व्‍यंग्‍य // ठगी का व्‍यापार // वीरेन्‍द्र ‘सरल‘

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चारों तरफ निराशा का घना अंधकार छाया हुआ था। भ्रष्‍ट्रासुर के आंतक से जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी। तभी कहीं-कहीं नारों की बूँदा-बाँदी होने ल...

चारों तरफ निराशा का घना अंधकार छाया हुआ था। भ्रष्‍ट्रासुर के आंतक से जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी। तभी कहीं-कहीं नारों की बूँदा-बाँदी होने लगी। वादों की बिजलियाँ चमकने लगी। लोगों को लगा कि अब चुनाव ऋतु आने वाली है। वादों की बिजलियों में लोग उम्‍मीद की किरणें देखने लगे। फिर भाषणों की मूसलाधार वर्षा होने लगी। दावों की गर्जना से गगन गूँजने लगा। चुनाव ऋतु समाप्‍त होने के बाद लोग बड़ी उम्‍मीदों से आकाश की ओर निहारने लगे। तभी आकाशवाणी हुई। भाषणवीर भागीरथियों की भाषणों से मेरी प्रसन्‍नता का स्‍टाक एकदम फुल हो गया है। अब सब सावधान हो जाओं। मैं अच्‍छे दिन प्रकट हो रहा हूँ। तुम मरो या बचो, अब तो मैं विकास करके ही दम लूंगा। ऐसा विकास करूंगा कि जिंदगी भर याद रखोगे। सम्‍हाल सको तो मेरा तेज सम्‍हाल लो।

अच्‍छे दिनों का पहला किस्‍त प्रकट होते ही महंगाई जनता पर कहर बनके इस कदर टूट पड़ी कि लोग इसका नाम सुनकर ही थरथराने लगे। मेरी हालत तो और भी बुरी थी। इसका जिक्र आते ही रोंगटे खड़े हो जाते थे और बदन में झुरझुरी होने लगती थी।

घटना कुछ दिनों पहले की है। रात्रि का अंतिम पहर चल रहा था। यही कोई तीन साढ़े तीन बजे की बात होगी। कोई मेरे घर का दरवाजा खटखटाया। मेरी नींद टूट गई थी। मैंने डरते-डरते पूछा-‘‘कौन है?‘‘ बाहर से आवाज आई, अच्‍छे दिन आया हूँ। आवाज सुनकर मेरे होश उड़ गये। मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। मैंने सहमते हुए कहा-‘‘अंधेरी रात में अच्‍छे दिन? रहने दो भैया! पहले किस्‍त में जो अच्‍छे दिन आये हैं वे सब रसोई में कब्‍जा जमाकर बैठ गये है। चूल्‍हा चौका सब सहमें हुए है। कटोरी से दाल ईमानदारी की तरह गायब हो गई। थाली की रोटियां नैतिकता की तरह कम हो रही है। रसोई में अनाज नहीं मिलने के कारण चूहे हम गरीबों के पेट में घूसकर उछल-कूद मचा रहें हैं। अपने बुरे दिनों में कम से कम दाल रोटी तो मिल ही जाती थी पर आपकी कृपा से वह भी नहीं बची। अब हममें और ज्‍यादा अच्‍छे दिनों को बर्दास्‍त करने की क्षमता नहीं रही हैं। कहीं आपके शुभागमन से जान ही न निकल जाये। हम पर तरस खाइये। ज्‍यादा दया दृष्‍टि न डालें। कृपा कर लौट जाये। पर वह अंदर घुसने की जिद करते हुए फिर से दरवाजा खटखटाने लगा।

मैंने लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहा-‘‘लगता है आप रास्‍ता भटक कर यहाँ आ गये है। अपनी सूची फिर से चेक कर लीजिए और जिनके लिए आयें हैं। उनके यहाँ ही जाइये। अगर आपको आना ही था तो दिन दहाड़े आते इस तरह रात के अंधेरे में आने से मुझे आपके ऊपर संदेह हो रहा है, जरूर आप किसी और के लिए आये होंगे और भूल से मेरा दरवाजा खटखटा रहे होंगे।

इस बार बाहर की आवाज कुछ कड़क हो गई थी। वह कह रहा था। अरे बकबक मत कर यार! सीधे दरवाजा खोल मुझे और भी घरों में विजिट करनी है। तू इतना डर क्‍यों रहा है। मैं पन्‍द्रह लाख वाला अच्‍छे दिन नहीं हूँ। मात्र दो लाख वाला हूँ और इस बार साक्षात नहीं बल्‍कि एस एम एस के रूप में आया हूँ। नेटवर्क नहीं होने के कारण तेरे मोबाइल तक नहीं पहुँच पा रहा हूँ। मुझसे इतना डर रहा है तो दरवाजा भले मत खोल, अपने मोबाइल को दरवाजे से बाहर खिसका ताकि नेटवर्क मिलते ही मैं उस तक पहुँच सकूँ। मुझे समझते देर नहीं लगी कि नेटवर्क न मिलना डिजिटल इंडिया की निशानी है।

मैंने चौंकते हुए कहा-भैया! आप अच्‍छे दिन हो कि बहुरूपिया? जो कभी भाषण के रूप में आते हो, कभी नारों के रूप में आते हो और कभी-कभी लोकलुभावन योजना बनकर टी वी के विज्ञापन या अखबारों पर आते हों। ये क्‍या चक्‍कर है मियां। आप चाहे जितना छल का प्रयोग कर लो पर अब मैं आपके झांसे में आकर दरवाजा खोलने वाला नहीं हूँ। हाँ मैं अपना मोबाइल दरवाजे से बाहर खिसका रहा हूँ। इसमें समाना है तो समा जाओ। मैं आराम से दिन के उजाले में आपका एस एम एस अवतार देख लूँगा। इतना कहते हुए मैने अपना मोबाइल दरवाजे से बाहर खिसका दिया। कुछ समय बाद आवाज आनी बंद हो गई। अब मुझे डर के मारे अपने ही हाँफने की आवाज के सिवाय और कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। नींद आँखों से कोसों दूर हो गई थी बची हुई रात करवट बदलते हुए बीती।

सुबह होते ही मैंने झट से दरवाजा खोला और सबसे पहले अपना मोबाइल उठाया फिर इत्‍मीनान से एस एम एस पढ़ने लगा। लिखा था कि आपकी दो लाख की लाटरी लगी है। नीचे दिये हुए नम्‍बर पर तुरन्‍त सम्‍पर्क करो। एस एम एस पढ़कर मैं सोच में पड़ गया, न तो मैंने चुनाव जीतकर कोई कुर्सी हथियाई है। न कोई चिटफंड कम्‍पनी खोली है न ही ईमानदारी का गला घोंटकर या अपनी अर्न्‍तात्‍मा की हत्‍या कर कोई अवैध कारोबार किया है और न ही मैंने लाभ के कोई बड़े सरकारी पद पर कार्य किया है तो फिर मेरी लाटरी लगी तो कैसी लगी? लेकिन मुफ्‍त का माल तो वो मेनका है जो विश्‍वामित्र जैसे तपस्‍वी के तप को भंग कर सकती है। आखिर मैं किसी और खेत की मूली तो नहीं सो झट से उस एस एम एस में लिखे नम्‍बर पर कॉल कर दिया। कॉल करते समय मैं समझ नहीं पाया था कि मैं कॉल नहीं बल्‍कि काल कर रहा हूँ।

नम्‍बर मिलते ही किसी महिला की सुरीली आवाज आई-‘‘हाँ जी! नमस्‍कार। आप बहुत भाग्‍यशाली है। आप के नम्‍बर का चयन हमने लक्‍की नम्‍बर के रूप में किया है। इसलिए आपको दो लाख रूपए का इनाम देने का निर्णय हुआ है। कहाँ तो लोग मेरा नम्‍बर कब आयेगा कहते हुए लाइन पर लगे है और आपका नम्‍बर बिना लाइन लगे ही आ गया है। फिर उसकी खिलखिलाहट गूँजी। उस सुरीली आवाज का जादू मेरे सिर पर चढकर बोलने लगा। मैंने बिना एक क्षण गंवाये कहा-‘‘ मुझे इस दो लाख के इनाम को झटकने के लिए क्‍या करना पड़ेगा मेम जी।‘‘ कानों में रस घोलती हुई फिर वही सुरीली आवाज गूंजने लगी। भाई! कुछ पाने के लिए कुछ लगाना भी पड़ता है। सबसे पहले तो हम आपको एक खाता नम्‍बर दे रहें है, उसमें आप कम-से कम बीस हजार रूपए जमा करा दीजिए। इसे आप सेवा शुल्‍क समझ लीजिए। दस प्रतिशत सेवा शुल्‍क तो आपको अदा करना ही पडेगा। मैंने मन में एक क्षण विचार किया कि सौदा बुरा तो नहीं है। आखिर चुनावी चंदा देने के बाद ही तो लूट और मिलावट का लायसंस मिलता है। धंधा चाहे कितना भी गंदा हो पर चंदा देने से पवित्र हो जाता है। चंदा ही वह गोदान है जो जमाखोरो और मिलावटखोरों की बैतरणी पार कराके अरबों का पुण्‍य अर्जित करा देता है।

माना कि लालच बुरी बला है पर यह बला इतनी अदा से बुलाती है कि लोग तुमने बुलाया और हम चल आये रे के अंदाज में जाकर फँस जाते है। मैंने उसके दिये हुए खाता नम्‍बर पर बीस हजार रूपए जमा करने के लिए हामी भर दी।

मेरे खाते में तो मेरे अब तक के जीवन की गाढ़ी कमाई मात्र बीस हजार रूपए ही जमा है जिसे मैंने आड़े वक्‍त के लिए रखा था। मेरे पास कोई चल-अचल सम्‍पत्ति तो थी नहीं। बैंक हम जैसे आम आदमी का केवल मुँह देखकर कर्ज तो देती नहीं है। कागजात के नाम पर इतने चक्‍कर लगवाती है कि आदमी को ही चक्‍कर आ जाता है। वह तो ईमानदारी का मुखौटा पहने और सिफारिशों का तमगा लगाए माल्‍या जैसे लोगो को माला पहनाकर कर्ज देती है। अब मेरे पास कर्ज लेने का एक मात्र विकल्‍प मित्र-मंडली के लोग ही थे। मैने एक मित्र से निवेदन किया और उसे दोगुणा धन वापस करने का विश्‍वास दिलाया तो वह बीस हजार देने के लिए सहर्ष तैयार हो गया।

मैंने मित्र से पैसे लेकर उस अंजान खाता नम्‍बर पर उसे जमा कर दिया और अपने खाते में दो लाख रूपए जमा होने का इंतजार करने लगा। मैं निराश होता उससे पहले ही लगभग महीने भर बाद फिर एक अंजान नम्‍बर से फोन आया । फोन करने वाले ने अपने आप को बैंक अधिकारी बताते हुए कहा-‘‘बधाई हो महाशय! मुझे आपके खाते में दो लाख रूपए जमा करने के लिए मिले है। कृपया अपना एकाउंट नम्‍बर बताइए और आपको उसे निकालने में किसी भी प्रकार से असुविधा न हो इसलिए अपने ए टी एम का पासवर्ड भी बता दीजिए।

सिर पर दो लाख का नशा तारी था इसलिए मैंने सहर्ष बता दिया। सहर्ष बताने भर की ही देर थी फिर तो मेरा सारा हर्ष गायब हो गया। कुछ ही समय में मेरे मोबाइल पर संदेश आ गया कि मेरे खाते में रखे बीस हजार रूपए पर किसी ने इस तबियत से स्‍वच्‍छता अभियान चला दिया है कि मात्र पाँच सौ रूपए के सिवा उसमें कुछ भी नहीं बचा है। अब मुझे पासवर्ड का महत्‍व समझ में आया। यह ऐसा वर्ड है जिसे बताने पर कोई भी आदमी आपके खाते का रकम अपने पास कर लेता है इसलिए इसे पासवर्ड कहते हैं। हाथ की सफाई से सामान गायब होने का जादू तो मैं चौक-चौराहों पर कभी-कभार देख ही चुका था पर बात की सफाई से खाते से रकम गायब हो जाने की यह मेरे साथ पहली धटना थी। उस पर गरज यह कि जादूगर स्‍वयं अदृश्‍य रहकर यह कमाल दिखलाया था। दो लाख के लालच में बीस हजार गंवा चुका था और सिर पर बीस हजार का अतिरिक्‍त कर्ज चढ़ गया। जब दो लाख का लालच मुझे इतना महंगा पडा़ तो फिर पन्‍द्रह लाख का लालच कितना भारी पड़ रहा है, सबको पता है।

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वीरेन्‍द्र ‘सरल‘

बोड़रा (मगरलोड़)

जिला-धमतरी( छ ग)

पिन- 493662

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ 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रचनाकार: व्‍यंग्‍य // ठगी का व्‍यापार // वीरेन्‍द्र ‘सरल‘
व्‍यंग्‍य // ठगी का व्‍यापार // वीरेन्‍द्र ‘सरल‘
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