देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–5 : 12 चमकती हुई मछली[ // सुषमा गुप्ता

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12 चमकती हुई मछली [1] एक बार एक बहुत ही अच्छे बूढ़े पति पत्नी के लड़के मर गये थे तो वे बेचारे यह ही नहीं सोच पा रहे थे कि वे उनके बिना अपनी बा...

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12 चमकती हुई मछली[1]

एक बार एक बहुत ही अच्छे बूढ़े पति पत्नी के लड़के मर गये थे तो वे बेचारे यह ही नहीं सोच पा रहे थे कि वे उनके बिना अपनी बाकी की ज़िन्दगी कैसे बितायेंगे।

बूढ़े की पत्नी बहुत बूढ़ी थी और बीमार भी बहुत रहती थी। बूढ़ा रोज जंगल जाता था और लकड़ी काट कर लाता था। फिर उस लकड़ी को बेचने के लिये बाजार ले जाता था। उनको बेच कर जो पैसा मिलता था उससे वह अपना पेट पालता था। इसी तरह से वह अपना गुजारा चला रहा था।

एक दिन जब वह जंगल जा रहा था तो कुछ कराहता जा रहा था कि रास्ते में उसको एक भला आदमी मिला जिसके लम्बी सी दाढ़ी थी।

वह लम्बी दाढ़ी वाला उस बूढ़े से बोला — “मुझे तुम्हारी परेशानियों का पता है। मैं तुम्हारी सहायता करूँगा। लो यह बटुआ लो। इसमें 100 डकैट[2] हैं। शायद यह तुम्हारी कुछ सहायता कर सके।”

बूढ़े ने वह बटुआ ले लिया और वह बेहोश हो गया। जब तक उसे होश आया तब तक वह भला आदमी तो गायब भी हो गया था। वह बूढ़ा उस बटुए को ले कर अपने घर चला गया और वह बटुआ खाद के एक ढेर के नीचे छिपा दिया।

उसने अपनी पत्नी को भी इस बारे में कुछ नहीं बताया। उसने सोचा — “अगर मैंने उसको इसके बारे में बताया तो यह सारा पैसा बहुत जल्दी ही खत्म हो जायेगा।” सो अगले दिन वह रोज की तरह फिर लकड़ी काटने जंगल चला गया।

उस शाम जब वह घर पहुँचा तो उसने देखा कि उसकी खाने की मेज पर तो दावत का खाना लगा हुआ है। वह देख कर वह चौंक गया और अपनी पत्नी से पूछा — “तुमने यह सब कहाँ से खरीदा?”

पत्नी सीधे स्वभाव बोली — “आज मैंने खाद बेच दी।”

वह आदमी बोला — “अरी बेवकूफ उसके नीचे तो 100 डकैट छिपे हुए थे।”

“मुझे क्या मालूम। तुमने मुझसे उसके बारे में कुछ कहा ही नहीं था तो मुझे कैसे पता चलता। कहाँ से आये वे?”

अगले दिन वह बूढ़ा फिर ज़ोर ज़ोर से कराहता हुआ जंगल की तरफ चल दिया। उसको वह पहले वाला भला आदमी उसी जगह फिर मिल गया।

वह भला आदमी बोला — “मुझे तुम्हारी बदकिस्मती का पता है। शान्त हो जाओ। यह लो 100 डकैट और।”

बूढ़े ने उन डकैटों को ले लिया और अपने घर वापस आ गया। अब की बार उसने वे पैसे राख के ढेर में छिपा दिये और रोज की तरह अगले दिन फिर जंगल लकड़ी काटने चला गया।

पर जब वह शाम को घर वापस लौटा तो उसकी खाने की मेज फिर वैसे ही बहुत सारे खानों से सजी हुई थी। वह फिर उसको देख कर परेशान हो गया।

उसने अपनी पत्नी से फिर पूछा — “आज तुमने इतना सारा खाना कहाँ से खरीदा?”

पत्नी ने सीधे स्वभाव कहा — “आज मैंने राख बेच दी।”

मगर आज उस बूढ़े के गले से वह खाना नीचे नहीं उतरा और वह बिना खाना खाये ही सोने चला गया। अगले दिन वह बूढ़ा फिर लकड़ी काटने के लिये जंगल चल दिया। आज वह बहुत ज़ोर ज़ोर से रोता हुआ जा रहा था।

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आज भी उसको जंगल में वही भला आदमी उसी जगह मिल गया। आज वह बोला — “अब की बार मैं तुमको पैसे नहीं दूँगा। आज तुम ये 24 मेंढक ले जाओ और इनको बेच कर इनके पैसे से एक मछली खरीद लो – सबसे बड़ी मछली जो भी तुम खरीद सकते हो।”

बूढ़े ने वे 24 मेंढक उस भले आदमी से ले लिये और जा कर उनको बाजार में बेच दिये। उससे आये पैसे से उसने एक बहुत बड़ी मछली खरीद ली और घर आ गया। रात को उसने देखा कि वह मछली तो चमक रही थी। उसमें से तो बहुत ज़ोर की रोशनी निकल रही थी जिससे सारी जगह में रोशनी फैल रही थी।

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उसकी रोशनी इतनी तेज़ थी कि अगर उस मछली को हाथ में ले कर चलो तो ऐसा लगता था जैसे कोई लालटेन ले कर चल रहा हो। शाम को वह उस मछली को घर के बाहर लटका देता ताकि वह ताजा रहे।

एक दिन बड़ी अ‍ँधेरी और तूफानी रात थी। मछियारे जो बाहर समुद्र पर मछलियाँ पकड़ने गये थे उनको घर वापस लौटने का रास्ता नहीं सुझाई दे रहा था सो वे लोग परेशान थे कि वे अब घर कैसे पहुँचें।

तभी उनको इस बूढ़े की खिड़की पर लटकी हुई इस मछली से निकली रोशनी दिखायी दे गयी। उसको देख कर उन्होंने इसी तरफ अपनी नावें खेना शुरू कर दिया और वे समुद्र में रास्ता भटकने से बच गये। वे ठीक से किनारे आ गये थे।

इस सबके बदले में उन सबने अपनी अपनी कमाई का आधा आधा हिस्सा उस बूढ़े को दे दिया और उससे समझौता किया कि अगर वह उस मछली को वहाँ पर ऐसे ही लटका कर रखेगा तो वे हमेशा अपना रात का शिकार उससे आधा आधा बाँट लेंगे।

बूढ़े ने ऐसा ही किया और फिर उसको कभी खाने की कोई मुश्किल नहीं उठानी पड़ी।



[1] Shining Fish (Story No 118) – a folktale from Abruzzo area, Italy, Europe.

Adapted from the book : “Italian Folktales”, by Italo Calvino”. Translated by George Martin in 1980.

[2] Ducat – currency in use at that time in Europe

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से क्रमशः  - रैवन की लोक कथाएँ,  इथियोपिया इटली की  ढेरों लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. 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पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–5 : 12 चमकती हुई मछली[ // सुषमा गुप्ता
देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–5 : 12 चमकती हुई मछली[ // सुषमा गुप्ता
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