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रामानुज श्रीवास्तव अनुज की 5 ग़ज़लें


..........(01)

टूटे हज़ार बार जुड़े जिंदगी से हम।

लगने लगे हैं फिर से किसी आदमी से हम।


उठता है दर्द जब भी जिगर के करीब से,

आँखों को पोंछते हैं बड़ी सादगी से हम।


अपने ही आइने से अभी इस तरह मिले,

जैसे मिले कभी थे किसी अज़नबी से हम।


बदनाम बस्तियों से मिले कौन आ गले,

किसको बुला रहें हैं बड़ी आजिज़ी से हम।


पागल समझ रहे थे मगर हम बता दिये,

रुख़सत अभी हुये हैं गमे जिंदगी से हम।


मरने का रंज अपने कोई क्यूँ अधिक करे,

बेशक नहीं मरे हैं कभी आदमी से हम।


कुछ भी गलत कहोगे लिखेंगे बुरा "अनुज"

डरते नहीं है दोस्त तिरी दुश्मनी से हम।


(2)

कहीँ मतला कहीँ मक़्ता कहीँ अशआर मिलते हैं।

कहीँ आँखे कहीँ नज़रे कहीँ रुखसार मिलते हैं।


मुकम्मल हो ग़जल कैसे कहाँ सूरज लिये भटकें,

कहीँ ग़ालिब कहीँ मोमिन कहीँ गुलज़ार मिलते हैं।


दवाओं से खफ़ा होकर हकीमो रूठ मत जाना,

यहीँ सब मर्ज मिलते हैं यहीँ बीमार मिलते हैं।


बराबर सब नहीं मिलते वजह क्या है खुदा जाने,

बिना सर के कहीँ मिलते कहीँ सरदार मिलते हैं।


वहीँ खबरें बनाते हैं जहाँ खबरें नहीँ बनती,

भला ऐसी हुनर वाले कहाँ अख़बार मिलते हैं।


तसव्वुर में उतर कर हम जिसे अपना बना बैठे,

उसी के हाथ के भेजे अभी तक तार मिलते हैं।


अदब के ऐ कद्रदानों चलो सर काटकर अपने,

सुना है इक जगह ऐसी जहाँ सरदार मिलते हैं।


(3)

काँप जाये सप्त सागर काँप जाये उर नदी का।

है कहाँ ललकार ऐसी डोल जाये सर मही का।


पीर जो पहले उठी थी क्या हुआ क्यों दब गई,

क्यूँ नहीं बहता है पानी आँख से गहरी नदी का।


कवि ह्रदय अब मंच से तुम गीत कैसे पढ़ रहे,

क्या तुम्हें मालूम नहीं है गीत कैसा है सदी का।


ग्लानि से मन भर उठा है कवि तुम्हारे छंद सुन,

ओ कहाँ है आँख तेरी जो दिखाये पथ सही का।


व्यथित है कितनी मनुजता व्यक्त हम कैसे करे,

है कोई जो ढूंढ़ लाये शब्द अपनी अनकही का।


पुस्तकें सब बन्द करिये जो पुरानी हो गयी,

फिर नये अर्थों से करिये तर्जुमा खाता बही का।


शाम के आने से पहले बात कह डालो "अनुज"

फिर अंधेरी रात आये कौन सुनता है किसी का।


(4)

गगन में बाग़ पैदा कर जमीं में जाग पैदा कर।

बड़ा फ़नकार बनता है कलम से आग पैदा कर।


हवा ने रुख नहीँ बदला तो समझो आग फैलेगी,

समन्दर से कहो कोई हवा में नाग पैदा कर।


तनी जब तान बैजू की तो सच में संग पिघला है,

अगर झूठा समझता है तो स्वर में राग पैदा कर।


तलातुम में फँसी कश्ती कभी भी हार न माने,

तो मांझी के इरादों में नया अनुराग पैदा कर।


मशीनी कोशिशों से तो नहीं आये अमन शायद,

अगर खुशहाल होना है दिलों में लाग पैदा कर।


खिलौने हर दुकानों के सभी महँगे नहीं बिकते,

अगर कीमत उठानी है तो अच्छी माँग पैदा कर।


मुहब्बत की तराजू में जिसे तौल वही कम था,

अगर झूठा समझता है नजर बेदाग पैदा कर।


(5)

बैठा बैठा बालकनी में सूरज चाँद निकलते देख।

नील गगन में बिजली को नित गीले वस्त्र बदलते देख।


चलती फिरती परछाई का नाम पता कुछ मालूम कर,

अगले दिन के अखबारों में फोटू सबकी छपते देख।


दूर गली के पार झांककर देख खुली पगडंडी को,

उसके तन को कुचल रौंद कर बढ़ते पक्के रस्ते देख।


शौक लगा है जिन्हें रात दिन कपड़े नये पहनने का,

उन कपड़ों की भरी जेब से दो दो आने गिरते देख।


किया भरोसा जिस पर सबने वो औंधे मुँह पड़ा मिला,

अब पछतावा करना कैसा मक्खी मुँह से उड़ते देख।


किल्लत जिल्लत देखी भाली मरना जीना लगा रहा,

अब की बारी हिम्मत की है पूँछ उठाकर भगते देख।


छत में बैठा देख ताक ले रंग बिरंगी दुनिया को,

आखिर में फिर नीचे आकर अरमानों को मरते देख।


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1...पूरा नाम रामानुज श्रीवास्तव पिता का नाम श्री रामदुलारे श्रीवास्तव

2.उपनाम.....अनुज

3...चित्र...मेल के साथ संलग्न है।

4..जन्मतिथि...25 जुलाई 1958

5...जन्मस्थान..ग्राम धोवखरा जिला रीवा म.प्र.

6...प्रकाशित पुस्तकें... सलिला, रोटी सेंकता सूरज (दोनों काव्य संग्रह) अभी सुबह नहीं,

                                   अभी ठहरा नहीं हूँ,  अनकहा सच,  मैं बोलूँगा,  दस्तार, (ग़जल संग्रह)

प्रकाशनार्थ... जूजू (उपन्यास)  चल साजन घर आपने (दोहा संग्रह) एक व्यंग संग्रह। सभी किताबें

किताबगंज प्रकाशन नई दिल्ली से प्रकाशित।

ग़ज़लें 7574260211472532946

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