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देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–6 : 4 तेरह डाकू// सुषमा गुप्ता

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4 तेरह डाकू [1] एक बार की बात है कि इटली के किसी शहर में दो भाई रहते थे – एक अमीर चमार था और दूसरा गरीब किसान। एक बार वह किसान अपने खेत से व...

4 तेरह डाकू[1]

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एक बार की बात है कि इटली के किसी शहर में दो भाई रहते थे – एक अमीर चमार था और दूसरा गरीब किसान।

एक बार वह किसान अपने खेत से वापस लौट रहा था कि उसने 13 आदमी एक ओक के पेड़ के नीचे देखे। हर एक के पास बहुत ही भयानक चाकू थे जो किसी को भी डराने के लिये काफी थे।

वे चाकू देख कर किसान ने सोचा कि लगता है ये तो डाकू हैं तो वह वहीं छिप गया। वह डर गया था कि वे डाकू कहीं उसे मार न दें।

उसने देखा कि वे सब उस ओक के पेड़ के पास गये। फिर उसने उनके सरदार को कहते सुना “खुल जा ओक”। सुन कर उस ओक के पेड़ ने एक जँभाई ली और वहाँ एक दरवाजा खुल गया। एक एक करके सारे डाकू उस दरवाजे के अन्दर चले गये।

वह किसान अपनी छिपने की जगह से सब देखता रहा। कुछ देर बाद वे डाकू एक एक करके वहाँ से बाहर निकल आये। उनका सरदार सबसे बाद में बाहर आया।

बाहर आ कर उसने अपने सब साथियों को गिना और फिर बोला “बन्द हो जा ओक” और ओक के पेड़ में जो दरवाजा खुला था वह बन्द हो गया। और वे सब डाकू वहाँ से चले गये।

जब वे डाकू चले गये तो किसान ने खुद उस दरवाजे के अन्दर जाने का फैसला किया। वह पेड़ तक गया और बोला “खुल जा ओक” तो उस पेड़ ने पहले की तरह से जँभाई ली और फिर वहाँ एक दरवाजा खुल गया और वह उसके अन्दर चला गया।

अन्दर जा कर उसको सीढ़ियाँ दिखायी दीं तो वह उन सीढ़ियों से नीचे चला गया। नीचे उतरने पर वह एक गुफा में पहुँच गया। वहाँ जा कर तो उसने जो कुछ देखा उससे तो उसका मुँह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया।

वहाँ खजाने के 13 ढेर लगे पड़े थे और वे सभी नीचे फर्श से ले कर ऊपर छत तक जा रहे थे। वहाँ कई ढेर सोने के थे, कई ढेर हीरों के थे और कई ढेर नैपोलियन्स[2] के थे।

किसान तो बहुत देर तक उनको घूरता ही रह गया। उसने तो इतना खजाना पहले कभी देखा ही नहीं था सो उसको तो वह सब देखने में ही बहुत अच्छा लग रहा था।

जब वह उनको अच्छी तरह देख चुका तो सबसे पहले उसने उनसे अपनी पोशाक की जेबें भरनी शुरू कीं। फिर उसने अपनी पैन्ट की जेबें भरीं। उसके बाद उसने अपनी पैन्ट ऊपर तक खींच ली और उससे बनी खाली जगह में सोने के टुकड़े भर लिये और फिर उनको ले कर नाचता हुआ घर चला गया।

वह जब इस हालत में घर पहुँचा तो उसकी पत्नी ने पूछा — “अरे यह क्या हुआ है तुमको?”

यह सुन कर उसने अपनी सारी जेबें खाली कर दीं और उसने उसको डाकू और उनकी गुफा के बारे में सब कुछ बता दिया।

उसने सोचा था कि वहाँ से लाया पैसा वह उस बोतल से गिन लेगा जिससे शराब नापी जाती है। पर उस समय उसके पास ऐसी कोई चीज़ ही नहीं थी जिससे वह उस पैसे को नाप सकता सो उसने अपनी पत्नी को अपने भाई के घर भेजा कि वह वहाँ से उस पैसे को नापने के लिये कोई चीज़ ले आये।

चमार के भाई को मालूम था कि उसका भाई तो बहुत ही गरीब था तो यह सुन कर उसको बड़ा आश्चर्य हुआ कि मेरे भाई के पास ऐसा क्या आ गया जिसको वह नापना चाहता है।

और उसने नापने वाला मँगवाया है तो क्यों मँगवाया है क्योंकि उसके घर में तो कुछ ऐसा तो था ही नहीं जिसको उसे नापने की जरूरत पड़े। मैं देखता हूँ।

सो उसने क्या किया कि एक बोतल की तली में एक मछली की एक हड्डी चिपका दी ताकि वह जो चीज़ भी उससे नापे उसमें से उसका कुछ हिस्सा उससे चिपक जाये और वह यह जान जाये कि उसने उससे क्या नापा था और वह बोतल उसको दे दी।

किसान भाई ने अपना पैसा नापा और वह बोतल अपने चमार भाई को वापस भिजवा दी। किसान भाई ने देखा ही नहीं कि बोतल की तली में उसके भाई ने कुछ चिपकने वाला लगा दिया था जिसमें उसका एक नैपोलियन का सिक्का चिपक गया था। उसने सीधे स्वभाव अपना सामान तौल कर बोतल अपने चमार भाई को वापस करवा दी थी।

जैसे ही किसान भाई ने अपने चमार भाई को उसकी बोतल वापस की तो उसके चमार भाई ने तुरन्त ही यह देखने के लिये उस बोतल की तली को देखा कि उसके गरीब किसान भाई ने उसकी बोतल से क्या नापा था और उसकी बोतल की तली की मछली की हड्डी में कुछ चिपका था या नहीं।

उसने देखा कि वहाँ तो एक नैपोलियन सिक्का चिपका हुआ था। यह देख कर तो उसका चेहरा चमक उठा।

अच्छा तो यह बात है। वह उसी समय अपने भाई के पास भागा गया और उससे कहा — “मुझे बताओ यह पैसा तुम्हें किसने दिया?”

किसान भाई सीधा था उसने उसे सब कुछ बता दिया।

चमार भाई बोला — “भाई तुम मुझे भी उस जगह ले चलो न। मेरे बच्चे हैं पालने पोसने के लिये इसलिये मुझे पैसे की तुमसे कहीं ज़्यादा जरूरत है।”

किसान भाई राजी हो गया और अपने चमार भाई को दो गधे और चार थैलों के साथ ले कर उसी ओक के पेड़ के पास ले चला। वहाँ जा कर वह बोला “खुल जा ओक” और ओक के पेड़ में पहले की तरह एक दरवाजा खुल गया।

दोनों भाई नीचे उतरे दोनों ने अपने अपने थैले भरे और घर वापस आ गये। घर आ कर उन दोनों ने वह सामान बाँट लिया – सोना, हीरे, नैपोलियन्स, सभी कुछ। अब उनके पास बहुत पैसा था सो वे दोनों आराम से रहने लगे।

एक दिन उन्होंने आपस में बात की तो किसान भाई बोला — “अब तो हम लोग आराम से रह रहे हैं और अगर हमें मरना नहीं है तो हमको अब वहाँ जाने की कोई जरूरत भी नहीं है। हमारे पास काफी पैसा है।”

हालाँकि उस समय तो चमार भाई इस बात पर राजी हो गया कि वह पैसा उनके लिये काफी था फिर भी वह अपने आपको दोबारा वहाँ जाने से रोक नहीं सका सो एक दिन वह अपने भाई को बिना बताये अकेला ही वहाँ चला गया।

असल में वह इस किस्म का आदमी था कि उसके लिये कभी कोई चीज़ काफी नहीं थी।

इत्तफाक से जब वह वहाँ पहुँचा तो वे डाकू उस पेड़ के अन्दर ही थे। वह उनके वहाँ से निकलने का इन्तजार करता रहा। आखिर वे बाहर निकले। उसने उनको गिना तो सही मगर वह उनको गिनते गिनते उनकी गिनती भूल गया।

जब वे सब वहाँ से बाहर निकल गये तो वह उस ओक के पेड़ के अन्दर गया। अब उसको अपनी गिनती भूलने की गलती का नतीजा भुगतना पड़ा। उस पेड़ में से 13 की बजाय 12 डाकू ही बाहर निकले थे। इसका मतलब था कि एक डाकू अभी भी उस गुफा के अन्दर ही था।

असल में हुआ क्या था कि उस दिन जब वे डाकू वहाँ आये तो उन्होंने देखा कि उनका कुछ सामान वहाँ से गायब है।

उनको कुछ शक हुआ कि लगता है कि किसी को उनके खजाने का पता मालूम हो गया है सो वे रोज एक डाकू को वहाँ छोड़ दिया करते थे ताकि वह उस गुफा की रखवाली करता रहे और अगर कोई वहाँ आये तो उसको पकड़ भी ले।

उस दिन भी उन्होंने ऐसा ही किया था सो जैसे ही यह चमार भाई गुफा में घुसा वह एक डाकू उसके ऊपर कूद पड़ा और उसने उसको काट कर उसके टुकड़े टुकड़े कर दिये। फिर उसने उनको बाहर ले जा कर पेड़ की दो शाखाओं पर टाँग दिया।

जब वह चमार भाई बहुत देर तक घर नहीं लौटा तो उसकी पत्नी किसान भाई के पास गयी और बोली — “भैया, मुझे ऐसा लगता है कि उनके साथ कुछ बुरा हो गया है। आपके भाई उस ओक के पेड़ पर गये थे और अभी तक वापस नहीं लौटे हैं।”

किसान भाई बोला — “भाभी, आप चिन्ता न करें मैं अभी जा कर देखता हूँ।” उसने रात होने का इन्तजार किया और रात होते ही ओक के पेड़ की तरफ चल दिया।

वहाँ जा कर उसने देखा कि ओक के पेड़ की शाखाओं से उसके भाई के शरीर के चार टुकड़े लटक रहे हैं। वह समझ गया कि उसके भाई के साथ क्या हुआ होगा।

उसने उन चारों टुकड़ों को खोला, अपने गधे पर लादा और उनको घर ले आया। चमार की पत्नी और बच्चे तो उसको इस हालत में देख कर रोने चीखने लगे।

किसान भाई अपने चमार भाई की लाश को चार हिस्सों में दफ़नाना नहीं चाहता था सो उसने अपने जानने वाले एक और चमार को बुलवाया और उसकी लाश को उससे सिलवा कर दफ़ना दिया।

अब उस चमार भाई की पत्नी के पास जो कुछ भी बचा था उस पैसे से उसने एक सराय खरीद ली और उसको चलाने लगी।

उधर डाकुओं ने देखा कि वह लाश जो उन्होंने ओक के पेड़ की शाखाओं से टाँगी थी वह गायब हो गयी है तो उन्हें कुछ शक हुआ।

उनको लगा कि अभी कोई और भी था जो उनकी गुफा का पता जानता था। सो अब की बार वे उस दूसरे आदमी को ढूँढने निकले। उन 13 डाकुओं में से एक डाकू शहर में गया और पता किया कि उस शहर में कहीं चार हिस्से की हुई कोई लाश तो नहीं दफ़नायी गयी।

सबके मना करने पर कि वहाँ ऐसी कोई लाश नहीं दफ़नायी गयी उन्होंने सोचा कि फिर जरूर ही किसी ने उसको सिल कर दफ़नाया होगा।

सो वह आदमी फिर सारे चमारों के पास गया और उनको एक फटा जूता दिखा कर उनसे पूछा — “क्या तुम यह जूता सिल दोगे?”

उनमें से एक चमार बोला — “क्या तुम मजाक कर रहे हो? मैंने तो एक चमार के पूरे शरीर को सिला है तो यह जूता मेरे लिये क्या चीज़ है।”

डाकू ने पूछा — “वह चमार कौन था?”

वह चमार बोला — “वह हमारा एक साथी चमार था। उसके शरीर के किसी ने चार हिस्से कर दिये थे मैंने उसी को सिला था। उसकी पत्नी अब एक सराय चलाती है।”

इस तरह से डाकुओं को पता चल गया कि वह सराय चलाने वाली ही उनके खजाने की मालकिन थी।

डाकुओं ने एक बहुत बड़ा बरतन लिया और 11 डाकू उस बरतन के अन्दर छिप गये। वह बरतन उन्होंने एक गाड़ी पर लादा और बाकी दो डाकू उस गाड़ी को खींच कर ले गये। वे उसी सराय में पहुँचे जिसकी मालकिन उस चमार भाई की पत्नी थी।

वहाँ जा कर उन्होंने उस सराय की मालकिन से पूछा — “क्या तुम हमारा यह बरतन कुछ देर के लिये रख लोगी और हमको खाना भी खिला दोगी?”

सराय की मालकिन बोली — “हाँ हाँ क्यों नहीं। आप आराम से बैठें।”

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कह कर उसने दोनों गाड़ी खींचने वालों के सामने मैकेरोनी[3] की दो प्लेटें रख दीं।

उस चमार की बेटी वहीं पास में खेल रही थी। उसने खेलते खेलते उस बरतन में से कुछ आवाज सुनी तो वह उसके और पास पहुँच गयी और ध्यान दे कर सुनने लगी। उसने सुना एक आदमी कह रहा था “अब हम इस स्त्री को देख लेंगे।”

वह लड़की भाग कर अपनी माँ के पास गयी और उसको जा कर बताया कि उस बक्से में कुछ आदमी हैं जो इस तरह की बात कर रहे हैं।

उस स्त्री ने तुरन्त ही चूल्हे पर से उबलते पानी की केटली उतारी और उसके पानी को उस बरतन में पलट दिया। इतने गरम पानी के पड़ने से वे सब डाकू जल कर मर गये।

फिर वह बाहर गयी और उन दोनों को और मैकेरोनी दी। फिर उसने शराब में दवा मिलायी जिसको पी कर वे दोनों सो गये। जब वे सो गये तो उसने उन दोनों के सिर काट लिये।

फिर वह अपनी बेटी से बोली — “जाओ, अब तुम जज के पास जाओ और उसको यहाँ ले आओ।” यह सुन कर वह लड़की जज के पास गयी और जज को बुला लायी।

जज वहाँ आया तो उसने उन डाकुओं को पहचान लिया और उस स्त्री को उन डाकुओं को मारने के लिये बहुत बड़ा इनाम दिया।



[1] The Thirteen Bandits (Story No 137) – a folktale from Italy from its Basicalata area.

Adapted from the book : “Italian Folktales”, by Italo Calvino. Translated by George Martin in 1980.

[This folktale is like “Ali Baba and Forty Thieves” of Arabian Nights. You may read it in English at

http://www.sushmajee.com/shishusansar/stories-arabian-nights/arabian-2/44-aleebaabaa-1.htm]

[2] A former gold coin of France equal to 20 Francs and bearing a portrait of Napoleon I or Napoleon III.

[3] Macaroni is very popular and main Italian food. It comes in several shapes. Here it is in elbow shape – see its picture above.

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से क्रमशः  - रैवन की लोक कथाएँ,  इथियोपिया इटली की  ढेरों लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)

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रचनाकार: देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–6 : 4 तेरह डाकू// सुषमा गुप्ता
देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–6 : 4 तेरह डाकू// सुषमा गुप्ता
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