क्षितिज पर उजाला हुआ // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी

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क्षितिज पर उजाला हुआ पिताजी के समीप जाते धीरे से कहा, ‘‘पिताजी।’’ उसने कागज पर से नजरें उठाकर मेरी ओर देखा। मैं उलझ गया कि क्या कहूं। हिचकते...

क्षितिज पर उजाला हुआ

पिताजी के समीप जाते धीरे से कहा, ‘‘पिताजी।’’

उसने कागज पर से नजरें उठाकर मेरी ओर देखा।

मैं उलझ गया कि क्या कहूं। हिचकते कहा, ‘‘मैं आपसे इजाजत लेने आया हूं।’’

उसने चकित होते कहा, ‘‘किस बात की इजाजत?’’

मैंने कहा, ‘‘मैं कायर कहलवाना नहीं चाहता। मेरी उम्र के साथी देश का भाग्य बदलने के लिए अपने देश के लिए जान देने के लिए अपनी जिंदगी अर्पित कर चुके हैं। ऐसे वक्त में मैं कैसे घर में छुपकर बैठ जाऊं!’’

‘‘फिर तुम क्या करना चाहते हो?’’

मेरी पूरी हिचकिचाहट समाप्त हो चुकी थी। ‘‘मैं भी अपनी जान अपने देश के लिए कुर्बान करना चाहता हूं।’’

‘‘तुम!’’ उसने हंसी रोक दी, लेकिन होंठों पर मुस्कान अभी भी फैली हुई थी। ‘‘पहले तुम अपना शरीर और ताकत देख, उसके बाद ऐसी बातें कर! मैं जानता हूं तुम नौजवानों में केवल थोड़े वक्त का जोश है। उम्र और वक्त के साथ यह जोश खत्म हो जाता है। हकीकत में हमारे देश से लड़ने की हिम्मत खत्म हो चुकी है। सदियों की गुलामी और डाकुओं की लूटमार ने हमारी हिम्मत को कीड़ा बनकर चूस लिया है। बाकी आप जैसे जोशीले नौजवान तो हर युग में पैदा होते रहे हैं और इन्होंने कौन-सा तीर मारा है! अपने देश का भाग्य बदलने के लिए गर्दनों की कुर्बानियां देनी पड़ती हैं, मुझे ऐसे नौजवान नजर नहीं आ रहे। जब तक हमारे नौजवानों में हिम्मत और जागृति उत्पन्न नहीं होती, उनके दिल देश की मोहब्बत में तपकर सोना नहीं बनी हैं, तब तक कुछ नहीं होगा, बेटे... कुछ नहीं होगा...’’ उसका स्वर धीमा होता गया, चेहरे पर मायूसी की रेखाएं उभर आईं।

मैंने कहा, ‘‘पिताजी, अगर हमारे देश के पिता आप जैसे होंगे, तो फिर उनकी संतानें क्यों नहीं देश के लिए कुर्बान होंगी! मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि जो जागृति आज के नौजवानों में उत्पन्न हुई है, वह पहले कभी नहीं थी। हमारा जोश केवल क्षण भर का जोश नहीं है। हम केवल अपने देश के लिए जीने का प्रण कर चुके हैं...’’

उसकी आंखों में चमक आ गई, ‘‘हां, यह एक नाजुक दौर है, अगर हम अभी जागृत नहीं हुए तो फिर कभी उठ नहीं पाएंगे। हो सकता है कि आप सभी अपनी कुर्बानी देकर देश में जागृति ला दें। लेकिन यह बात माननी पड़ेगी कि हम बहुत ही पीछे रह गये हैं। शिक्षा और विवेक की बहुत ही कमी है, इसलिए देश की इज्जत और गैरत में कमी है। इसके लिए आपको बहुत कुछ करना पड़ेगा।’’

मैंने कहा, ‘‘हम सब कुछ करेंगे। अगर हमें जिंदा रहना है तो इसके लिए हमें हर कुर्बानी देनी पड़ेगी। हम अपने ही देश में पराये होते जा रहे हैं, आखिर हम बेमौत मर जायेंगे, भूतकाल बन जाएंगे। यह कौन समझेगा! हम कमजोर ही सही, लेकिन हमारे दिल कितने बड़े हैं, इसकी परायों को क्या खबर!’’

पिताजी गंभीर हो गए, कहा, ‘‘बिल्कुल, दिलों के उफान के आगे कोई भी बांध आज तक बंध नहीं पाया है। कैद की जंजीरों को आखिर टूटना ही है। काश आपका रक्त इस गरीब सताये हुए देश की पृथ्वी को सींचे, यह फूल पौधे उगाए जिसकी खुशबू पूरी दुनिया में फैल जाए। मैं तुम्हें रोककर एक बुजदिल बाप कहलवाना नहीं चाहता। लेकिन देख, अपनी माँ के बारे में जो कुछ सोचो, हमदर्दी से सोचना। देश के लिए संतान की कुर्बानी देने में मांएं ज्यादा बहादुर होती हैं, लेकिन वक्त और हालातों ने मांओं को यह सबक दिया ही नहीं है। उन्हें अपनी संतान से हद से ज्यादा प्यार होता है, इसलिए तुम्हारी माँ शायद तुम्हें जाने न दे।’’

‘‘मैं माँ को मनाऊंगा।’’

किसी बड़ी उलझन और विचार के कारण माँ का चेहरा उतरा हुआ था। मैं समझ गया। मैंने करीब जाकर उसे गले लगाते कहा, ‘‘माँ...’’

उसके सूखे होंठ हिलने लगे। उसने मुझे गले से लगा लिया। माँ के सीने से लगकर मेरी आत्मा एक जबरदस्त आत्मिक शांति से भर गई। उस वक्त मुझे ऐसा लगा जैसे मैं अभी तक दूध पीता बच्चा हूं और माँ के सीने से लगकर सब कुछ भूल चुका था।

मुझे महसूस हुआ कि माँ रो रही थी। शायद उसने पिताजी और मेरी बातें सुन ली थीं।

‘‘मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगी। मेरा हाल देख रहे हो, मैं पहले ही मर चुकी हूं। अगर तुम्हें जाना है तो मुझे पूरी तरह से मार दे फिर जा।’’

बेचारी माँ! पता नहीं क्यों हमारी गरीब मांएं इतनी दुखी होती हैं। उनकी पूरी जिंदगी आर्थिक परेशानियों, संतान के भविष्य की फिक्र और घर के कभी न खत्म होने वाले काम में गुजर जाती है। ज्यादा दुःख सहन करने के कारण ही वे हद से ज्यादा भावुक होती हैं। प्यार तो उनकी मिट्टी और आत्मा में समाया रहता है, क्योंकि हम सभी की धरती-माँ के कण कण में अनंत प्यार समाया हुआ है।

मैंने कहा, ‘‘माँ, सिंध हम सब की माँ है, और वह संतान कमीनी है जो माँ को तकलीफों में देखकर भी मुंह छुपाकर बैठी हो। ऐसी संतान बे गैरत है जो अपने माँ के दूध की लाज नहीं रखता। माँ, हमसे हमारे सभी अधिकार छीन लिए गए हैं। हमारी माँ को जेल में कैद करके रखा गया है और हम सभी नींद में जाकर अनजान बन गए हैं।’’

उसने कहा, ‘‘बेटे, काश भगवान बच्चों को कोई कठिन दिन न दिखाए, काश मंडली सुरक्षित हो, बाकी छोटे मोटे सुखों दुःखों से हमारी जिंदगी कट जाएगी, भगवान का शुक्र है।’’

‘‘माँ, तुम्हारे बच्चों के मुंह से निवाला छीन लिया जाए, उनकी जबान काटकर फेंक दी जाए, तब भी तुम ऐसा ही कहोगी! तुम समझती क्यों नहीं, कि हमारे ऊपर क्या बीत रही है।’’

माँ ने गुस्से से कहा, ‘‘तुम पढ़े लिखों की बातें हम गंवार कहां समझ पाते हैं।’’

माँ ने जैसे मुझे जोर से तमाचा मार दिया। उन्हें अनपढ़ और गंवार बनाकर रखने में किसका दोष है? कितना भाग्यहीन है वह देश जिसकी मांएं अनपढ़ हैं।

मैंने उसे गले लगाते कहा, ‘‘माँ तुम्हें पता है कि हमारे देश पर हमेशा पराये देशों का कब्जा रहा है, जो हमें लूटते खसोटते आए हैं। शायद हमें भी इस गुलामी की आदत पड़ गई है, नहीं तो इतने वक्त तक अपने देश को गुलामी में कैसे रहने देते। माँ, मुझे जितना तुमसे प्यार है, उतना ही अपने देश से है। जिस देश में पला बड़ा हुआ हूं, जिस धरती का मैंने दूध पिया है, वह भी तो मेरी माँ है। क्या उसका मेरे ऊपर कोई अधिकार नहीं है?’’

‘‘बेटे, हमारा भाग्य ही ऐसा है तो हम क्या करें?’’

‘‘नहीं माँ, भाग्य भी हिम्मत से बदल जाता है। ताकत और जोर जबरदस्ती से दुनिया के कई देशों को गुलाम बनाकर उनके अधिकारों पर डाका डाला गया, लेकिन उन देशों के वीरों ने अपनी जान की कुर्बानी देकर आजादी प्राप्त की।’’

माँ ने तंग होकर कहा, ‘‘मेरा इन बातों से कोई संबंध नहीं है। मेरी खुशी, मेरी आँखें तुम बच्चे हो, आपके बिना मैं अंधी हूं, इससे ज्यादा मुझे और कुछ पता नहीं।’’ उसकर आँखें फिर से भर आईं।

मैं और कुछ न कह सका। मैं जानता था कि माँ का कोई दोष नहीं। पूरा दोष उस वक्त और हालात का है, जब औरतों को घर के काम काज की मशीन बनाकर रख दिया गया था। वे अंधी रस्में, रिवाज और विवेक जिन्हें हमारे देश का विशेष गुण समझा जाता है; उसने हम पर कितना सितम किया है। जिन मांओं को शिक्षा व विवेक से बहुत दूर अशिक्षा के अनंत अंधेरे में बंद करके रखा गया है, वे अपनी संतान को कौन-सी शिक्षा, कौन-सा सबक देंगी! मैंने चाहा कि चीखकर कहूं, ‘‘माँ, हमारे देश का भाग्य आपके दूध और आपकी लोली में है। अगर तुमने अपना दूध कायर संतान पर नहीं गंवाई और अपनी संतानों को ऐसी लोली नहीं दी जिसमें शेर की गर्जना हो तो हम दूसरा ‘मोहन का दड़ा’ (मरे हुओं का ढेर) बन जाएंगे। हमें जीने मरने का सबक दो माँ...’’ लेकिन मेरे आगे अनंत और गहरा अंधेरा छा गया, जिसमें दूर दूर तक जहां तक नजर जा रही थी वहां तक रोशनी की एक मामूली किरण भी नजर नहीं आ रही थी। तभी मुझे महसूस हुआ कि मैं मर चुका हूं। हम सब मर चुके हैं, खंडहर बन गए हैं। वक्त के साथ बदले लोग नफरत और व्यंग्यात्मक नजरों से हमें देखकर एकदम से मुंह घुमा लेते हैं। मेरे मन में अपने देश की ये पुरानी सभ्यताएं घूमने लगीं जो अपने वक्त में काफी सुधरी हुई थीं, लेकिन आज वक्त ने उन्हें कई सौ सदियां पीछे ढकेल दिया है। मोहन के शहर की सुधरी हुई सभ्यता ने आज मोहन के दड़े समान खंडहर बन चुकी है। क्या हम भी... क्या हम भी...

मेरे चारों ओर अंधेरा और अशिक्षा का देव पंख फैलाकर खड़ा हो गया और उसके डर से उम्मीद का पक्षी तड़प तड़पकर सांस छोड़ने लगा। पता नहीं कब मैं माँ के यहां से उठकर अंदर कमरे में आकर बैठ गया था। कुछ खटखटाने की आवाज पर जागकर देखा तो मेरी छोटी बहन दरवाजे पर खड़ी थी। उसे देखकर चाहा, जोर से कहूं, ‘‘अब तुम आई हो, रोने धोने! यह आँसुओं की जंजीरें हमारी सभ्यता को मुर्दा बना देंगी। अब मुझमें ज्यादा आँसू देखने की ताकत नहीं है।’’ लेकिन इससे पहले कि मैं कुछ कहूं, वह अंदर चली आई। अंदर आकर थर्राती आवाज में कहा, ‘‘मैंने समझा था कि मेरा भाई दोदा (नाम) है, लेकिन आज पता चला कि तुम चिनेसर (नाम) हो, भाई।’’

मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं, चीखकर कहा, ‘‘बाघी!’’

भावुकता में उसका गला भर आया। नजरें नीचे करके कहा, ‘‘मुझे माफ करना भाई, पता नहीं मैं तुम्हें क्या कह गई। लेकिन मैंने तुम्हें पता नहीं क्या समझा था। मुझे पता नहीं था कि तुम्हारी दिल भी इतनी कमजोर है, कि माँ के आँसूं देखकर हिम्मत हार बैठोगे।’’

तभी खुशी से उठकर उसे गले लगाकर कहा, ‘‘मेरी छोटी गुड़िया बहन! मुझे इससे भी ज्यादा सख्त शब्द कह। तेरे इन शब्दों से तेरे भाईयों का रक्त खौल उठेगा, आफरीन मेरी बहन!’’

उस पल मुझे अहसास हुआ कि मेरी उम्मीद का पक्षी पंख फड़फड़ाकर उठ खड़ा हुआ है। अंधेरे का देव किसी जबरदस्त ताकत से डरकर भागने लगा था।

मैंने कहा, ‘‘बाघी, मुझे एक बात बता, अगर तुम्हारा भाई देश के लिए कुर्बान हो जाए तो तुम खुश होओगी न!’’

उसने जोश से कहा, ‘‘बेशक भाई, लाख बार खुश होऊंगी। देश के आगे बेटों और भाईयों के जान की कीमत कुछ नहीं है। मुझे चिनेसर जैसे पुत्रों और भाईयों से नफरत है, भाई।’’

‘‘मेरी बाघी बहन, विश्वास कर, तेरा भाई दोदो (नाम) साबित होगा।’’

उस वक्त मेरे मन में ऐसी लाखों बाघियां और कल की मांएं थीं, जो अपने दादों जैसे पुत्रों को मुस्कराते मौत का पाठ पढ़ा रही थीं और कहीं दूर क्षितिज पर उजाला होने लगा।

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रचनाकार: क्षितिज पर उजाला हुआ // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी
क्षितिज पर उजाला हुआ // सिंधी कहानी // शौकत हुसैन शोरो // अनुवाद - डॉ. संध्या चंदर कुंदनानी
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