प्राची - अगस्त 2017 : कथा-यात्रा अन्दर से बाहर की कथा-यात्रा : रामदरश मिश्र की कहानियां // डॉ. विनय

SHARE:

ध र्मवीर भारती की कहानियों की समीक्षा करते हुए, रामदरश मिश्र ने ‘अनुभवशील आधुनिकता’ की जो बात कही है, वह उनकी कहानियों के संदर्भ में भी उतनी...

र्मवीर भारती की कहानियों की समीक्षा करते हुए, रामदरश मिश्र ने ‘अनुभवशील आधुनिकता’ की जो बात कही है, वह उनकी कहानियों के संदर्भ में भी उतनी ही सही और समर्थक है, बल्कि अधिक प्रामाणिक भी. वस्तुतः जब एक रचनाकार समीक्षक का धर्म निभाता है तो जाने-अनजाने वे तत्व स्वतः प्रमुखता प्राप्त कर लेते हैं जो रचनाकार समीक्षक के सर्जन के क्षणों में महत्त्वपूर्ण होते हैं. मिश्रजी ने लिखा है, ‘‘आधुनिकता आज की रचना की प्रकृति भी है और उसकी अनिवार्यता भी. किन्तु आधुनिकता क्या है, अनेक बहसों के बावजूद यह तै नहीं हो पाया. आधुनिकता के ठीक-ठीक परिभाषित न होने के बावजूद रचनाओं में आधुनिकता की खोज होती रहती है और इस आधार पर रचना की प्रासंगिकता-अप्रासंगिकता का ही नहीं, उसकी रचनात्मक उपलब्धि और सीमा का भी निर्णय होता चलता है.’’...

मैं समझता हूं कि ‘आधुनिकता बोध’ अपने आप में सही और सार्थक रचना की एकमात्र कसौटी नहीं हो सकता जब तक कि उसके साथ रचनात्मक ईमानदारी और उदात्तता के अन्य तत्त्व जुड़े न हों. रचनागत ईमानदारी रचना को व्यक्ति-समाज सापेक्ष यथार्थ से जोड़ती है और उदात्तता रचनाकार की मूल्यवादी दृष्टि से व्यक्त होती है. पिछले दिनों वस्तुवादी क्रूर दृष्टि और मूल्यवादी दृष्टि को अनिवार्यतः छत्तीस की स्थिति में स्वीकार करनेवाले लेखक-समीक्षकों ने बड़े गलत ढंग से आधुनिकता की परिभाषा की और उसे महानगरीय बोध से जोड़कर वहीं तक सीमित कर दिया. लेकिन आधुनिकता जैसे व्यापक साहित्यिक मूल्य पर खुले नजरिये से सोचना इसलिए भी जरूरी हो जाता है कि परिवेशगत संपृक्तता को सही रूप से देखा समझा जाये. जब कभी भी परिवेश की बात उठती है तो अनायास ही ‘आधुनिक परिवेश’ जैसा पारिभाषिक शब्द उभर पड़ता है और भारत में बदलते हुए व्यापक जीवन-संदर्भ, जो शहरों से दूर, ग्रामों, कस्बों छोटे नगरों में उभरते हैं, नजर अंदाज कर दिए जाते हैं. यहीं पर उन समीक्षकों और रचनाकारों की दृष्टि भी मुझे सीमित जान पड़ती जो समकालीन के नाम पर किसी भी मूल्य-दृष्टि को नकारते रहे हैं.

रामदरश मिश्र की कहानियों के संदर्भ में आधुनिकता के प्रसंग को उठाना इसलिए जरूरी हो जाता है क्योंकि उनकी अधिकांश उल्लेखनीय कहानियां ग्राम-जीवन पर आधारित हैं, उसकी संवेदनात्मक अभिव्यक्ति करती हैं. यही कारण है कि उनका अनुभव-जगत, वस्तुवादी दृष्टि तथा विशिष्टता अपने विश्लेषण और मूल्यांकन के लिए कथा-बोध के व्यापक दृष्टिकोण की अपेक्षा करती है.

मिश्रजी के पास ग्राम-जीवन के व्यापक अध्ययन से बनी जीवन दृष्टि है तो नगर जीवन के अध्ययन से उभरी ज्ञानात्मक संवेदना भी है जो उनके रचनाकार को इन दोनों परिवेशों में कोई कृत्रिम दीवार खड़ी न करने की प्रेरणा देती है. मेरी धारणा यह है कि आज के साहित्य में उभरी आधुनिकता विज्ञान और प्रविधि के प्रभाव में जिस विघटन, संत्रास, व्यक्तिवादिता और अकेलेपन, परायेपन के बोध को नगर के संदर्भ में निरूपित करती है, वे सारे संदर्भ ग्राम-जीवन को भी वैसा ही आधार देते हैं. तेजी से नगरों, महानगरों में बदलते जीवन-मूल्य जिस सामाजिकता के लिए खतरा बनते दिखते हैं, उसी प्रकार का संकट गांवों में भी है. यह मिश्रजी के कथाकार की विशिष्टता है कि उन्होंने अपने अनुभव जगत को नितान्त स्वाभाविक और सहज रूप से गांव और नगर के साक्षात्कार ‘कन्फ्रन्ट्रेशन’ तक ही नहीं रखा, बल्कि क्रूर वस्तुवादी दृष्टि से परे, बदलाव का अनुभव करते हुए मनुष्य की उस संवेदना को अभिव्यक्त किया है जो कहीं जुड़ने की विवशता लिए है लेकिन जुड़ नहीं पाती. इस कारण मिश्र जी प्रामाणिक अनुभव के आधार पर कहानी को कभी गांव के छोर से शुरू करके गांव तक ही रखते हैं, कभी उसका फलक बड़ा होकर नगर को समेटता है और कई बार वे शहर से लेकर गांव तक एक ऐसी सड़क बना देते हैं जो बदलाव के धर्म को एक साथ गांव और शहर के आकाश में व्यापक कर देती है.

‘नयी कहानी’ के आन्दोलन के कहानी में जिस अतिरिक्त व्यक्तिवादिता की प्रतिष्ठा हुई थी, वह धीरे-धीरे वाम दृष्टि के आधार पर आम आदमी के चरित्र में बदलती नजर आई.

इधर इस आम आदमी की चर्चा बहुत हुई है और निःसंदेह कुछ समर्थ रचनाकारों के द्वारा आम आदमी की पक्षधरता काफी सशक्त रूप में व्यक्त हुई है. मिश्रजी उन कथाकारों में विशिष्ट स्थान के अधिकारी हैं जिन्होंने सही परिप्रेक्ष्य में आम आदमी की बात आम आदमी के सामने ही रखी है. उनका आम आदमी नगरों की सड़कों पर संत्रस्त जीवन गुजारता है, और गांवों में खेती की मेंड़ों पर संस्कारों और परंपरा से जकड़ा, छूटने के लिए व्याकुल, बदलाव को स्वीकार करने की यातना से बंधा खड़ा है. यह बिंदु ही उनकी कहानियों का बुनियादी तत्व है जिसके आधार पर वे आंचलिकता के सीमित दायरे से निकलकर आधुनिकता के संदर्भ में संवेदनशील कहानीकार के रूप में आते हैं. और क्रूर वस्तुवादी दृष्टि से आगे आकर, व्यापक विघटन के बीच वैयक्तिता की रक्षा करते हुए, सामाजिकता की प्रतिष्ठा करते हैं.

डॉ. नित्यानन्द तिवारी ने मिश्रजी की कहानियों के विषय में लिखा है कि ‘‘उनको पढ़ते ही पाठक को इस बात का विश्वास हो जाता है कि लेखक का सब कुछ भोगा हुआ है. एक-एक पीड़ा का उसने साक्षात्कार किया है. यही तत्व व्यक्त अनुभव को पाठक के लिए इतना आत्मीय बना देता है कि लेख के प्रति वह सहज विश्वासी हो जाता है.’’ ...मैं यहीं से यदि मिश्रजी की कहानयों का विश्लेषण आरम्भ करूं तो एक मूल तत्व की ओर ध्यान देना चाहूंगा...यह तत्व है ‘‘अनुभव की ईमानदारी.’’ इस अनुभव की ईमानदारी के साथ, परिवेशगत सजगता और सक्रियता तथा व्यक्ति-समाज-सापेक्ष क्रूर वस्तुवादिता, एक ऐसे संश्लिष्ट जीवनानुभव का निर्माण करती है जहां आधुनिकता, आम आदमी का संकट और मूल्यवत्ता उनकी रचना को उदात्तता देते हैं.

‘खाली घर’ की सीमा को लेकर ‘एक वह’ की संबंध कहानी तक उनकी कथा-यात्रा में विविध अनुभव व्यक्त हुए हैं-जो इस बात का विश्वास दिलाते हैं कि अनुभव की गहराई के साथ दृष्टिगत वैविध्य भी उनकी कहानियों में पूरी तरह से हैं. सीमा, लाल हथेलियां, मुक्ति, एक औरत एक जिन्दगी, छूटता हुआ नगर-एक व्यक्ति को केंद्र में रखकर लिखी गई कहानियां हैं. इनमें मुक्ति और छूटता हुआ नगर की वेदना सीमा, लाल हथेलियों की वेदना से भिन्न है. उन अनुभूतियों को यदि वेदना न कहकर स्थितिगत अभाव कहा जाए तो अधिक अच्छा होगा. ये कहानियां एक-सी वेदना की कहानियां हैं जहां व्यक्ति अपने किसी अभाव से संत्रस्त है, उसके कारण उपेक्षित भी और टूटा हुआ भी. रचनात्मक धरातल पर व्यक्ति केंद्रित होने पर भी इन कहानियों में परिस्थितियों का चक्र भी महत्त्वपूर्ण है. दरअसल मिश्रजी को स्थितियां इस प्रकार उपलब्ध हुई हैं कि उन्हें कहानी में केवल भीतर से बाहर व्यक्त करना पड़ा है, गढ़ना नहीं पड़ा. यही उनकी कहानियों की स्वाभाविकता और सहजता है. ‘सीमा’ एक पंगु लड़की की कथा है जिसका मन अपनी स्थिति से बुरी तरह टूटा हुआ है और आस-पास वाले व्यक्ति व्यंग्य से उस टूटन को और भी घना बना देते हैं. कहानी का पूरा परिवेश इस रूप में उजागर हुआ है कि भावुकता की वकालत नहीं करता लेकिन यहां वह अपरिहार्य तत्व के रूप में आया है. अनुभव की ईमानदारी ‘सीमा’ को अत्यधिक प्रामाणिक और प्रभावोत्पादक कहानी बना देती है. तो क्या इसकी सफलता का आधार केवल अनुभव है? और क्या यह कहानी मिश्र जी की उन कहानियों में आती है जो संदर्भों की व्यापकता के कारण अधिक सफल हैं. दरअसल प्रारंभिक कहानियों में लेखक की रचनात्मक शक्ति संवेदनात्मक गहराई तक विचरण करती ही है...और बाद में विविध संदर्भों से जुड़कर...विस्तृत फलक पर उभरी है. सीमा में फलक विस्तृत नहीं है. ‘सीमा’ में ही नहीं, ‘बादलों भरा दिन’ में भी फलक सीमित है. अन्य कहानियों में इस सीमितता को मिश्रजी भावनात्मक उद्वेग से पूरा करते हैं, पर ‘बादलों भरा दिन’ में यह संभव नहीं हो पाया है. वहां पर वर्णित स्थितियां रचनात्मक उद्वेग का पर्याय नहीं बन पाई हैं बल्कि पाठक के संदर्भ में यह केवल एक खास स्थिति की अभिव्यक्ति ही रह जाती हैं. यह कहानी स्थितियों की अभिव्यक्ति करते ‘क्रियेशन’ के गहरे अर्थों से जुड़ी कहानी है. सीमा के बाहर आकर खुले में अपने को पाना, व्यक्ति को कितना प्राणवान बना देता है. ‘सीमा’ की सीमा जब चाचा शर्मा जी की मदद से रेलिंग पर आ जाती है तो वह ताजगी महसूस करती है, उसका फैला हुआ असीम आकाश कुछ छोटा हो जाता है. इस कहानी से ही इन प्रश्नों को उभारा जा सकता है जो आध्ुानिकता के संदर्भ में क्रूर यथार्थ के नाम पर उछाले जाते रहे हैं. पंगु और अशक्त, अपने को बोझ समझने वाली सीमा, राधा और कृष्ण की फोटो देखती है, रामायाण-महाभारत-धर्मकथाएं पढ़ती है, मां को किसी से भी झगड़ा न करने के लिए कहती है-ये सारी स्थितियां उस अभाव से उपजी हैं जो सीमा के अन्दर हैं, बाहर से आधुनिकता के नाम पर आरोपित नहीं. यहीं विघटन, संत्रास, अकेलापन सभी कुछ है और इस सब कुछ के साथ समाज से न जुड़ने की, उसका एक सक्रिय अंग न बन पाने की विवशता भी. और ये तमाम अनुभव खंड, अधूरेपन को कभी न भर पाने की अशक्तता में भी क्रूर यथार्थ के साथ जितने संवेद्य हो पाये हैं, उस संवेदनशीलता में ही इस कहानी की सफलता है. इसी प्रकार अकेलेपन की वेदना को घनीभूत करने वाली कहानी ‘लाल हथेलियां’ है. सुभाष की पहली पत्नी उसके विकसित होते सौंदर्यबोध को तृप्त नहीं कर पाती, फलतः वह उसकी उपेक्षा करता है, यहां तक कि वह मृत्यु को प्राप्त होती है. उसके बाद वह ज्योत्सना से विवाह करता है लेकिन धीरे-धीरे जीवन का क्रूर यथार्थ उसके समक्ष खुलता जाता है और वह पाता है कि अब वही उपेक्षा का पात्र बन गया है. जीवन के व्यावहारिक पक्ष में उसकी आर्थिक स्थिति ज्योत्सना के जीवन-बोध के समानान्तर नहीं चल सकी, उसे अपने अहं का क्षरण करके ससुर के घर जाना पड़ता है-इसके बाद चलता है मानसिक तनाव, द्वंद्व का असमाप्त होने वाला चक्र और याद आती है सेवा परायण पहली पत्नी. लेकिन जो छूट गया है उसे पाया नहीं जा सकता और जो है उससे दुःख और भी घना हो जाता है. इस कहानी में पर्याप्त भावुकता के होते भी करुणाजनक स्थितियां एक साथ ही अर्थगत असमानता और प्यार को आमने-सामने उपस्थिति करती हैं.

इस स्थल से मिश्रजी की कहानियों में दृष्टि विषयक नया अध्याय जुड़ता है. वे मानवीय संबंधों को जीवन के अन्य व्यावहारिक तत्वों से जोड़कर देखने लगते हैं...कहीं पर आर्थिक कसाव में घिरा ‘चिट्ठियों के बीच’ का डा. देव है, कहीं पर पति के मरने के बाद अकेली सारे कष्टों से जूझती ‘एक औरत एक जिंदगी’ की भवानी, कहीं पर मशीन न बनने की कामना से भाग जाने वाली ‘मुक्ति’ की चंदा है. यह सभी पात्र अपने चारों तरफ की स्थितियों पर जिस तरह से ‘रियेक्ट’ करते हैं उससे स्पष्ट होता है कि भावमयता के साथ मिश्रजी ने घोर यथार्थ का साक्षात्कार करते हुए व्यक्ति-मन को काफी गहराई से पकड़ा है. मनुष्य संबंधों को ढोने की मजबूरी लिए है, यह मजबूरी एक सस्सती जीवन-दृष्टि का प्रक्षेपण न करती हुई व्यक्ति के संघर्ष को कई धरातलों पर व्यक्त करती है. डॉ. देव परिवार की आवश्यकताओं को समझते-बूझते द्वन्द्वमय क्षणों से तब छुटकारा पाते हैं जब वे सही और क्रूर यथार्थ के सामने अपने संस्कारों के बढ़ते आवेग को रोगते हैं. वस्तुतः समकालीन अनुभव अपने को होम करके परिवार, समाज के प्रति उत्तरदायित्व का निर्वाह करने की मानसिकता को अस्वीकार करता है. महानगरीय बोध को लेकर आधुनिकता के धरातल पर जो कहानियां लिखी गई हैं-उसकी तुलना में ‘खण्डहर की आवाज’, ‘मां, सन्नाटा और बजता हुआ रेडियो’ जैसी कहानियां ग्रामों के संदर्भ में अधिक आधुनिक लगती हैं.

मिश्र जी की कहानियों का मूलस्वर संस्कार विजड़ित मानसिकता और यथार्थगत व्यावहारिक अशक्तता के बीच उपजा द्वंद्व है. उन्होंने कहीं पर इस द्वंद्व को जीवन-संघर्ष की ऊर्जा से व्यक्त किया है, कहीं पर अशक्त स्वीकार में. लेकिन दोनों ही स्तर अधिक संवेद्य और विश्वसनीय बन पड़े हैं. ‘मुक्ति’ की चंदा का अल्हड़पन किसी भी उस विवशता को मानने को तैयार नहीं जो उसके वैयक्तिक अस्तित्व को समाप्त करे. वह अपनी बड़ी बहन, पिता के द्वारा अपनाये जीवन को विवशतावश रोती कलपती स्वीकार न करके, भाग जाती है. उसका यथास्थिति के विरोध में व्यक्त ‘प्रोटेस्ट’ कहीं पर बदलते जीवन-मूल्य की ओर भी संकेत करता है. यहां भागना सामाजिक रूढ़ अर्थ में अनैतिक हो सकता है लेकिन वैयक्तिक उन्मुक्त जीवन के संदर्भ पात्रगत ऊर्जा की ही अभिव्यक्ति करता है. इसी तरह ‘एक औरत एक जिंदगी’ की भवानी का संघर्ष है. यह संघर्ष दो स्तरों पर है, एक अपने-आपसे टूटने की नियति को अस्वीकार करता हुआ संघर्ष, दूसरे स्तर पर परिवेश (समाज) की स्वार्थ लिप्सा के विरोध में अपने को जमाये रखने का संघर्ष. ये सारी स्थितियां निश्चित ही उस गहरे अनुभव से उपजी हैं जो अनारोपित, अनाविल और सहज रचनात्मक धर्म का स्वरूप उपस्थित करता है. लेखक की कलात्मक क्षमता इस बात में है कि वह अभाव को सहज रूप से स्वीकारते क्षणों में जीवन के सत्य का साक्षात्कार करता है. भवानी कहती है, ‘‘छोड़िये बाबा, उन बीते दिनों को. वे पकड़ में कहां आते हैं! झूठे हैरान करते हैं!’’ यह सत्य मनुष्य को कितनी शक्ति देता है, यह जानना केवल अनुभव के आधार पर ही संभव है.

‘यह भटकी हुई मुलाकात’ कहानी भी भवानी के कहे शब्दों की सत्यता चरितार्थ करती है. मिश्र जी ने इस सत्यता को काफी गहरे उतारकर मानव-अनुभव की दीप्ति से मुखर किया है- दरअसल जीवन की गतिमत्ता के बीच छूटते क्षण जहां कहीं सार्थक होकर एक जीवन-क्रम को रूपायित करते हैं वहां कभी-कभी जीवन में अवरोधक तत्व के रूप में भी उपस्थित होते हैं. सुधांशु और अंजना ऐसे मोड़ पर मिलते हैं जहां एक पूरा अतीत विश्लेषण के लिए उनके सामने उपस्थित हो जाता है. अंजना मां की संवेदना भोगती, पत्नी की असफलता को स्वीकारती खुद के काटे गये जीवन-क्रम के घेरे से बाहर नहीं आ पाती. यही स्थिति सुधांशु की है, लेकिन यहां छूटते क्षण ऐसा अवरोध उपस्थित करते हैं जो व्यक्ति के अस्तित्वगत चैतन्य में भी दरारें पैदा करता है.

वस्तुतः मिश्रजी की कहानियों में उभरी स्थितियों, संवेदनाओं और घटनाओं पर जब मैं गहराई से विचार करता हूं तो पाता हूं कि वे, जैसे सारी कहानियों में आत्म-विवेचन का भावनात्मक रुख अपनाते चलते हैं अर्थात् आज के वैज्ञानिक और प्रबिधि के भागते युग में भी मिश्र जी का लेखक व्यक्ति को सोचने-समझने का एक और अवसर देना चाहता है. संपूर्ण पारिवारिक और सामाजिक असंगति, विघटन, वैयक्तिक टूटन को स्वीकार करते भी वे इन स्थितियों को केवल तथ्य मानकर चलते हैं, सत्य नहीं. वे कहीं-कहीं, शायद अनेक स्थलों पर, मानव की जिजीविषा का प्रतिपादन करते उसके हृदय पक्ष की अवहेलना नहीं करते हैं, बल्कि कहना चाहिए कि वे हार्दिकता को मानव-संचेतना का संवाहक मानते हैं. इस स्थिति का अतिरेक ही उनसे खाली घर, पिता, मंगलयात्रा, जैसी कहानियां भी लिखवा लेता है, जिनकी व्यक्त स्थितियां पाठक को दूर तक प्रभावित नहीं करतीं.

वैयक्तिक संवेदना को केन्द्र में रखकर संपूर्ण सामाजिक आचरण के क्रूर यथार्थ को ‘खाली घर’ की दो कहानियों में सशक्त रूप से व्यक्त किया गया है. ये कहानियां हैं ‘खण्डहर की आवाज’ और ‘मां, सन्नाटा और बजता हुआ रेडियो’. इन कहानियों का रचनात्मक कौशल लेखक की सामाजिक दृष्टि का साक्षात्कार कराता है जिसके संदर्भ में हम देख सकते हैं कि किस प्रकार व्यक्ति परिवेशगत स्थितियों को अपने अनुकूल करता हुआ बदल जाता है और किस प्रकार व्यक्ति सारी सुविधाओं की घोषणा के बावजूद व्यक्ति की छूटती जमीन उसे एक क्षण के लिए भी आश्वस्त नहीं कर पाती. ‘खण्डहर की आवाज’ के पंडितजी अपने सहज, त्यागी जीवन से त्रस्त होकर व्याप्त भ्रष्टाचार के दलदल में फंसते हैं. नैतिकता और सेवा की भावनाओं को पालते हुए अभावग्रस्त जीवन जीने की स्थिति के विकल्प में वे राजनीति और फिर लाभ की राजनीति को अपनाते हैं. यहां पर पंडितजी की मानसिकता को उभारने के लिए लेखक ने परिवेश को अत्यंत जीवंत रूप से पाठक के सामने उपस्थित किया है. लगता है स्थितियां व्यक्ति से अधिक सशक्त होकर उसका संचालन कर रही हैं. ... इधर पंडित जी की मानसिकता के बनने-बिगड़ने में और ‘मां, सन्नाटा और बजता हुआ रेडियो’ के ‘मैं’ की मानसिकता के उतार चढ़ाव में एक मूर्त सामाजिक आधार दृढ़ होता चला गया है. इन कहानियों में उभरी सामाजिकता दरअसल सामाजिक-बोध के रूप में उभरी है क्योंकि आज का लेखक रूढ़ सामाजिक-चेतना का समर्थन नहीं करता.

‘खाली घर’ की कहानियों में लगभग सारी कलागत मान्यतायें सामाजिक-वैयक्तिक बोध के स्तर पर स्पष्ट हो जाती हैं, जो मिश्रजी को आगे की रचनाओं को ठोस वैचारिक आधार देती हैं. उनके दूसरे कहानी-संग्रह ‘एक वह’ से व्यक्ति की वेदना और समाजगत चेतना का एक नया दौर शुरू होता है. इन कहानियों में लेखक अनुभवगत ईमानदारी को गहराता हुआ समाज-सापेक्ष चिंतन की विविध सरणियों को अपेक्षाकृत नये कथाबिंबों में उभारता है. मिश्रजी का आम आदमी अब तक भावुक जीवन-दृष्टि के घेरे में घूमकर बाहर आकर फिर वहीं लौटने की संवेदना से ग्रस्त था लेकिन ‘एक वह’ की कहानियों में वह भावुकता से पीछा छुड़ाकर अधिक सतर्कता से जीवन के बीच खड़ा होता दीखता है. शायद वे आस्थाएं जो जीवन-संघर्ष में जूझते केंचुल उतारने की स्थिति में मूर्त होना चाहती थीं- अब निर्विकल्प होकर तटस्थ जीवन-भोग की खुली सड़क पर रूपायित होती हैं. इस दृष्टि से उनकी ये कहानियां पहली कहानियों की उपेक्षा अधिक आधुनिक और संश्लिष्ट जीवन-दृष्टियों की मूल्यगत संवदेना को उभारती हैं.

‘खाली घर’ की कहानियों में रचनात्मक क्षमता यदि मूल्यों के टूटने पर वेदना से आक्रांत पात्रों की मनःस्थिति के द्वंद्व को सिर्फ झेलती थीं और उनसे बाहर आने से डरती थीं तो ‘एक वह’ की कहानियों में उसका एतद्विषयक वैचारिक धरातल निश्चित रूप से बदल गया है. तो क्या वह बदलाव लेखक की दृष्टि से परिवर्तन का द्योतक है या परिप्रेक्ष्य में. मैं कहूंगा कि बदलते परिप्रेक्ष्य में परिवर्तित दृष्टि की स्वस्थता का परिचायक यह मूल्यबोध मिश्रजी के रचनाकार की सफलता और जीवन-दृष्टि का विकास है. उदाहरण के लिए ‘चिट्ठियों के बीच’ का डॉ. देव जब सारे तनाव को झेलता अंततः पत्र को डालने का निश्चय करता है तो एक टूटन का एहसास, कहीं-न-कहीं उसे अपराध-भावना से ग्रसित कर देता है, जबकि उससे कोई अपराध हुआ ही नहीं. सामाजिक दायित्व की पूर्ति के अभाव में उसकी वेदना बार-बार उसके निर्णय को प्रभावित करती है- ‘‘वह एक क्षण जोर से तड़पा जैसे उसने दोनों कनपटियों पर साथ ही जोर का दबाव अनुभव किया हो, फिर उसने घर के नाम लिखा हुआ पत्र उठा लिया- आज इसे पोस्ट करना ही होगा. लेकर कमरे से बाहर हुआ. मगर यह तो शाम हो गई है, पोस्ट तो निकल गई होगी, कल पोस्ट कर देता और लौटकर मेज पर उसे पेपर वेट से दबा दिया.’’ डॉ. देव का यह कथन पूरे तनाव, चिंतन-मनन के बाद की निर्णयात्मक स्थिति का द्योतक है- फिर भी उसका निर्णय संस्कारों के प्रभाव से मुक्त नहीं माना जा सकता. इसके आगे ‘एक वह’ संग्रह की कहानी ‘सड़क’ के पांडेजी भी आद्यन्त मूल्यगत चेतना से जकड़े हैं. लेकिन जहां स्थितियां बार-बार अहं पर, अस्तित्व पर चोट करती हों वहां किस प्रकार व्यक्ति के मूल्य बदल जाते हैं- इसकी बेबाक अभिव्यक्ति पांडेजी की ‘साबुत धोती की मांग’ में वस्तुवादी दृष्टि की व्यावहारिकता और सशक्तता में हुई है.

रमेश सामान लिए अंदर जा रहा था कि पांडेजी ने पुकारा.

‘‘रमेश’’

‘‘हां बाबूजी’’

‘‘तुम्हारे पास एक के अलावा कोई साबुत धोती है?’’

‘‘हां है बाबूजी’’

‘‘लाना तो बेटा’’-

इस अंतिम वाक्य में निर्णय की क्षमता की दीप्ति ही नहीं बल्कि नये जीवन-मूल्य को स्वीकारने का साहस भी व्यक्त हुआ है. यही वह बिंदु है जिससे मिश्रजी अपनी तमाम भावुकता को भावप्रवणता में बदलते क्रूर यथार्थ के सामने शक्ति में खड़े हो जाते हैं.

लेकिन लेखक कितनी ही शक्ति से निर्णय की धुरी को पकड़े, जीवन की कटु वास्तविकता कई बार उसकी शक्ति को डांवाडोल करती हुई केवल वस्तुस्थिति के स्वीकार तक रोक देती हैं. समाज में व्याप्त वे स्थितियां जो बाहर से व्यक्ति को तोड़ती या आक्रांत करती हैं- केवल अभिव्यक्ति के स्तर पर उभरती हैं... उनके बीच कोई भी निर्णय कारगत नहीं हो सकता. ‘एक वह’ और ‘निर्णयों के बीच निर्णय’, ‘दूरियां’ और ‘आधुनिक’ कहानियों में मिश्रजी का कथाकार ऐसे पात्रों का सृजन करता है जो अपनी विवशता, अभाव को झेलने की नियति को अस्वीकार कर ही नहीं सकते. ‘एक वह’ का गरीब बुड्ढा बावजूद संस्कारगत चेतना के किसी भी अनुकूल स्थिति का नियामक नहीं हो सका. गरीबी हटाओ के व्यापक प्रयासों को मिश्रजी ने अत्यंत संवेदनात्मक क्षणों के बीच असफल होते दिखाया है. वह गरीब बुड्ढा, अपना पेट पालने की मजबूरी से ग्रस्त है लेकिन घर की याद रह-रहकर उसकी अशक्तता को कुछ संबल देती है किंतु यह मिथ्या भ्रम कि वह कुछ कर सकेगा, वह बहुत जल्दी ही क्रूर यथार्थ की चोटों से ढह जाता है. उसकी मृत्यु प्रकारांतर भेद से सारी सामाजिक व्यवस्था के प्रति व्यंग्य करती हुई अपनी अनिवार्यता को ‘जस्टीफाई’ करती है. ‘निर्णयों के बीच निर्णय’ के ज्ञान की दशा किसी विशिष्ट सामाजिक या वैयक्तिक मूल्यगत संघर्ष की देन नहीं है फिर भी उसके प्रति श्रीवास्तव या अन्य व्यक्तियों का व्यवहार सारे मानवीय संबंधों की गहराई को उथला कर देता है. इस कहानी में उभरा कथा बिंब केवल ज्ञान की स्थिति को ही नहीं उभारता अपितु अनेक छोटे-छोटे संश्लिष्ट बिंबों के माध्यम से जीवन की विविधत को उपस्थित करता है.

आधुनिकता और नई संवेदना का सबसे अधिक प्रभाव व्यक्ति के व्यवहार पर पड़ा है. जिन स्थितियों में पहले का आदमी असुविधा होते भी ‘एडजस्ट’ कर लेता था, अब वह उससे कतराता है. हर एक की अपनी एक दुनिया बन गई है और उस दुनिया से निकलकर कुछ देर के लिए भी आदमी अपने को सहज नहीं कर पाता है. ‘दूरियां’ कहानी में मिश्रजी ने इस बात को सफलता से व्यक्त किया है. ऐसी स्थिति में असहज होना व्यक्ति के मन की अनिवार्यता हो गई है. पप्पू की असहजता स्वाभाविक है और उतनी ही स्वाभाविक मजबूरी काशी मइया की है. ‘दूरियां’, ‘घर’ और ‘पिंजड़ा’ कहानियों में अलग-अलग संदर्भों से सिमटती दुनिया का चित्रण मिश्रजी ने संबंधों की ललक से छुटकारा पाने की छटपटाहट में किया है. बल्कि कहा जा सकता है कि संबंधों के प्रति लगाव और स्थितिगत क्रूरता के बीच द्वंद्व की धुरी से इन कहानियों की शुरूआत होती है... हर पात्र के पास दो जिंदगियां हैं- एक में उसके विश्वास, भावना, संस्कार जगे हैं, दूसरे में विघटन, क्रूरता से साक्षात्कार होता है. यहीं संघर्ष उपजता है और रचना सामयिक जीवन के संदर्भ में प्रासंगिक हो उठती है.

आज के जीवन की अनेक समस्याओं में अभिजात वर्ग के अस्तित्व की समस्या और शिक्षा-पद्धति की समस्या भी सामाजिक ढांचे को प्रभावित करती है. इन समस्याओं को लेखक ने ‘जमीन’ और ‘मिसफिट’ कहानियों में उभारा है. ‘जमीन’ का मोहन स्कूल में मंत्री जी के भाषण को सुनता है, तो एक और स्वप्निल जिंदगी उसकी आंखों के सामने तैरती है पर लौटते समय और बपई से बात करते हुए वह जिस यथार्थ का साक्षात्कार करता है वह उसके विकास को अवरुद्ध करते हुए केवल भूख जगाता है. मिश्रजी की यह कहानी एक वेदना को उभारती है लेकिन अब उसकी एप्रोच बौद्धिक हो गई है. लगता है जैसे वर्तमान का भेद-भाव, अलगाव, इस देश के भविष्य को सही परिप्रेक्ष्य में नहीं पनपने देगा... इधर की इन कहानियों में उन्होंने वैचारिक धरातल पर खड़े होकर स्थितियों का विश्लेषण ही नहीं किया बल्कि उन्हें विकल्प की चेतना तक भी पहुंचाया है. ‘मिसफिट’ में लेखक आज की शिक्षा-पद्धति, जो केवल वेशभूषा पर ध्यान देती है- का विवेचन किया है. बावजूद सारे प्रयासों को आज की शिक्षा रचनात्मक स्तर पर व्यक्ति-मन का विकास नहीं कर पाती.

इधर के लेखन के संदर्भ में इन कहानियों की चर्चा और मूल्यांकन का आधार दूसरा हो सकता है लेकिन मिश्रजी के कथाकार के अपने विकास के संदर्भ में इन कहानियों की एक विशेषता यह है कि इनमें लेखक ने व्यक्ति-वेदना की अभिव्यक्ति के लिए प्रसंगों का संधान नहीं किया अपितु बदलती हुई स्थितियां स्वयं पात्र के रूप में उपस्थित हुई हैं. सड़क के पांडेजी, पिंजड़ा का अध्यापक, दूरियों का शरद, घर का घनश्याम ऐसे पात्र हैं जो स्थितियों के बीच से अपने अस्तित्व की शुरूआत करते हैं और उन्हें एक अर्थगत संदर्भ देकर उनमें समाहित हो जाते हैं. मिश्रजी की पहली कहानियों में याद रहते थे पात्र, लेकिन इनमें पात्रों से अधिक सशक्त परिवेश है और वही पाठक की चेतना के इर्द-गिर्द मंडराता है. मैं कहूंगा कि अंतश्चेतना से युक्त अंदर से बाहर की यह कथा-यात्रा लेखक की कलागत उपलब्धि है. साथ में ‘उत्सव’, ‘पराया शहर’ जैसी सामान्य संवेदना की कहानियां भी हैं जो कहीं दूर तक कोई विशेष प्रभाव नहीं छोड़ती.

मिश्रजी अनुभव की तल्खी अद्वितीयता के आधार पर भाषा की नई भंगिमा और बिंबात्मक ताजगी की तलाश करते हैं. वे पात्र की समूची वेदना की बिंब और प्रतीक के द्वारा सांकेतिक रूप से व्यक्त करते हैं :

‘चील एकाएक टिहा उठी और उदास सूखे हुए ताल-सी टंगी क्वार की दुपहरी में छोटी-छोटी दरारें उभर आईं.’’ ‘सीमा’. यहां पर लेखक ने भाव को प्रत्यक्ष और गहरे रूप में उभारने के लिए चील का टिहाना और दरारों के उभरने का प्रतीक कलात्मक रूप से प्रयुक्त किया है. ‘खाली घर’ की अधिकांश कहानियों की भाषा इस प्रकार की है जहां पात्र की स्थिति के समानांतर प्राकृतिक बिंब उभारा गया है. वैसे वे मानवीय संबंधों और तनाव के चित्रण में तटस्थ भाषा का प्रयोग करते हुए भी भावुकता के अतिरेक से नहीं बच सके हैं- अनेक स्थलों पर इस प्रवृत्ति के द्वारा विस्तार दोष भी आ गया है किंतु मूलतः उनके बिंब भाषागत क्षमता के के साथ पात्र को स्पष्ट रूप से साकार कर देते हैं.

‘‘पड़ोस में एक कुत्ता बहुत नंगे और भूखे स्वर में रो उठता है.’’

पु ऊं ऊं ऊं... मोहन को लगता है कि सारी चमरौटी इस आवाज में लिपट कर थर्रा उठी है... (जमीन).

यहां कुत्ते का प्रतीक मोहन की सामाजिक अवस्था को जिस रूप में व्यक्त करता है वह भाषिक सरंचना की क्षमता का प्रतीक है. कहानी की संपूर्ण केन्द्रिय संदेवना इस एक बिंब में समग्र रूप से उभरकर तीव्रतर होती हुई पाठक को द्रवीभूत करती है. जिस सहज और संवेगात्मक भाषा से रामदरश मिश्र ने ‘खाली घर’, ‘चिट्ठियों के बीच’, ‘एक भटकी मुलाकात’ कहानियों में परिस्थितियों को व्यक्त किया है वह उनकी इस काल की सामर्थ्य की द्योतक है. ‘एक वह’ के संदर्भों का वैविध्य, वैचारिक ठोस धरातल और बदलते परिप्रेक्ष्य में भाषा अधिक मुखर, सीधी और प्रभावशाली हो गई है.

‘‘मैं कल स्कूल नहीं जाऊंगा.’’

‘‘क्यों बेटे!’’

‘‘टीचर साली मारती है.’’ (मिसफिट)

यह तेजी और खुलापन उस तनाव की भाषा से अलग है जो अब तक वैयक्तिक संदर्भों में प्रयुक्त हुई थी. कुल मिलाकर रामदरश मिश्र की कहानियां आज के जीवन को उसके सही और विविध परिप्रेक्ष्य में चित्रित करती हैं. जैसे-जैसे उन्होंने बदलती संवेदनाओं के साथ अपने अनुभव के लगाव को सही रूप में पाया है उन्होंने सामान्य स्थितियों को भी आधुनिक और विश्वसनीय बनाकर प्रस्तुत किया है. उनका संस्कारशील कहानीकार आधुनिक-बोध की चेतना से रहित पात्रों को भी इस रूप में उपस्थित कर पाया है कि वे नितांत आधुनिक लगें- क्योंकि इसके लिए वे कुछ और नहीं करते, केवल पात्रों की उस मनःस्थिति का वर्णन करते हैं जो उन्हें सारे जीवन को स्वीकारते-अस्वीकारते गतिमान बनाए रखती है. यही कारण है कि वे आधुनिकता के फैशन से हटकर भी आधुनिकता-बोध की सशक्त कहानियां दे पाये हैं.

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: प्राची - अगस्त 2017 : कथा-यात्रा अन्दर से बाहर की कथा-यात्रा : रामदरश मिश्र की कहानियां // डॉ. विनय
प्राची - अगस्त 2017 : कथा-यात्रा अन्दर से बाहर की कथा-यात्रा : रामदरश मिश्र की कहानियां // डॉ. विनय
https://lh3.googleusercontent.com/-CCrCHUSJ8wc/WcjogBGbSjI/AAAAAAAA7Ps/lo0cz1e8UAo0318iOE1R9ycH16fWvkv5gCHMYCw/image_thumb%255B2%255D?imgmax=800
https://lh3.googleusercontent.com/-CCrCHUSJ8wc/WcjogBGbSjI/AAAAAAAA7Ps/lo0cz1e8UAo0318iOE1R9ycH16fWvkv5gCHMYCw/s72-c/image_thumb%255B2%255D?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2017/09/2017_74.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2017/09/2017_74.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content