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रंग हैं तो रंगरेज़ भी हैं और रंगरेजों का काम रंगना है। रंगने के इस कार्य को आप रंगदारी भी कह सकते हैं। लेकिन रंगदारी सिर्फ रंगने का कार्य ही नहीं है। रंगदारी रोब और धाक भी है जिसके चलते गुंडे लोग जबरन वसूली कर लेते हैं। गुंडों द्वारा लिया जाने वाला पैसा रंगदारी है और इस प्रकार से दिया गया धन भी रंगदारी ही कहलाता है। रंगदारी कोई अपने आप नहीं देता। मांगी जाती है और रंगदारी मांगना एक अपराध है। हम प्राय: रंगदारी के किस्से अखबारों में पढ़ते ही रहते हैं। अपना रंग जमाकर, डरा-धमाका कर, गुंडे रंगदारी वसूलते हैं। पकड़े जाने पर हवालात की सज़ा भी खा आते हैं। पर रंगदारी से बाज़ नहीं आते।

गुंडे रंगदारी करते हैं, चलो ठीक है। पर अब तो रंग भी रंगदारी करने लगे हैं। कोई न कोई रंग किसी न किसी जगह पर अपना कब्ज़ा जमाए बैठा है। राजनीति के खेल में रंगों को मज़ा आने लगा है। राजनीति रंगीन हो उठी है। राष्ट्रीय जनता दल पर हरे रंग ने कब्ज़ा कर लिया है। लाल रंग समाजवादी पार्टी पर हावी है। नीले रंग ने बसपा को रंग डाला है और भाजपा पर भगवा रंग चढ़ा हुआ है। जब जिस पार्टी का राज होता है बस उसका अपना रंग छा जता है। इन दिनों भगवा रंग इठला रहा है। हर जगह इसकी रंगदारी देखी जा सकती है।

पता नहीं भगवा रंग का ‘भगवा’न से कोई सम्बन्ध है या नहीं किन्तु हिन्दुओं में यह पवित्रता का प्रतीक है। सांसारिक मोह त्याग का प्रतीक है। भगवा रंग कहें या गेरुआ –बात एक ही है। गेरुआ, केसरिया, भगवा, नारंगी – सभी में एक प्रकार की पारिवारिक साम्यता है। गेरुए रंग में पीले, नारंगी और लाल रंग की छाया देखी जा सकती है। ऋषि मुनियों के वस्त्र गेरुए रंग में रंगे होते हैं। इलाहाबाद में इन दिनों माघ मेला चल रहा है। संगम की रेती पर बनी कुम्भ नगरी में प्रवेश करते ही आप साधु सन्यासियों के अखाड़ों की दुनिया में पहुँच जाते हैं जहां भगवा रंग अपने उठान पर है। इस बार तो लगभग एक लाख वर्ग फुट जगह में बसा ‘संया- सिनी अखाड़ा’ भी है जिसमे गेरुआ वस्त्रधारी स्त्रियाँ टूटते हुए पुरुष वर्चस्व की घोषणा कर रही हैं। अपने अपने अखाड़ों में तो उनकी उपस्थिति है ही, गेरुआ वस्त्र-धारी संन्यासी-नुमा न जाने कितने लोग इलाहाबाद की सभी सड़कों पर देखे जा सकते हैं। पूरा प्रयाग ही मानों भगवा रंग की दादागिरी में रंग गया है।

उत्तर प्रदेश के मुख्य-मंत्री योगी आदित्यनाथ जिस ‘नाथ सम्प्रदाय’ से आते हैं उसमें गेरुआ रंग “पसंद नहीं परम्परा” है। योगी जी गेरुआ साफा लगाते हैं, गेरुआ कुरता पहनते हैं, कुरते के ऊपर एक चौड़ा पट्टा भी गेरुए रंग का ही पड़ा रहता है। यहाँ तक कि उनके मोज़े और अंतर्वस्त्र तक गेरुए ही होते हैं। उन्होंने हुक्म दिया कि सरकारी बैठकों में उनके लिए जो कुर्सी डाली जाए उसपर एक गेरुए रंग का तौलिया ज़रूर रखा जाए।

बस फिर क्या था। आपकी पसंद, हमारी पसंद। पूरा लखनऊ गेरुआ-गेरुआ हो गया। जगह जगह बस यही रंग अपनी धाक जमाने लगा। देखते देखते आम हो या ख़ास हर ज़बान पर गेरुआ है। गेरुआ का जादू सर पर चढ़ कर बोल रहा है। कुछ दिन पहले तक नवाबों की इस नगरी में सफ़ेद झक कुर्ता-पाजामे का दबदबा था। अब यहाँ गेरुए कुरते की ज़बरदस्त मांग है। सिर्फ योगी और संन्यासी ही नहीं आम जन में भी गेरुए रंग का ट्रेंड बढ़ता ही चला जा रहा है। कुरते, जैकेट, गमछे, अंगोछे और दुपट्टे तक अब भगवे ही चाहिए।

आलम यह है कि कई सरकारी महकमों के सिर पर भी रंग गेरुआ चढ़ कर बोल रहा है। कई इमारतें भगवा रंग से रंगी जा चुकी हैं। यहाँ तक कि गेरुए रंग ने कई थानों को भी अपने आगोश में ले लिया है। कहाँ तक गिनाएं, सब्जी मंडी और गुड मंडी में भी यह प्रवेश पा चुका है। उत्तर प्रदेश तो उत्तर प्रदेश, भोपाल और दिल्ली तक में इसकी अकड़ महसूस की जा रही है। सारे रंग पीछे रह गए हैं। हर जगह गेरुए रंग ने अपनी रंगदारी दिखाना शुरू कर दी है।

कहाँ तो गेरुआ रंग त्याग, तपस्या और पवित्रता का प्रतीक रहा है और कहाँ यह अब अकड़ और धौंस-डपट का औज़ार बन गया है। नेतृत्व और राजनीति की हवा इसे लग गई है। कितनी अजीब बात है कि रंग तक रंग बदलने लगे हैं।

होली नज़दीक है। मुझे पूरा यकीन है होली इस बार भगवे रंग में ही रंगी होगी। एक फिल्मी गाना बड़ा प्रसिद्ध हुआ था – “रंग दे तू मुझे गेरुआ”। इस बार होली की यही ‘टेगलाइन’ होगी। दृश्य कुछ इस प्रकार होगा। केसरिया रंग में रंगा प्रेमी आता है। प्रेमिका इठलाते हुए कहती है, मुझे भी रंग दे तू गेरुआ। तू जोगी, तो मैं भी ”जोगन बन जाऊँगी सैंया तोरे कारन”| ... समझा करो जानम !

डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

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