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देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–7 : 9 रत्न जड़ा जूता // सुषमा गुप्ता

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9 रत्न जड़ा जूता [1] एक बार यूरोप के पुर्तगाल देश [2] में एक व्यापारी अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ रहता था – एक बेटा और एक बेटी। वे जब छोट...

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9 रत्न जड़ा जूता[1]

एक बार यूरोप के पुर्तगाल देश[2] में एक व्यापारी अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ रहता था – एक बेटा और एक बेटी। वे जब छोटे थे तभी व्यापारी और उसकी पत्नी की मृत्यु हो गयी थी सो वे दोनों भाई बहिन अकेले रह गये।

वह लड़का अपनी बहिन को बहुत प्यार करता था। वह पढ़ लिख कर पुर्तगाल के राजा के यहाँ नौकरी करने लगा था। उसकी लिखाई ऑखों को इतनी सुन्दर लगती थी कि राजा ने उसको अपना सेक्रेटरी बना लिया था।

अब हुआ यह कि उसके हाथ की लिखी हुई कुछ चिट्ठियाँ स्पेन[3] के राजा के पास पहुँचीं तो उसके मुँह से निकला — “कितनी सुन्दर लिखाई है। अगर मुझे यह लिखने वाला मिल जाये तो मैं इसको अपना सेक्रेटरी बना लूँ।”

यह सोच कर उसने पुर्तगाल के राजा को लिखा – “मैंने आपकी चिठ्ठी पढ़ी। मैं आपके सेक्रेटरी की सुन्दर लिखावट देख कर बहुत खुश हुआ।

हमारी दोस्ती की खातिर जिसने हमको बाँध रखा है मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप इस चिट्ठी लिखने वाले को मुझे दे दें। मैं उसे अपना सेक्रेटरी बनाना चाहता हूँ। स्पेन में कोई ऐसा आदमी नहीं है जो इतना सुन्दर लिखता हो।”

ये दोनों राजा लोग एक दूसरे के बड़े अच्छे दोस्त थे इसलिये हालाँकि पुर्तगाल का राजा अपना सेक्रेटरी किसी को देना नहीं चाहता था फिर भी उसने अपने सेक्रेटरी को अपने दोस्त स्पेन के राजा के पास भेज दिया।

जाते समय उस नौजवान ने पूछा — “योर मैजेस्टी, मैं अपनी बहिन का क्या करूँ? मैं उसको इस तरह अकेले छोड़ कर तो नहीं जा सकता।”

राजा बोला — “डौन जियूसैप[4]। मैं यह तो नहीं बता सकता। मैं तो बस इतना जानता हूँ कि तुमको वहाँ जाना है। तुम्हारी बहिन एक अच्छी लड़की है और मेरे ख्याल में वह अपनी देखभाल अपने आप कर सकती है। तुम अपनी नौकरानी को बोल जाओ कि वह उस पर नजर रखे। फिर तुमको उसकी चिन्ता करने की कोई जरूरत नहीं है।”

अब उस नौजवान के पास और कोई चारा नहीं था कि वह अपनी बहिन को यह सब बता दे।

उसने उसको लिखा — “प्यारी बहिन कुछ ऐसा मामला आ गया है कि मुझे पुर्तगाल से स्पेन जाना पड़ रहा है। स्पेन का राजा मुझे अपना सेक्रेटरी बनाना चाहता है।

तुम मेरे पीछे नौकरानी के साथ अकेली रह जाओगी। मैं जब वहाँ ठीक से रहने लगूँगा तब मैं तुमको वहाँ बुला लूँगा।”

यह पढ़ कर उसकी बहिन तो रोने लगी। उसने आगे पढ़ा — “हम लोग एक दूसरे को इतना दूर न महसूस करें इसलिये हम लोगों को अपनी अपनी तस्वीरें बनवा लेनी चाहिये। मैं तुम्हारी तस्वीर ले जाऊँगा और तुम मेरी तस्वीर रख लेना।”

और फिर उन्होंने ऐसा ही किया। उन्होंने एक दूसरे की तस्वीरें बनवा लीं और वह लड़का अपनी बहिन की तस्वीर ले कर स्पेन चला गया।

स्पेन के राजा ने उसका ज़ोर शोर से स्वागत किया और तुरन्त ही उसको लिखने के काम पर लगा दिया। वह खुद खड़े हो कर उसकी सुन्दर लिखाई देखता रहता और मन ही मन उसकी तारीफ करता रहता।

वह अपने नये सेक्रेटरी को इतना चाहने लगा कि उसके राज्य में अब जब भी कोई समस्या होती तो वह उससे कहता — “डौन जियूसैप, तुम ही देख लो इसको। तुम्हारे ऊपर मुझे पूरा विश्वास है। अपनी समझ से जो भी तुम करोगे ठीक ही करोगे।”

इस सबका नतीजा यह हुआ कि राजा के दरबारियों में उसके लिये बहुत जलन पैदा हो गयी – कुलीन लोग, राजा का पुराना सेक्रेटरी, नाइट आदि सभी उससे जलने लगे।

एक दिन उन सबने मिल कर डौन जियूसैप की इज़्ज़त को मिट्टी में मिलाने का प्लान बनाया।

एक कुलीन आदमी राजा के पास गया और बोला — “मैजेस्टी, आपने लिखने के लिये तो बहुत अच्छा आदमी ढूँढ लिया है। आप समझ गये होंगे कि मैं डौन जियूसैप के बारे में बात कर रहा हूँ जिसकी तारीफ करते करते आप थकते नहीं। पर क्या आपको पता है कि आपके पीछे आपके विश्वास की आड़ में वह छिपे छिपे वह क्या कर रहा है।”

“यह तुम क्या कह रहे हो? क्या मामला है? मुझे साफ साफ बताओ कि तुम क्या कहना चाहते हो।”

“क्या मामला है और मैं क्या कहना चाहता हूँ? बात यह है कि रोज वह कमरे में एक तस्वीर ले कर जाता है। वह उसको देखता रहता है। उसको चूमता है और रोता है। और फिर वह उसको छिपा कर रख देता है।”

राजा ने यह सुन कर सोचा कि वह इस मामले की जाँच खुद ही करेगा। एक दिन राजा डौन जियूसैप के कमरे में गया और वहाँ अचानक ही पहुँच कर उसको आश्चर्यचकित कर दिया। उस समय वह उस तस्वीर को चूम रहा था।

राजा ने पूछा — “क्या मैं पूछ सकता हूँ कि यह तुम किसे चूम रहे थे, डौन जियूसैप?”

डौन जियूसैप बोला — “यह मेरी बहिन की तस्वीर है मैजेस्टी।”

राजा ने उस तस्वीर की तरफ देखा तो वह उसको बहुत सुन्दर लगी। वह उस तस्वीर वाली लड़की से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। डौन जियूसैप ने फिर राजा को उसके बारे में और भी बहुत कुछ बताया। उसने उसके और भी कई सारे गुण बखान किये।

वहाँ वह कुलीन आदमी भी मौजूद था जो डौन जियूसैप को गलत साबित करने से अपने आपको रोक नहीं सका।

उसने राजा के पीछे से उस तस्वीर को देखा और बोला — “कौन? यह स्त्री? इसको तो मैं जानता हूँ मैजेस्टी। मैं तो इसके साथ बातचीत भी कर चुका हूँ।”

नौजवान आश्चर्य से बोला — “क्या? मेरी बहिन से? और तुम बातचीत कर चुके हो? पर वह तो घर के बाहर कभी गयी ही नहीं। तुमने उससे कैसे बात कर ली जबकि उसे तो अभी तक किसी ने देखा भी नहीं?”

“हाँ हाँ, मैं सच कह रहा हूँ कि मैंने उससे बात की है।”

“तुम झूठ बोल रहे हो।”

जब दोनों में काफी बहस होने लगी तो राजा बीच में बोला — “इस मामले का हम एक बार ही फैसला कर देते हैं। ओ कुलीन आदमी, अगर यह सच है कि तुमने डौन जियूसैप की बहिन से बात की है तो हम तुमको एक महीना देते हैं कि तुम हमको यह बात साबित करके दिखाओ कि तुमने उससे बात की है।

अगर तुमने यह साबित कर दिया कि तुमने डौन जियूसैप की बहिन से बात की है तो डौन जियूसैप का सिर धड़ से अलग कर दिया जायेगा। और अगर तुम इस बात को साबित नहीं कर सके तो फिर तुम्हारा सिर धड़ से अलग कर दिया जायेगा।”

अब शाही हुकुम तो शाही हुकुम है और आखिरी फैसला है।

यह सुन कर वह कुलीन आदमी वहाँ से चला गया। जब वह पलेरमो पहुँचा तो उसने इस लड़की के बारे में हर एक से पूछना शुरू किया तो हर एक ने यही कहा कि वह है तो बहुत सुन्दर पर उसको देखा किसी ने नहीं है क्योंकि वह कभी घर से बाहर ही नहीं निकली।

दिन पर दिन बीतते गये और उस कुलीन आदमी को कुल्हाड़ी रोज अपनी गरदन के और पास आती दिखायी देती रही।

यही सोचते हुए और अपने हाथ मलते हुए वह एक शाम को डौन जियूसैप के घर के आस पास घूम रहा था और साथ में बुड़बुड़ाता जा रहा था कि “मैं क्या करूँ? मैं क्या करूँ?” कि तभी एक बुढ़िया ने उसको चौंका दिया।

उस बुढ़िया ने उससे कहा — “मेहरबानी करके मुझे कुछ खाने को दो मैं बहुत भूखी हूँ।”

“जाओ भागो यहाँ से।”

“मुझे कुछ दे दो मैं तुम्हारी सहायता करूँगी।”

“मुझे एक ऐसे आदमी से मिलना है जो मेरी अभी अभी सहायता कर सके।”

“तुम मुझे अपनी परेशानी बताओ तो मैं तुम्हारी सहायता करने की पूरी पूरी कोशिश करूँगी।”

सो उस कुलीन आदमी ने उसको सब कुछ बता दिया।

“अरे बस इतना ही। तुम सब कुछ मेरे ऊपर छोड़ दो और सोच लो कि तुमको इस बात का सबूत मिल गया।”

उस रात बहुत ज़ोर की बारिश हुई और बिजली चमकी और बादल गरजे। वह बुढ़िया डौन जियूसैप के घर के सामने वाले दरवाजे के सहारे लग कर खड़ी हो गयी।

वह ठंड से काँप रही थी और बहुत ज़ोर ज़ोर से रो रही थी। उसके रोने की आवाज सुन कर घर की मालकिन यानी डौन जियूसैप की बहिन ने अपनी नौकरानी से कहा — “बेचारी बुढ़िया, उसको घर के अन्दर ले आओ। लगता है उसको बहुत ठंड लग रही है।”

सो घर का दरवाजा खुला और वह बुढ़िया घर के अन्दर घुसी। “ओह मैं तो ठंड की वजह से जमी जा रही हूँ।”

मालकिन ने उसको आग के पास बिठाया और उसको खाना खिलाया। उस चालाक बुढ़िया ने यह सब देख लिया कि घर की मालकिन कहाँ सोती थी।

जब वह मालकिन शाम के तूफान से थकी सोने चली गयी और गहरी नींद सो गयी तो वह बुढ़िया उठ कर दबे पाँव उसके सोने के कमरे में गयी और उसकी ओढ़ने की चादर उठा कर उसको सिर से पाँव तक ध्यान से देखा।

उसने देखा कि उसके दाँये कन्धे पर तीन सुनहरे बाल उगे हुए थे। उसने एक छोटी कैंची से उन बालों को काट लिया और अपने रूमाल में बाँध लिया। फिर उसने उसको चादर से ढक दिया और अपने बिस्तर पर चली आयी।

कुछ देर बाद वह हिली डुली और फिर से रोना शुरू कर दिया। रोते रोते बोली — “ओह मेरा तो यहाँ कुछ दम सा घुट रहा है मैं जरा बाहर जाना चाहती हूँ।”

मालकिन उठी और अपनी नौकरानी से कहा कि वह उसको बाहर छोड़ दे नहीं तो वे दोनों रात भर नहीं सो पायेंगे।

वह कुलीन आदमी डौन जियूसैप के महल के आगे बेचैनी से तेज़ तेज़ चक्कर काट रहा था। तभी वह बुढ़िया घर से बाहर निकली और उसको तीन बाल दे कर और अपना इनाम ले कर वहाँ से चली गयी।

अगले दिन वह कुलीन आदमी जहाज में बैठ कर स्पेन वापस चला गया। स्पेन पहुँच कर वह तुरन्त राजा के पास पहुँचा और बोला — “मैजेस्टी, यह है डौन जियूसैप की बहिन की पहचान – उसके दाँये कन्धे पर उगे तीन सुनहरे बाल।”

डौन जियूसैप अपना चेहरा अपने हाथों से ढकते हुए बोला — “उफ़ यह तो मेरे लिये एक बहुत बड़ी मुसीबत हो गयी।”

राजा डौन जियूसैप से बोला — “अब मैं तुमको अपनी सफाई देने के लिये एक महीने का समय देता हूँ नहीं तो मेरे चौकीदार मेरा हुकुम बजा लायेंगे।”

चौकीदार आये और उन्होंने डौन जियूसैप को पकड़ कर जेल में डाल दिया। वहाँ उसको खाने के लिये केवल एक डबल रोटी का टुकड़ा और पीने के लिये केवल एक गिलास पानी रोज मिलता था।

पर जेलर ने यह देख कर कि यह कैदी कितना अच्छा आदमी था वह दूसरे कैदियों के खाने में से कुछ खाना निकाल कर उसको दे दिया करता था।

इसमें बस अब सबसे ज़्यादा परेशानी डौन जियूसैप को यह थी कि वह अपनी बहिन को एक लाइन भी नहीं लिख सकता था।

क्योंकि जेलर उसके ऊपर मेहरबान था इसलिये एक दिन उसने जेलर से एक प्रार्थना की — “क्या तुम मुझे मेरी बहिन को एक छोटी सी चिट्ठी लिखने दोगे? फिर चाहो तो तुम खुद ही उसको डाकखाने में डाल देना।”

जेलर एक बड़े दिल वाला आदमी था सो उसने उसको अपनी बहिन को एक चिट्ठी लिखने की इजाज़त दे दी। डौन जियूसैप ने अपनी बहिन को एक चिट्ठी लिखी और उसमें उसने वह सब लिखा जो वहाँ हो रहा था और कैसे वह उसकी वजह से मरने वाला था।

उसने चिट्ठी लिख कर जेलर को दे दी और जेलर ने उससे वह चिट्ठी ले कर डाकखाने में डाल दी।

उधर बहिन ने जब अपने भाई के बारे में अब तक कुछ नहीं सुना था तो वह उसकी चिट्ठी पा कर बहुत खुश हुई और जल्दी से उसे खोल कर पढ़ा।

चिट्ठी पढ़ कर तो वह रो पड़ी — “ओह मेरा प्यारा छोटा भाई। हमारे ऊपर यह क्या मुसीबत आ पड़ी।” उसने तुरन्त ही सोचना शुरू कर दिया कि वह अपने भाई की कैसे सहायता कर सकती थी।

काफी सोच विचार के बाद उसने अपना घर और अपने घर की सारी चीज़ें बेच दीं और उनसे जितने भी जवाहरात वह खरीद सकती थी खरीद लिये।

उन जवाहरातों को ले कर वह एक सुनार के पास गयी और उससे कहा कि वह उन सारे जवाहरातों को जड़ कर उसके लिये एक जोड़ी जूता बना दे।

फिर उसने एक काली पोशाक खरीदी जिसको शोक के मौके[5] पर पहनते हैं और स्पेन चल दी।

जब वह स्पेन पहुँची तो वहाँ उसने बिगुलों की आवाजें सुनी। उसने देखा कि कुछ सिपाही लोग एक आदमी की ऑखों पर पट्टी बाँध कर उसे फाँसी के तख्ते की तरफ लिये जा रहे हैं।

अपनी काली पोशाक पहने हुए, एक पैर में मोजा पहने हुए और दूसरे पैर में एक रत्न जड़ा जूता पहने हुए वह उस भीड़ में चिल्लाती हुई घुस गयी — “मैजेस्टी रहम करिये, मैजेस्टी रहम करिये।”

एक इतनी सुन्दर लड़की को काली शोक वाली पोशाक पहने, एक पैर मे केवल मोजा पहने और दूसरे पैर में केवल एक रत्न जड़ा जूता पहने देख कर भीड़ के लोगों ने उसके लिये अन्दर जाने के लिये जगह छोड़ दी।

राजा ने उसकी बात सुनी। उसने अपने सिपाहियों को कहा कि वह उस लड़की को कुछ न कहें और उसको उसके पास तक आने दें। उसने उस लड़की से पूछा कि क्या बात है। उसको क्या चाहिये।

वह लड़की बोली — “रहम करें और न्याय करें मैजेस्टी, रहम करें और न्याय करें।”

“हम वायदा करते हैं कि हम न्याय करेंगे। बोलो।”

लड़की बोली — “मैजेस्टी, आपके राज्य का एक कुलीन आदमी मेरे साथ बात करके मेरा एक ऐसा जूता जिसमें हीरे जवाहरात जड़े थे चोरी करके ले गया है।” कहते हुए उसने राजा को अपने पैर में पहना हुआ दूसरा जूता दिखा दिया।

यह देख कर राजा की तो बोलती बन्द हो गयी। उस कुलीन आदमी को बुलवाया गया।

उसने उस कुलीन आदमी की तरफ देखा और उससे पूछा — “तुम इतनी नीच हरकत कैसे कर सके ओ कुलीन आदमी? तुमने तो उससे बातचीत करने के बाद उसका जूता ही चुरा लिया और अब तुम्हारी इतनी हिम्मत कि तुम मेरे सामने खड़े हुए हो?”

वह कुलीन आदमी तो अब जाल में फँस चुका था। उसको झूठ बोलना ही पड़ा। उसने तुरन्त जवाब दिया — “पर मैजेस्टी, इस लड़की को तो मैंने कभी देखा ही नहीं।”

लड़की बोली — “इसका क्या मतलब है कि तुमने मुझे कभी देखा ही नहीं है। तुम जो कुछ कह रहे हो सोच समझ कर कहो।”

वह कुलीन आदमी बोला — “मैं कसम खाता हूँ मैंने इस लड़की को पहले कभी नहीं देखा।”

लड़की फिर बोली — “अगर ऐसा है तो तुमने पहले यह क्यों कहा था कि तुमने मुझसे बातचीत की है?”

“पर मैंने यह कहा ही कब?”

“यह सब तुमने तब कहा था जब तुमने यह कसम खायी थी कि तुम डौन जियूसैप की बहिन को जानते हो और तुमने उससे बातें की हैं। क्या तुमने वह सब उसको मारने के लिये नहीं कहा था?”

उसके बाद उसने राजा को बताया कि वह डौन जियूसैप की बहिन थी।

उस कुलीन आदमी को अपना जुर्म कुबूल करना ही पड़ा। बहिन को बेकुसूर देख कर राजा ने डौन जियूसैप को छोड़ दिया और उसे अपने पास बिठा लिया।

और उसके बदले उस कुलीन आदमी की ऑखों पर पट्टी बाँध कर उसको फाँसी के तख्ते की तरफ ले जाया गया। दोनों भाई बहिनों के आपस में गले मिल कर खुशी के ऑसू निकल आये।

राजा ने हुकुम दिया — “सिर काट दो इस कुलीन आदमी का।” और उस कुलीन आदमी का सिर वहीं उसी समय काट दिया गया।

राजा उन भाई बहिन को साथ लेकर महल लौटा और बहिन की सुन्दरता को देख कर उसने उससे शादी कर ली।



[1] Bejeweled Boot (Story No 159) – a folktale from Italy from its Palermo area.

Adapted from the book : “Italian Folktales”, by Italo Calvino”. Translated by George Martin in 1980.

[2] Portugal – a European country

[3] Spain – a European country

[4] Don Giuseppe – the name of the son of the trader

[5] In Christians people wear black clothes on the occasion of death ceremony.

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से क्रमशः  - रैवन की लोक कथाएँ,  इथियोपिया इटली की  ढेरों लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)

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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,345,बाल कलम,25,बाल दिवस,4,बालकथा,67,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,16,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,28,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,242,लघुकथा,1248,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,326,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2005,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,707,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,793,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,17,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,83,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,204,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,77,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–7 : 9 रत्न जड़ा जूता // सुषमा गुप्ता
देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–7 : 9 रत्न जड़ा जूता // सुषमा गुप्ता
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