व्‍यंग्‍य // महान टाइप के लेखक // वीरेन्‍द्र ‘सरल‘

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मेरे एक लेखक मित्र को संपादक बनने का शौक चर्राया तो वह हिन्‍दी सेवा का व्रत लेकर एक लघु पत्रिका निकालना प्रांरभ कर दिया। पुश्‍तैनी जमीन बेची...

मेरे एक लेखक मित्र को संपादक बनने का शौक चर्राया तो वह हिन्‍दी सेवा का व्रत लेकर एक लघु पत्रिका निकालना प्रांरभ कर दिया। पुश्‍तैनी जमीन बेची, पत्‍नी के गहने बेचे, कुछ सहृदय मित्रों से आर्थिक सहयोग लिया और तलवार की धार पर संतुलन बनाकर चलने लगा। स्‍वाभिमानी आदमी थे। दुम हिलाने की कला उसे आती नहीं थी इसलिए कुछ ही समय में उसका दम फूलने लगा। हालत बिल्‍कुल कर्ज में दबे भारतीय किसान जैसी हो गई और कमर बस्‍ते के बोझ और पालकों की अपेक्षाओं तले दबे बचपन की कमर की तरह झुक गई। पर पाठकों का प्‍यार और हिन्‍दी सेवा का जुनून उसे सम्‍बल देता रहा।

एक दिन अचानक उनसे मुलाकात होने पर मैंने पूछा-‘‘मित्रवर! आपने यह कैसी हालत बना रखी है?‘‘ तो उसकी पीड़ा आँखों से आंसू बनकर बहने लगा। उन्‍होंने अपनी व्‍यथा प्रकट करते हुए कहा-‘‘भाई! कुछ लेखक सचमुच महान होते हैं क्‍योंकि वे एक लेखक होने के पहले एक नेकदिल इंसान होते हैं। पर कुछ लेखक महान तो नहीं पर महान टाइप के जरूर होते है। अब वे जन्‍मजात होते हैं या पूर्व जन्‍म से यह तो जानकारी नहीं है। पर विद्वानो का कहना है कि ऐसे महान टाइप के लेखकों का नाम साहित्‍य जगत में वैसे ही कुख्‍यात हो जाता है जैसे फिल्‍म शोले में डाकू गब्‍बरसिंह का नाम रामगढ़ में हो गया था। महान टाइप के लेखक का अवतरण इस जगत में संपादक और प्रकाशकों के कल्‍याण के लिए होता है। जब तक ऐसे लेखक अपनी रचना किसी प्रकाशक या संपादक को नहीं देते तब तक किसी के लिए भी लघु पत्रिका निकालना संभव नहीं हो पाता।

पता नहीं पिछले जन्‍म में मैंने कौन-सा अपराध किया था जो इस जन्‍म में हिन्‍दी सेवा करने की बुरी लत लग गइ्रर्। किस मनहूस घड़ी में मैंने लघु पत्रिका निकालने की जोखिम उठाने का फैसला लिया, यह तो अब मुझे भी याद नहीं है। लोग पत्रिका पसंद करने लगे थे तो गाड़ी पटरी पर दौड़ने लगी थी पर पता नहीं कुछ ही दिनों के बाद मेरी पत्रिका को किसकी नजर लग गई जो अंजान नम्‍बरों से मेरे पास फोन पर फोन आने लगे और पाठकों के पत्र भी कि जब तक आप महान टाइप के एक लेखक की रचना अपनी पत्रिका में नहीं छापेंगे। तब तक हम आपकी पत्रिका खरीदकर नहीं पढेंगे। आप हमारी वार्षिक सदस्‍यता शुल्‍क वापस कर दीजिए और सदस्‍यता समाप्‍त कर दीजिए। मैं परेशान हो गया। मन उस महान टाइप के लेखक से मिलने को व्‍याकुल हो गया। मेरा मन, मन तड़पत हरिदर्शन को मोर के स्‍टाइल में तड़पने लगा। इसी बीच डाक से मुझे एक अंजान लेखक की रचना मिली जिसमें लेखक के नाम के स्‍थान पर महानटाइप लेखक लिखा था। मैं खुशी से उछल पड़ा। प्रभु को धन्‍यवाद देते हुए मैं बार-बार यही जपता रहा कि प्रभु आपने मेरी सुन ली। मेरी पत्रिका बंद होने से बच गईं। मेरी पत्रिका में इस महानटाइप लेखक की रचना छपते ही सैकड़ों प्रति में बिकने वाली यह पत्रिका अचानक लाखों प्रतियों में बिकने लगेंगी। मैं मालामाल हो जाऊँगा। मुझे लगा, यह केवल महानटाइप के लेखक की रचना भर नहीं बल्‍कि मेरे लिए करोड़ों रूपये का चेक है। इस रचना के छपते ही मैं करोड़पति हो जाऊँगा। आज तक मैं एक जिम्‍मेदार पति भी नहीं बन सका था। अब करोड़पति बनते ही एक अच्‍छा पति बनने के लिए पुनः प्रयास करूँगा। मैं मुंगेली लाल की तरह हसीन सपने देखते हुए उस रचना को खुशी-खुशी प्रकाशित की। खुशी के मारे स्‍वयं समय निकालकर पत्रिका की एक प्रति लेकर महानटाइप के लेखक के पते पर पहुँचा। सोचा था, उस महानटाइप के लेखक की चरणधूलि अपने माथे पर लगाकर और उसका दर्शन लाभ लेते हुए अपने आप को कृतार्थ कर पत्रिका की एक प्रति ससम्‍मान उन्‍हें भेट करूंगा। उन्‍हें महान टाइप के लेखक कहना मुझे जरा लम्‍बा लगता था तो मैं उन्‍हें अपनी सुविधा के अनुसार केवल महान जी ही कहने लगा।

जब मैं महान जी के घर पहुँचा तो वे पेटभर भोजन कर डकार लेते हुए भूख पर रचना लिखने के लिए बैठे हुए थे। महानता के बुखार से उनका मस्‍तक तप रहा था। मैने जब नमस्‍कार महान जी कहा तो वे मुझे घुरकर ऐसे देखने लगे जैसे कहना चाह रहें हो कि मैं तुम्‍हे नमस्‍कार कहने लायक दिखता हूँ। वे अनमने ढंग से मुझे बैठने का इशारा किया। बैठते हुए मैंने कहा-‘‘ आपका नाम बहुत सुना था महान जी। आपकी रचना मिली तो मैं उसे सहर्ष अपनी पत्रिका में प्रकाशित कर आपके अवलोकनार्थ एक प्रति आपको सादर भेट करने के लिए लाया हूँ, लीजिए स्‍वीकार कीजिए।‘‘ महान जी तमतमाकर बोले-‘‘मेरी रचना छापने की तुम्‍हारी हिम्‍मत कैसे हुई?‘‘ मैंने कहा-‘‘महाशय! रचना तो आपने ही मुझे भिजवाई थी। आपकी रचना लेने मैं तो चलकर आपके पास नहीं आया था।‘‘ महान जी ताव खा गये, बिफरकर बोले-‘‘भिजवाई थी इसका मतलब क्‍या आप छाप ही देंगे।‘‘ मेरा जी तो चाह रहा था कि कह दूँ, रचना छपने के लिए नही ंतो क्‍या आचार डालने के लिए भिजवाई थी महाशय, पर मन मसोस कर रह गया। मुझे चुप देखकर महान जी बोले-‘‘वह तो मैंने अपनी महानता प्रदर्शित करने के लिए भेजी थी। आपको पता है, मैं पैदा होने से पहले ही बहुत अच्‍छा लिख रहा हूँ। जिस समय मैं महानता की सीढ़िया चढ़ रहा था, उस समय परसाई, जोशी, त्‍यागी और शुक्‍ल वगैरह गिल्‍ली-डंडा खेलने में मशगूल रहते थे। मार्कटवेन, शेक्‍सपियर, टालस्‍टाय और गोर्की को लेखन की बारीकियां मैंने ही सिखलाई थी। आज साहित्‍य मे जितने भी बड़े नाम है, वे सब मेरी ही कोंचिग क्‍लास की देन है। मैं ही साहित्‍य के सभी लधु पत्रिकाओं का मेरूदंड हूँ। असली लेखक तो केवल मैं ही हूँ बाकी सब कागज काले करने वाले क्‍या जाने कि लेखन क्‍या होता है। मै लिखना बंद कर दूँ तो संपादको के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो जायेगा। वे सब सड़क पर आ जायेंगे। प्रकाशकों के सामने भूखों मरने की नौबत आ जायेगी। अभी जो प्रकाशक मेरी किताबे छाप रहें हैं वे पूर्व जन्‍म से ही मेरी किताब छापने के लिए मरे जा रहे हैं। बड़ी मुश्‍किल से उनकी बारी इस जन्‍म में आई है, इसीलिए मैं उनका हिसाब चुकता करने में लगा हूँ। उन प्रकाशकों का कहना है कि पहले जन्‍म में किसी अपराध के लिए ईश्‍वर ने उन्‍हे शाप दे दिया था। इस शाप से मुक्‍ति का उपाय पूछने पर भगवान के एजेन्‍टों ने उनसे कहा है, जब धरती पर एक महानटाइप के लेखक का जन्‍म होगा और तुम उनकी किताब प्रकाशित करोगे तभी तुम्‍हें इस शाप से मुक्‍ति मिलेगी। अपनी किताब की पाण्‍डुलिपि मैं उन्‍हें अपने प्रचार के लिए नहीं बल्‍कि शाप से मुक्‍ति दिलाने के लिए देता हूँ। अब जो प्रकाशक मेरी किताब छापना चाहेंगे उनको अगले जन्‍म तक इंतजार करना पडेगा। इस जन्‍म में मैंने केवल एक प्रकाशक को अपनी पाण्‍डुलिपि दी है। वह भी तब, जब वह मेरे पैरों पर गिरकर अपने बीबी-बच्‍चों की दुहाई दिया। मेरे इंकार करने पर मेरी चौखट पर ही आत्‍मदाह करने की धमकी दे डाली तब मेरा हृदय पसीजा और मैं द्रवित होकर बड़ी मुश्‍किल से उसे अपनी पाण्‍डुलिपि दे दी। देश के सारे लधु पत्रिकाओं के संपादक हजार बार मिन्‍नतें करते। मेरे घर के सामने घटों आपकी एक रचना का सवाल है बाबा कहते हुए खड़े रहते है तब मैं उन्‍हें अपनी रचना छापने की सौभाग्‍य देता हूँ और आप बिना मेरी अनुमति मेरी रचना छापने का दुःसाहस कर गये।, भुगतनी पडेगी, इसकी सजा बराबर भुगतनी पड़ेगी, समझे।

मैं महान जी के महानता से आतंकित हो गया। उनकी महानता का तेज मैं बर्दास्‍त नहीं कर पा रहा था। महान जी के सामने एक मिनट भी रूकना मेरी सहनशीलता से बाहर हो रहा था। मैंने वहाँ से उठते हुए कहा-‘‘क्षमा करें श्रीमान! मैंने आपका कीमती समय नष्‍ट किया। अब आप मुझे यहाँ से जाने की अनुमति प्रदान करे तो मैं आपका जीवन भर आभारी रहूँगा।‘‘ मेरा इतना कहना था कि महान जी अपना आपा खो बैठे। गुर्राते हुए बोले-‘‘शट-अप, बन्‍द करो ये बकवास। मुझे इन शब्‍दों से घोर एलर्जी है। इन शब्‍दों को सुनकर मुझे खुजली होती है। चापलूसी और चाटुकारिता की बदबू आती है मुझे इन शब्‍दो से, समझ गये?‘‘

मैं सोचने लगा, आखिर महान जी की आँखों में किस रंग का चश्‍मा चढ़ा हुआ है। जो आदरसूचक और शिष्‍ट व्‍यवहार में प्रयुक्‍त होने वाले शब्‍दों से इन्‍हें चाटुकारिता की बू आती है। यही सोचते हुए मैं बाहर निकल आया। मुख्‍य द्वार तक आया ही था कि एक और झोलाधारी इंसान से भेट हो गई। मैं समझ गया, यह भी अपनी ही बिरादरी का है। मैंने लपककर उनसे पूछा-क्‍या आप भी महान जी के दर्शनार्थ जा रहे है?‘‘ उन्‍होंने मुस्‍कराते हुए जवाब दिया-‘‘हाँ भाई! महान जी ने कृपापूर्वक एक रचना मुझे भिजवाई थी। मैंने वह अपनी पत्रिका में प्रकाशित की है और अब उसे महान जी को भेटकर उनके स्‍नेह का प्रसाद ग्रहण पाने जा रहा हूँ। मैं बुदबुदाया-‘‘ जाओ भाई! प्रसाद तो महान जी तबियत से देते हैं। ग्रहण करो और अपनी खैर मनाओ। बहरहाल, आपने उनकी कौन-सी रचना प्रकाशित की है। जवाब मिला -‘‘बहुत ही सुन्‍दर निबंध है भाई। शीर्षक है ‘शिष्‍ट व्‍यवहार कैसे करे‘ रचना की शुरूआत बहुत सुन्‍दर वाक्‍य से हुई है ‘शिष्‍टाचार मनुष्‍य का आभूषण है‘। जिसकी रचना इतनी सुन्‍दर वह कितना सुन्‍दर होगा बस इसी लालसा में महान जी से मिलने जा रहा हूँ।

मैं फिर बुदबुदाया-‘‘जाओ भाई! महान जी से मिलकर आपमें जो शिष्‍टाचार है, आप वह भी भूल जायेंगे। इन महानटाइप के लेखको को आप शिष्‍टाचार का फर्जी विश्‍वविद्यालय ही समझें।‘‘

महान जी के दरवाजे से लौटने के बाद मुझे लगा, शिष्‍टाचार कहने और लिखने भर की बातें है व्‍यवहार में अपनाने की नहीं। नये जमाने के शिष्‍टाचार का यह अध्‍याय आज तक मेरे दिमाग में उथल-पुथल मचाये हुए है।

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वीरेन्‍द्र -सरल‘

बोड़रा (मगरलोड़)

जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)

पिन-493662

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर 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रचनाकार: व्‍यंग्‍य // महान टाइप के लेखक // वीरेन्‍द्र ‘सरल‘
व्‍यंग्‍य // महान टाइप के लेखक // वीरेन्‍द्र ‘सरल‘
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