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लघुकथाएँ : कृष्ण मनु // प्राची - दिसंबर 2017 : लघुकथा विशेषांक

कृष्ण मनु

जन्म : 04 जून, 1953

प्रकाशन : विभिन्न पुस्तकें प्रकाशित, सम्प्रति : सेवा निवृत अभियंता, स्वतंत्र लेखन

संपर्कः ‘शिव धाम’, कतरास रोड, बीहाइड पोद्दार हार्डवेयर, ऑटो स्टोर नियर, मटकुरिया, धनबाद (झारखंड)


कृष्ण मनु

सार्थक सोच

पिछले चार दिनों से वह इस टापू में पड़ा था। हां, इस जगह को वह टापू ही कहेगा। जहां के रहवासियों के बोल चाल, रहन सहन, बात विचार उसकी संस्कृति से बिल्कुल भिन्न हों वो उसके लिए टापू ही तो है। वह अजनबी बना फिरता है। न किसी से बात न उससे कोई बतियाने वाला।

पौ फटने के पहले वह दूर तक चली गई लम्बी सपाट सड़क पर टहल कर चला आता है। फिर अकेला किताबों में खो जाता है। मन थका तो सो जाता है। सोये नहीं तो क्या करे। पोते पोती स्कूल चले जाते हैं । बहू बेटा अपने अपने काम पर।

एक दिन सवेरे टहलने के क्रम में अपने सरीखा आदमी दिखा तो खुद को रोक न सका, खड़ा हो गया। उसके हाथ में एक बड़े से डॉग के गले में बंधा पट्टे का डोर था। वह उस डरावने डॉॅग को अपनी ओर खींचने का प्रयास कर रहा था। एक क्षण लगाया सोचने में कि मुझे डरावने कुत्ते के साथ उस आदमी से बात करनी चहिए या नहीं और दूसरे ही पल मैं उसके और समीप चला आया। मैं उसे सम्बोधित करनेवाला था कि उसकी नजर मेरी तरफ उठ गई। वह भी पारखी निकला। उसकी नजर की मिठास चुगली कर गई। समझ गया कि यह शख्स भी अपने बीचवाला है। मेरे कुछ कहने के पहले उसने सलीके से नमस्कार कहते हुए बोला-शायद आप नये नये आये हैं साहब। मैं दो तीन दिनों से आप को देख रहा हूं। बात करने का मन करता था मेरा लेकिन शायद आप बुरा मान जायेंगे इसलिए टोक-टाक नहीं किया।

फिर तो हमारे बीच बातचीत का सिलसिला चल निकला।

बात बात में उसने बताया कि वह दसवीं तक पढ़ा है। घर पर बेकार बैठा था। उसके चाचा जो यहां सेक्युरिटी गार्ड हैं, एक दिन साथ लेते आए और एक धानी परिवार में उनके कुत्ते की देखभाल करने के लिए रखवा दिया। तब से वह यहीं है। परिवार घर पर है। साल में एक बार गांव जाता है।

जब मैंने उससे पूछा कि क्या वह इस काम से संतुष्ट है? कैसे कह पाता है वह गांव जेवार में कि वह कुत्ते की देखभाल करता है?उसे शर्म नहीं आती.

उसके जवाब ने मुझे तब लाजवाब कर दिया था,सोचता हूं तो आज भी लाजवाब कर देता है।

उसने चेहरे पर निश्छल मुस्कान लाते हुए कहा था- शर्म काहे का साहब, इसमें बुराई क्या है। चाकरी करके पेट तो पालना ही था। धूर्त, बेईमान आदमी की चाकरी से तो बेहतर यह स्वामी भद्र, निरपराध, सीधो-सादे जानवर की चाकरी है। फिर दोहरा लाभ भी तो है। सवेरे का घूमना टहलना भी हो जाता है, स्वास्थ्य बना रहता है और पैसे भी मिल जाते हैं ।

उस रात मैं उसकी संतुष्टि और सार्थक बातों के बारे में देर तक सोचता रहा। वह रोना धाोना भी तो कर सकता था कि कम पैसे मिलते हैं, कुत्ते के पीछे भागना पड़ता है, पढ़ेलिखे को यह निकृष्ट काम शोभा नहीं देता पर क्या करूं साहब, किस्मत में यही लिखा है।.. आदि आदि। जैसा कि अक्सर लोग कहा करते हैं।

सार्थक सोच संतुष्ट जीवन के लिए कितना जरूरी है! एक अदना सा आदमी मुझे सिखा दिया।

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