगन सालिम मियाँ साहित्य समाचार साहित्यिक गतिविधियाँ साहित्यिक बगिया सिंहासन बत्तीसी सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध सीताराम गुप्ता सीताराम साहू सीमा असीम सक्सेना सीमा शाहजी सुगन आहूजा सुचिंता कुमारी सुधा गुप्ता अमृता सुधा गोयल नवीन सुधेंदु पटेल सुनीता काम्बोज सुनील जाधव सुभाष चंदर सुभाष चन्द्र कुशवाहा सुभाष नीरव सुभाष लखोटिया सुमन सुमन गौड़ सुरभि बेहेरा सुरेन्द्र चौधरी सुरेन्द्र वर्मा सुरेश चन्द्र सुरेश चन्द्र दास सुविचार सुशांत सुप्रिय सुशील कुमार शर्मा सुशील यादव सुशील शर्मा सुषमा गुप्ता सुषमा श्रीवास्तव सूरज प्रकाश सूर्य बाला सूर्यकांत मिश्रा सूर्यकुमार पांडेय सेल्फी सौमित्र सौरभ मालवीय स्नेहमयी चौधरी स्वच्छ भारत स्वतंत्रता दिवस स्वराज सेनानी हबीब तनवीर हरि भटनागर हरि हिमथाणी हरिकांत जेठवाणी हरिवंश राय बच्चन हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन हरिशंकर परसाई हरीश कुमार हरीश गोयल हरीश नवल हरीश भादानी हरीश सम्यक हरे प्रकाश उपाध्याय हाइकु हाइगा हास-परिहास हास्य हास्य-व्यंग्य हिंदी दिवस विशेष हुस्न तबस्सुम 'निहाँ' biography dohe hindi divas hindi sahitya indian art kavita review satire shatak tevari undefined
नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3789,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,326,ईबुक,182,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2744,कहानी,2067,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,484,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,129,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,86,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,309,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,326,बाल कलम,23,बाल दिवस,3,बालकथा,48,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,8,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,16,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,224,लघुकथा,806,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,305,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,57,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1879,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,637,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,675,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,51,साहित्यिक गतिविधियाँ,180,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,51,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: कहानी // दुर्भाग्य // अर्जुन प्रसाद
कहानी // दुर्भाग्य // अर्जुन प्रसाद
https://lh3.googleusercontent.com/-VNr29Ekg4mc/WXWQ_OFVPGI/AAAAAAAA5pA/0xa6ZwxLyNg4dZGuGYQWQPpinIE7lNciwCHMYCw/image_thumb%255B5%255D?imgmax=800
https://lh3.googleusercontent.com/-VNr29Ekg4mc/WXWQ_OFVPGI/AAAAAAAA5pA/0xa6ZwxLyNg4dZGuGYQWQPpinIE7lNciwCHMYCw/s72-c/image_thumb%255B5%255D?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2017/07/blog-post_37.html
https://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/2017/07/blog-post_37.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय खोजें सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है चरण 1: साझा करें. चरण 2: ताला खोलने के लिए साझा किए लिंक पर क्लिक करें सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ