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संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 14 - मेरा बचपन, मेरा गाँव // छत्र पाल वर्मा

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प्रविष्टि क्र. 14 -

मेरा बचपन, मेरा गाँव

छत्र पाल वर्मा


काश! फिर से लौट आता,

मेरा बचपन, मेरा गाँव।

बन वही नन्हा सा बालक,

गली मोहल्ले धरता पाँव।


घर के पिछवाड़े खड़ा वह,

नीम बूढ़ा गीत गाता।

झूमता मस्ती में अपनी,

दादा के किस्से सुनाता।


मेरे दादाजी के दादा,

ने इसे रोपा यहाँ था।

और फिर जाने से पहले,

दादी को सौंपा कहा था।


पाँचवाँ बेटा है मेरा,

पेड़ भर न जानना।

खाद-पानी से सगे,

बेटों सा इसको पालना।


देखना इक दिन यह बिरवा,

जब सघन हो जाएगा।

मेरे बेटों के भी बेटों,

को सुकूं पहुंचाएगा।


जेठ की तपती दुपहरी,

में घनेरी इसकी छांव।

राहतें पहुंचाएगी,

जो भी बैठे इसकी ठाँव।


काश! फिर से लौट आता,

मेरा बचपन, मेरा गाँव।


और उस चौपाल पर,

फिर से सजेंगी डोलियाँ।

सरसुतिया दुल्हन बनेगी,

फन्ने खाँ दूल्हे मियाँ।


चुनिया, मुनिया का दिखावे,

का रुदन गहराएगा।

निज सहेली की बिदाई,

का समां बंध जाएगा।


आ गया चौमासा देखो,

ताल-पोखर भर गए।

काले-भूरे बादरा,

ताप महि का हर गए।


झूमकर आएगा सावन,

रखियाँ बंधवाएंगे।

पक रहे पकवान घर-घर,

पेट भर-भर खाएँगे।


अतिथि आने की खबर पर,

कौवा करेगा कांव-कांव।

नदी नालों में चलेगी,

मेरी कागज वाली नाव।


काश! फिर से लौट आता,

मेरा बचपन, मेरा गाँव।


मेरी धौली गैया का,

बछड़ा फुदक कर आयेगा।

जीभ से चाटेगा मुझको,

जोश में भर जाएगा।


शाम को बैलों की जोड़ी,

आएगी घंटी बजाती।

राम-लक्षमन आ रहे ज्यों,

देख कर आँखें जुड़ातीं।


लच्छी धींवर की कुतिया ने,

पिल्ला प्यारा सा जना है।

भीग पानी में गया वह,

इसलिए कुछ अनमना है।


कुछ दिनों के बाद खेत,

जोते  बोये जाएंगे।

और फिर फसलों के पूड़े,

खलिहानों में आएंगे।


उससे पहले होली का,

त्योहार भी तो आएगा।

आला अदना, बूढ़ा बच्चा,

रंगों में खो जाएगा।


मैं हाथों में ले पिचकारी,

खेलूँगा ऐसा कोई दाव।

उस नटखट बड़की भाभी पर,

खूब करूँगा रंग छिड़काव।


काश! फिर से लौट आता,

मेरा बचपन, मेरा गाँव।


भाभी मेरी बड़ी सयानी,

किया इशारा पास बुलाया।

मल-मल रंग मेरे गालों पर,

मुझको उसने बहुत रुलाया।


जाते-जाते धमकी दे गई,

लाला अब न शोर मचाना।

भाभी के गालों को छूने,

का न कोई ढोंग रचाना।


अब न खेलूँगा मैं होली,

भाभी का ताना खटक गया।

लौटकर बुद्धू घर को आए,

सा मेरा मुंह लटक गया।


फसल बिकी घर पैसे आए,

सबने कुछ न कुछ सिलवाया।

मैं घर में सबसे छोटा हूँ,

रंगी सूट मुझे दिलवाया।


एक-एक संगी-साथी को,

घूम-घूम कर बता रहा हूँ।

बीस रूपय में सूट है आया,

उंगली पर गिन, जता रहा हूँ।


उनकी देख-देख जिज्ञासा,

पढ़ लेता चेहरे के भाव।

और जलाने को मन उनका,

देता मैं मूँछों पर ताव।


काश! फिर से लौट आता,

मेरा बचपन, मेरा गाँव।


कैसे भूली जा सकती हैं,

जाड़ों की वो ठंडी रातें।

कंबल, चद्दर ओढ़ रज़ाई,

मुंह ढ़क कर करना वो बातें।


सूरज जब सिर पर चढ़ आता,

और आँगन में धूप निखरती।

उठने का मन ही न करता,

बिस्तर छोड़े जान निकलती।


उठना तो पड़ता ही था जब,

महतारी करती मनमानी।

सिर पर हाथ फेर कर कहती,

उठता है या डालूँ पानी?


मरता क्या न करता बस,

अलसाया सा मैं उठ जाता।

फारिग होकर नित्य कर्म से,

दस-बारह रोटी गटकाता।


गौमाता को चरवाहे के,

पास छोड़ कर जब मैं आता।

पास बैठ कर गप्पोड़ों के,

लंबी-चौड़ी गप्प लगाता।


गप्पें करता, आग तापता,

सुनकर खूब दिखाता चाव।

तब तक यह सब चलता रहता,

जब तक न बुझ जाए अलाव।


काश! फिर से लौट आता,

मेरा बचपन, मेरा गाँव।


---

छत्र पाल वर्मा

35 - शिवम् टेनेमेंट्स,

आई पी स्कूल के पास,

वल्लभ पार्क, साबरमती

अहमदाबाद 382424

संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018 3941140602696952565

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