संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 35 : आत्मा की दैनिक यात्राएँ // कुबेर

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प्रविष्टि क्र. 35 संस्मरण आत्मा की दैनिक यात्राएँ कुबेर जाहिर है, पांच-छः दशक पूर्व मैं भी बच्चा रहा होऊँगा। उस समय के बच्चे आजकल के बच्चों ...

प्रविष्टि क्र. 35

संस्मरण

आत्मा की दैनिक यात्राएँ

कुबेर

जाहिर है, पांच-छः दशक पूर्व मैं भी बच्चा रहा होऊँगा। उस समय के बच्चे आजकल के बच्चों की तरह नहीं होते होंगे। मैं भी आजकल के बच्चों की तरह नहीं रहा होऊँगा, यह तय है। कारण साफ है - तब न तो कंप्यूटर देवता होते थे और न ही इंटरनेट मुनि। बडों से सवाल पूछने में झिझक होती थी, डर लगता था। हम लोग सारा समय खेल और मस्ती में जाया करते थे। गाँव के खेत-खलिहानों में, आम-अमरइया और चौपालों में समय बीतता था। आजकल के बच्चे दिन भर अपने कंप्यूटर देवता से चिपके रहते हैं। अपना हर सवाल कंप्यूटर देवता से पूछ लिया करते हैं। इंटरनेट मुनि के पास इनकी हर जिज्ञासा, हर शंका और इनके सारे प्रश्नों के जवाब मौजूद रहते हैं। इनके सवालों की बौछारों से इंटरनेट मुनि कभी झल्लाते भी नहीं हैं। इसीलिए किसी सवाल के लिए आजकल के बच्चों को न तो माँ-बाप की जरूरत होती और न ही बड़े-बुजुर्गों की।

हमारा जमाना अलग था। कंप्यूटर देवता प्रचलन में नहीं आये थे। बड़े-बुजुर्ग ही हमारे कंप्यूटर देवता हुआ करते थे। वे भी आज के कंप्यूटरों की तरह ही होते थे। इंटरनेट मुनि के बिना कंप्यूटर देवता भला किसी प्रश्न का जवाब दे सकेंगे? इसी तरह मर्जी और मूड हमारे जमाने के बड़े-बुजुर्ग रूपी कंप्यूटर देवताओं के इंटरनेट मुनि हुआ करते थे। उनका मूड न होने पर उनसे कुछ भी पूछ पाना संभव नहीं होता था। डाट अलग पड़ती थी।

कई मामलों में हमारे ये बुजुर्ग कंप्यूटर देवता आज के कंप्यूटर देवताओं से बहुत बेहतर होते थे। वे हमें प्यार करते थे। सिर में हाथ फेरकर आशीर्वाद और दुआएँ देते थे। हमारे भले-बुरे और सुख-दुख का खयाल रखते थे। अच्छा काम करने पर शाबासी और गलत-सलत करने पर झिड़की मिलती थी।

मेरा कंप्यूटर देवता मेरे पड़ोस में ही रहते थे। मैं उन्हें ’बबा’ कहता था। हमारे घर में उनका आना-जाना था; सभी उनका सम्मान करते थे। आदमी की अवस्था के बारे में तब मुझे समझ तो थी नहीं कि उनकी अवस्था के बारे में कुछ बताऊँ, पर इतना जरूर कह सकता हूँ कि मेरे जवान होने से पहले ही वे इस दुनिया को छोड़ चुके थे। टेरीकॉट और फैंसी कपड़े तब नहीं बनते थे। वे कोष्टउहाँ धोती पहनते थे। लाठी लेकर चलते थे। दांत झड़ जाने के कारण गाल पिचक गये थे। अब बापू का लाठीवाला चित्र देखता हूँ तो मस्तिष्क में उनकी ही छबि बनती है।

बबा के पास बैठना मुझे अच्छा लगता था। वे मुझे बहुत स्नेह करते थे। मेरे सारे प्रश्नों का उत्तर देते थे। दिमाग में इंटरनेट मुनि के अवतरित होने अर्थात् मूड होने पर वे खुद ही ज्ञान-विज्ञान का पिटारा खोलकर बैठ जाते थे। कुछ नहीं पूछने पर भी बहुत सारी बातें बताया करते थे। वे मुझे चांद-सूरज, धरती-आकाश और ग्रहों और तारों के बारे में बताते थे। चाँद पर दिखनेवाला धब्बा धान कूटती हुई किसी बुढ़िया का है, ऐसा उसी ने बताया था। यह उनका पारंपरिक ज्ञान था। आदमी अपनी परंपराओं और संस्कारों से बहुत कुछ अर्जित करता है। गाँवों में तब ढेंकी और मूसल ही धान कुटाई का साधन हुआ करते थे। यह काम महिलाएँ ही करती थी। वे रामायण और महाभारत की कहानियाँ भी सुनाते थे। तोता-मैना, बेंदरा-भालू, बघवा-सियार, डोकरा-डोकरी और बाम्हन-बम्हनिन के किस्से सुनाते थे। भूत-प्रेतों के बारे में बताते थे। अपने राज के राजा और गाँव के मालगुजार के कारनामों और उनके द्वारा ढाये गये जुल्मों के बारे में बताते थे। अंग्रेजों के अत्याचारों की घटनाएँ सुनाते थे। परंतु इंटरनेट मुनि के रूठ जाने पर अर्थात् मूड न होने पर वे झिड़क भी देते थे। कहते थे - ’’मनवा! बहुत सवाल पूछता है तू। स्कूल में मास्टरजी से पूछता है?’’

तारों के बारे में वे बताते थे - ’’ये तारे और कुछ नहीं हैं, आदमी की आत्माएँ हैं। आदमी के मरने के बाद उनकी आत्माएँ आसमान में जाकर तारे बन जाया करते हैं। तारे बनकर रात में चमकने लगते हैं।’’

’’मरने के बाद आत्माएँ तारे बन जाते हैं?’’

’’हाँ।’’

’’सबकी आत्माएँ?’’

’’नहीं, जो पुण्य का काम करते हैं, उन्हीं की आत्माएँ तारे बनते हैं।’’

’’पापी लोगों की आत्माएँ तारे नहीं बनते हैं?’’

’’नहीं।’’

’’मरने के बाद आप भी तारे बन जाओंगे?’’

’’पता नहीं। शायद नहीं। हमने कहाँ कोई पुण्य का काम किया है।’’

’’और पेटला महराज की आत्मा?’’

’’पता नहीं।’’

’’हमेशा माला फेरते रहते हैं न। सुबह भगवान जी की आरती करते हैं। घंटियाँ बजाते हैं। शंख बजाते है। दिन में कीर्तन करते हैं। क्यों नहीं बनेंगे?’’

’’और? और क्या जानते हो पेटला महराज के बारे में? यह सब तो दिखावा है, मनवा! तुम उसे नहीं जानते।’’

’’और मैं?’’

’’मेहनत करके खाना। लोगों को मत सताना। किसी प्राणी को मत दुखाना। झूठ मत बोलना। माँ-बाप की सेवा करना। जरूर तारे बनोगे। जुग-जुग चमकोगे।’’

अब, जबकि जान गया हूँ कि तारों के निर्माण की प्रक्रिया अलग है। आत्मा का इससे कोई लेना-देना नहीं है, तब भी बबा की कही बातें मुझे गलत नहीं लगती हैं। और फिर पूर्व में प्रमाणित अनेक वैज्ञानिक सिद्धांत भी तो आगे चलकर गलत साबित होते हैं। विज्ञान का यह कहना अभी भी सत्य है कि ब्रह्माण्ड में द्रव्य और ऊर्जा में आपसी रूपान्तरण की प्रक्रियाएँ चलती रहती हैं। तब? तारा बनकर आसमान में कोई चमके, न चमके; बबा जरूर चमकते होंगे। आज भी बबा मेरी यादों में तारों की तरह चमकते रहते हैं।

एक बार मेरे इसी बुजुर्ग कुप्यूटर देवता ने बताया था - ’’मनवा! सुन रहा है न तू। आदमी जब गहरी नींद में होता है तब उसकी आत्मा शरीर छोड़कर बाहर घूमने निकल जाती है। नींद खुलने के पहले परिवार में, सगे-संबंधियों में, देश-विदेश में, आकाश-पाताल में, स्वर्ग-नरक में, कहीं भी स्वतंत्रतापूर्वक घूमकर लौट आती है।’’

’’आत्मा कैसी होती है?’’

’’इसे कोई नहीं देख सकता। सबके सो जाने पर निकलती है।’’

’’हाथ-पैर होते हैं कि नहीं?’’

’’नहीं’’

’’फिर चलती कैसे है?’’

’’यह दीये की लौ तरह होती है। शरीर के बाहर आते ही लौ चारों ओर फैल जाती है। और पलभर में ही कहीं भी पहुँच जाती है।’’

’’देश-विदेश और स्वर्ग-नरक तो बहुत दूर होते हैं, कभी लौटने में विलंब नहीं होता होगा?’’ मैं पूछता था।

वे बताते थे - ’’कभी नहीं। आत्मा की गति मन की गति से भी अधिक होती है। आने-जाने में समय नहीं लगता। हाँ! आदमी की आयु जब पूरी हो जाती है, तभी वह लौटकर नहीं आती।’’

’’इस दौरान वह लोगों से बातचीत, मुलाकात वगैरह भी कर लेती होगी?’’

’’जरूर। पर आत्माओं के साथ ही।’’

’’मैं तो खूब सपने देखता हूँ। आत्माएँ बाहर जो देखती होंगी, वही सब हमारे सपनों में आते होंगे?’’

’’धत्। मनवा! सपने तो सपने हैं। आत्मा का इससे संबंध होता होगा?

’’आपकी आत्मा भी जाती होगी?’’

’’जरूर जाती होगी।’’

’’आपको पता नहीं?’’

’’नहीं।’’

’’किसे पता होता है?’’

’’साधकों को। इसके लिए बड़ी साधना की जरूरत होती है।’’

’’मैं भी नहीं जान पाऊँगा?’’

’’ज्ञानियों की संगति करना। खूब साधना करना। जरूर जान पाओगे।’’

बबा की बातों पर मुझे विश्वास था। मैं रात में आत्माओं को शरीर से निकलकर बाहर घूमते हुए देखना चाहता था और हमेशा इसकी विधि तलाशता रहता था।

कल ही अखबार में मैंने पढ़ा - कुछ साल पहले वैज्ञानिकों ने क्लोनिंग तकनीक से डॉली नामक भेड़ पैदा किया था। अब इसी तकनीक से बंदर के जुड़वा बच्चों को पैदा करने में वे सफल हो गये हैं। जल्द ही यह विधि मनुष्यों पर सफल हो सकेगी।

विलुप्त हो चुके जीवों को फिर से पैदा करने के लिए या विलुप्ति के कगार पर खड़े जीवों के रक्षण के लिए यह तकनीक जरूर किसी वरदान से कम नहीं है। परंतु मनुष्य के मामले में? जनसंख्या जब इतनी तेजी से बढ रही है, तब आदमी पैदा करने के लिए क्लोनिंग तकनीक की क्या आवश्यकता है? सवाल मुझे महत्वपूर्ण और सामयिक लगा। पर इसका जवाब कौन देगा। सोचा, क्लोनिंग तकनीक से बंदर के जुड़वा बच्चों को पैदा करनेवाले वैज्ञानिकों से ही मिलकर इसका उत्तर पूछना चाहिए। पर कैसे? यह सवाल मुझे मथने लगा। दिनभर मथता रहा। रात में भी पीछा नहीं छोड़ा।

पता नहीं, कैसे। पर अंततः क्लोंनिंग तकनीक पर अनुसंधानरत एक वैज्ञानिक से मिलने में मैं सफल हो ही गया। रात काफी हो चुकी थी पर वह अपनी प्रयोगशाला में अपने अनुसंधान और प्रयोगों में व्यस्त था। मैं उनसे अपना सवाल पूछना चाहता था। पर उन्हें व्यवधान पहुँचाना उचित नहीं था। और फिर वैज्ञानिक आपने शोध कार्यों को गुप्त रखते हैं। किसी नतीजे पर पहुँचे बिना किसी भी जानकारी को वे सार्वजनिक नहीं करते हैं। सरकार के नियंत्रण में काम करते हैं। खुफिया विभाग के अधिकारियों की सख्त निगरानी रहती है। ऐसे में मुझे दुश्मन देश का भेदिया होने के शक में गिरफ्तार भी किया जा सकता था। और फिर वैज्ञानिक भी तो आखिर मनुष्य ही होते हैं। वह सच को छिपा सकता था। मुझे टाल सकता था। अतः मैं उनके सोने की और उनकी आत्मा के बाहर आने की प्रतीक्षा करने लगा।

धीरज का भी फल मीठा होता है। आखिर मेरी प्रतीक्षा पूरी हुई। उस वैज्ञानिक की आत्मा से मैंने सम्मानपूर्वक हाथ मिलाया और झटपट आपना ऊपरवाला सवाल दुहरा दिया।

उसने कहा - ’’आपका सवाल बहुत ही उचित है। हमारा प्रयोग न तो जनसंख्या नियंत्रण के लिए है और न ही जनसंख्या विस्तार के लिए ही। ये सब तो आप लोगों के हाथों में हैं। इस प्रयोग के अनेक मानवीय पहलू हैं। क्लोनिंग तकनीक से बच्चे पैदा करना तो बाद की बात है। सबसे पहले हम बीमारियों पर विजय प्राप्त करना चाहते हैं। आप जानते ही होंगे, मनुष्य में अनेक बीमारियाँ आनुवांशिक होती हैं। केंसर, मधुमेह और एड्स जैसी अनेक असाध्य बीमारियाँ भी हैं जिनका कोई उपचार नहीं है। इन बीमारियों को पैदा करने के जीन्स मनुष्य के गुणसूत्रों में ही पाये जाते हैं और संतानों में स्थानांतरित होते रहते हैं। इस तकनीक से ऐसे सभी रोगों के जीन्स को हम गुणसूत्रों से अलग कर देंगे और उनकी जगह मनुष्य की रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ानेवाले जीन्सों को स्थापित कर देंगे। तब मनुष्य कभी बीमार ही नहीं होगा। इस तरह हम बीमारियों पर विजय पा लेंगे। पौधों पर इसी तरह के प्रयोग द्वारा कीटनाशकों और ऊर्वरकों के बगैर ही फसलों का उत्पादन हम कई गुना बढ़ाने में सक्षम हो सकेंगे।’’

’’निश्चित ही यह एक महान कार्य है। इसके लिए आपको बधाई।’’

’’सो तो ठीक है। परंतु हमें शंका है कि इस प्रयोग का लाभ आम जनता को मिल सकेगा।’’

’’क्यों?’’

’’क्योंकि दवा बनानेवाली कंपनियाँ ऐसा नहीं चाहती।’’

’’ओह! दुर्भाग्य। एक सवाल और पूछना चाहता हूँ - मानवता की राह में सबसे बड़ी बीमारी तो लोगों में पनप रहा भ्रष्ट आचरण है। कामुकता और हिंसा की वृत्ति है। मनुष्य के गुणसूत्रों में इनके भी जीन्स होते होंगे। क्या इन जीन्सों को निकालकर इनकी जगह सदाचरण और अहिंसा के जीन्स प्रतिरोपित करके अच्छा इन्सान विकसित करने के लिए आप लोग कोई प्रयोग नहीं कर रहे हैं?’’

मेरे इस सवाल से वह कुछ विचलित हुआ। दुखी मन से उसने बताया - ’’हम भी ऐसा ही चाहते हैं। पर आप तो जानते ही हैं। इस तरह के अनुसंधान कार्य में काफी धन खर्च होता है। इस अनुसंधान में जिन धनपतियों का धन लग रहा है वे ऐसा नहीं चाहते। वे तो भ्रष्ट आचरण, कामुकता और हिंसा की वृत्तियाँ पैदा करनेवाले जिंन्सों को अधिक से अधिक फैलाना चाहते हैं ताकि हथियारों का उनका कारोबार अधिक से अधिक फल-फूल सके, बढ़ सके।’’

’’सरकार के रहते वे ऐसा कैसे कर सकते हैं?’’ मैंने जानना चाहा।

’’सरकार?’’ उसने आश्चर्य से मेरी ओर देखा।

बात पूरी हो पाती, इसके पहले ही उसके शयनकक्ष में लगी घड़ी का अलार्म बजने लगा और वह वैज्ञानिक आत्मा तुरंत अपने शरीर में लौट गई।

इधर मेरे भी बेडरूम में बेड-टी का प्याला लेकर खड़ी मेरी पत्नी का अलार्म बजने लगा था।

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000 कुबेर 000

परिचय

कुबेर


जन्म तिथि: 16 जून 1956

जन्म स्थान (स्थायी पता): ग्राम-भोडि़या, पोस्ट - हरदी,

वार्ड 51, राजनांदगाँव (छ.ग.), पिन 491441


प्रकाशित कृतियाँ -

1. भूखमापी यंत्र (कविता संग्रह)

2. उजाले की नीयत (कहानी संग्रह)

3. भोलापुर के कहानी (छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह)

4. कहा नहीं (छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह)

5. छत्तीसगढ़ी कथा कंथली (छत्तीसगढ़ी लोककथा संग्रह)

6. माइक्रोकविता और दसवाँ रस (व्यंग्य संग्रह)

7. ढाई आखर प्रेम के (अंग्रेजी कहानियों का छत्तीसगढ़ी अनुवाद)

प्रकाशन की प्रक्रिया में -

1. कुत्तों के भूत (व्यंग्य संग्रह)

2. कुछ समय की कुछ घटनाएँ: इस समय (कविता संग्रह)

3. मेमोरी कार्ड (कहानी संग्रह)


संप्रति - व्याख्याता,

शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला कन्हारपुरी, वार्ड 33,

राजनांदगाँव (छ.ग.) पिन 491441

E Mail - kubersinghsahu@gmail.com

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र 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रचनाकार: संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 35 : आत्मा की दैनिक यात्राएँ // कुबेर
संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 35 : आत्मा की दैनिक यात्राएँ // कुबेर
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