हास्य-व्यंग्य // परमानेंट गवरमिंट ऑफ इंडिया // आशा रावत

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मैं अपने प्रिय देश के एक सरकारी विभाग में चपरासी हूँ । मुझे अपने ओहदे पर बहुत गर्व है । बचपन में एक कविता पढ़ी थी जिसका अर्थ था कि हिमालय देश...

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मैं अपने प्रिय देश के एक सरकारी विभाग में चपरासी हूँ । मुझे अपने ओहदे पर बहुत गर्व है । बचपन में एक कविता पढ़ी थी जिसका अर्थ था कि हिमालय देश का सजग प्रहरी है तो मैं भी अपने महकमे का एक सजग प्रहरी हूँ । हर पल दफ्तर के अंदर-बाहर घूम-घूमकर पहरा देता हूँ ताकि अपने- अपने कक्षों में बैठे अधिकारीगण निर्भय होकर अपना काम कर सकें ।

मैं जागता रहता हूँ तभी तो मेरे अफसर काम के बीच-बीच में आराम फरमा लेते हैं । वरना बेचारे रोज-रोज के दिनजगों और रतजगों में बीमार न पड़ जाएँ । उनमें इतना स्टेमिना तो है नहीं हो भी कैसे! दबाकर दाल रोटियाँ दूध दही मौसमी फल सब्जियाँ खाएं तो सेहत बने । तरह-तरह के सूप पीने और मुर्गे की एकाध टाँग के साथ रोटी का एकाध टुकड़ा तोड़ने से ताकत कहाँ आएगी? ऊपर से काम का इतना दिमागी बोझ फैक्ट्री मालिकों के साथ उठापटक सोच विचार तर्क-वितर्क आदि ।

मैं अपने अधिकारियों का बहुत आभारी हूँ कि उन्होंने मुझे नौकरी करना सिखा दिया वरना मैं तो अपने हाथों उसे खो ही देता । जब मैं यहाँ नया आया था तो अपने साथ गाँव के संस्कारों का आदर्श और खाँटीपन साथ लाया था । परिणाम स्वरूप एक बार एयरपोर्ट में चैकिंग के दौरान किसी एम०एल०ए० साहब से कह दिया था ' साहब... आपके हाथन मा जो झोला है तनिक हमें दिखावा... । '

उन्होंने गुस्से से घूरकर कहा था ' कौन हो तुम बदतमीज... । जानते नहीं मैं एम०एल०ए० हूँ ।

मैंने भी उसी तड़ी से जवाब दिया ' आप ज्यादा-से-ज्यादा पाँच साल के एम०एल०ए० हो और मैं परमानिट गवरमिंट ऑफ इंडिया हूँ । लाव आपन झोला दिखावा... । '

यह सुनकर वे क्रोध और मेरे अफसर घबराहट से भर गए । किसी ने आगे बढ्कर मुझे पीछे किया और हाथ जोड़ माफी माँगकर बात सँभाली ।

बाद में मेर अफसरों को ऊपर से और मुझे उनसे खूब झाड़ पड़ी । इसके साथ ही सब मुझे बातचीत भाषा और व्यवहार की सभ्यता सिखाने में जुट गए । उनकी सीखों का ही सुफल है कि मैंने नौकरी और जिंदगी दोनों के पाठ बखूबी पढ़ लिए ।

एक बात मैं अवश्य कहूँगा कि मेरे विभाग के सारे अधिकारी-कर्मचारी अपने काम के प्रति पूरे निष्ठावान हैं । उन्हीं के कारण मेरा देश सुचारु रूप से चल रहा है नेताओं के बूते नहीं । कहीं पड़ा था कि अपना काम ईमानदारी से करना देश की सबसे बड़ी सेवा है इस लिहाज से यहाँ के सारे अफसर भयानक रूप से देशभक्त हैं इसलिए काम से नहीं डरते । चाहे रात के बारह बजे घर पहुँचें या न पहुँचें । घरवाले खा-पीकर चैन की नींद सो जाते हैं । जानते हैं आज नहीं तो कल लौटेंगे घर ही ।

मेरे सभी अफसर मुझसे बहुत खुश रहते हैं । कभी कुछ लोग शिकायत भी करते हैं कि मैं बोलता बहुत हूँ । अब जो ज्यादा बोलेगा उसमें बड़बोलापन तो झलकेगा ही । लेकिन सब मेरे सटीक कामों की प्रशंसा भी कम नहीं करते । यहाँ आए-दिन होनेवाले प्रोटोकॉल में गाड़ी होटल से लेकर खिलाने-पिलाने घुमाने तक के कई इंतजाम करने पड़ते हैं । जो काम अफसर फोन पर नहीं कर पाते उन्हें मैं चुटकियों में दौड़कर बजा लाता हूँ । इसीलिए जब मेरे ज्यादा बोलने पर कोई मुझे घुड़कता है तो दूसरा फौरन वीटो पावर लगाकर कहता है, ' बोलता तो है लेकिन काम भी लाजवाब करता है । ' अब जिस प्रशंसा या निंदा में ' लेकिन ' लग जाए उसका प्रभाव अपने आप कम हो जाता है ।

इन दिनों हमारे विभाग के हाईकमान यानी वी०आई०पी० साहब अपने बच्चों और उनके भी बच्चों के काफिले को लेकर हमारे यहाँ आए हैं । तीनों पीढ़ियाँ एक साथ श्री बद्रीनाथ धाम का पुण्य लगी ।

वी०आई०पी० साहब की मेमसाहब और उनके बच्चे पहाड़ी रास्तों में बेदम से हो गए । नतीजा कि ऋषिकेश से जोशीमठ पहुँचते-पहुँचते सब अधमरे से अपने- अपने कमरों में निढाल पड़ गए, लेकिन बच्चों के बच्चे एकदम चुस्त दुरुस्त दिख रहे थे । बड़ों के होश में आने की प्रतीक्षा में वे ऊबने लगे । उनके घूमने की इच्छा भाँपकर मैंने अपने साहब के कान में पूछा ।

वे एकदम खुशी से बोले रामसिंह. .. यह तुमने पते की बात कही । जाओ उन्हें औली घुमा लाओ । बच्चे खुश तो उनके दादा भी पटे समझो । ' मैंने औली के लिए रोपवे के टिकट खरीदे और एक थैले में खाने-पीने की वस्तुएँ रखकर बच्चों को ले लिया । उनके लिए रोपवे का सफर बहुत रोमांचक और आह्‌लादकारी था इसीलिए वे रास्ते भर नीचे देख - देखकर विस्मय से चीखते रहे ।

वहाँ पहुँचते ही वे खुले मैदान में दौड़ने लगे । ऐसी सुंदर रमणीक जगह कौन चुप बैठ सकता है । मैं भी उनके साथ भागता उन्हें चुटकुले कहानियों सुनाता रहा ।

कुछ देर बाद मैंने उनसे पूछा ' साब लोग आपको भूख नहीं लगी?' ' लगी है अंकल...' वे एक साथ बोले ।

' तो आइए । ' मैंने फटाफट चादर बिछाकर बच्चों को बिठाया और थैले में से केक बिस्किट चिप्स चाकलेट आदि उनके सामने सजा दिए । क्या पता किसे क्या अच्छा लगे! मन में हुडुक सी हुई । गाँव अपने बच्चों को ऐसा कुछ नहीं भेज पाता और यहाँ .. । पैसे मेरे न सही देनेवाले हाथ तो मेरे हैं ।

वापस आते- आते शाम हो गई । रात मेहमान लोग पी खाकर सोने चले गए तब जाकर हमारे साहब बेचारे अपने मातहतों के साथ खाने की मेज पर बैठे । मैंने और जगपाल ने आनन-फानन में मेज हर तरह से सजा दी ।

साहब ने खुश होकर कहा ' रामसिंह तुम आदमी बड़े काम के हो । बच्चे अपने दादाजी से तुम्हारी बहुत प्रशंसा कर रहे थे । '

दूसरे साहब बोले ' हों भई रामसिंह तुम हर आदमी को पटाना जानते हो ' किससे किस अंदाज में बात करना है यह कोई तुमसे सीखे । '

' यह तो आप लोगों की मेहरबानी है साहब कि मुझे किसी लायक समझते हो । ' मैंने विनम्रता से जवाब दिया ।

' बस इसी तरह इन्हें पटाए रखो । साहब खुश होकर जाएगा तो सब ठीक ठाक चलेगा वरना कब किसकी गर्दन पर ट्रांसफर की छुरी गिर जाए कुछ पता नहीं । '

साहब लोग अपने कार्यक्रम में व्यस्त हो गए और हम दोनों बाहर बरामदे में अपने । कुछ समय बाद भीतर से आई पुकार सुनकर मैं आया तो साहब बोले ' अरे हां रामसिंह..तुमने पिछले महीने नैनीताल में जिन बहिनों का प्रोटोकॉल किया था उन्होंने तुम्हें याद किया है । '

' मुझे याद किया है उन नकचढ़ी भैसों ने... । ' कहकर मैंने जीभ काट ' हाँ भई...वे तुमसे बहुत खुश हैं और शायद इस वर्ष यहाँ बद्री दर्शन के लिए आएँ। ' आएँगी तो झेलना पड़ेगा ' मेंने सोचा । साहब लोग उसकी हसीन यादों में

डूब गए। क्या चीज थीं वे हसीनाएँ। भारी-भरकम, बेडौल, शक्ल न सूरत और नखरे ऐसे कि कोमल तन्वंगी हों । '

' होतीं ऐसी तो क्या होता?' एक ने पूछा ।

' तो वे अकेली न आतीं । कोई-न-कोई जवाँ मर्द उनके साथ आता । भला ऐसे रोमांटिक मौसम में कोई अकेला कैसे रह सकता है?' दूसरे ने जबाव दिया । साहब लोग मस्ती में डूबते - उतराते रहे और मेरे मुँह का स्वाद कसैला होता रहा । वे दोनों किसी छोटे कद के अफसर की बहिनें थीं अतः उनके लिए सरकारी गेस्ट हाउस पर्याप्त समझा गया । प्रोटोकॉल भी अकेले मैंने किया । अत: सब-कुछ झेलना भी मुझे ही पड़ा था । जगपाल साहब लोगों के साथ किसी वी०आई०पी. की अगवानी में व्यस्त था ।

कितनी नखरीली थीं वे । एक को चादर का रंग पसंद नहीं आया तो दूसरी को कंबल । एक को सोफा खराब लगा तो दूसरी को टॉयलेट । जैसे यहाँ घूमने नहीं गृहस्थी बसाने आई हों । जब ये ऊपरी चीजें उन्हें ठीक नहीं लगीं तो खाना क्या लगता । हद तो तब हुई जब वे नाश्ते में केसर वाले नमकीन चावल खाने की जिद में अड़ गईं ।

बैरे ने कह दिया ' मैम यह सरकारी गेस्ट हाउस है । आपसे पहले ही बोल दिया था यहाँ यही गिना-चुना मिलता है । ' मुझे अच्छा लगा, किसी ने तो मेरे मन की बात कही । मैंने भी उसका समर्थन किया ' मैम यह ठीक कह रहा है । यहाँ इससे ज्यादा नहीं मिलेगा । ये पराँठे एकदम ताजा और स्वादिष्ट होंगे । ' ' हूँ बैरे का चमचा... ' एक ने धीमे से कहकर जलती आँखों से मुझे देखा । दूसरी ने हिकारत से । जी में तो आया क्या कह दूँ पर चुप रहने की मजबूरी थी । फिर मैं पहले वाला रामसिंह तो था नहीं ।

नाश्ते के बाद उन्हें घुमाना मेरा दायित्व था । पैदल वे चल नहीं सकती थीं अत: देखभाल कर दो स्वस्थ खच्चरों का प्रबंध किया गया । यह बात अलग थी कि वे रास्ते- भर मरियल पशुओं और काहिल साईसों को आशीर्वचनों से भरती रहीं । तल्लीताल झील के किनारे पहुँचकर जब वे नौकारोहण के लिए चली गईं तब मैंने किनारे बैठकर चैन की साँस ली ।

इस प्रोटोकॉल को निबटे अभी एक सप्ताह ही बीता कि दूसरा आ गया । वे वी०आई०पी० भी दल-बल समेत आ धमके । लगता है पहले वाले मेहमानों ने हमारी मेजबानी की बहुत प्रशंसा की । ये बेचारे आते भी हैं पूरे काफिले के साथ । वैसे इसमें बुरा भी क्या है । जब देश का प्रथम नागरिक इस तरह के सत्कर्म कर

सकता है तो शेष बचे सभी आमोखास प्रथम के बाद ही आते हैं । फिर अलग अलग आने की अपेक्षा साथ आना देश के लिए हर तरह से अधिक किफायती है । तो जी इस वी०आई०पी. काफिले को भी बद्री-दर्शन की चाह थी । हम लोगों को पहले पहुँचकर होटलों की चाक-चौबंद व्यवस्था देखनी थी । देख भी ली पर हद तब हुई जब काफिला समय से पहुँचा ही नहीं । समय के साथ सबके मुँह सूखने लगे । तुरंत दो अफसरों के साथ मुझे नीचे भेजा गया । वहाँ नजारा ही दूसरा था । जोशीमठ से थोड़ा पहले काफिले की एक गाड़ी खराब हो गई थी । हम आते ही फायरिंग के शिकार हो गए । वी०आई०पी० साहब दिल्ली फोन करा चुके थे । उसी फोन पर हमें भी झाड पिलाई गई और आदेश हुआ कि शीघ्र हम एक नहीं दो टैक्सी मँगाएँ और ऊपर पहुँचे लाटसाहबों को नीचे बुलवाएँ ।

मैंने फोन पर गाड़ी मँगवाई और अपने साहबों को फोन कर नीचे आने के लिए कहा । यद्यपि तीन गाड़ियों की सवारियाँ दो में आसानी से शिफ्ट हो सकती थीं पर हमें याद रखना चाहिए कि कुछ प्रजातियाँ एडजस्ट करने के लिए नहीं बनी हैं ।

इधर खराब गाड़ी ठीक हो गई पर हममें से किसी की हिम्मत यह पूछने की नहीं हुई कि मँगाई गई दो गाड़ियों को मना कर दें । पूछे बिना ही दिल्ली से दोबारा फटकार आई कि गाड़ियाँ अवश्य मँगवाई जाएँ क्योंकि विश्वास न हमारे स्टाफ का है न हमारी गाड़ियों का और न पहाड़ी मार्गों का । अत: गाड़ियाँ खाली रहती हैं तो रहें । व्यर्थ का खर्च होता है तो हुआ करे । कौन कुछ अपनी जेब से जा रहा है । वाह क्या नजारा होगा! मैंने कल्पना में देखा । तीन गाड़ियों के साथ उनके पीछे-पीछे दो गाड़ियाँ और चलेंगी वे भी एकदम खाली ।

रात में बड़े साहबों के सो जाने के बाद हमारे साहब लोग दिन- भर के तनाव हटाने बैठे । आज का खर्चा चर्चा का मुख्य विषय था । इन बाहरी मेहमानों पर इतने जायज-नाजायज खचे करने पड़ते हैं कि कमर टूट जाती है । व्यर्थ इतने दिन फालतू गाड़ियाँ चलेंगी उसका कुछ नहीं ।

एक साहब ने आह भरी ' इन लोगों को हर जगह फाइव स्टार होटल और उसकी सुविधाएँ चाहिए । मंदिरों में भी जहाँ छोटे-बड़े सब समान हैं । '

बड़े साहब ने टीका ' क्या समान हैं वे मंदिर तक पहुँचेगे हमारे पैसे से हजार रुपए की स्पेशल थाली चढ़ाएंगे हमारे पैसों से और पुजारी बड़ी भक्ति से इन भक्तों को भगवान के दर्शन कराएगा हमारे पैसों से और हम सब-कुछ बाहर से झाँक-झोंक कर देखेंगे । '

सच... । कितना व्यर्थ खर्च करना पड़ता है इन बाहरी लोगों पर । जो पैसा पसीना बहाने से मिलता हो उसे पानी की तरह औरों पर बहाना पडे तो दर्द होगा ही । पता नहीं बाहरी मेहमान क्यों सोचते हैं कि पैस हमारे दफ्तर के पैड पौधों से झरते हैं ।

अभी हमारे साहब लोगों को यही चिंता खाए जा रही थी कि जाने उनकी कितनी भ्रमण-योजनाएँ बनेंगी । जाम टकराने के साथ यही भयावह कयास लगाए जा रहे थे । मुझे मुक्ति का एक उपाय सूझा ' साहब आप अगर इजाजत दें तो मैं इन सबके भोजन में जमालगोंटा मिला दूँ । दस्त लगेंगे तो कह देंगे कि पहाड़ का पानी आप पचा नहीं पाए । '

इस पर सबकी हँसी छूट गई । सब कहने लगे उपाय तो अच्छा है । साँप भी मर जाएगा और लाठी भी बेदाग बच जाएगी ।

मैं उत्साहित होकर बोला ' सोचिये तो साहब...! कितना. अच्छा दृश्य होगा । सारे साहब-साहिबान पेट पकड़कर लेट्रिन की ओर भागेंगे और इंतजार में लगे कच्छों से जमीन पर टपकाते रहेंगे । सारी साहबी निकल जाएगी । '

' छि : रामसिंह तुम बहुत बोलते हो । '

सब कहते रहे और हँस-हँस कर दोहरे होते रहे ।

हँसते-हँसते वे एकाएक गंभीर हो गए । उदासी से कहने लगे कि उनके हाथों घर की कितनी उपेक्षा होती है । चार पैसे ऊपर से मिलते नहीं कि दो इसी में स्वाहा । जीवन के कितने सुनहरे पल इन अफसरों को दे रहे हैं । रिटायर होने के बाद अहसास होगा कि हम जिंदगी जिये ही कहाँ..!

यह सच है कि हमारे यहाँ काम में सब चुस्त हैं । बाहरी लोग भले हम पर कितने तरह के आरोप लगाएँ किंतु वे हमारे काम और खर्च देखें तो पता चले । दूर समीप के प्रोटोकॉल से लेकर गिफ्ट्स देने मनचाही जगह जमने या जमे रहने में किस-किस आकार-प्रकार के पापड़ बेलने पड़ते हैं यह भुक्तभोगी ही जानता है । याद आया इस दफ्तर के इतिहास में एक खस अफसर ऐसा भी आया था जिसे सिर्फ काम से मतलब था दाम से नहीं । दाम का नाम सुनते ही वे मरखने साँड से भड़कते थे । उनके अधीनस्थ पीठ-पीछे कोसते पर सामने पड़ने पर सामना नहीं कर पाते थे । जाने साली सच्चाई में इतनी चमक क्यों होती है कि आँखें चुंधिया जाती हैं यह जानते हुए भी कि यह चमक एकदम बोगस है ।

खैर उस ईमानदार अफसर का वही हश्र हुआ जो सदा से होता आया है । अतिशीघ्र तबादला । उसमें मेरी तरह सीखने की कूवत होती तो आज कहाँ पहुँच जाता । मेरा विश्वास पक्का हो गया है कि मैं देशभक्त परमानेंट गवर्नमैंट ऑफ इंडिया हूँ। मैं या मेरे जैसे । मेरा पुराना विचार थोड़ा बदल गया है । अब मैं पाँच क्या बल्कि साल दो साल के लिए बनने वाले एम०एल. ए० मंत्री संतरी आदि सभी को परमानेंट गवर्नमेंट ऑफ इंडिया मानता हूँ क्योंकि वे बेचारे थोड़े समय में ही अपने प्यारे देश की भरपूर सेवा कर लेते हैं ।

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चुनिंदा व्यंग्य - व्यंग्य संग्रह - आशा रावत, संकलन - डॉ. रमेश तिवारी, गीतिका प्रकाशन  से साभार.

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रचनाकार: हास्य-व्यंग्य // परमानेंट गवरमिंट ऑफ इंडिया // आशा रावत
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