शबनम शर्मा की कविताएँ

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सोने की चिड़िया सोने की चिड़िया कहलाने वाला, ऋषियों का देश बतलाने वाला, यह भारत देश क्या से क्या हो गया, सोना मिट्टी बनता चला गया, और ऋषि...

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सोने की चिड़िया


सोने की चिड़िया कहलाने वाला,
ऋषियों का देश बतलाने वाला,
यह भारत देश क्या से क्या हो गया,
सोना मिट्टी बनता चला गया,
और ऋषि चंबल में जाते चले गये।


     संस्कृति जो संसार का मुकुट
     कहलाती थी,
     सौम्य, सभ्य और सिमटी सी थी,
     आज कितनी छिछली, घिनौनी
     बनती जा रही है।
     देश की नारी, पुरुषों से लगाई
     दौड़ में, अपना पूजनीय स्थान
     खोती जा रही है।


जी चाहता है, मेरी बात
कोई समझे,
कि इस धरा पर सिर्फ
मानव जन्म लेता है,
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई नहीं।
फसादों में खुद को फंसा के
कितना खुश होता है ये आदमी
और सोचता ही नहीं, कि हर किसी
शर्त पर, सिर्फ आदमी को खोता है आदमी।


     छोड़ पराये चक्करों को
     असलियत पर आना होगा
     अमन, शांति और अहिंसा अपनाकर
     भारत को फिर से सोने की चिड़िया बनाना होगा।


इक माँ का दूजी माँ को पैगाम


आंसुओं में डूबी इक माँ ने,
दूजी माँ के पास ये पैगाम
भेजा है, कि उसने अपने दिल
के टुकड़ों को, माँ की रक्षा
के लिये सरहदों पर भेजा है,
उसकी अपनी जिन्दगी, अब
श्मशान से कम नहीं,
रात-दिन उसे इक अजीब
सा अंदेशा रहता है।


     पाला-पोसा, कूट-कूट कर
     भरी वीरता उसमें,
     मैंने अपने लाल को, मौसी
     के घर भेजा है,
     रक्षा तेरी वो कर सके,
     उसे भरपूर शक्ति देना,
     दुश्मनों के छक्के छुड़ा दे,
     उसे वो साहस देना।
     पर इक गुज़ारिश है मेरी
     तुझ से ये धरती माँ,
     हो सके तो लाल मेरा
     मुझको तू लौटा देना।



मेरा हिमाचल


धरती पर जन्नत है
आसमान जिसका निर्मल है
मदमस्त हवा, निर्मल जल
अपने आगोश में लिये,
सीधे-सादे पेड़ जहाँ बातें करें
उस अम्बर से
कहें, बता हमें राज़ अपना,
क्यूँ नीला दिखता सिर्फ यहाँ,
बोलते पर्वत, छनकती नदियाँ,
स्वर्ग की अपसराओं का सा
कसमकसाता यौवन,
भोली-भाली, सतयुगी सूरतें,
ईमानदारी से भरे दिल,
कहते हैं हमारी पुरानी सभ्यता को,
आ आँगन में हमसे मिल।
छल, फरेब, घोटालों से परे,
उल्टे कानून जहाँ रह जायें
धरे के धरे,
ये देवों की भूमि, ये मणिकों
की धरा, जिसे शत-शत प्रणाम
करता हर शीश नरा
इसके यौवन में चंदन की खुशबू आये,
है कौन जिसे मेरा हिमाचल न भाये,
इन सर्पीली सड़कों के, तो मदमस्त नज़ारे,
इन्द्र भी करे, यहाँ स्वर्ग से इशारे।
गर्व से कहो, हम हिमाचली हैं
ठाठ से कहो, हम हिमाचली हैं
कुछ ऐसा करो कि हिमाचल ही नहीं
पूरा देश हम पर गर्व कर उठे, सभी कहें हमें,
ये निश्चल, पवित्र, ये देवों की भूमि हिमाचल।


सुनो वतन के ठेकेदारों


ऐ वतन के ठेकेदारों, सुनो
धरती बेवक्त काँप उठती,
चूड़ियों का रंग फीका दिखता,
हर आँख खौफ़ से भर जाती,
हर गली से खंजर निकलता होता,
हर मकान हिल जाता,
किलकारियाँ, सिसकियों में बदल जाती,
धुंआ माहौल में घुल जाता,
बूढ़ी आँखें न जाने किस खौफ से,
टिकटिकी बाँध लेती,
कोई लम्हा भी आज़ाद न होता,
ग़र तुम सरहद पर न जाते।


     जान हथेली पर रखकर जाने वालो,
     आज कामयाबी का सेहरा बाँध आने वालो,
     आज हम गर्व से फूले नहीं समा रहे हैं,
     तुम्हारे आगमन में आँखें बिछा रहे हैं,
     खुशी अपनी तुम्हें दिखा सकते नहीं,
     शब्द तारीफ़ के गुनगुना सकते नहीं,
     तुम ही हमारे भारत की तकदीर हो,
     टूटे जो न कभी वहीं प्यारी तस्वीर हो,
     चूम लें तुम्हारे कदमों तले की मिट्टी को,
     लगा माथे पे चंदन बना दें उस मिट्टी को,
     आज तुम्हारे आने से धन्य ये धरा हो गई,
     मन भी पुलकित हो गये, शाम सुनहरी हो गई।


गीत


हम हैं बच्चे भारत माँ के - 2,
जय हिन्द हमारा नारा है,
बुरी नज़र हम पर मत डालो,
जय हिन्द हमारा नारा है।
     अमन, शांति और अंहिसा,
     यही तो हमको प्यारा है,
     बुरी नज़र हम पर मत डालो,
     जय हिन्द हमारा नारा है।
     हम हैं बच्चे..................


जो कोई भी हमको छेड़ेगा,
सोच लो सब कुछ हारा है
बुरी नज़र हम पर मत डालो,
जय हिन्द हमारा नारा है।
हम हैं बच्चे..................


     वक्त पड़ने पर शीश भी हमने
     इस पर कई बार वारा है
     बुरी नज़र हम पर मत डालो,
     जय हिन्द हमारा नारा है।   
     हम हैं बच्चे..................


सहस्त्र वीरों का बल हम रखें,
असंख्य दुश्मन ललकारा है,
खुद जिओ औरों को भी जीने दो,
यही संकल्प हमारा है,
बुरी नज़र हम पर मत डालो,
जय हिन्द हमारा नारा है।


मेरी जिन्दगी के वो निश्चल पल


मेरी जिन्दगी के वो निश्चल पल
जो तेरी आगोश में निकले,
कुछ सहमे-सहमे, कुछ बिखरे-बिखरे,
उनको समेटकर तुम अपने दिल में,
चल दिये यूँ दावतें प्यार की बांटते
मुझे कि फिर कब आयेंगे, मेरी
जिन्दगी के वो निश्चल पल।


     समय गुहार करता, मनौतियाँ माँगता,
     समय से कुछ कह रहा,
     कुछ लब हिले, कुछ चक्षु मिले,
     पूछते हैं कि कब आयेंगे वो
     मेरी जिन्दगी के निश्चल पल।


रात-दिन लम्बी चादर लिये,
द्रोपदी के चीरहरण की तरह,
लम्बे दर लम्बे होते चले गये,
तेरी याद में काटे नहीं कटते,
क्षण-क्षण मेरे दिल से पूछते
हैं कि कब आयेंगे मेरी
जिन्दगी के वो निश्चल पल।


पीपल का पेड़


सदियों पुराना, दादाओं का दादा,
गाँव के उस छोर पर खड़ा
पीपल का पेड़,
दिन बीते, माह बीते, बरस बीते,
दशक बीते, सदियाँ बीत गई,
इंसान पुश्त दर पुश्त गया,
पर, एक टाँग पर खड़ा,
देखता रहा बदलते युगों को,
ये पीपल का पेड़।


दुनियाँ क्या से क्या हो गई,
राजाओं के महल ढह गये,
पुरानी संस्कृति विलुप्त हो गई,
नई सभ्यता ने जन्म लिया, पर
सबको ताकता रहा पीपल का पेड़।
सदियों तक पूज्य रहा, सभ्य रहा, बना रहा,
आभूषण ये पीपल का पेड़।


आज यह पूज्य नहीं, सभ्य नहीं,
चुपचाप काटा जाता है इसे
वह भी लोगों की तरह अंधा, बहरा,
गूंगा बन जाता है।
देखता है सिर्फ उसके आँसू
ये गगन, ये हवा और देते हैं
आवाज़, चुप हो जा, समझौता
कर ले। सह लेता है असंख्य वज्र
मूक खड़ा ये पीपल का पेड़।

मेरा जीवन


मेरा जीवन सरिता के वेग सा
बहता चला गया,
पत्थरों पर सैकड़ों प्रहार जैसे
सहता चला गया,
मूक बन गया वह पहाड़
उस वन के तरू भी
मुँह मोड़ गये, जब यह
ज़माना हम पर बेबाक
जुल्म करता चला गया
मेरा जीवन.......


पानी की तरह निर्मल मन,
कुछ कहने को आतुर होता,
अंगारों के आगोश में, यह
तपन, गरमाहट व दर्द
सहता चला गया
मेरा जीवन........


पता मुझे न चला
कब सर्द हवा हमसे
मुख मोड़ गई
वर्षा की बूंदों में मेरा
हर दर्द आँसू धोता चला गया
मेरा जीवन......


इन्तज़ार रहा उन लम्हों का,
जो सुला दें, रूलायें नहीं,
मन ही मन हृदय मेरा
कुछ ऐसी अकुलाहट सहता
चला गया......
मेरा जीवन........


पैबंद


तेरे नाम का जो पैबंद
मेरी जिंदगी पर लग गया
तेरे नाम से सब पुकारने लगे
मेरा नाम पीछे लग गया......


जर्रा-जर्रा, कतरा-कतरा
दुश्मन मेरा हो गया
जब सिलसिला इस बात का
और तेज़ होता गया तेरे नाम......


वो खुशबू बिखेरता,
तेरा मरमरी सा हाथ,
वो तेरी भिनी-भिनी खुशबू,
स्वर्ग का सा साथ,
हर हवा का झोंका, मुझसे,
कुछ-कुछ कह गया तेरे नाम.....


मिलना तो दूर था, बस
देखना ही दूभर हो गया,
फिर रात का वो कपटी पल,
मुझसे सब कुछ कह गया तेरे नाम.....


ये अबोध प्यारे से बालक


इक दिन सामान बाँध रही थी मैं
कि मेरी छोटी सी नन्हीं बालिका
ने मुझे अपने नन्हें हाथों से
पकड़कर कहा, ‘‘माँ मुझे भी
साथ ले चलो’’


उसे प्यार से टालते मैंने कुछ
लालच भरे शब्द कहे,
‘‘मैं वो लाऊँगी, ये लाऊँगी’’
पर वो न मानी।


क्षणभर सोचकर कहने लगी,
‘‘माँ! बर्फ का छोटा सा पहाड़
ला देना, मैं तुम्हारे साथ नहीं
जाती।’’


सुनकर अनायास ही मन
भर आया, कितनी दूर हैं
ये बालक, इस लालची,
स्वार्थी संसार से अभी।


लड़की जब सोलह साल की हुई


आईना शरमाने लगा,
यौवन बल खाने लगा,
लड़की जब सोलह साल की हुई।
     बाबुल के जूते सरकने लगे,
     मैया के सपने चटकने लगे,
     लड़की जब सोलह साल की हुई।


आँगन में बारात के सपने
सजने लगे,
अंदर रखे, देग, पतीले, पारात
मंजने लगे
लड़की जब सोलह साल की हुई।


     माँ के अन्दर अकुलाहट सी हुई,
     दर्द ऐसा कि आहट न हुई,
     लड़की जब सोलह साल की हुई।
बैठने, फिरने, बतियाने पर पाबंदियाँ
लगने लगीं,
ऐरों-गैरों की बातें सबको
खलने लगी
लड़की जब.....


अल्हड़ता हँसने लगी, बाबुल खिसयाने लगा
रोक हँसी पर लगी, ज़माना बतियाने लगा,
लड़की जब सोलह साल की हुई।

---

शबनम शर्मा

  माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर, हि.प्र.     

नाम

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नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया 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फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर 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रचनाकार: शबनम शर्मा की कविताएँ
शबनम शर्मा की कविताएँ
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