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राकेश भ्रमर की पांच लघुकथायें

पूर्णिमा सिसोदिया की कलाकृति

एक : किसान और सांप

एक किसान को खेत में काम करते हुए एक ज़हरीले सांप ने डस लिया. पहले तो किसान थोड़ा भयभीत हुआ, फिर मन को दृढ़ करते हुए सोचा, ‘सांप का ज़हर मेरा क्या बिगाड़ लेगा?’ और वह निष्चिन्त होकर काम करता रहा.

दूसरे दिन किसान को जीवित देखकर सांप उसके पास आकर बोला, ‘‘किसान भाई, तुम मेरे काटने से बच कैसे गए? क्या मेरा विष अब मनुष्यों के ऊपर असर नहीं करता?’’

किसान ने हंसकर कहा, ‘‘नहीं नाग देवता, आपका विष अभी भी मृत्युदायक है, परन्तु मेरे जैसे किसान के अन्दर सरकार और महाजनों द्वारा दिया गया आश्वासन और सूदरूपी इतना विष भरा है कि अब हमारे शरीर पर किसी प्रकार का ज़हर असर नहीं करता. मौसम जब हमारी फसल बरबाद कर देता है, तब भी हमें हार्ट अटैक नहीं होता. हमें तो बस अपनों की दया मार देती है.’’

सांप ने अपना फन काढ़कर उसे नमस्कार करते हुए कहा, ‘‘किसान भाई, आप महान हो, जो हर प्रकार का विष पीकर भी जिन्दा रहते हो. भगवान, आपकी मदद करे.’’ और वह अपने बिल में घुस गया.

दो : सोना

चन्द्रपाल दिल्ली में आटोरिक्शा चलाता था. एक बार किसी अज्ञात महिला का पर्स उसके आटो में छूट गया. देखा तो उसमें ढेर सारी ज्वेलरी और रुपये थे. पहले सोचा, पुलिस थाने में जमा करवा दे, फिर उसने सोचा कि पुलिस भी कहां उस महिला को ढूंढ़ेगी. स्वयं इस माल को हड़प कर जाएगी.

कुछ सोचकर उसने पर्स को चुपचाप लाकर घर में पत्नी को दे दिया. पत्नी बहुत खुश हुई.

परन्तु रात भर उन दोनों को नींद नहीं आई. पुलिस और चोरों के भय से उनकी आंखों की नींद भाग गई थी. चन्द्रपाल को डर लग रहा था कि उस महिला ने थाने में रिपोर्ट लिखा दी होगी और पुलिस उसे ढूंढ़ती हुई किसी भी पल उसके घर पर आ धमकेगी और उसकी पत्नी को यह भय सता रहा था कि कहीं घर में चोर न घुस आएं और सारे गहने और रुपये लूट ले जाएं.

सुबह दोनों आश्चर्य से एक-दूसरे का मुंह देख रहे थे. जैसे वह दोनों पूछ रहे थे, अब क्या करें? चन्द्रपाल ने कहा, ‘‘इन सोने के गहनों ने पहली रात ही मेरी नींद उड़़ा दी. आगे न जाने क्या होगा?’’

‘‘हां, मेरी भी यही हालत है? सोना हमें सोने नहीं देगा. आप तो इसे थाने में जमा करवा दो. हम गरीब हैं तो क्या हुआ? चैन की नींद तो सोते हैं.’’ उसकी पत्नी ने कहा. चन्द्रपाल ने सहमति में सिर हिलाया.

थाने में उस अज्ञात महिला का पर्स जमा करवाकर चन्द्रपाल को जो सुकून मिला, वह आजीवन उसे भुला नहीं सकेगा.

सोना सचमुच अमीर और गरीब दोनों को ही सोने नहीं देता.

तीन : कुल्हाड़ी

एक दिन कुल्हाड़ी ने घमंड में आकर पेड़ से कहा, ‘‘मेरे सामने तुम्हारी कोई औकात नहीं है. पल भर में मैं तुम्हारे टुकड़े-टुकड़े कर सकती हूं.’’

पेड़ ने एक पल गंभीरता से सोचा, फिर जवाब दिया, ‘‘मेरी औलादों ने मेरे साथ दगाबाजी न की होती और तुम्हारा साथ न दिया होता, तो तुम्हारी क्या हैसियत कि मेरा बाल-बांका कर सकती?’’

‘‘तुम्हारे किस वंशज ने मेरा साथ दिया.’’ कुल्हाड़ी ने ऐंठते हुए कहा, ‘‘मैं स्वयं इतनी सक्षम हूं कि किसी के भी टुकड़े कर सकती हूं.’’

‘‘इतना घमंड अच्छा नहीं होता, मेरी प्यारी कुल्हाड़ी. मेरी बात ध्यान से सुनो. अपने आप में तुम एक बेकार लोहे के टुकड़े के अलावा कुछ नहीं हो. तुम्हारे साथ अगर लकड़ी का बेंत न लगा होता तो तुम कैसे किसी के टुकड़े करती. बेंत के सहारे ही तुम्हारा जीवन और अस्तित्व है, वरना तुम एक अपंग के समान हो. तुमको सहारा देने के लिए बेंत लगाया जाता है. वह भी मेरे जैसे किसी पेड़ की शाखा को तोड़कर बनाया जाता है. इस प्रकार वह हमारा वंशज हुआ न! बताओ, बिना लकड़ी के बेंत के तुमको कौन पूछता? दुनिया की यही रीति है, अपने ही अपनों के साथ दगा करते हैं. अगर हम अपनों के साथ दगा न करें, तो पराए हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते.’’ पेड़ ने जीवन की मीमांसा करते हुए कुल्हाड़ी से कहा.

सुनकर कुल्हाड़ी का सिर शर्म से झुक गया. सच, बिना बेंत के उसका क्या अस्तित्व? पेड़ की लकड़ी का सहारा पाकर वह इतराती है और पेड़ों के ही जिस्म चीरती है.

चार : मुआवजा

इस बार बेमौसम की बरसात और ओलों की मार ने रबी की फसल को चैपट कर दिया था. छोटे-बड़े सभी किसान दुखी और परेशान थे. सरकार ने मुआवजे की घोषणा की थी, परन्तु गरीब किसान खुश नहीं थे. पहले भी इस तरह के मुआवजे की घोषणाएं हुई थीं, परन्तु किसी को मुआवजा नहीं मिला था. इस बार भी ऐसा ही होगा.

बर्बाद फसलों का मुआयना करने के लिए गांव में लेखपाल के साथ कुछ अधिकारी आए थे. बद्री की पांच बीघे की फसल पूरी तरह बर्बाद हो गयी थी. लेखपाल ने सूची में उसका नाम भी लिख लिया था, परन्तु जब मुआवजा आया तो उसका नाम कहीं नहीं था, बल्कि कुछ ऐसे लोगों के नाम थे, जिनकी खेती को थोड़ा-बहुत नुकसान हुआ था.

‘‘परधानजी!’’ उसने सकुचाते हुए ग्राम प्रधान से पूछा, ‘‘मेरा मुआवजा नहीं आया?’’ उसे इस बार बेटी की शादी तय कर रखी थी.

‘‘बद्री! मुआवजा उनको मिलता है, जो सरकार को वोट देते हैं. याद है, पिछली बार तुमने सरकार को वोट नहीं दिया था.’’

बद्री की समझ में कुछ नहीं आया. फिर भी पूछा, ‘‘नहीं परधानजी! मैंने तो सरकार को वोट दिया था.’’

‘‘दिया होगा, परन्तु तुमने मुझे वोट नहीं दिया था.’’ प्रधानजी ने कुटिलता से मुस्कराते हुए कहा.

बद्री की समझ में सबकुछ आ गया. पिछले प्रधानी के चुनाव में उसने प्रधान के प्रतिद्वंद्वी को वोट दिया था और वह हार गया था.

पांच : पहचान का संकट

एक दिन वह मेरे पास आया. उसके होंठों पर भेदभरी मुस्कान थी. उसने मुझसे कहा‌‌- “ वह मेरे बारे में बहुत कुछ जानता है.”

मैंने पूछा- “ कितना?”

आँखों को चमकाते हुये उसने कहा- “जितना आप स्वयं को नहीं जानते.”

“अच्छा !” मैंने भी आंखें फैलाकर कहा.

और वह मेरे बारे में बहुत कुछ बताता रहा. मैं चुपचाप सुनता रहा.

उसकी बातें सुनकर मैं हैरान होता रहा. फिर वह चला गया. मैं बैठा सोचता रहा कि सचमुच मैं अपने बारे में कितना कम जानता था. उतना भी नहीं, जितना लोग मेरे बारे में जानते थे.

क्या यह हमारा दुर्भाग्य नहीं कि हम दूसरों के बारे में ज़्यादा जानते हैं और स्वयं के बारे में बहुत कम.

अगर हम स्वयं को पहचान जाएँ तो जीवन कितना सरल और सुखमय हो जाय.

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(राकेश भ्रमर)

24, जगदीशपुरम, लखनऊ मार्ग,

निकट त्रिपुला चौराहा, रायबरेली-229001

मोबा- 9968020930

ईमेल : rakeshbhramar@rediffmail.com

लघुकथा 8651687375242952136

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