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होली की लोक-परम्परा // राजेन्द्र जोशी

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मरु शहर बीकानेर में होली की लोक-परम्परा :- परकोटायुक्त शहर की होली में तथा वृहद् परम्परा के रूप में पूरे राष्ट्र में मनाई जाने वाली होली में...

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मरु शहर बीकानेर में होली की लोक-परम्परा :-

परकोटायुक्त शहर की होली में तथा वृहद् परम्परा के रूप में पूरे राष्ट्र में मनाई जाने वाली होली में काफी अन्तर नज़र आया। बरसाने की होली व बीकानेर के परकोटायुक्त शहर की होली में कुछ समानता है। दोनों क्षेत्रों में होली की शुरुआत बसन्तोत्सव से मन्दिरों में प्रारम्भ होती है। बल्लभ सम्प्रदाय के मन्दिरों में प्रतिदिन फाग उत्सव मनाया जाता है। राधा-कृष्ण के बीच प्रेमरस पर आधारित भक्तिगीतों से होली का आगाज़ होता है।

शाम को प्रत्येक मौहल्ले में लोग चंग बजाते हुये लोकगीत गाते व नाचते हैं। यह परम्परा गांवों व परकोटायुक्त शहर के अन्दर व बाहर - दोनों तरफ देखी जा सकती है।

लेकिन विधिवत् रूप से होली की शुरुआत होली से सात दिन पहले होती है। यहीं से लोकजीवन में होली का रंग रचने लगता है। रात्रि 9 बजे के बाद शहर में युवा वर्ग की मण्डलियाँ चंग-मजीरे के साथ विभिन्न प्रकार के स्वांग रचाकर नृत्य करती हुई विभिन्न मुहल्लों से गुजरती है। परकोटायुक्त शहर की होली की अपनी निश्चित प्रक्रिया है, जो इस प्रकार है

(अ) खम्भरोपण :-

खम्भ स्थानीय शब्द है जिसका अर्थ स्तम्भ है। यह लकड़ी का एक कलात्मक चित्रमय स्तम्भ है। जिसके चारों अनेक देवताओं के चित्र अंकित होते हैं। यह खम्भ (स्तम्भ) मन्दिरों में सुरक्षित रखे होते हैं। फाल्गुन सुदी चौथ के बाद गुरुवार या शनिवार को शुभ नक्षत्र एवं प्रहर में मौहल्ले के सभी पुरुष एकत्रित होते हैं। स्तम्भ की सबसे पहले सफाई करते हैं और निर्धारित स्थान पर उसका रोपण करते हैं। उसके बाद वंशानुगत ब्राह्मण, पण्डित तथा यजमान सामूहिक रूप से वैदिक मन्त्रोचारण करके पूजा-अर्चना के साथ खम्भरोपण परम्परा सम्पन्न करते हैं। उसके बाद प्रसाद का वितरण होता है। खम्भ का प्रसाद प्रत्येक घर से नारियल रेवड़ी के रूप में मंगवाया जाता है। जिस घर में इस वर्ष शादी हुई, लड़के का जन्म हुआ, उस घर से अधिक भेंट ली जाती है। यह परम्परा लगभग 450 वर्षों से चली आ रही है।

जब पूछा गया कि खम्भरोपण का होली से क्या वास्ता है, तो वृद्धजनों ने बताया कि खम्भ का सम्बन्ध नृसिंह अवतार के खम्भ से है। जिस खम्भे से हरिण्यकष्यप ने प्रह्लाद को बांधा था, उसी खम्भे से भगवान् विष्णु ने नृसिंह अवतार लिया था। उसी प्रसंग का यह प्रतीक है। यह खम्भा होली के समय होने वाली दुर्घटना, अनिष्ट व दुरात्माओं से हमारी रक्षा करता है। होलिका दहन के साथ इसे निकाल कर वापस मन्दिर में रख दिया जाता है।

भारत के अन्य क्षेत्रों में खम्भरोपण होता है। लेकिन परकोटायुक्त शहर के खम्भरोपण व अन्य क्षेत्रों के खम्भरोपण में अन्तर है। दूसरे क्षेत्रों में खम्भरोपण वहाँ किया जाता है, जहाँ होली-दहन किया जाता है। उस खम्भ का स्वरूप बाँस या बल्ले का होता है। उसमें किसी प्रकार का चित्रण व धार्मिकता नज़र नहीं आती, लेकिन परकोटायुक्त शहर में खम्भ-रोपण वाली जगह होलिका-दहन नहीं किया जाता है।

(आ) खेल सप्तमी :-

खेल सप्तमी को होलिका लगना भी कहा जाता है। इस दिन के बाद सभी प्रकार के शुभकार्य निषिद्ध माने जाते हैं। मन्दिरों में फाग उत्सव में गुलाल का प्रयोग प्रारम्भ हो जाता है। फाल्गुन सुदी सत्तमी से होलिका लगना माना जाता है। इस दिन मन्दिरों में वंशानुगत पुजारी शाकद्वीपीय ब्राह्मणों का सामूहिक भोज आयोजित होता है। पहले यह भोज राजपरिवार की कुलदेवी नागाणी देवी के मन्दिर में सम्पन्न होता था। कालान्तर में जातीय परिवर्तन के कारण विभिन्न स्थानों पर भोज होने लगे हैं। रात्रि में सभी शाकद्वीपीय ब्राह्मण परिवारों के पुरुष नागाणी मन्दिर में एकत्रित होते हैं। वहीं से गेवर के रूप में लोकगीत गाते शहर की विभिन्न गलियों से गुजरते हैं। इस तरह पूरे शहर में होलिका लग जाती है। प्रत्येक व्यक्ति का व्यवहार रंगीला व मस्तमौला हो जाता है।

वहीं दूसरी तरह चौवतियाँ जोशी परिवार में सब्जी न बनाने का निषेध प्रारम्भ हो जाता है।

(इ) गेर परम्परा :-

गेर राजस्थान व गुजरात में प्रचलित देशज शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ है -

राजस्थान में भरतपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा व जैसलमेर में भी गेर परम्परा है और इन स्थानों पर होली के अवसर पर गेर निकलती है। लेकिन परकोटायुक्त शहर में गेर को गेवर भी कहते हैं। यहाँ गेर की अपनी मौलिकता है। यहाँ जातीय एवं संगठनात्मक तरीके से गेर निकलती है। इसके पीछे निश्चित प्रतिमान पाये जाते हैं। परकोटायुक्त शहर में होली के अवसर पर लगभग अलग-अलग समय में आठ गेर निकलती हैं। गेर में सैकड़ों लोग लोक-परम्परागत गीत गाते हुए चलते हैं। रास्ते में जगह-जगह गुलाल उछालते, व्यंगात्मक दोहे बोलते अपने निर्धारित स्थान तक जाते हैं। वर्तमान में निकलने वाली गेवर से सबसे पहले खेल सप्तमी को शाकद्वीपीय ब्राह्मणों की गेवर, उसके बाद कीकाणी व्यासों की गेवर, हर्षों की गेवर, बारहगुवाड़ की गेवर, आचार्यों की गेवर, तणी तोड़ने की गेवर, साले की होली दहन पर साला परिवार की गेवर प्रमुख हैं। गेवर में केवल पुरुष होते है। स्त्रियाँ गेवर को केवल मकानों की छतों पर जाकर दर्शक बनकर देखती हैं। गेवर के लोग अपने सगे-सम्बन्धियों व वैवाहिक नातेदारों की स्त्रियों को देखकर व्यंग्यात्मक अश्लील दोहे बोलते हैं।

(ई) डांडिया नृत्य प्रारम्भ :-डांडिया नृत्य उत्तर भारत की प्राचीन नृत्यशैली है। द्वापर युग में कृष्ण-राधा के बीच डांडिया नृत्य का उल्लेख मिलता है। प्राचीन मन्दिरों के भित्तिचित्रों में डांडिया नृत्य का चित्रण देखा जा सकता है। डांडिया नृत्य में समूह के रूप में पुरुष व स्त्रियाँ लकड़ी के छोटे बाँस, जिनकी लम्बाई 2 या 3 फुट होती है, लेकर नगाड़ों व मजीरे की ताल पर तालमय नृत्य करते हैं।

परकोटायुक्त शहर में स्थित मरूनायक चौक में एतिहासिक मरूनायक मन्दिर में सन् 1656 से ढोल पूजा के साथ डांडिया नृत्य होता आ रहा है। फाल्गुन सुदी सप्तमी को विधि विधान से नृत्य एवं सास्कृतिक गतिविधिया सम्पन्न होती हैं, उसके बाद यह नृत्य खुले चौक में फाल्गुन सुदी 14 तक निरन्तर रात्रि में 10 बजे से 1 बजे तक चलता है। नृत्य के दौरान श्रृंगार रस पर आधारित लोकगीत गाये जाते हैं। ये गीत पंचम सुर में गाये जाते हैं।

(उ) रम्मतों का प्रारम्भ :-

परकोटायुक्त शहर लोकनाट्य रम्मतों के लिये भी प्रसिद्ध है। पाटे रम्मतों के मंच हैं। बीकानेर में नौं मौहल्लों में रम्मतें रात्रि दस बजे प्रारम्भ होकर अगले दिन सुबह 9 बजे तक चलती है । इसमें पारम्परिक लोकगीतों, ऐतिहासिक घटनाओं, राजनीतिक घटनाओं आदि से सम्बन्धित विषयों पर नाट्य होता है। रम्मतों के पात्र मौहल्ले के ही पुरुष सदस्य होते है। स्त्रियों की भूमिका भी पुरुष निभाते है। बीकानेर की रम्मत परम्पराएं विषेष जातियों एवं परिवारों से जुड़ी हुई है।

(ऊ) होली-दहन :-

फाल्गुन सुदी पूर्णिमा की शाम के मुहूर्त के अनुसार विभिन्न मौहल्लों में लकड़ी के ढ़ेर के रूप होलिका बनाई जाती है। जिसके बीच में एक लकड़ी का खम्भ रोपा जाता है। वह प्रह्लाद का प्रतीक होता है। इस दिन सुबह सभी हिन्दू परिवारों में गोबर के गोल चक्करों से बनी माला को बहिन व बुआ अपने भाइयों व भतीजों के सिर पर पानी के लोटे के साथ सात बार घुमाती हैं, तिलक करती हैं और उसे मिठाई खिलाती हैं। भाई अपनी बहिनों को बदले में रुपये देता है। वर्तमान में गोबर की माला की जगह फूलों की माला का उपयोग होने लगा है। शाम को सभी गोबर की मालाएं होलिका-दहन के समय होलिका सहित जला दी जाती हैं।

शहर के विभिन्न स्थानों पर होलिका-दहन होता है। लेकिन सबसे बड़ी व परम्परागत होली साले की होली है। साले की होली क्या है ? इस विषय में लोगों से विस्तार से जानकारी प्राप्त करने पर निम्नलिखित तथ्य प्राप्त हुए :-

साले की होली सालोजी राठी के वंशजों एवं उनके साथियों की सामूहिक होली है। बीकानेर स्थापना के समय राव बीका के साथ वे सन् 1465 में बीकानेर क्षेत्र में आये। वे प्रारम्भ में सालासर गांव में रुक गये। वहीं अपना डेरा डाला। जब राव बीका ने राती घाटी पर सन् 1488 में बीकानेर शहर की स्थापना की तब वे तथा उनके पुत्र व सगे-साथी, जिनमें रत्ताणी व्यास, छंगाणी वंषज, मूधांडा सेवग भी शहर में आकर रहने लगे। शहर में मरुनायक मन्दिर की स्थापना की गई। मरुनायक मन्दिर में आज भी पुजारी मूधांडा सेवग हैं। कथावाचन रत्ताणी व्यास (ब्राह्मण) करते हैं। पंचांग देखने का कार्य छंगाणी-वंशज जोशी करते हैं। मन्दिर के ट्रस्टी साला-वंशज हैं। इन तथ्यों से यह प्रमाणित होता है कि रियासतकाल में स्थानान्तरण की प्रक्रिया व्यक्तिगत न होकर सामूहिक रूप से होती थी। जिसमें जजमानी व्यवस्था के सभी सदस्य एक साथ पलायन करते थे।

परकोटायुक्त शहर में साले की होली क्षेत्र में साला-परिवार के बहुत कम लोग रहते हैं। इस क्षेत्र में होलिका-दहन के लिए साला-वंशज के सभी सदस्य व उनके सगे-साथी ब्राह्मण एक निश्चित स्थान से सामूहिक रूप से गेवर के रूप में लोक-प्रतीक-देवता ’’गोदोजी‘‘ को लेकर रवाना होते हैं। एक निश्चित हद या सीमा तक पहुँच कर दूसरी जाति जैसे छंगाणी गेवर के रूप आकर गोदोजी पर गुलाल डालते हैं तब वे आगे एक साथ रवाना होते हैं। कुछ दूर जाकर फिर रूक जायें और बायें तरफ के रास्ते से रत्ताणी व मूधांडा सेवगों की गेवर आती है। वे भी लाल गुलाबी नामक गीत गाते आते हैं। गुलाल उडाते हैं। तब आगे रवाना होते हैं और सभी जातियों के व्यक्ति निर्धारित स्थान पर पहुँचते हैं और साला-वंशज के दीवान मोहता परिवार के बुजुर्ग सदस्य होली का दहन मन्त्रोच्चारण के साथ करते हैं और ब्राह्मण साथी जातियाँ होलिका के चारों तरफ लकडियाँ लिये चक्कर लगाते हैं और गीत गाते हैं। जब होलिका-दहन होने लगता है तब नवदम्पती, नवजात शिशु आदि का ढुंढणा किया जाता है। लोग नवदम्पती को गोद लेने की माँग करते हैं। अर्थात दूल्हा दुल्हन को गोद में उठाये। इसकी माँग बड़े-बुजुर्ग करते हैं। उनकी बात उन्हें माननी पड़ती हैं और इस तरह पूरे शहर में होलिका-दहन के साथ धुलण्डी प्रारम्भ हो जाती है। युवा वर्ग रातभर टोलियों में घूमते रहते हैं। अगले दिन पूरे शहर में होली परवान पर होती है।

(ए) धुलण्डी की परम्परा :-

होलिका-दहन होने के बाद बुजुर्ग लोग पाटों पर बैठकर फाल्गुनी लोकगीत गाते हैं। अर्द्धरात्रि तक यह कार्यक्रम चलता रहता है। इसके बाद अगले दिन होलिका-दहन स्थल पर भस्म लगाने के लिए लोग गेवर के रूप में जाते हैं। साला-परिवार के लोग संगठित होकर ’’गोदोजी‘‘ के साथ भस्म लगाने जाते हैं। स्थानीय लोग इसे टीकी लगाना भी कहते हैं।

जब लोगों से पूछा कि गोदोजी को साथ लेकर जाना और भस्म लगाने का क्या तर्क है ? तो वृद्धजनों ने गोदोजी को होलिका का प्रेमी बताया और कहा कि जब होलिका जल कर भस्म हो गई तो उसके प्रेमी गोदोजी (जिसे फलौदी व जोधपुर में ईलौजी व नागौर में नाथूरामजी कहते हैं) अत्यधिक दुःखी हो गये और दीवानों व पागलों की तरह होलिका की राख को उछाल-उछाल कर अपने शरीर पर मलने लगे तथा आते-जाते राहगीरों पर राख डालने लगे तो सभी लोग उन पर भी राख डालने लगे। तभी से होली खेलने की रस्म, सबसे पहले राख का तिलक लगाने के बाद प्रारम्भ होती है। वास्तव में होली खेलने की परम्परा यहीं से प्रारम्भ हुई। ऐसी स्थानीय लोगों की मान्यता है लेकिन वैदिक साहित्य में ऐसी घटना का उल्लेख नहीं मिलता है। सर्वेक्षण से यह तथ्य सामने आया कि फलौदी तहसील तथा जोधपुर में गोदोजी या ईलोजी की मूर्ति स्थापित है। गोदोजी या ईलोजी की मूर्ति नग्न तथा पुरुषत्व अंग आवश्यकता से अधिक बड़ा है। होली के अवसर पर लोग इनके साथ होली खेलते हैं तथा सन्तानहीन स्त्रियाँ इनकी पूजा करती हैं।

इस लोक-कथानक से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय समाज में लघु व वृहद् परम्पराएँ मौलिक रूप से कहीं भी प्रचलित नहीं हैं। स्थानीय लोक-संस्कृति एवं शाश्वत परम्पराओं की मिश्रित परम्पराएँ अधिक प्रचलित हैं।

इस तरह मरू शहर बीकानेर में होली की अपनी अलग ही लोक मान्यताएं व परम्पराएं है जो बीकानेर को एक अलग पहचान देती है।

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डॉ. राजेन्द्र जोशी

प्रवक्ता श्री जैन कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय

बीकानेर

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रचनाकार: होली की लोक-परम्परा // राजेन्द्र जोशी
होली की लोक-परम्परा // राजेन्द्र जोशी
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